यह कैसा अहसास - भाग 2 H.k Bhardwaj द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यह कैसा अहसास - भाग 2

▪️यह कैसा अहसास▪️ भाग 02Written by H K Bharadwaj_________________________________________________________________________________प्रिय पाठको..आपने भाग एक मे पढ़ा  की,मै एक अद्वतीय रूप की दुल्हन को देख ने से पहिले.उस आत्मा से ...मैंने हिम्मत कर उस रहष्यमय अंधेरे में खड़ी शक्ति से पुनः पूँछा।"आप कौन हैं ? और आप हमें क्यों डरा रहे हो"।अचानक उसी छण बारात की ओर से आती एक गेस लालटेन का प्रकाश मेरे मुहँ पर पड़ा और वह रहष्य मई शक्ति छण भर में अदृश्य हो चुकी थी।               अब वहाँ घना अन्धेरे के सिबाए और कोई न था, मैंने अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई पर वह आत्मा मुझे कहीं भी न दिखाई दी, तभी अचानक उस नीम का ख्याल मेरे जेहन में घूमने लगा और फिर एक वर्ष पहिले घटी घटना का स्मरण मात्र से ही मेरे शरीर के सारे रोम छिद्रों ने एक साथ पशीना उगलना आरम्भ कर दिया ।        मेरी तन्द्रा धीरे धीरे लोप हो रही थी उस लोप होती तन्द्रा में मैंने स्पस्ट देखा कि, एक निहायत खूवसूरत लड़की चमक दार दुल्हन के कपड़ो में सजी सम्भली अति सुंदर दुल्हन , अपने एक हाथ मे लाल गुलाब का फूल पकड़े हुए, मेरी ओर देखकर मुश्करा रही थी।इसी के साथ मेरी तन्द्रा अंधेरों में एक साथ डूबती चली गई ।और मैरी  जब आँख खुली तो मै अपने आप को दादा,दादी,चाचा,चाची और ढेर सारे अडोस पड़ोस के लोगों को अपने आस पास खड़े पाया।मैने अपनी दादीअम्मा का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने पास बैठने को कहा।मुझे डरा हुआ देख कर दादी अम्मा मेरे नजदीक आकर बैठ गई ।मैं उनकी गोदी में सिर छिपा कर डरा सहमा इधर उधर ताकता रहा,कुछ देर तक ।और मैं यू ही इधर उधर आँखों से विचित्र अंदाज में देखता रहा ।दादीअम्मा मुझे सीने से चिपटाए रहीं,उनका बरद हस्त मेरे पूरे शरीर पर रेंग रहा था और इसी के साथ मेरे अंदर का भय, डर, का जो भी मिलाजुला भाव था,वह  एक दम शांत हो गया था।           अब मेरे मन मे पुनः आत्म्विश्वास जाग चुका था  मैंने दादी अम्मा से कहा ।अम्मा में  अब ठीक हूँ।यह कहता हुआ मैं उनकी गोद से उतरा।अब वाहर एकित्रित भीड़ धीरे धीरे कम होने लगी थी।             मैं अब अपने कमरे में अकेला होकर पढ़ना चाहता था क्योंकि मेरी हाई स्कूल की परीक्षाये भी नजदीक आचुकी थी,और मेंरी अभी तक किसी भी विषय की तैयारी नहीं हुई थी। इसलिए मैं पड़ने के मूड से अपने कमरे में कुर्सी पर बैठकर पढ़ने लगा,।         पढ़ते पढ़ते मुश्किल से आधा घण्टा बीता था,कि अचानक मुझे एक गन्ध जानी पहिचानी सी "तेज गुलाबों की गन्ध" मेरे नाशिका पुट से टकराई ,         वह खुशबू अब धीमे धीमे मेरे पूरे कमरे में फैल चुकी थी।मेने उस खुशबू की ओर बिल्कुल ध्यान नही दिया,अतः अपनी सब्जेक्ट सम्बन्धी किताब को पढ़ता रहा।          कुछ देर पश्चात अचानक मेरे कमरे की खिड़की पर किसी पक्षी के तेजी से पंख फड़फड़ाने का मुझे तीब्र आभास हुआ।, न चाहते हुए मेरा ध्यान उस खिड़की की ओर चला गया ।मैने नजर उठा कर देखा तो मेरा आश्चर्य से मेरा बुरा हाल था, क्यों कि यह एक बड़े बड़े पँखो बाला चमगादड़ था,जो लगातार खिड़की के काँच पर अपने डेनो से अटेक कर रहा था।          उस चमगादड़ की हमला करने की गति से लगता था कि वह हर हाल में मेरे कमरे में घुसना चाहता था।मेरे मस्तिष्क में उसे भगाने का एक उपाय कौंधा,और अगले पल मैं खिड़की के पास पहुँचा, और मैं अभी खिड़की खोलने बाला ही था ,कि वह चमगादड़ एक वहुत सुंदर स्त्री के रूप में,जो कि एक दुल्हन की आकर्षक वेष भूसा में खड़ी थी, उसके रूप मे परिवर्तित हो गया।मैं कौतूहल से भरा एक टक उसे टकटकी लगाए किसी मंत्रमुग्ध की भाँति देखरहा था। तभी मेरे कानों में एक खनखनाति हँसी गूँजी,।मैं अपलक उस दुलहन सुन्दरी के बारे में अभी सोच ही रहा था कि वह मुश्कराती हुई फुशफुशाई ।"खिड़की खोलो .....मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ "।मैं किसी आज्ञा कारी बच्चे की तरह उठा ,और अगले पल मैंने वह खिड़की खोल दी।, खिड़की खुलते ही एक तेज हवा का झोका मुझे छूता हुआ महसूस हुआ,मेने खिड़की बन्द की और तेज़ी से पीछे मुड़ा कमरे में कहीं कुछ नहीं था, किन्तु अब मेरा सिर भारी हो गया ,मन में इच्छा हुई कि थोडी देर विश्राम करूँ,        अतः मैं कमरे में पड़े बेड पर लेट गया लगभग पाँच मिनट ही के अंदर मुझे गहरी नींद ने घेर लिया अचानक मुझे एक अनोखा अहसास हुआ कि कोई मेरे नजदीक लेटा हुआ है ।उसकी गर्म गर्म स्वांसों की तपस  मेरे  चेहरे गले और वक्ष पर महसूस हो रही थी, मैं अपनी आंखें खोल कर देखना चाहता था किंतु मेरे लाख प्रयत्न करने से भी मेरी आँखें अपनेआप नहीं खुल पा रही थी,मैंने आँखों को खोलने का असफल प्रयास किया ।सबका सब उपाए व्यर्थ!अचानक मुझे दादी माँ की दी हुयी शिक्षा याद आई ।"कि जब तुम्हे कोई डर या ऐसी कोइ डराबनी परिस्थितियों में तुम हो, तो तुम महावीर हनुमान जी का मन ही मन में जाप करना वह अबश्य तुम्हारी रक्षा करेँगे,"।         अतः मैं बिना बोले,मन ही मन हनुमानाष्टक का जप करने लगा जप करते करते मुझे लगा ,कि कोई मेरे निकट से उठ कर खडा हो गया है,मेरा शरीर भी अब पूरी तरह से जाग चुका था ।किंतु मेरी आँखे स्पष्टतया अभी निद्रा से भरी हुई थी।मैं अब अपनी आंखों पर हाथ रखकर जोर जोर से हनुमान  अष्टक का जप पुन: करने लगा ।परिणामतः अब मेरी आँखें धीरे धीरे देखने की पूर्णतया अभ्यस्त हुई और मैने अपने सामने वही सुंदरी जो दुल्हन के रूप में हाथ में एक सुंदर सा गुलाब का पुष्प लिए मेरी ओर मन्द मन्द मुश्करा रही थी को देखा।वह सर्वांगसुन्दरी अति मनमोहक थी उसके सुन्दर नारंगी की फाँकों जैसे अधर और मुश्काने पर दिखती दाँतों की स्वेत धवल दन्तावली जिसे देखने को लगातार मेरा मन कर रहा था मैं लगातार उसे एक सम्मोहन की तरह निहार रहा था।अचानक वह नवयौवना मन्थर गति से मेरे निकट आकर कुछ दूरी पर खड़ी होगई ,और मन्द मन्द मुश्कराने लगी।उसको हँसते देखकर  मैं भी उसकी ओर धीरे-धीरें हंसने लगा।"आप कौन हो "?।मेरे मुंह से  अचानक निकला।वह धीमे से फुसफुसाई ,आप ...मुझ से नाराज तो नही हैं।मैंने अपना "न" में सिर हिला कर उसे बताने की कोशिश की।"आप अपने दोस्तों का स्वागत ऐसे ही खड़े खड़े  करतें हैं "।वह  खनखनाती आवाज में बोली।अचानक मेरे मुहँ से निकला ।"नहीं यार ! आओ हमारे निकट आओ और बैठो"।वह मेरी बात सुन कर जोर जोर से खिलखिला कर और जोर से खिलखिलाकर हंसनें लगी ,उसकी हंसी में मुझे लगा कि मेरे आसपास जलतरंग वाद्ययन्त्र को किसी ने छेड़  दिया हो।मैं बिना पलकें झपकाए उस असीम सौंदर्य की स्वामिनी परम सुन्दरी को  हँसते हुए देखे जारहा था,।और मुझे लग रहा था  वह मेरे मन मस्तिष्क में कब्जा करती जा रही थी मैं उसकी किसी बात का भी कोई विरोध नही कर पा रहा था।सहसा वह अपने स्थान से आगे वडी और मेरे कंधे पर हाथ रख खड़ी हुई और बोली,।अच्छा मैं अव चलती हूँ। और वह मुडकर गेट की ओर वडी।अब कब आओगी ? अचानक मैंने उस से पूँछा।वह थोड़ा सा मेरी और झुकी और धीमें से कान में फ़ूशफुसाकर बोली।"काहे ......को"।मैंने भी उसे उसी तरह फुस फुसाकर उत्तर दिया ।तुम हमारी दोश्त जो हो।आपने हमें प्यार तो करने नहीं दिया।वह इठलाती सी थोडा मुश्काती हुई बोली।उसकी इस विन्दास बात पर मुझे शर्म महसूस हुई,जबकि वह अपनी बात बिना शरमाये स्पष्ट कर चुकी थी।          वह अब धीमे धीमे चलती हुई गेट को खोल चुकी थी, और वाहर की ओर आहिस्ता आहिस्ता बड़ रही थी, मुझे लग रहा था कि उसे मेरी शायद कोई बात बुरी लगी हो,साथ ही उसके विछुड़ ने से मुझे लगा, कि मेरी कोइ प्यारी बस्तु गुम हो चुकी है, अत: मै अधिक देर तक उसी के बारे में सोच ता रहा।.........क्रमशः अगले अंक 03 में।

Written by H K Bharadwaj