क्या सब ठीक है - 5 Narayan Menariya द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

क्या सब ठीक है - 5

लाइक्स के लिए जीती लड़की...


रिया अपने कमरे के आईने के सामने खड़ी थी। हाथ में मोबाइल था और चेहरे पर नकली मुस्कान। उसने कैमरा ऑन किया, बालों को ठीक किया और फिर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ वीडियो रिकॉर्ड करने लगी।

“हेलो दोस्तों! कैसी लग रही हूँ आज? अगर वीडियो पसंद आए तो लाइक, शेयर और फॉलो करना मत भूलना…”

वीडियो खत्म होते ही उसके चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई। उसने गहरी साँस ली और थके हुए कदमों से बिस्तर पर बैठ गई। बाहर शाम हो चुकी थी, लेकिन उसके कमरे में अँधेरा पहले से ही उतर आया था।

रिया सोशल मीडिया पर बहुत मशहूर थी। इंस्टाग्राम पर उसके लाखों फॉलोअर्स थे। हर फोटो पर हजारों लाइक्स आते थे। लोग उसकी खूबसूरती, उसके कपड़े और उसकी लाइफस्टाइल की तारीफ करते नहीं थकते थे। देखने वालों को लगता था कि वह दुनिया की सबसे खुश लड़की है।

लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग था।

रिया की असली जिंदगी उस चमकती स्क्रीन के पीछे कहीं खो चुकी थी।

पहले वह बहुत साधारण लड़की थी। कॉलेज जाती थी, दोस्तों के साथ हँसती थी, माँ के साथ रसोई में बातें करती थी और पिता के साथ शाम को चाय पीती थी। लेकिन धीरे-धीरे सोशल मीडिया उसकी जिंदगी का हिस्सा नहीं, पूरी जिंदगी बन गया।

एक दिन उसने मज़ाक में अपना वीडियो अपलोड किया था। वीडियो वायरल हो गया। हजारों लाइक्स आए। लोगों के कमेंट्स देखकर उसे पहली बार लगा कि शायद उसकी पहचान अब बन रही है।

उस दिन के बाद रिया बदलने लगी।

अब उसकी सुबह सूरज की रोशनी से नहीं, मोबाइल की नोटिफिकेशन से होती थी। रात को सोने से पहले वह भगवान का नाम नहीं, बल्कि अपने फॉलोअर्स की संख्या देखती थी।

अगर किसी पोस्ट पर कम लाइक्स आते, तो उसका पूरा दिन खराब हो जाता। वह घंटों आईने के सामने खुद को देखती और सोचती — “क्या मैं अब पहले जैसी सुंदर नहीं रही?”

धीरे-धीरे उसने खुद की तुलना दूसरों से करनी शुरू कर दी। किसी की महंगी कार देखकर उसे अपनी जिंदगी छोटी लगने लगती। किसी की विदेश यात्रा देखकर उसे अपना घर बेकार लगने लगता।

असल में वह दूसरों की खुशी देखकर अपनी जिंदगी से नफरत करने लगी थी।

रिया की माँ कई बार उसे समझाती थीं।

“बेटा, थोड़ा समय हमारे साथ भी बिता लिया करो।”

लेकिन रिया हमेशा यही कहती —
“माँ, आपको समझ नहीं आएगा। ये मेरा काम है।”

एक समय ऐसा आया जब घर में रहते हुए भी वह घर से दूर हो गई। पिता डाइनिंग टेबल पर उसका इंतजार करते रहते, लेकिन वह कमरे में बंद मोबाइल पर लाइव आती रहती।

धीरे-धीरे उसके दोस्त भी उससे दूर हो गए। क्योंकि अब रिया हर मुलाकात को सिर्फ कंटेंट समझने लगी थी।

एक दिन उसकी सबसे अच्छी दोस्त ने उससे कहा —
“रिया, तू अब इंसानों से नहीं, कैमरे से बातें करती है।”

उसने हँसकर बात टाल दी, लेकिन कहीं न कहीं वह बात उसके दिल में चुभ गई।

समय बीतता गया। फॉलोअर्स बढ़ते गए, लेकिन रिया अंदर से खाली होती गई।

अब उसे हर वक्त डर लगा रहता था।
डर कि कहीं लोग उसे भूल न जाएँ।
डर कि कहीं उसके लाइक्स कम न हो जाएँ।
डर कि कहीं कोई दूसरी लड़की उससे ज्यादा लोकप्रिय न हो जाए।

वह हर समय परफेक्ट दिखना चाहती थी। कई बार बुखार में भी वीडियो बनाती। कई बार रोने के बाद भी मेकअप करके मुस्कुराती।

क्योंकि सोशल मीडिया पर दुख दिखाना कमजोरी माना जाता था।

एक रात रिया ने अपनी नई फोटो पोस्ट की। उसे पूरा विश्वास था कि हमेशा की तरह लाखों लाइक्स आएँगे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।

कुछ लोगों ने उसकी तस्वीर का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया।
किसी ने लिखा —
“पहले जैसी बात नहीं रही।”

किसी ने कहा —
“फिल्टर हटाओ, असली चेहरा दिखाओ।”

रिया पूरी रात उन कमेंट्स को पढ़ती रही। हर शब्द उसके दिल में तीर की तरह चुभ रहा था।

उस रात उसने पहली बार खुद को आईने में ध्यान से देखा।

आँखों के नीचे काले घेरे थे।
चेहरे पर थकान थी।
और सबसे ज्यादा… उसकी आँखों में अकेलापन था।

वह अचानक रोने लगी।

इतना रोई कि खुद को संभाल नहीं पाई।

उसी समय उसकी माँ कमरे में आईं। उन्होंने बिना कुछ कहे रिया का सिर अपनी गोद में रख लिया।

रिया फूट-फूट कर रोते हुए बोली —
“माँ… मैं बहुत थक गई हूँ। लोग मुझे जानते हैं, लेकिन कोई मुझे समझता नहीं।”

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा —
“बेटा, दुनिया की भीड़ में खुद को मत खो देना। लाइक्स कभी किसी को सच्ची खुशी नहीं दे सकते।”

उस रात शायद कई महीनों बाद रिया ने चैन की नींद सोई।

अगली सुबह उसने अपना मोबाइल उठाया, लेकिन पहली बार सोशल मीडिया खोलने का मन नहीं हुआ। वह बाहर बालकनी में गई। पिता अखबार पढ़ रहे थे। माँ पौधों में पानी डाल रही थीं।

रिया चुपचाप जाकर उनके पास बैठ गई।

पिता मुस्कुराए —
“आज सूरज पश्चिम से निकला क्या?”

रिया हल्का सा हँस दी।

बहुत दिनों बाद उसकी हँसी असली थी।

धीरे-धीरे उसने सोशल मीडिया से दूरी बनानी शुरू कर दी। शुरुआत में बहुत मुश्किल हुई। बार-बार मोबाइल देखने का मन करता। लेकिन अब वह खुद को फिर से ढूँढना चाहती थी।

उसने माँ के साथ खाना बनाना शुरू किया।
पुराने दोस्तों से मिलना शुरू किया।
पिता के साथ शाम की चाय पीने लगी।

अब भी वह सोशल मीडिया इस्तेमाल करती थी, लेकिन सिर्फ जरूरत के लिए। अब उसकी जिंदगी लाइक्स से नहीं चलती थी।

एक दिन उसने बिना मेकअप और बिना फिल्टर के अपनी एक साधारण तस्वीर पोस्ट की। साथ में सिर्फ एक लाइन लिखी —

“असल जिंदगी में खुश रहना, ऑनलाइन परफेक्ट दिखने से ज्यादा जरूरी है।”

इस बार लाइक्स पहले से कम थे।

लेकिन कई सालों बाद पहली बार रिया सच में खुश थी।

क्योंकि अब वह लोगों के लिए नहीं, खुद के लिए जीना सीख चुकी थी।