कमरे में सिर पकड़े बैठी कुसुम के ज़ेहन में ! बारह बरस पहले की यादों ने हल्के से दस्तक दी !
और कुसुम उन्हें आने से रोक नहीं पाई।
बचपन मैं जब वो पाँच साल की थी, तब वो इस शहर में अपने माँ-पापा के साथ आई थी।
वो कभी भी आसानी से दोस्त नहीं बना पाती थी।
यही कारण था कि यहाँ आने के बाद भी दो दिन तक वो अपने घर से बाहर नहीं निकली थी।
हमेशा की तरह वो अपने कमरे में बैठी अपनी गुड़िया के बालों को सँवार रही थी,
जब एक “ चहकती सी आवाज़ “ उसको सुनाई दी
“हैलो! “
कुसुम ने झट से अपनी नज़रें उठाकर सामने देखा
तो उसको सामने सात साल का एक लड़का दीखा,
जिसने मुस्कुराते हुए उसकी ओर हाथ बढ़ा रखा था।
कुसुम बस उसके हाथ को देखती रही।
तभी उसे अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दी
“हाथ मिलाओ कुसुम, वो हमारे नेबर हैं।
हमसे मिलने आए हैं और हमें वेलकम करने आए हैं।”
कुसुम ने अपनी माँ को देखा तो उन्होंने आँखों से इशारा किया।
कुसुम ने धीरे से अपने नन्हे हाथों को अंकित के हाथों में रख दिया।
उसके साँवले हाथ, अंकित के गोरे हाथों में बहुत अच्छे लग रहे थे।
अंकित ने फिर से चहकते हुए कहा “
“हाय! मेरा नाम अंकित है ! और तुम्हारा? ”
“कुसुम “ कुसुम ने धीरे से कहा “ ।
तो अंकित मुस्कुरा दिया !
“ओह्ह, नाइस नेम! फ्रेंड्स?”उसने बड़ी सी मुस्कान के साथ पूछा।
“हम्म…”कुसुम ने बस सिर हिला दिया।
और उस दिन के बाद से ही ! उनका एक-दूसरे के घर जाना ! ,कभी भी एक-दूसरे के कमरे में धमक जाना !
आम बात हो गई थी।
हमेशा चुप सी रहने वाली कुसुम ! उसके सामने चुप ही नहीं होती थी। स्कूल में अंकित उसका सीनियर था ! इसलिए वो उसकी पढ़ाई में भी मदद कर देता था।
वो लोग अक्सर उसके कमरे में पढ़ाई करते थे !
और अंकित की माँ हमेशा उसे ! टेस्टी-टेस्टी नाश्ता बनाकर खिलाती थीं।
अंकित उसे हमेशा स्कूल में बुली होने से बचाता था।
और जब भी उसकी माँ उसे उसके चेहरे पर कुछ लगाने को कहती, और कुसुम मना करती, तो उसे खूब सुनने को मिलता ! और फिर रोती हुई जाकर अंकित के कमरे में बैठ जाती।
ऐसे ही एक दिन वो बस रोए जा रही थी। उसकी आँखों में जैसे किसी ने टंकी फिट कर दी थी। अंकित उसके सामने हाथ बाँधे खड़ा था। जब उसने देखा कि कुसुम चुप ही नहीं हो रही है, तो उसने एक गहरी साँस ली, और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा “ ओय्य्य किट्टी! अगर अब तुम चुप नहीं हुई न, तो तुम्हारी मम्मी को बता दूँगा कि वो महँगा वाला क्रीम तुमने कहाँ फेंका था!
कुसुम की आँखें बड़ी हो गईं। वो अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से अंकित को देखने लगी। उसकी हिचकियाँ बंध गईं थी ! पूरा चेहरा और आँखें लाल हो गई थीं। उसकी नाक भी लाल हो गई थी ! और उसके बगल में रखा पूरा टिश्यू पेपर खत्म हो गया था।
अंकित ने सिर हिलाया ! और उठकर जाकर एक गिलास पानी लाया ! और उसके सामने रख दिया।
कुसुम ने एक साँस में पूरा गिलास खाली कर दिया। अंकित मुस्कुरा दिया और अपना बीन बैग सरका कर उसके सामने बैठ गया।
“अब बोलो क्या हुआ? क्यों गंगा-जमुना बहाए जा रही हो?
तुम्हारी मम्मी ने फिर से तुम्हें कुछ कहा क्या? फिर किसी डॉक्टर के पास ले गई थीं क्या? फिर से तुम्हारे मुँह पर हल्दी पोता? या …तुम्हारी वजह से…” कुसुम चीख पड़ी !
तो अंकित शांत हो गया। उसने कुसुम की उँगली को देखा
वो उसकी ओर इशारा कर रही थी।
अंकित ने अपनी तरफ़ उँगली करते हुए कहा “ मेरी वजह से?”
“हाआं!” कुसुम ने जल्दी-जल्दी सिर हिला दिया।
“मैंने क्या किया? थोड़ा बताओगी भी?
क्योंकि मैं खुद नहीं जानता ! तो थोड़ा बताने का कष्ट करो, मोहतरमा!”
“तुम जा रहे हो यहाँ से! तुम मुझे छोड़कर चले जाओगे! तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”
और उसने दोबारा ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया।
अंकित ने हैरानी से एक पल के लिए उसे देखा ! फिर ज़ोर से ठहाका मारकर हँस पड़ा।
उसे हँसते देख कुसुम चुप हो गई ! और उसे घूरने लगी।
अंकित ने हँसी रोकी और कुसुम के सिर पर चपत लगाते हुए कहा ‘’ पागल ! इसके लिए रो रही थी? मुझे बताती तो !
और इसमें रोने वाली कौन सी बात है? पापा का तबादला हो गया है ! इसलिए हमें जाना पड़ रहा है।
और तुम तो ऐसे रो रही हो जैसे मैं चाँद पर जा रहा हूँ! दूसरे शहर ही तो जा रहा हूँ। जब मिलने का मन करेगा, मुझे बता देना ! मै चला आऊँगा। और फिर हम फोन पर भी तो बातें करेंगे ना?
और कुछ टाइम बाद तुम्हारे पास जब कंप्यूटर आ जाएगा, तो हम उससे भी बात कर सकते है !
पर जैसे हम सोचते हैं, वैसा होता कहाँ है… सब कुछ कह देने से हो जाता, तो फिर क्या ही बात थी।
एक हफ़्ते बाद, कुसुम अंकित के सामने खड़ी थी ! जो तैयार खड़ा था, दूसरे शहर जाने को। कुसुम से दूर जाने को।
पंद्रह साल का अंकित, तेरह साल की कुसुम से काफ़ी लंबा था। कुसुम बस एकटक अंकित को देख रही थी।
उसकी आँखों के कोर गीले थे, उसने अपना हाथ पीछे कर रखा था।
अंकित ने उसके हाथों को देखा और मुस्कुराते हुए कहा “क्या छुपा रही हो किट्टी? मेरे लिए कुछ लेकर आई हो क्या? लाओ।” दो अंकित ने अपना हाथ आगे कर दिया ! पर कुसुम ने अपना हाथ आगे नहीं किया।
अंकित की आँखें सिकुड़ गईं। उसने अपने दोनों हाथ पीछे किए और झुक गया, और अपना चेहरा कुसुम के चेहरे के बराबर ले आया।
“तुम क्या सोच रही हो किट्टी? कहाँ खोई हो? सब ठीक है न?”
“हम्म…” कुसुम ने सिर हिला दिया और अपना हाथ आगे कर के अपनी मुट्ठी खोली।
अंकित की नज़र उसकी खुली हथेली पर गई ! वहाँ एक सिल्वर रंग की चेन थी। उसने झट से दोबारा कुसुम को देखा।
कुसुम ने सिर झुकाए ही कहा “ वो… मैंने अपनी गुल्लक फोड़ी। वहाँ से जितने पैसे निकले, उससे बस यही मिला।”
उसने मासूमियत से कहा “ और नज़रें उठाकर अंकित को देखा।
अंकित उसे हैरानी से देख रहा था, फिर सीधा खड़ा हो गया।
तुमने मेरे लिए अपनी गुल्लक तोड़ी? क्यों? तुमने तो कहा था कि तुम इसे तब तोड़ोगी जब कॉलेज जाओगी।”
कुसुम ने कुछ नहीं कहा और अपना हाथ थोड़ा और आगे बढ़ा दिया। क्या ये तुम्हें पसंद नहीं आया ! कुसुम ने धीरे से झिझकते हुवे कहा “ …!
अंकित ने वो चेन उसके हाथ से ले ली और उसे ध्यान से देखा।
वो एक सिल्वर कलर की चेन थी, जिसके बीच में एक छोटा-सा ‘ॐ’ का लॉकेट लटक रहा था।
अंकित मुस्कुरा दिया, “बहुत सुंदर है… पर मैं तो तुम्हारे लिए कुछ भी लेकर नहीं आया।”अंकित ने मुस्कुराते हुए उसको देखा !
“कोई बात नहीं।” कुसुम ने चहकते हुए कहा “तुम्हें ये सच में पसंद आया न?”
अंकित ने उसका सिर सहलाते हुए कहा “हाँ, बहुत पसंद आया।” उसने उसे अपनी जींस की पॉकेट में डाल लिया।
फिर उसने दूसरा हाथ भी पॉकेट में डाला और एक ब्रेसलेट निकाल कर कुसुम के हाथ में पहना दिया। कुसुम बस एकटक अंकित को देख रही थी। उसने एक नज़र ब्रेसलेट पर डाली ! जिसके बीच में अर्धचंद्र का निशान था ! और उसमें छोटे-छोटे गुलाब के फूल बने हुए थे। उसने देखा वो बड़ा हो रहा था ! उसने अंकित को देखा और बोली ये तो बड़ा है !
अंकित ने उसका सिर सहलाया और धीरे से कहा
“ क्योंकि कुछ समय मैं तुम भी बड़ी हो जाओगी तो ये छोटा हो जाएगा ना ! इसलिए बड़ा साइज लिया ताकि तुम उसे हमेशा पहन सको ! इसको उतारना मत समझी ! और अपना ख़याल रखना, ठीक है? और स्कूल में झगड़ा मत करना।
आंटी की बातों का बुरा मत मानना। और लोग कुछ भी कहें, उनकी बातों पर ध्यान मत देना।
और एक बात हमेशा याद रखना ! तुम जैसी हो, परफेक्ट हो। तुम्हें खूबसूरत बनने की ज़रूरत नहीं है, किट्टी… तुम पहले से ही बहुत खूबसूरत हो, समझी?”
कुसुम ने सिर हिला दिया। और अंकित मुड़कर चला और जाकर कार में बैठ गया।
कुसुम वहीं खड़ी उसकी गाड़ी को जाते हुए देखती रही।
अंकित भी कार से सिर निकाल कर उसे देख रहा था। दोनों ही एक-दूसरे को देखते रहे, जब तक एक-दूसरे की आँखों से ओझल नहीं हो गए।
और अंकित ने जैसा कहा था ! वो उसे कॉल करता था।
वो दोनों घंटों बातें करते थे।
ये बात अलग थी कि वो कभी एक-दूसरे से मिल नहीं पाए।
जैसे ही कुसुम को कंप्यूटर मिला, दोनों उससे बातें करने लगे रोज़ घंटों चैट करते, एक-दूसरे को पूरे दिन का हाल सुनाते।
लेकिन अंकित के कॉलेज जाते ही उनकी बातें कम हो गईं।
शायद वो अब थोड़ा बिज़ी हो गया था। अब हफ़्ते में एक बार बात होती। उनकी बातें भी बहुत सिमटी-सिमटी सी हो गई थीं।
और धीरे-धीरे उसकी बातों में किसी तीसरे का ज़िक्र होने लगा। और जाने क्यों ये बात कुसुम को खटकने लगी।
वो अंकित की बातों में किसी और का ज़िक्र सुनकर चिढ़ जाती। उसे बुरा लगता ! उसका मन उचट जाता।
उस लड़की पर गुस्सा आता ! जिससे वो कभी मिली भी नहीं थी।
और फिर धीरे-धीरे वो गुस्सा बढ़ता गया।
एक दिन वो फूट-फूट कर रोई, और खुद से ही सवाल करने लगी !
“क्यों? क्यों तुझे बुरा लगता है वो जो करे? हम बस दोस्त ही तो हैं। उसे हक़ है अपनी ज़िंदगी जीने का। और यही तो उम्र होती है प्यार करने की, गर्लफ्रेंड बनाने की…” “उसे क्यों बुरा लग रहा है?” “क्या चाहती है आखिर वो?”
और उसके अंतरमन ने ही इसका जवाब हल्के से दे दिया
“उसे… उसे चाहती है वो। वो उससे प्यार करती है।”
वो बस उसके लिए दोस्त नहीं था ! वो उससे ज़्यादा कुछ था।
जाने कब वो उसे अपना दिल दे बैठी। उससे प्यार कर बैठी।
शायद बचपन से ही… हमेशा से। वो उसका पहला प्यार था।
उस दिन जब अंकित का मैसेज आया ! तो वो घंटों कंप्यूटर के सामने बैठी उसे घूरती रही। उसमें लिखा था !
“हे किट्टी! तुम्हें पता है, मैं इतने टाइम से उसको अपने दिल की बात बताने की सोच रहा था, यार… पर आज पता है क्या हुआ ! उसने खुद मुझे सामने से प्रपोज़ कर दिया!
I’m so happy, I can’t explain मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ। वो बहुत अच्छी है ! तुम भी उससे मिलोगी न ! तुम्हें भी वो बहुत पसंद आएगी।”
कुसुम सुनी आँखों से उस मैसेज को देख रही थी। उसके जहन में अंकित का मुस्कुराता चेहरा चल रहा था !
कितना खुश होगा वो…
और उस दिन के बाद उसने दोबारा कभी अंकित से बात नहीं की। उसके बहुत से मैसेज और कॉल आए, ! पर उसने कभी जवाब नहीं दिया।
और फिर, एक वक्त के बाद, उसके कॉल और मैसेज आना भी बंद हो गए। पर उसकी यादें… वो आना कभी बंद नहीं हुईं।याद नहीं वो तो कभी उसे भूली ही नहीं।
बारह बरस तक उसने उस प्यार को अपने अंदर छिपाए रखा।
किसी को नहीं बताया।
और अब जब उसने अपनी ज़िंदगी से समझौता कर लिया था… तो फिर क्यों… ये लड़का दोबारा आकर उसके सामने खड़ा हो गया था?