अगले दिन उसकी नींद बाहर से आते शोर से खुली।
बाहर से हँसने की आवाज़ें आ रही थीं।
कुसुम ने अपना सिर पकड़ लिया और उठकर बैठ गई।
उसका सिर दर्द कर रहा था ! कल रात वो अंकित के बारे में सोचते-सोचते ही सो गई थी। उसे अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दी
“अंकित!”
कुसुम हड़बड़ा कर उठ गई ! अंकित? तो क्या अंकित की फैमिली उसके घर आई है? वो आया है? क्या कर रहा है वो यहाँ...?
कुसुम ने आव देखा ना ताव, और झट से बाथरूम की ओर दौड़ गई। जाते वक्त उसने घड़ी पर नज़र डाली ! सुबह के नौ बज रहे थे।
उसकी माँ रोज़ तो उसके सिर पर खड़ी होकर चिल्लाती थीं !
“स्कूल कब जाएगी?” तो फिर आज क्या हो गया? आज क्यों नहीं उठाया? “अरे! आज तो संडे है...” कुसुम ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
दस मिनट में ही वो दोबारा आँधी की तरह बाथरूम से बाहर निकली और जाकर शीशे के सामने खड़ी हो गई।
उसने नीले रंग की लॉन्ग स्कर्ट और सफ़ेद रंग का फुल स्लीव टॉप पहना था।
उसने अपने बालों को जल्दी से सँवारा! एक छोटी सी काली बिंदी लगाई ! छोटे-से झुमके डाले ! और आँखों में हल्का काजल “हम्म... ठीक है,” उसने खुद को शीशे में देखा।
फिर कमरे का गेट खोला, सिर थोड़ा सा बाहर निकाला, इधर-उधर देखा और फिर बाहर आ गई। वो सीढ़ियों की ओर बढ़ी ! उसे अंकित के हँसने और बातें करने की आवाज़ें आ रही थीं। शायद वो उसकी माँ से बात कर रहा था।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा ! साँसें हल्की-सी तेज़ हो गईं। वो गहरी-गहरी साँसें ले रही थी। उसने दोनों हाथों को आपस में फँसा रखा था, उन्हें मसल रही थी। उसने सीढ़ियों से झाँककर नीचे देखा ! तो उसे हँसता हुआ अंकित दिखा ! नीली शर्ट और सफ़ेद पैंट में।
कुसुम ने झट से खुद के कपड़ों की ओर देखा ! ये कैसे हो सकता है! नहीं, वो ऐसे नीचे नहीं जा सकती... अगर उसने कुछ ग़लत सोच लिया तो?*
सोचते हुए कुसुम पीछे मुड़ी ही थी कि उसे सुनाई दिया !
“किट्टी!”
और बस... वो जहाँ थी, वहीं ठहर गई। कितने सालों बाद उसने ये नाम सुना था। उसने अपने सीने पर हाथ रख लिया और अपनी बढ़ती धड़कनों को क़ाबू में करने लगी। उसने दो-तीन गहरी साँसें लीं और पीछे मुड़ गई।
अंकित उसकी ओर ही देख रहा था। वो मुस्कुरा रहा था।
कुसुम ने अपनी माँ को देखा, जो उसे नीचे आने का इशारा कर रही थीं। कुसुम नीचे चली गई। और जाकर अंकित की माँ के पैर छू लिए !
“कैसी हो बेटा उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा “ “मैं बिल्कुल ठीक हूँ aunty कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा “ …!
“ और बताओ, क्या चल रहा है लाइफ में? भाई और तुम तो पहले से भी ज़्यादा सुंदर हो गई हो... और अब तो एक टीचर भी बन गई हो!” कुसुम मुस्कुरा दी। फिर दोनों बातें करने लगीं। उसने एक बार भी नज़रे उठाकर अंकित को नहीं देखा। वो उसके बिलकुल पास, बगल में ही बैठा था, पर उसमें हिम्मत ही नहीं हो रही थी उसे देखने की।
अंकित अपने मुँह पर हाथ रखे, एक पैर को दूसरे पैर पर चढ़ाए बैठा, कुसुम को आराम से देख रहा था। कुछ देर बाद बातें करते हुए अंकित की माँ ने कहा “ठीक है, तो हम चलते हैं। सारा सामान भी सेट करना है, अभी बहुत काम है।”
असीमा जी ने ये सुना तो झट से बोलीं “अरे, कुसुम आपकी मदद कर देगी। आज संडे है ! और उसको कुछ काम भी नहीं है।”
अंकित की माँ कुछ कहना चाहा की तभी असीमा जी ने फिर कह “अरे और क्या, कुछ नहीं दीदी, वो फ्री है।” और उन्होंने आँखों से कुसुम को इशारा किया।
वहीं ये सुनकर कुसुम हक्की-बक्की खड़ी रह गई। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसे अजीब महसूस हो रहा था वो घर जहाँ बचपन मैं वो कभी भी जा धमकती थी ! वहाँ आज जाने में उसे बेचेनी हो रही थी। उसने एक दबी साँस छोड़ी और धीरे से कहा “ “हाँ आंटी, मैं फ्री हूँ... और मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है ! मैं हेल्प कर दूँगी।”
अंकित की नज़र उसके हाथों पर गई, जिन्हें वो आपस में मसल रही थी, तो वो मुस्कुरा दिया। पर जब उसकी नज़र उसके हाथ के ब्रेसलेट पर गया ! To उसकी मुस्कान और बड़ी हो गई !
“हाँ, और मेरी मेड को भी ले जाइए,” असीमा जी ने कहा” ..।
कुछ देर बाद ही कुसुम अंकित के घर पर थी। वो अपनी नज़रें घुमाकर पूरे घर को देख रही थी। कुछ भी तो नहीं बदला था इन बारह सालों में इस घर में।
“क्या देख रही हो?” अंकित ने उसके सामने खड़े होते हुए कहा” ।
तो कुसुम हड़बड़ाकर पीछे हट गई ! क्योंकि वो उसके कुछ ज़्यादा ही करीब खड़ा था।
उसे पीछे हटते देख अंकित की भवें सिकुड़ गईं,
“किटी, तुम...” अंकित ने कुछ कहना चाहा ही था कि.. तभी उसकी माँ ने कुसुम को आवाज़ दी।
कुसुम झट से उस तरफ़ चली गई। अंकित ने उसे फुर्ती से वहाँ से निकलते देखा, तो उसने एक लंबी साँस छोड़ी। और फिर मुहाकुरा दिया “ किट्टी “ ..!
सुबह से काम करते-करते सबको पता ही नहीं चला कि दोपहर कब हुई। और दोपहर से शाम ! शाम तक सारा सामान अनपैक होकर सेट हो गया था। ईस वक़्त तीनों गार्डन में बैठे चाय पी रहे थे। अंकित की माँ ने कुसुम को देखा और मुस्कुराते हुए कहा “ “हमने सुना है कि आपकी शादी की बात चल रही है, बेटा?”
चाय पीती कुसुम रुक गई, और नज़रे उठाकर अंकित को देखा ! जो अपने फोन में देखते हुए आराम से चाय पी रहा था।
कुसुम ने फिर से सिर झुका लिया ! “हाँ आंटी,” उसने धीरे से कहा “ .. और फिर चुप हो गई।
तो अंकित की माँ मुस्कुरा दीं ! “मैं भी चाहती हूँ कि ये शादी कर ले ! पर जनाब के नखरे ही ख़त्म नहीं होते। एक से एक लड़की दिखाई ! पर एक भी इनको पसंद नहीं आई। पता नहीं कैसी लड़की चाहिए इसको। अब देखो बेटा, यहाँ अकेला रहेगा ! भूत जैसा! मैं तो चली जाऊँगी क्योंकि अंकल वहाँ अकेले हैं।”
कुसुम की नज़र झट से अंकित की ओर उठ गई। देखा तो अंकित उसी को देख रहा था।
कुसुम ने धीरे से कहा “क्या पता आंटी, अंकित को पहले से कोई पसंद हो।”
“अरे पूछा तो था कोई पसंद है तो ले आओ ! पर नहीं इसकी तो अब तक एक गर्लफ्रेंड भी नहीं बनी!”
ये सुनकर कुसुम की आँखें बड़ी हो गईं। उसने झट से दोबारा अंकित को देखा। वो अब भी मुस्कुराते हुए उसी को देख रहा था।
तभी फोन की रिंग बजी। देखा तो अंकित की माँ का फोन वाइब्रेट कर रहा था। उन्होंने फोन उठाया और बोलीं,
“ठीक है बेटा, तुम लोग बात करो, मैं आती हूँ।” कहकर वो अंदर चली गईं।
उनके जाते ही अब दोनों वहाँ बिल्कुल अकेले थे।
कुसुम ने अंकित को देखा ! जो चाय पीते हुए उसी को देख रहा था। कुसुम के हाथ में चाय का कप कस गया, उसे बहुत अजीब लग रहा था।
“टीचर... हाँ, तुम सच में टीचर बन गई, किटी! क्या बात है!”
अंकित ने मुस्कुराते हुए कहा “ और चाय का कप टेबल पर रख दिया। वो घुटनों पर हथेलियाँ रखकर आगे की ओर झुक गया।
“हम्म...” कुसुम ने धीरे से कहा, “और तुम?”
“तुम्हें नहीं पता?” अंकित ने थोड़ी अजीब आवाज़ में पूछा।
तो कुसुम कुछ नहीं कह पाई...
" हा उसको सब पता है ! भले ही वो उसके मैसेज का रिप्लाई नहीं करती ! उससे बात नहीं करती ! पर फिर भी वो उसके बारे में जनाने से खुदको रोक नहीं पाती ! स्टॉकर की तरह पीछे पड़ी है वो उसके ! सिर्फ उसके लिया पता नहीं उसने कितनी फेक बनाई है ! पर ये बात सिर्फ वो जानती थी ! कोई नहीं और वो किसी और को कभी बताना चाहती भी नहीं थी !
“शादी के बारे में क्या सोचा है? कैसा लाइफ पार्टनर चाहिए?”
अंकित ने फिर पूछा।
“पता नहीं... बस एक अच्छा लड़का, जो मुझे वैसे ही एक्सेप्ट करे जैसे मैं हूँ।” कहते हुए कुसुम ने नज़रे उठाकर अंकित को देखा तो अंकित मुस्कुरा दिया।
“वैसे, तुमने मेरे मैसेज का रिप्लाई और कॉल का जवाब देना क्यों बंद कर दिया था ! किट्टी?”
कहते हुए उसकी आवाज़ में हल्का-सा गुस्सा था, और जवाब जानने की बेचैनी थी ! वो टकटकी लगाए अपने जवाब के इंतज़ार में मैं कुसुम को देख रहा था !
कुसुम ने कसकर अपनी स्कर्ट को पकड़ लिया। बस इसी एक सवाल से तो वो बचना चाहती थी। ऐसा नहीं था कि उसके पास इस सवाल का जवाब नहीं था ! लेकिन वो सच बोलना नहीं चाहती थी ! और झूठ वो अंकित के सामने बोल नहीं पाती थी।
उसने एक गहरी साँस खींची और झट से उठ खड़ी हुई।
“वो... माँ बुला रही हैं,” कहते हुए वो तेज़ी से निकलने लगी।
“किट्टी!”
और उसे अपनी कलाई पर अंकित का स्पर्श महसूस हुआ।
वो सिहर उठी ! उसकी आँखें बंद हो गईं।
उसका दिल बेतहासा धड़कने लगा ! साँसें तेज़ हो गईं ! और वो जहाँ थी, वहीं जम गई।