इश्क़ का इलाका - 2 Aarushi Singh Rajput द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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इश्क़ का इलाका - 2

सिवान, बिहार।

सुबह के नौ बजे थे।

आज शहर में security थोड़ी ज्यादा थी। कई जगह पुलिस खड़ी थी। बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे। लोग भी समझ रहे थे कि कुछ बड़ा होने वाला है।

कारण सिर्फ एक था

रणविजय ठाकुर।

सिवान में उसका नाम अलग तरीके से लिया जाता था।
लोग कहते थे

“ठाकुर साहेब।”

बस।

नाम सुनते ही सामने वाला समझ जाता था किसकी बात हो रही है।

शहर के बाहर उसकी हवेली थी।

बड़ी। पुरानी। और पूरी security में।

बाहर काली SUVs खड़ी थीं। अंदर staff लगातार इधर-उधर भाग रहा था।

Dining hall में रणविजय बैठा था।

सफेद कुर्ता। Sleeves हल्की folded। हाथ में black watch। सामने laptop खुला था।

सामने खड़े थे सुभाष भैया।

“सर, उत्तरी ब्लॉक वाले फिर problem कर रहे हैं।”
रणविजय ने नज़र उठाई।

“कौन लोग?”

“विपक्ष वाले।”

उसने laptop बंद किया।

“चुनाव नज़दीक आते ही सबको बिहार याद आने लगता है।”

सुभाष हल्का हँसा।

“पटना वाले function की तैयारी हो गई?”
“जी सर।”

“Media रहेगी?”

“हाँ।”

रणविजय कुर्सी से पीछे टिक गया।

“हम शादी में जा रहे हैं… election rally में नहीं।”
“समझ गए सर।”

तभी एक guard अंदर आया।

“सर, बाहर गाँव से कुछ लोग आए हैं।”
“काहे?”

“ज़मीन का मामला है।”

रणविजय तुरंत उठ गया।

बरामदे में पाँच लोग खड़े थे। सब थोड़े घबराए हुए लग रहे थे। उनके बीच एक बुज़ुर्ग आदमी भी था।

रणविजय उनके सामने रुका।

“का दिक्कत है?”

बुज़ुर्ग ने काँपते हाथ से कागज़ आगे किया।

“साहब… तहसील वाले सुन नहीं रहे।”

रणविजय ने paper देखा। फिर सुभाष की तरफ मुड़ा।

“कल सुबह तहसीलदार हवेली पहुँचना चाहिए।”

“जी सर।”

“और इनका काम तीन दिन में खत्म होना चाहिए।”
“Done.”

बुज़ुर्ग आदमी की आँखें भर गईं।

“भगवान खुश रखे बेटा”

रणविजय हल्का मुस्कुराया।

“अरे बाबा… ई सब हमरा काम है।”

इतना बोलकर वो वापस अंदर चला गया।

पीछे खड़े लोग बस उसे जाते देखते रह गए।

शाम तक हवेली meetings से भरी रही।

कोई MLA आया।

कोई businessman।

कोई district head।

सबको रणविजय से कुछ चाहिए था।

और रणविजय?

वो सबकी सुनता था… मगर फैसला अपना करता था।
रात में private meeting चल रही थी।

कमरे में सिर्फ चार लोग थे।

सुभाष ने फाइल टेबल पर रखी।

“दिल्ली से funding आ रही है opposition को।”

“कौन दे रहा?”

“अभी confirm नहीं।”

कुछ सेकंड कमरे में चुप्पी रही।

फिर रणविजय बोला

“बिहार को लोग बहुत आसान समझते हैं।”

कोई कुछ नहीं बोला।

उसने पानी का गिलास उठाया।

“याद दिलाना पड़ेगा… कि अभी रणविजय ठाकुर जिंदा है।”


एक आदमी धीरे से बोला

“सर… खतरा बढ़ सकता है।”

रणविजय हल्का हँसा।

“हमरा जान लेने का सपना बहुत लोग देखे हैं।”

उसकी नज़र सीधी सामने उठी।

“अब तक सपना ही है।”

कमरे में फिर कोई कुछ नहीं बोला।

रात करीब बारह बजे रणविजय हवेली की छत पर खड़ा था।

फोन लगातार बज रहा था।

Political calls। Meetings। Security updates।
नीचे courtyard में गाड़ियाँ अभी भी आ-जा रही थीं।
सुभाष पीछे आकर रुका।

“सर, पटना वाले function का time fix हो गया।”
“हूँ।”

“सुबह निकलना है।”

रणविजय ने बस सिर हिलाया।

कुछ सेकंड बाद उसने पूछा

“लड़की वाले कौन हैं?”

“राजपूत family है सर। काफी नाम है उनका।”
“ठीक है।”

इतना बोलकर वो नीचे चला गया।
और सुभाष वहीं खड़ा उसे जाता देखता रहा

Hay doston 
Kaise ho aap sab?
Main ek story likh rahi hoon jo Bihar se related hai।

Waise mujhe politics ke baare mein zyada knowledge nahi hai toh agar kahin koi galti ho jaye to please mujhe maaf kar dena।
Aur please mujhe zarur batana ki meri galti kahan hai ya mujhe kya improve karna chahiye। Main honestly apne hisaab se likhne ki koshish kar rahi hoon 

Aur kyunki story Bihar se related hai… toh jo bhi Bihar se hain please comment zarur karna 

Mujhe bahut accha lagega aap sabke baare mein jaan kar।

Apne naam ke saath apni jagah bhi comment karna  jaise: “Ayush, Patna” “Riya, Siwan” aisa kuchh 

Sach mein mujhe bahut accha lagta hai ye dekhna ki meri story kaun kahan se padh raha hai।

Okay bye my lovely readers 💗🌸
— Aarushi Singh Rajput ✨