पटना।
बिहार की राजधानी।
उस रात शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल में शादी थी।
सिन्हा जी की बेटी की शादी।
पुराने नेता। बड़ा नाम। इसलिए शादी में नेता, अफसर, बिज़नेसमैन — सब आए हुए थे। बाहर मीडिया भी खड़ी थी और सिक्योरिटी भी काफी थी।
पूरा हॉल रोशनी से भरा हुआ था।
गेंदे के फूल। बड़ा स्टेज। ऑर्केस्ट्रा। खाने की लंबी लाइनें। हर तरफ लोग ही लोग।
ऑर्केस्ट्रा पर भोजपुरी गाना चल रहा था
🎶 “नजरिया ना लागे… ए राजा नजरिया ना लागे…” 🎶
आराध्या हॉल में दाखिल हुई।
उसने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी। बालों में साधारण सी चोटी। कानों में छोटी बालियाँ। चेहरे पर बस हल्का काजल।
कोई ज़्यादा makeup नहीं।
ना ही उसे उसकी ज़रूरत थी।
उसके साथ उसकी दो cousins थीं
प्रिया और नेहा।
दोनों पूरे excitement में थीं।
“यार वो देख! टीवी में आते हैं ना?” प्रिया ने धीरे से कहा।
“और उधर देख… कितनी बड़ी actress जैसी लग रही है वो aunty।” नेहा बोली।
आराध्या ने बस एक नज़र घुमाई।
फिर सीधा पूछा
“खाना कहाँ है?”
दोनों हँस पड़ीं।
तीनों एक तरफ खड़ी हो गईं।
हॉल में लगातार लोग आ-जा रहे थे। कोई नेताओं से मिल रहा था, कोई फोटो खिंचवा रहा था।
तभी अचानक माहौल थोड़ा बदल गया।
लोग एक तरफ देखने लगे।
सिक्योरिटी वाले alert हो गए।
मीडिया कैमरे घुमाने लगी।
और फिर
रणविजय ठाकुर हॉल में दाखिल हुआ।
सफेद कुर्ता।
बाँहें हल्की folded।
हाथ में black watch।
चेहरे पर वही शांत look।
उसके साथ सिर्फ चार लोग थे। मगर उसके अंदर आते ही पूरा हॉल सीधा हो गया।
कई लोग तुरंत उसके पास जाने लगे।
“साहब आ गए…” प्रिया ने धीरे से कहा।
नेहा भी उसे ही देख रही थी।
आराध्या ने देखा।
एक सेकंड।
फिर नज़र हटा ली।
DJ पर गाना चल रहा है। उसने आराम से कहा।
उधर रणविजय लोगों से मिल रहा था।
सिन्हा जी से बात की। कुछ नेताओं से मिला।
मगर बीच-बीच में उसकी नज़र उसी तरफ जा रही थी जहाँ तीन लड़कियाँ खड़ी थीं।
उसने धीरे से सुभाष से कहा
“वो तीन लड़कियाँ दिख रही हैं?”
“जी सर।”
“बीच वाली।”
सुभाष ने देखा।
गुलाबी साड़ी। साधारण look। मगर भीड़ में अलग दिख रही थी।
“पता करवाएँ?”
रणविजय ने दो सेकंड उसे देखा।
फिर बोला
“रहने दो।”
उधर आराध्या अब परेशान हो चुकी थी।
“यार कोई खाना लेकर आओ ना।”
“अरे दो मिनट। पहले रणविजय ठाकुर को देख लेने दे।” प्रिया बोली।
“मुझे नेता नहीं… खाना चाहिए।”
नेहा फिर हँस पड़ी।
आख़िर आराध्या खुद खाने की तरफ चली गई।
काउंटर पर काफी भीड़ थी। उसने किसी तरह प्लेट ली।
थोड़ा खाना लिया और वापस मुड़ी।
तभी सामने से कोई तेज़ी से आया।
टक्कर होते-होते बची।
उसकी प्लेट हिली मगर गिरी नहीं।
आराध्या ने ऊपर देखा।
सामने रणविजय ठाकुर खड़ा था।
दो सेकंड के लिए दोनों की नज़रें मिलीं।
रणविजय बस उसे देखता रह गया।
और आराध्या?
उसने प्लेट सँभाली।
थोड़ा side हुई।
और सीधा आगे निकल गई।
बस ऐसे ही।
जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
रणविजय वहीं रुक गया।
सुभाष पास आया।
“सर?”
रणविजय की नज़र अभी भी उसी तरफ थी जहाँ आराध्या जा रही थी।
फिर उसके चेहरे पर हल्की सी smile आई।
“सुभाष।”
“जी सर?”
“उस लड़की का नाम पता करो।”
उधर आराध्या वापस अपनी cousins के पास पहुँची।
“मिल गया खाना?” नेहा ने पूछा।
“हाँ।”
“इतनी देर क्यों लगा दी?”
“भीड़ थी।”
उसने आराम से दाल बाटी का पहला टुकड़ा खाया।
प्रिया उसे देख रही थी।
“कुछ हुआ क्या?”
“नहीं।”
आराध्या ने सीधा जवाब दिया।
मगर एक पल के लिए उसे वो भूरी आँखें याद आईं।
शांत। सीधी।
उसने तुरंत ध्यान खाने पर लगाया।
और उधर
रणविजय ठाकुर पहली बार किसी लड़की के बारे में सोच रहा था।