यह कैसा अहसास - भाग 4 H.k Bhardwaj द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यह कैसा अहसास - भाग 4

 ■यह कैसा अहसास 🔲 भाग 04Written by H K Bharadwaj________________________________________________________________________________एक दिन मै अपने कमरे मै  बैठा अपनी हाई स्कूल की वार्षिक परीक्षा की तैयारी अपने कमरे में बैठा हुआ कर रहा  था। कि ठीक उसी समय अचानक एक ठंडा शीतल वायु का झोका पता नही कहाँ से एक नई गन्ध जो परिचित सी लग रही थी, लिये मेरे कमरे में घुसा। 

          मै चौंक कर इधर उधर देखने लगा कि  यह मस्त खुशबू बाला झोका कहाँ से और किस रास्ते से मेरे कमरे में घुसा था,

कि अचानक मैने सामने खिडकी की ओर देखा,

और तभी मै गुलाबों की भीनी भीनी आ रही गन्ध से चौंक गया।

 यह क्या ?

फिर वही पुरानी परिचित खुशबू मेरे नासा पुटौँ के अंदर समाई,

और इसी के साथ साथ मैं उछलकर उस खुवसूरत स्वप्न सुन्दरी को एक हवा के झौके के रुप मे ।

मेरे कमरे की खिडकी से प्रवेश करती हुई उस नाजनीन को देखा।   

         वह इठलती इतराती  अदा के साथ मेरे नजदीक से इस तरह गुजरी की उसके मनमोहक बदन की खुशबू मेरी श्वाँशो में घुल मिल कर  मुझें एक नए अहसास की अनुभूति करा रही थी ।

          पता नही यह कैसा अहसास था जो मै समझ नहीं पा रहा था,अचानक मेरे मन ने चाहा की मै निकट पड़े बैड पर थोडी देर विश्राम करू,और अगले पल मै अपने कमरे मे बिछाए गये नर्म बिस्तर पर  गिर गया ।

और मुझे पलक झपकते ही हल्की हल्की देशी गुलाबों की गन्ध ने आ घेरा,

मै सोच रहा था की मेरे घर में गुलाब का कोई झाड भी नहीं था जो उसकी खुशबू  मेरे कमरे में आती ,

अचानक मेरी कमर के नीचे गुलाब की पन्खुरियाँ होने का अहसास जब मुझे हुआ तो मै तुरंत विद्युत गति  से उठ कर  खड़ा हो चुका था ।

और अगले पल मै अपने विस्तर को अपलक झपकाये विस्फारित नेत्रों से असमंजस में भरा घूर रहा था । 

         क्यो की मेरा पूरा विस्तर किसी नव दुल्हन के सुहाग रात की सेज की तरह सजा हुआ था।

लगता था कि मेरा विस्तर किसी ने जान बूझ कर सजाया और सम्भला था।

यह कैसे सम्भव है ?

मन ने आधीर भाव से प्रश्न किया,?

कौन है वह जिसने मेरा विस्तर संजाया है ?

मन मै जानने का कौतूहल भाव उत्पन्न हुआ।

लेकिन प्रश्न का उत्तर अनुत्तरित था ।

अभी मै यह विचार कर ही रहा था कि मुझे एसा लगा की मेरे कमरे मे मेरे अलाबा भी, शायद कोई और है,।

एसी जानकारी मेरी छठी इन्द्री किसी और की उपस्तिथि की चेतावनी मुझें देने लगती है।

कौन है ...?..

...... मेरे कमरे में......सामने आओ।

मैने बिना डरे जोर से पुकारा।,

दो तीन मिनटों तक खामोशी छाई रहीं।

कौन हों तुम ....सामने आओं,......मेरा वायदा है, मैं तुम से कुछ नहीँ कहूँगा ।

किन्तु फिर वही नीरवता ....।

अगले पल फिर वही खामोशी, कहीं कोई ....हलचल भी नहीं हुई ।

इस कशमकश  में थोड़ा समय और गुजरा ......सब कुछ पहिले जैसा सामान्य हो चुका था,।

अब मुझे लगने लगा कि यह सब मेरा वहम हो सकता है,।कोई मेरे कमरे में भला कहाँ से आ गया।

जब की मैने देखा था दरबाजा अभी भी अन्दर से बन्द था।                मुझे अपनी बेबकूफी पर हँसी आने लगी और मै अपनी मूर्खता पूर्ण सोच को याद कर, 

एक बार जोर से हँसा, और पुना विस्तर पर आंखें बंद कर  लेट गया।

लेटते ही फिर वहीं चिर परचित देशी गुलाबों की "खुशबू"

जो मुझे एक अनौखा अहसास दिला रही थी, और मेरे दिल दिमांग पर  एक अनौखा अहसास छाता जा रहा था,

            मै सोचने लगा,यह सब क्या है ? ,आज से पहिले मेरे साथ एसा कभी नही हुआ ?।

एक मन कहता यह सब कुछ क्या है ?

और अगले पल वही मन तुरंत समाधन करता ।

"कुछ नहीं है बस वहम है"।

अता अब मै निश्चय कर चुका था , कि कुछ भी सही हो ,अब चुप चाप  मुझे यूँ ही पडा रहना है।

इसीलिय अब मै आंखें बंद किये तंद्रा की स्तिथि में अपनें विस्तर पर लेटा रहा ।,

ठीक तभी अचानक मुझे लगा कि कोई मेरे नजदीक मेरे ही बैड पर लेटा  हुआ है, 

          उसकी गर्म गर्म श्वाँशों की खुशबूदार  हवा मुझे अन्दर तक महका रही थी,।

हूँऊऊ .....सब वकबास ।

मैने एक लम्बी सांस ली।

"कहीं कुछ नहीं....   ।" 

मन फिर आलस कर टालने के लिए हुआ।

कितु यह क्या.....।

मुझे अगले पल लगा की कोई शायद महिला अपने कोमल हाथों से मेरे बालों में उंगलियों से कंघा कर रही हो।

ऊँहुन्ह्ह्ह्ह्ह।

 कोई करता है तो करे मुझे क्या?

मै एसा निश्चय करके अब दूसरी ओर मुहँ फेर कर लेट गया। और ठीक तभी मै चुपचाप आँख बंद कर महशूश कर रहा था कि कोई महिला अपने कोमल कोमल हाथों की नाजुक लम्बी लम्बी उंगलियों से मेरे कभी गले,

कभी चेहरे, 

कभी मेरे गालों।

तो कभी सीने पर शरारत करती,

और उसके बदले में मै, एक नई आनंद की दुनियाँ में गुम होता जा रहा था । 

        मैरी आँख वन्द हो चुकी थी एक नये अहसास का मै अनुभव कर रहा था जो मुझे न चाहते हुए भी उसकी इन हरकतों का विरोध नहीं करने की आज्ञा देने पर मजबूर कर रहा था,।

मुझे अब उसकी यह हरकते और तेजी के साथ आगें बड़ती हुई लगीं ,। 

        जिसके परिणामस्वरूप मेरे अन्दर कुछ पिघलने लगा था,

अब मेरी नाडियों,नशों में एक अनौखी आग प्रवाहित  होचुकी थी ।

जिसका अहसास मुझे मेंरा मन एक अच्छी अनुभूति (फीलिंग्स)कर  रहा था। 

       अब उसकी हरकतें अब और भी तेजी से बड़ती  हुई जा रहीं थीं, ।

वो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

        तभी मुझे अचानक लगा की मेरे अन्दर का वहता हुआ लाबा अब पूरी तरह पिघल कर  एक विस्फोट के साथ फटकर बाहर निकलने बाला है। 

       अत: मैंने अपनी आखें शीघ्र खोली तो मेरे नजदीक वही खूबसूरत दुल्हन लेटी  हुई थी,उसके वालों में लगा गज़रा महक रहा था और वह यह सब कृत्य वड़े  निरलज्जता से भरी हुई,

वह महिला सब कार्य वहुत तेजी से कर रही थी। 

मुझे उसकी इस असहनीय हरकत से क्रोध आया और अगले पल अचानक मैने उस सुन्दरी के मुहँ पर एक जोरदार चाँटा जड़ दिया।

वह चौक कर  मेरे मुहँ को आश्चर्य से निहारने लगी,।

पर वह बोली कुछ नहीं। 

अब पल भर को मुझे उसकी उस क्रिया से निजात  मिल गयीं,।

मुझें लगा एक आग जो मेरे बदन में मुझे लगातार जलाये जा रही थी,उस से फिलहाल राहत मिलचुकी है।

ठीक उसी प्रकार जैसे आग में जलने बाले इन्शान को वचाने से जो नया जीवन दान मिल जाता है।

मै कुछ समय तक उसी स्तिथि में पडा लम्बी लम्बी स्वांस गहराई तक खीचता और छोड़ता, रहा।

लगभग दस मिनट बाद मैने देखा वह स्वप्न सुन्दरी मेरे विस्तर से स्वयं उठकर खडी हुई और मेरी ओर पीठ कर दु:खी मन से बोली।

हारेंन, मैं अब जा रहीं हूँ .....।

अचानक मेंरे मुहूँ से उसके लिए निकला। 

"सॉरी, .....यार ....आई एम वेरी वेरी सॉरी .....यार मुझें माँफ करदो।"

मुझे लगा की मुझे एसा ब्यबहार उसके साथ नहीं करना चाहिये था। 

         वह कुछ नहीं बोली ,वस एक टक उसकी आंखे वाहर जानें के लिए दरबाजे की तरफ देखनें लगीं थी। 

        मेरे दिल ने मुझे क्षमा नहीं किया, अता मै अपने बैड से उतर कर उस खूवसूरत दुल्हन की ओर बडा और उसके नज दीक जाकर खड़ा हो गया और उस से एक बार पुन: कहा।                सॉरी .....दोस्त अब तो माँफ कर दो।

मैने अपने दोनों कानों को पकड कर उस से बोला।

          वह जोर से खिलखिलकर हँसी,उसकी हँसी मेरे पूरे कमरे में मेरे तन, मन, और मस्तिष्क  में गूँज उठी।                             पल भर को,लगा कहीं किसी ने कहीं रखी शान्त जल तरंग को एक ऊँगली से किसी ने जानबूझ कर छेडा हो ।             मै उसकी खूवसूरती में अभी डूबा हुआ था की वह गेट की ओर बडती बोली।

वाय, दोस्त,।

अब कब मिलोगी ?।

मैने उसके समाने जाकर उसका रास्ता रोक कर कहा।

अव......कभी ...भी नहीं...शायद। 

वह बेरुखी से बोली और फिर अगले पल दरबाजे को खोल कर वाहर जा चुकी थी, ।

मै अब अपने उस दुर्ब्यव्हार  पर शर्मिंदा था ,मन में एक पश्चाताप की अग्नि  प्रज्वलित होचुकी थी, 

मेंरे मन मे क्या है ?

मै कुछ नहीं समझ पा रहा था।

मन में विचार उठ रहे थे।

 " कि अब मुझे  क्या करना चाहिये "?,

मै यूँ ही आशा और निराशा के वीच फँसा हुआ सोच ही रहा था कि 'मुझे एक बार फिर लगा, कि कोई मेरे माथे पर आए बालों को कोई एक ओर कर के संभाल रहा है,।

जो बाल वेतरतीबी से मेंरे चेहरे पर आ चुके थे ।

मैने चिहुंक कर  अपना सिर ऊपर उठाया, और अपनी दादी अम्मा को अपने माथे के बालों को संभालते हुए देखा।

"दादीअम्मा तुम यहाँ  कैसे "?

मेने उनसे पूछा।

"क्यों बेटा, क्या मै तेरे कमरे मे नहीं आ सकतीं हूँ क्या? "।

"नहीं, दादीअम्मा, मेरा यह मतलब नहीं था।"

दादी  अम्मा ने मेरे माथे पर  हाथ रखा और बोलीं ।

"अरे हरेन तुझे तो वहुत तेज बुखार है, और तू है कि लापरबाही से यहाँ अभी तक बैठा है,जा चल,अपने दादाजी के साथ दवा ले आओ।"

मै दादी माँ की आदत जानता था, वह एक बार जो कह देती उसे जरुर कराती थी,अता मै चुपचाप उठ कर दादा जी के साथ दवा लेने चला गया। 

       उस रात  मुझे वहुत तेज बुखार तेजी से आया,दादाजी दादीअम्मा पूरे  रात भर मुझें  लिए बैठे रहे, किन्तु मेरा  बुखार कम नहीं हुआ, ।

इस तरह पूरा एक हफ्ता बीत चुका था, किन्तु बुखार था वो जाने का नाम ही नहीं ले रहा था।

दादाजी वहुत परेशांन थे।

अचानक मेरी दादी माँ  मेरे कमरे में घुसी और उन्होने मुझें माता दुर्गा का प्रसाद दिया और मेरे माथे पर माँ का  चढ़ाया हुआ पुष्प मेरे माथे पर रखा कि फूल रखते ही सभी तरह की विमारियों से मुझे छुटकारा  मिल गया।

तब से अब तक में  मन लगकर परीक्षाओं की तैयारी मे जुट गया, पूरा एक माह बीत चुका था । 

        एक दिन मुझे मेरे दोस्त मुन्ना की बीमारी की खबर मिलीं मेरे मन में मुन्ना की याद ताजा हो गई  क्यों की मुन्ना मेरा लंगोटिया यार था।दुसरे दिन मै,दादी अम्मा के साथ खेत पर से घर बापिस लौट रहा था की रास्ते में मुन्ना का घर पडा, ।मेरे अनुरोध करने पर  दादी अम्मा मेरी बात मन कर मुन्ना के घर गई, घर पर मुन्ना की माँ  थी जो वरामदा में एक चार पाई पर  वैठी थी,मेरी दादी माँ  इस गाँव की लड्की थीं अता सभी महिलाएं उनकी वहुत इज्जत करती थी ।अत: दादीअम्मा को उन्होनें आदर के साथ अपने निकट बैठाया,।और वह मुन्ना की बीमारी के बारे में बताने लगीं,कि मुन्ना अब चिड़चिड़ा होगया है।घर पर तीन भेसों का दूध अकेला ही पीजाता है और एकबार में कम से कम तींन लोगों की पूरी खुराक अकेला हज़म कर जाता है, किन्तु फिर भी वह कमजोर होता जारहा है।"आंटी मै मुन्ना से मिलना चहता हूँ "।मेने मुन्ना की माँ  से कहा।वह अपने कमरे में है।उसकी माँ ने उँगली से संकेत कर कहा । 

       और फिर अगले पल मै मुन्ना के कमरे का बाहर से दरबाजा खटखटा रहा था ,

किन्तु अन्दर से दरबाजा ना खुला तो मैंने जोर से चिल्ला कर आवाज दीं।

" मुन्ना sssss दरबाजा खोल,मै तुझ से मिलने आया हूँ।"

कोई प्रतिक्रिया ना देख मेने पुन: आवाज लगाई।

इस बार भी कोई उत्तर नहीं आया तो मेने उसके कमरे का दरबाजा खटखटाया।

 और तभी अगले पल अन्दर से मुन्ना की वहुत ही गुस्से से भरी आबाज आई,।

चला ssssss .......जाssssss .....।"

क्यों तू मेरा दोस्त नहीं ? "।

मैंने उस से कहा। 

अंदर से मुन्ना की क्रोध भरी आवाज प्रतियोत्तर में सुनाई दी।                "नहीं, ......अब आगें कुछ मत बोल,..बस...इसी में तेरी भलाई है ,......वरना मैं तेरा खूँन पी जाऊँगा"।

वह भयानक अंदाज में दहाड़ा । 

      मै डर कर  उसके कमरे के निकट से अलग हट कर  बरामदा में दादी अम्मा के निकट आ गया।

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Written by H K Bharadwaj.