​अरेंज मैरिज का संदूक sukhvinder Singh Rai द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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​अरेंज मैरिज का संदूक

**एपिसोड: बदलते रंग**कहा जाता है कि प्रेम विवाह (लव मैरिज) में इंसान जो रोता है, वह शादी से पहले रो लेता है। लेकिन अरेंज मैरिज एक ऐसा बंद संदूक है, जिसे खोलने के बाद अगर किस्मत दगा दे जाए, तो इंसान ताउम्र रोता है। रोहित और श्रुति की शादी भी इसी संदूक से निकली थी, जिस पर पहले महीने तो 'बेटी' और 'बहन' के नाम का सुनहरा रैपर लिपटा था, लेकिन दूसरे महीने ही वह रैपर फटने लगा था।रसोई में छौंक की महक से ज्यादा अब तानों की गंध आती थी।श्रुति सिंक में जूठे बर्तनों को रगड़ रही थी। पसीने से उसकी लटें माथे पर चिपक गई थीं। तभी पीछे से बिमला देवी की भारी आवाज़ ने रसोई की खामोशी तोड़ी, "अरे महारानी! किनारे पर हल्दी लगी छोड़ दी है। ये बर्तन धो रही है या सिर्फ पानी बहा रही है?"श्रुति के हाथ पल भर को रुके, उसने अपनी सांवली उंगलियों से साबुन का झाग पोंछा। तभी दरवाजे पर खड़ी ननद नेहा ने अपने गोरे चेहरे पर क्रीम मलते हुए तंज कसा, "मम्मी, आप भी क्या उम्मीद कर रही हैं? इसे तो ये भी नहीं पता कि सब्जी में आधा किलो तेल नहीं उड़ेला जाता। महीने भर का मसाला हफ्ते में चट कर गई है। पता नहीं मायके में क्या सीख कर आई है!"बिमला ने मुँह बनाते हुए नेहा की तरफ देखा और जानबूझकर आवाज़ ऊंची की, "सीखना तो दूर की बात है! हमारे खानदान में तो शुरू से सब दूध जैसे उजले और गोरे-चिट्टे रहे हैं। पता नहीं ये पक्के रंग की कलूटी हमारे माथे कैसे मढ़ दी गई।"यह शब्द श्रुति के कानों में खौलते तेल की तरह गिरे। उसने स्पंज को मुट्ठी में इतनी ज़ोर से भींचा कि सारा पानी निचड़ गया। उसकी आँखें डबडबाईं, लेकिन उसने होंठ भींच लिए। दूसरे महीने की यही सच्चाई थी। अरेंज मैरिज का संदूक अब अपने असली रंग दिखा रहा था।तीसरा महीना आते-आते श्रुति के अंदर का वह घूंट-घूंट कर रोने वाला इंसान मर चुका था। उसकी जगह एक ऐसी औरत ने ले ली थी, जिसकी आँखों में अब नमी नहीं, शोले थे।रविवार की दोपहर थी। बैठक में बिमला देवी मोहल्ले की चार औरतों के बीच बैठी अपनी वही पुरानी कैसेट बजा रही थीं। "क्या बताऊँ बहन, किस्मत फूट गई मेरी। ऐसी बहू आई है जिसे रोटियां बेलनी नहीं आतीं, पापड़ सेकती है! सारा दिन राशन फूंकती है, कामचोर कहीं की..."दरवाजे के पीछे खड़ी श्रुति के हाथों में चाय की ट्रे थी। कपों से उठती भाप उसके सख्त होते चेहरे को छू रही थी। उसने एक गहरी सांस ली। बेचारगी का चोला उसने वहीं दरवाजे पर उतार फेंका और सीधे बैठक में कदम रखा।'खनक!'चाय की ट्रे कांच की मेज पर इतनी ज़ोर से रखी गई कि औरतों की बातें वहीं जम गईं। श्रुति सीधी खड़ी हुई। उसकी आँखों में सीधा बिमला देवी के चेहरे पर गढ़ा हुआ एक तीखा सवाल था।"मांजी," श्रुति की आवाज़ में कोई कांप नहीं थी, एकदम ठहरी हुई और धारदार आवाज़, "सन 2000 से पहले के ज़माने में ना, सास भगवान के सामने झोली फैलाकर मन्नत मांगती थी कि 'भगवान, बस एक अच्छी और संस्कारी बहू दे दे।' लेकिन आज का ज़माना बदल गया है। आज हर लड़की फेरे लेने से पहले यही मन्नत मांगती है कि 'भगवान, घर भले ही कैसा भी दे देना, बस सास अच्छी दे देना!'"बैठक में सन्नाटा छा गया। औरतों ने एक-दूसरे का मुँह देखा। बिमला का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, "ये क्या बकवास कर रही है तू मेहमानों के सामने?""बकवास नहीं, सच है मांजी।" श्रुति ने एक कदम और आगे बढ़ाया, उसकी नज़रें अब सीधे अपनी सास की आँखों में थीं। "रंग गोरा होने से किसी का दिल गोरा नहीं हो जाता। आप दोनों माँ-बेटी के तो खून में ही कालिख भरी है। और हाँ, जब आपको मेरे हाथ का खाना पचता ही नहीं और मैं आपका इतना कीमती राशन बर्बाद करती हूँ, तो आज से आप और नेहा अपना मनपसंद खाना खुद बना लिया करो। मैं इस घर में सिर्फ अपना और रोहित का खाना बनाऊंगी।"श्रुति पलटी और बिना किसी की तरफ देखे सीधे अपने कमरे में चली गई।शाम को साढ़े सात बजे रोहित ऑफिस का बैग कंधे पर लटकाए थका-हारा घर लौटा। उसने अभी जूते उतारे ही थे कि बिमला देवी पल्लू से सूखी आँखें पोंछते हुए उसके सामने खड़ी हो गईं। पीछे-पीछे नेहा भी आ गई।"देख ले रोहित! आज तेरी बीवी ने मोहल्ले की औरतों के सामने मेरी क्या इज्ज़त छोड़ी है!" बिमला रोने का नाटक करते हुए चिल्लाईं। "कितनी सब्जी बना डालती है, राशन बर्बाद कर रही है। हमने टोका तो हमें ही कलमुंही बोल दिया। शादी को दो महीने नहीं हुए और तू अभी से अपनी पत्नी के पीछे लग गया है? जोरू का गुलाम बन गया है तू!"रोहित ने अपना लैपटॉप बैग सोफे पर रखा। उसने ना तो गुस्सा किया और ना ही श्रुति के कमरे की तरफ दौड़ा। उसने बहुत ही शांत भाव से पानी का गिलास उठाया, दो घूंट पिए और अपनी माँ की आँखों में सीधा देखा।"माँ, बस करो अब।" रोहित की आवाज़ में एक ऐसी सख्ती थी जिसने नेहा के मुंह से निकलने वाले अगले ताने को वहीं रोक दिया। "मैं किसी के पीछे नहीं लगा हूँ। और ना ही मैं अंधा हूँ। श्रुति तो इस घर में सिर्फ दो महीने पहले आई है। लेकिन तुम दोनों... तुम दोनों को मैं बचपन से जानता हूँ।"रोहित एक कदम अपनी माँ के करीब आया। "मुझे बहुत अच्छे से पता है कि मेरी माँ और बहन की फितरत कैसी है। तुम दोनों ने आज तक घर में शांति नहीं रहने दी। गलती श्रुति के काम में या उसके राशन खर्च करने में नहीं है... गलती तुम दोनों की नीयत में है।"बिमला का नकली रोना एकदम से बंद हो गया। नेहा अवाक रह गई। जिस बेटे को वो भड़काने चली थीं, वो उनके ही पाखंड का आईना उनके सामने रख चुका था। रोहित को पता था कि उसे अपनी पूरी ज़िंदगी अपनी पत्नी के साथ गुज़ारनी है, इन खोखले तानों के साथ नहीं।रोहित मुड़ा और श्रुति के कमरे का दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया।बाहर खड़ी बिमला और नेहा को समझ आ गया था कि अब इस घर की रसोई में एक नहीं, दो अलग-अलग चूल्हे जलने वाले हैं। और उस नए चूल्हे की आंच उनके तानों से कहीं ज़्यादा तेज़ होने वाली थी।