50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 34 Priya Chaudhary द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 34

(कंक्रीट के गिरने की भयानक आवाज़ें, अलार्म की तीखी चीखें, और रंजना की पागलों जैसी हँसी। आर्यन के कानों में सिर्फ आयशा की सांसें गूँज रही हैं।)
समय का चक्र अब सेकंडों में सिमट चुका था। लैब की छतें ताश के पत्तों की तरह ढह रही थीं। आर्यन ने आयशा को अपने जैकेट के अंदर मजबूती से लपेटा और अपना पूरा ज़ोर लगाकर उस मुख्य खंभे की तरफ दौड़ा, जिसे रंजना ने एक्सप्लोसिव्स से घेर रखा था।
सीन 1: रंजना का आखिरी खेल
रंजना ने हाथ में रिमोट थामे हुए आर्यन को रोका। "तुमने अपने पिता का साम्राज्य तो खत्म कर दिया आर्यन, लेकिन तुमने मेरा जो कुछ भी छीना, उसका हिसाब कौन देगा? मैं मरूँगी, लेकिन तुम्हारे साथ!"
आर्यन ने अपनी आँखों में वह शांति देखी जो मौत के करीब होने पर आती है। उसने रंजना की आँखों में देखा और कहा, "रंजना, तुम कभी मेरी दुश्मन नहीं थी। तुम तो बस उस सन्नाटे की शिकार थी जो विक्रम मल्होत्रा ने हम सबके चारों ओर बुना था। अगर तुम सच में बदला लेना चाहती हो, तो उस रिमोट को छोड़ दो और मेरे साथ चलो।"
रंजना एक पल के लिए रुकी। उसके हाथ कांपने लगे। तभी एक बड़ी चट्टान रंजना के पीछे गिरी, जिससे वह असंतुलित हो गई और रिमोट उसके हाथ से छूटकर दूर जा गिरा। आर्यन ने बिना सोचे झपट्टा मारा और उस रिमोट को उठाकर एक तरफ फेंक दिया। लेकिन टाइमर अभी भी चल रहा था—वह 'मैनुअल' मोड पर था!
सीन 2: वह दीवार जिसे तोड़ना ज़रूरी था
लैब के एग्जिट गेट के सामने एक लोहे की भारी दीवार आ गई थी जो धमाके के सेंसर से बंद हुई थी। आर्यन जानता था कि अब उसके पास भागने का समय नहीं है। उसने पास में पड़े एक पुराने वेल्डिंग टॉर्च और कुछ केमिकल ड्रम्स को देखा। उसने आयशा को एक सुरक्षित कोने में सुलाया।
"आयशा, बेटा, बस थोड़ी देर और," उसने फुसफुसाकर कहा।
आर्यन ने उन केमिकल ड्रम्स के साथ एक 'चेन रिएक्शन' (Chain Reaction) बनाने की कोशिश की। अगर वह उन्हें सही तरीके से फोड़ता, तो धमाके का प्रेशर इस लोहे की दीवार को बाहर की तरफ धकेल सकता था।
सीन 3: धमाके के बीच सन्नाटा
आर्यन ने आग लगाई। बूम्! एक ज़ोरदार विस्फोट हुआ। लैब की दीवार का एक हिस्सा उड़ गया। आर्यन ने आयशा को उठाया और उस धुएं और मलबे के बीच से बाहर कूद गया। ठीक उसी पल, पूरी लैब आग के गोले में बदल गई। रंजना उस मलबे के साथ ही अंदर खत्म हो गई, लेकिन आर्यन और आयशा उस पहाड़ी ढलान पर सुरक्षित लुढ़कते हुए बाहर आ गए।
सीन 4: सुबह की पहली किरण
बाहर अभी भोर (Dawn) का समय था। आसमान नारंगी और बैंगनी रंग का था। आर्यन लेटा हुआ था, उसके कपड़े फटे हुए थे और शरीर पर कई चोटें थीं। पास ही आयशा धीरे से उठी। उसने अपनी आँखें मलीं और आर्यन को देखा।
"पापा?" उसकी आवाज़ में वही मासूमियत थी। वह विक्रम की आवाज़ अब जा चुकी थी। आयशा ने उसे गले लगा लिया।
आर्यन की आँखों से आँसू निकल पड़े। वह सन्नाटा, जो 50 दिन पहले हवेली की उस सीढ़ी से शुरू हुआ था, अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका था।
सीन 5: एक नई शुरुआत?
आर्यन ने अपनी जेब से अपनी नोटबुक निकाली। आखिरी पन्ना—0 दिन शेष। उसने कुछ नहीं लिखा। उसने वह नोटबुक वहीं उस मलबे के ढेर पर रख दी। उसने जान लिया था कि अब कोई 'दिन' या 'काउंटडाउन' नहीं है। वह अब आज़ाद था।
पुलिस की गाड़ियाँ और एम्बुलेंस दूर से आती दिखाई दीं। आदित्य, जो गायब हो गया था, वह भी वहाँ पहुँचा। उसकी आँखों में पछतावा था। उसने आर्यन को देखा और सिर झुकाया।
"सब खत्म हो गया, आर्यन," आदित्य ने कहा।
"नहीं आदित्य," आर्यन ने ठंडी सांस ली। "सब शुरू हुआ है।"
नैरेटर: 50 दिन का सन्नाटा अब खत्म हो चुका है। आर्यन ने सब कुछ खोकर भी सब कुछ पा लिया है। लेकिन उस मलबे के ढेर में, क्या वाकई विक्रम मल्होत्रा और उसका हर एक राज़ दफन हो गया है? या सन्नाटा फिर से किसी और रूप में लौट आएगा?
(सस्पेंस पॉइंट: दूर खड़ी एम्बुलेंस में बैठे एक डॉक्टर ने अपना मास्क उतारा। वह चेहरा—विक्रम मल्होत्रा का नहीं था, लेकिन वह चेहरा जाना-पहचाना था। वह समीर था! समीर ने एक टैबलेट निकाला और उस पर टाइप किया—"प्रोजेक्ट आर्यन सफल। सब्जेक्ट अब पूरी तरह से स्वतंत्र है। अगला चरण शुरू करें।" आर्यन और आयशा एम्बुलेंस में बैठ गए, यह जाने बिना कि वे अभी भी एक और बड़े खेल का हिस्सा हैं।)
लेखिका की कलम से:
दोस्तों, "50 दिन का सन्नाटा" का यह फिनाले पार्ट 1 आपको कैसा लगा? आर्यन ने खुद को आज़ाद तो समझ लिया, लेकिन क्या समीर का यह नया खेल उसे फिर से उसी सन्नाटे में ले जाएगा?
अब आखिरी पड़ाव बाकी है! क्या आप जानना चाहते हैं कि समीर की सच्चाई क्या है? कमेंट्स में अपनी थ्योरी बताएं और तैयार रहें कल के 'अंतिम एपिसोड' के लिए! ⏳🖤🔓🔥