इश्क़ का इलाका - 1 Aarushi Singh Rajput द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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इश्क़ का इलाका - 1


आरा, बिहार।

सुबह का समय था। मोहल्ले में कहीं भजन चल रहा था, कहीं दूधवाला आवाज़ लगा रहा था। सिंह राजपूत परिवार के बड़े घर में भी रोज़ की तरह हलचल शुरू हो चुकी थी।
आँगन में दादी माँ चारपाई पर बैठी तुलसी में पानी डाल रही थीं। तभी अंदर से तेज आवाज़ आई

“दादी! मेरी नीली साड़ी कहाँ है?!”

दादी ने बिना ऊपर देखे कहा “अलमारी में होगी। हमका का पता.”

दो मिनट बाद आराध्या गुस्से में बाहर आई।
“मिली नहीं.”

“तो दूसरी पहन ले.”
“नहीं. वही पहननी है.”
दादी हँस पड़ीं। “हे भगवान… तेरे अंदर बचपन से जिद कूट-कूट के भरा है.”

आराध्या ने मुँह बनाया और उनके पास बैठ गई।
आराध्या सिंह राजपूत।

आरा की रहने वाली। उम्र इक्कीस साल। तेज दिमाग, तेज जुबान… और attitude ऐसा कि बड़े-बड़े लड़के लाइन सीधी कर लें 

घर में सब उससे प्यार करते थे… मगर उससे बहस करने की गलती कोई नहीं करता था।
तभी अंदर से उसके पिताजी की आवाज़ आई—
“आराध्या!”

वो तुरंत उठी। “आ रही हूँ!”

बाहरी बैठक में विक्रम सिंह राजपूत बैठे थे। सफेद कुर्ता, आँखों पर चश्मा, हाथ में अखबार।

“परसों पटना जाना है.” उन्होंने सीधा कहा।
“क्यों?”
“सिन्हा जी की बेटी की शादी है.”
आराध्या ने धीरे से “हम्म” कहा। उसे शादियों में जाना खास पसंद नहीं था।
हर जगह वही सवाल— “अब इसकी शादी कब?” “कितनी बड़ी हो गई.” “लड़की बहुत बोलती है.”
उसे irritation होती थी 😭

“हम ना जाएँ तो?” उसने धीरे से पूछा।
विक्रम सिंह ने अखबार नीचे किया। बस एक बार देखा।
और आराध्या समझ गई— जाना पड़ेगा 

“ठीक है.”
उसी समय उसका छोटा भाई अभि नींद में बाल खराब किए बाहर आया।

“हमको नहीं जाना शादी-वाड़ी में.” उसने जम्हाई लेते हुए कहा।

आराध्या तुरंत बोली— “क्यों? पिछली शादी में तेरी तीन plate chicken खत्म नहीं हुई थी क्या?”
दादी हँस पड़ीं।

अभि घूरने लगा। “दीदी चुप रहो.”
“सच बोल रहे हैं.”
घर में हल्की हँसी गूँज गई।
रात को आराध्या छत पर बैठी थी। हाथ में मोबाइल। बाल खुले हुए।
उसकी दोस्त रिया वीडियो कॉल पर थी।

“सुन!” रिया लगभग चिल्लाई। “पटना वाली शादी में रणविजय ठाकुर भी आएंगे!”

आराध्या ने भौंह चढ़ाई। “तो?”
“तो मतलब?!” रिया shocked थी। “पूरा बिहार पागल है उस आदमी के पीछे!”

“राजनीति वाला आदमी है बस.”

रिया हँसी। “तू न किसी दिन सच में किसी बड़े आदमी से लड़ पड़ेगी.”

आराध्या ने कंधे उचकाए। “गलत रहेगा तो बोलेंगे ही.”
रिया अभी भी excited थी।

“यार तूने उसकी photos नहीं देखी? पूरा hero लगता है.”

“हमको नेता लोग में interest नहीं है.”
“CM है वो.”

“तो?” 

रिया चुप।

फिर दोनों हँसने लगीं।
उधर…

सिवान।
रात के करीब ग्यारह बजे।

काली गाड़ियों का बड़ा काफिला एक विशाल farmhouse के अंदर रुका।

गार्ड तुरंत दरवाजा खोलने दौड़े।
पहले bodyguards उतरे।

फिर

रणविजय ठाकुर।
सफेद कुर्ता। काली घड़ी। चेहरे पर वही शांत look…

जिससे लोग डरते भी थे और impress भी होते थे।
एक आदमी भागते हुए आया।

“सर कल पटना वाले function का पूरा arrangement हो गया है.”
“हम्म.”

“Media भी रहेगी.”

रणविजय चलते-चलते रुका।
“Security tight रखिए.”

“जी सर.”
वो अंदर चला गया।
बड़े hall में पहले से कुछ नेता बैठे थे।

जैसे ही रणविजय अंदर आया— सब खड़े हो गए 

“बैठिए.” उसने calmly कहा।

उसकी आवाज़ ज्यादा ऊँची नहीं थी। मगर असर ऐसा कि पूरा कमरा चुप हो जाए।

Meeting शुरू हुई।

राजनीति। Election। Opposition।
सब बातें चलती रहीं।

मगर बीच में रणविजय अचानक खिड़की की तरफ देखने लगा।

“पटना वाले function में कौन-कौन आ रहा है?” उसने casually पूछा।

एक आदमी ने list देखी।

“काफी लोग सर… मंत्री, businessmen… आरा से विक्रम सिंह राजपूत family भी.”

रणविजय ने हल्का सिर हिलाया।
बस इतना।

उसे नहीं पता था… दो दिन बाद उसी शादी में उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी problem मिलने वाली थी 

और उसका नाम था— आराध्या सिंह राजपूत।