डिजिटलजाल sukhvinder Singh Rai द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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डिजिटलजाल

कमरे की सीलन भरी हवा में छत वाले पुराने पंखे की 'कटर-कटर' आवाज़ किसी उल्टी गिनती की तरह गूंज रही थी। आर्यन ज़मीन पर, घुटनों के बीच सिर दिए बैठा था। उसके माथे से पसीने की एक ठंडी बूंद फिसलकर उसके कांपते हाथों में जकड़े फोन की स्क्रीन पर गिरी। उसकी उंगलियां पागलों की तरह वेबपेज का 'रिफ्रेश' बटन पीट रही थीं, लेकिन स्क्रीन पर छपा 'एरर 404 - पेज नॉट फाउंड' (Error 404 - Page Not Found) का सफ़ेद पन्ना किसी कफ़न की तरह उसे घूर रहा था।पच्चीस दिन... बस पच्चीस दिन में पैसे दोगुने करने का वो सुनहरा दावा करने वाली कंपनी की वेबसाइट अब इंटरनेट के किसी अंधेरे कुएं में हमेशा के लिए दफ़न हो चुकी थी। आर्यन का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे अपने कानों में खून के दौड़ने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। वो पच्चीस हज़ार रुपये... उसके अपने नहीं थे। उसने कल दोपहर ही बापू की दुकान के उस पुराने, दीमक लगे लकड़ी के गल्ले से निकाले थे, जब बापू थकावट के मारे बोरी पर सिर रखकर सो गए थे।तभी दरवाज़े के कब्ज़ों के चरमराने की आवाज़ आई। दरवाज़े की चौखट से टिक कर खड़ी रिया उसे पिछले कुछ पलों से खामोशी से देख रही थी। आर्यन की फटी हुई आँखें, उसका बिखरा हुआ चेहरा और फोन की स्क्रीन का वो मरा हुआ पन्ना देखकर रिया को पूरा माज़रा समझने में एक सेकंड भी नहीं लगा।रिया ने कमरे की उस घुटन भरी खामोशी को अपनी तीखी आवाज़ से चीर दिया।"क्या हुआ आर्यन?" रिया की आवाज़ में बर्फ जैसी ठंडक और कांटों जैसी चुभन थी। "आ गई वो रातों-रात वाली अमीरी? खरीद ली मर्सिडीज़? या पेज रिफ्रेश करने से पैसे डबल होकर स्क्रीन से बाहर गिरने वाले हैं?"आर्यन के सूखे होंठ काँपने लगे। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन दौड़ गई। वह रिया की आँखों में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। उसने फोन को ज़मीन पर पटक दिया और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया।"वो साइट उड़ गई रिया..." आर्यन के रुंधे हुए गले से मुश्किल से लफ़्ज़ बाहर निकले। उसकी आवाज़ में खौफ और बेबसी का भयानक मिश्रण था। "मेरे पच्चीस हज़ार... बापू के वो गल्ले वाले पैसे... सब खत्म हो गया। मैं... मैं तो बस जल्दी पैसा कमाकर घर की हालत सुधारना चाहता था रिया। मैं बापू को आराम देना चाहता था।"रिया के चेहरे पर अब तरस या हमदर्दी का कोई नामोनिशान नहीं था। उसकी जगह एक सुलगते हुए गुस्से ने ले ली थी। वो आगे बढ़ी और आर्यन के बिल्कुल सामने खड़ी हो गई।"जल्दी पैसा?" रिया की आवाज़ अब एक दहाड़ में बदल चुकी थी। "घर की हालत सुधारनी थी तुझे? आर्यन, तुझे रत्ती भर भी अंदाज़ा है कि वो पच्चीस हज़ार रुपये कमाने में तेरे बापू की कितनी बार चमड़ी उस जेठ की दोपहर में जली होगी? उनकी उस घिसी हुई चप्पल के तलवे देखे हैं कभी तूने? वो इंसान पाई-पाई जोड़ता है ताकि तू चैन से खा सके, और तूने... तूने बिना मेहनत के, बिना पसीना बहाए अमीर बनने की हवस में उनकी खून-पसीने की कमाई एक झटके में किसी ठग के हाथ में रख दी!"आर्यन की आँखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसके कंधे बुरी तरह कांपने लगे, लेकिन रिया का गुस्सा आज रुकने वाला नहीं था। उसने ज़मीन पर पड़े उस स्मार्टफोन को ठोकर मारी।"और ये जो तू सारा दिन अपनी गर्दन झुकाए इस छः इंच की स्क्रीन में घुसा रहता है ना..." रिया ने आर्यन की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, "कभी इस डिजिटल दुनिया में पैसे लगाकर 'वर्चुअल कॉइन' खरीदना, कभी रातों-रात लखपति बनाने वाली गेम खेलना, तो कभी डबल पैसे के लालच में अपनी औकात दांव पर लगाना। इस फोन के अंदर, इस नकली दुनिया में तू चाहे जितना बड़ा 'हीरो' बन जा आर्यन, लेकिन हकीकत में... असल ज़िंदगी में तूने आज अपने ही घर को हार दिया है। इस डिजिटल दुनिया के खोखले भ्रम ने तुम्हारी असली दुनिया बर्बाद कर दी है।"रिया के वो लफ़्ज़ किसी तेज़ धार वाले चाबुक की तरह आर्यन की नंगी पीठ पर पड़ रहे थे। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके मुँह पर बर्फीला पानी फेंककर उसे एक बहुत ही खौफनाक नींद से झकझोर कर जगा दिया हो।रिया ने कमरे से बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ाया, पर दरवाज़े पर रुककर उसने आख़िरी बार मुड़कर आर्यन को देखा। उसकी आवाज़ अब गहरी और बहुत भारी थी।"सुन ले आर्यन, जो पैसा बिना पसीने के, बिना मेहनत के आता है ना... वो इंसान की भूख नहीं मिटाता, वो इंसान को अंदर से खोखला करके बर्बाद कर देता है। जब तक तुम जैसे जवान लड़के बिना मेहनत के पैसा कमाने का ये 'शॉर्टकट' ढूँढते रहेंगे, तब तक तुम्हारे बाप-दादों की गाढ़ी कमाई ऐसे ही लुटती रहेगी। ज़िंदगी में कोई 'चीट कोड' नहीं होता।"रिया कमरे से बाहर चली गई। उसके कदमों की आवाज़ दूर होती गई। आर्यन उस ठंडे फर्श पर पड़ा, अपने घुटनों में मुँह दिए रो रहा था। ज़मीन पर पड़ा उसका फोन अब बंद हो चुका था। आज उसे समझ आ गया था कि असल ज़िंदगी, उस डिजिटल दुनिया के रंगीन और मायावी भ्रम से बहुत अलग, बहुत कठोर और बहुत बेरहम है। वहाँ पसीना बहाए बिना एक निवाला भी गले से नीचे नहीं उतरता।**सुखविंदर की कलम से:**"आज के समय में नौजवान डिजिटल दुनिया के इस मायाजाल और रातों-रात अरबपति बनने के लालच में इतने अंधे हो चुके हैं कि उन्हें हलाल की और मेहनत की रोटी का स्वाद फीका लगने लगा है। शॉर्टकट के चक्कर में बिना सोचे-समझे अपनी गाढ़ी कमाई उड़ा देना और स्क्रीन के पीछे छिपी नकली चीज़ों के पीछे भागना अकल का काम नहीं, बल्कि लालच का सबसे बड़ा दिवालियापन है।याद रखिए, रातों-रात कोई भी अमीर नहीं बनता! जब एक बाप की हड्डियां धूप और मिट्टी में गलती हैं, जब जवानी पसीने में नहाती है, तब जाकर घर की चौखट के अंदर चार पैसे आते हैं। इस खोखले, डिजिटल जाल से बाहर निकलिए। मेहनत और ईमानदारी का कमाया हुआ एक रुपया, बेईमानी और लालच के लाख रुपयों से बहुत भारी और सुकून देने वाला होता है। अपने माता-पिता के खून-पसीने की कद्र करना सीखिए, क्योंकि स्क्रीन के बाहर की इस असली दुनिया में कोई शॉर्टकट नहीं होता... यहाँ सिर्फ और सिर्फ आपकी मेहनत काम आती है।"