अभी तक आपने पढ़ा कि रितु और उसका परिवार पंकज के सहारे एक हफ़्ते तक शहर में रहा और डॉक्टर ने उन्हें घर जाने की अनुमति दी। रमन और किशन दर्द और पछतावे में डूबे थे, जबकि किशन बदले की आग में जल रहा था। पंकज ने उन्हें समझाया कि क़ानून ही अपराधियों को सज़ा देगा, ताकि रितु को और सदमा न पहुँचे। अब इसके आगे पढ़ें-
रितु का पूरा परिवार भावनात्मक तौर पर पंकज से जुड़ गया था। यह विदाई का समय था, जाने से पहले रमन और बसंती पंकज के पास गए। वे दोनों उसका शुक्रिया अदा करना चाहते थे।
रमन ने कहा, "पंकज बेटा तुमने जो कुछ भी किया है उसके लिए धन्यवाद शब्द तो बहुत छोटा है।"
पंकज कुछ कहता उससे पहले बसंती ने कहा, "पंकज बेटा, तुमने तो हमारा बहुत साथ दिया।"
पंकज ने धीरे से रितु की तरफ़ देखकर कहा, "आंटी, मैं तो हमेशा आपके साथ हूँ। आप सिर्फ एक आवाज़ लगाना, मैं दौड़ा चला आऊँगा।"
बसंती पंकज की बातें सुनकर रो पड़ी और उसे अपने सीने से लगा लिया।
उसके बाद पंकज ने झुककर रमन और बसंती के पैर छुए।
वे लोग जब जाने लगे, तब रितु सबसे पीछे थी ...सबसे आगे किशन, फिर रमन, फिर बसंती और सबसे पीछे रितु।
रितु ने जैसे ही कमरे से बाहर क़दम रखा, पंकज ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। रितु का पूरा शरीर काँप गया। इस समय किसी भी छुअन से उसे डर लग रहा था। लेकिन जैसे ही उसने पलटकर पंकज की तरफ़ देखा, उसकी आँखों से प्यार के मोती टप-टप करके गिर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि मानो अभी यह बादल फट जाएंगे और पंकज फूट-फूट कर रो पड़ेगा।
पंकज की आँखों में भरे हुए प्यार को रितु देख रही थी। वह कुछ पलों के लिए उस प्यार के बंधन में अटक गई, जो उसे पंकज की आँखों में दिखाई दे रहा था। वह कुछ पल तक उसे देखती रही और फिर उससे लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगी।
इस आवाज़ को सुनकर रमन, बसंती और किशन, तीनों ने पलटकर देखा। यह दृश्य देखकर वे स्तब्ध रह गए । सभी की आँखों में आँसू थे; कोई कुछ कहने की हालत में नहीं था।
पंकज और रितु एक-दूसरे से लिपटकर रोते ही जा रहे थे, ऐसा लग रहा था मानो एक-दूसरे के उस दुःख को, जो अंदर ही अंदर दोनों को खाए जा रहा था, वे उसे अपने आँसुओं के साथ बहा रहे हों। कुछ देर तक वे दोनों इसी तरह रोते रहे।
तब किशन आया और उसने कहा, "पंकज मेरे भाई, तुम तो हमारे लिए फ़रिश्ता बनकर आए हो।"
पंकज ने कहा, "किशन, तुम अपना और सबका ख़याल रखना। कुछ भी ज़रूरत हो, यहाँ का कोई भी काम हो, तो वह मुझे बताना। तुम्हें बार-बार आने की ज़रूरत नहीं है।"
"ठीक है, पंकज।"
उसके बाद वे अपने गाँव के लिए निकल गए। गाँव में किशन के दोस्त राहुल के सिवाय किसी को इस घटना के बारे में पता नहीं था।
राहुल तो किशन का बचपन का दोस्त था और रितु को अपनी बहन जैसा ही मानता था। हर साल उससे राखी भी बंधवाता था। उसका किशन के परिवार के साथ दिल से दिल का प्यार भरा नाता था। उसने भी इस हादसे के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया था, यहाँ तक कि अपने मां-बाप को भी नहीं। किशन और उसका परिवार शाम तक अपने गाँव पहुँच गया।
राहुल अपनी जीप से उन्हें बस स्टेशन पर लेने पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने रितु को ऐसा बिल्कुल भी महसूस नहीं होने दिया कि उसे सब मालूम है। वह हमेशा की तरह ही सबसे मिला, विशेष रूप से रितु से।
उसने कहा, "रितु जीजी, इस बार आप बहुत दिनों बाद आई हो ना?"
रितु ने थोड़ा सा मुस्कुराकर कहा, "हाँ राहुल, तुम कैसे हो?"
"ठीक हूँ जीजी।"
रितु ने तो पूछ लिया, लेकिन राहुल की यह पूछने की हिम्मत नहीं थी कि "जीजी, आप कैसी हो?"
कुछ ही समय में वे सब अपने घर पहुँच गए। रितु सीधे अपने कमरे में चली गई। उसके पीछे-पीछे बसंती भी वहाँ पहुँच गई।
उसने रितु का हाथ पकड़कर कहा, "रितु बेटा, मैं तेरी माँ हूँ। तेरे हर दर्द की पीड़ा मुझे झकझोरती रहती है। तू यदि ख़ुद को नहीं संभाल पाएगी तो मैं पूरी तरह से टूट जाऊंगी। लेकिन हमें किशन और तेरे बाबूजी दोनों के लिए जीना होगा। हमें अपने आप से लड़कर जीतना होगा, मेरी बच्ची।"
रितु ने कहा, "माँ, मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था जो मेरे साथ..."
"नहीं रितु, यह हमारा दुर्भाग्य था। चल बेटा, नहा ले। मैं खाने की तैयारी करती हूँ।"
✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः