क्या सब ठीक है - 6 Narayan Menariya द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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क्या सब ठीक है - 6

भीड़ में खोया इंसान...


दिल्ली जैसे बड़े शहर की सुबह हमेशा शोर से शुरू होती थी। सड़क पर दौड़ती गाड़ियाँ, बस स्टॉप पर खड़ी लंबी लाइनें, हॉर्न की आवाज़ें और हर चेहरे पर जल्दी का भाव। ऐसा लगता था जैसे पूरा शहर किसी अदृश्य दौड़ में भाग रहा हो।

उसी भीड़ का एक हिस्सा था — अर्जुन।

करीब तीस साल का साधारण युवक। एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। हर सुबह जल्दी उठना, मेट्रो पकड़ना, ऑफिस जाना और देर रात थककर घर लौट आना उसकी जिंदगी बन चुकी थी।

उसके पास सब कुछ था — अच्छी नौकरी, रहने के लिए फ्लैट, बैंक बैलेंस और महंगे कपड़े। लेकिन फिर भी उसके अंदर एक अजीब खालीपन था।

अर्जुन रोज हजारों लोगों के बीच से गुजरता था, लेकिन फिर भी अकेला था।

मेट्रो में लोग एक-दूसरे से सटे खड़े रहते, लेकिन किसी की नजर किसी से नहीं मिलती। हर कोई अपने मोबाइल में खोया रहता। किसी के कान में ईयरफोन, किसी की उंगलियाँ स्क्रीन पर दौड़ती हुई।

अर्जुन भी उन्हीं में से एक था।

एक समय था जब वह छोटे शहर में रहता था। पड़ोसी परिवार जैसे होते थे। शाम को लोग छतों पर बातें करते थे। रिश्तों में अपनापन था।

लेकिन शहर में आते ही सब बदल गया।

यहाँ लोग नाम से नहीं, काम से पहचाने जाते थे।

उसका दिन सुबह के “गुड मॉर्निंग” मैसेज से शुरू होता और रात के “टारगेट पूरा हुआ?” पर खत्म हो जाता। जिंदगी धीरे-धीरे मशीन जैसी बनती जा रही थी।

ऑफिस में भी हालत अलग नहीं थी।

सब लोग साथ बैठते थे, लेकिन सिर्फ काम की बातें होती थीं। किसी के पास किसी का दुख सुनने का समय नहीं था। वहाँ दोस्ती नहीं, सिर्फ प्रतियोगिता थी।

अर्जुन का एक सहकर्मी था — रोहन। हमेशा हँसता रहता था। हर मीटिंग में मजाक करता, सबको खुश रखता।

एक दिन अचानक खबर आई कि रोहन ने नौकरी छोड़ दी।

कारण सुनकर पूरा ऑफिस चुप हो गया।

वह कई महीनों से डिप्रेशन में था।

यह सुनकर अर्जुन अंदर तक हिल गया। क्योंकि जिस इंसान को सब सबसे खुश समझते थे, वह अंदर से टूट चुका था।

उस रात अर्जुन देर तक सो नहीं पाया।

उसने सोचा —
“क्या हम सच में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने आसपास के लोगों का दर्द भी नहीं देख पाते?”

अगले दिन मेट्रो में जाते समय उसने पहली बार अपने आसपास ध्यान से देखा।

एक बुजुर्ग आदमी सीट के लिए खड़ा था, लेकिन कोई मोबाइल से नजर हटाने को तैयार नहीं था।
एक छोटा बच्चा अपनी माँ का हाथ पकड़े भीड़ में घबराया हुआ था।
एक लड़की आँखों में आँसू लिए चुपचाप खिड़की की तरफ देख रही थी।

हर चेहरा कुछ कह रहा था।

लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था।

धीरे-धीरे अर्जुन को महसूस होने लगा कि यह शहर सिर्फ लोगों से भरा हुआ है, इंसानियत से नहीं।

उसके अपने जीवन में भी रिश्ते धीरे-धीरे कमजोर हो चुके थे।

माँ रोज फोन करतीं, लेकिन वह हमेशा कह देता —
“माँ, अभी मीटिंग में हूँ। बाद में बात करता हूँ।”

और वह “बाद में” कभी नहीं आता था।

पिता कई बार कहते —
“बेटा, घर आ जाया कर कभी-कभी।”

लेकिन अर्जुन के पास हमेशा काम का बहाना होता।

असल में उसने रिश्तों को जरूरी नहीं, अतिरिक्त समझना शुरू कर दिया था।

एक रविवार को अचानक उसे अपने पुराने दोस्त समीर का फोन आया।

“यार, कितने साल हो गए मिले हुए?”

अर्जुन ने हँसते हुए कहा —
“बस काम में व्यस्त हूँ।”

समीर कुछ देर चुप रहा, फिर बोला —
“काम खत्म हो जाएगा अर्जुन, लेकिन अगर रिश्ते खत्म हो गए ना… तो जिंदगी बहुत खाली लगती है।”

यह बात अर्जुन के दिल में उतर गई।

उस रात वह अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ा शहर की चमकती रोशनियाँ देख रहा था। नीचे सड़क पर हजारों लोग थे। हर कोई कहीं पहुँचने की जल्दी में था।

लेकिन अचानक उसके मन में सवाल उठा —
“इतनी भागदौड़ के बाद आखिर हम पहुँच कहाँ रहे हैं?”

उसने महसूस किया कि वह पिछले कई सालों से सिर्फ जी नहीं रहा था, बल्कि खुद को साबित करने की कोशिश कर रहा था।

बड़ा घर चाहिए।
बड़ी सैलरी चाहिए।
महंगा फोन चाहिए।

लेकिन इस दौड़ में उसने छोटी-छोटी खुशियाँ खो दी थीं।

माँ के हाथ की चाय।
दोस्तों के साथ बेवजह की बातें।
पिता की सलाह।
बारिश में भीगना।
खुलकर हँसना।

सब कहीं पीछे छूट गया था।

अगले दिन ऑफिस जाते समय मेट्रो स्टेशन के बाहर उसने एक बुजुर्ग चायवाले को देखा। वह मुस्कुराकर हर ग्राहक से बात कर रहा था।

अर्जुन ने पहली बार वहाँ रुककर चाय पी।

चायवाले ने मुस्कुराते हुए पूछा —
“बहुत थके हुए लग रहे हो साहब?”

अर्जुन हल्का सा मुस्कुराया —
“हाँ… शायद जिंदगी से।”

बुजुर्ग आदमी हँस पड़ा।

“जिंदगी से नहीं साहब, जिंदगी की दौड़ से थके हो। जिंदगी तो छोटी-छोटी चीजों में छुपी होती है।”

अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

एक साधारण चायवाले की बात उसके बड़े-बड़े मोटिवेशनल वीडियो से ज्यादा असर कर गई।

उस दिन ऑफिस पहुँचकर उसने सबसे पहले माँ को फोन किया।

माँ की आवाज सुनते ही उसका दिल भर आया।

“कैसे हो बेटा?”

अर्जुन ने धीरे से कहा —
“ठीक हूँ माँ… और आप?”

माँ कुछ सेकंड चुप रहीं, फिर बोलीं —
“आज बहुत दिनों बाद तूने खुद फोन किया है।”

अर्जुन की आँखें नम हो गईं।

उसने उसी सप्ताह घर जाने का फैसला किया।

कई महीनों बाद जब वह अपने गाँव पहुँचा, तो उसे लगा जैसे वह खुद के पास लौट आया हो।

वहीं पुरानी गलियाँ।
वही लोग।
वही अपनापन।

उस रात छत पर लेटे हुए उसने आसमान की तरफ देखा। शहर में इतने साल रहने के बाद शायद पहली बार उसे सुकून महसूस हो रहा था।

अब वह समझ चुका था कि जिंदगी सिर्फ पैसे कमाने का नाम नहीं है।

अगर इंसान के पास बात करने वाले अपने लोग नहीं हैं, तो भीड़ के बीच भी वह अकेला ही रहता है।

कुछ दिनों बाद वह वापस शहर लौट आया।

शहर वही था।
भीड़ वही थी।
भागदौड़ वही थी।

लेकिन अर्जुन बदल चुका था।

अब वह मेट्रो में मोबाइल से ज्यादा लोगों को देखने लगा था।
माँ का फोन तुरंत उठाने लगा था।
दोस्तों के लिए समय निकालने लगा था।

क्योंकि उसने समझ लिया था —

इस दुनिया में सबसे बड़ा अकेलापन वह नहीं है जब इंसान अकेला हो।

सबसे बड़ा अकेलापन तब होता है, जब इंसान भीड़ में रहकर भी किसी का ना रहे।