उन्हें नींद नहीं आती-3 Dr. Suryapal Singh द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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उन्हें नींद नहीं आती-3

अंक- 3
 (स्थान वही, कटियार एक कुर्सी पर ऊँघ रहा है। मटरू दौड़ता हुआ आता है।)
मटरू- सरकार?
 (मटरू थर-थर काँपता है। एक बार दौड़कर अन्दर झाँककर)
 सरकार?
 (कटियार के चारो ओर चक्कर लगाकर)
 सरकार
कटियार- (कुनमुनाते हुए) कौन? मटरू? सोने दो, नींद आ रही है।
मटरू- सरकार?
कटियार- कह रहा हूँ, नींद आ रही है
मटरू- (थोड़ा तेज किन्तु आर्त्त स्वर में) सरकार?
कटियार- (एक थप्पड़ मटरू को जड़ते हुए) क्या है? बोल?
मटरू- (एक बार फिर दौड़कर अन्दर झाँकता है।)
 सरकार....मैं तो मिट गया सरकार!
कटियार- हुआ क्या?
मटरू- सरकार मेरी झोपड़ी (रोने लगता है।)
कटियार- तेरी झोपड़ी?
मटरू- हाँ, सरकार।
कटियार- (एक थप्पड़ और लगाकर) एक झोपड़ी के लिए सरकार की नींद खराब कर रहा है।
मटरू- सरकार!
कटियार- तेरी बोटी-बोटी उड़वा दूँगा। सरकार की नींद में झोपड़ी... .बदमाश कहीं का.....
मटरू- (एक बार फिर अन्दर झाँककर) सरकार ....मेरी झोपड़ी जल गई.....
कटियार- तो कटियार क्या करें? झोपड़ी पकड़ कर रोये....बदमाश कहीं का......नींद मे खलल डालता है.....
मटरू- सरकार.....हम प्रजा हैं सरकार.....कुछ
कटियार- सरकारी नींद में खलल डालना जुर्म है.....तू बेवकूफ है मटरू...सोने दे.....
मटरू- सरकार!(पैर पकड़ लेता है।) जनता....
कटियार- क्या?जनता?
मटरू- हाँ सरकार । जनता....
कटियार- जनता क्या?
मटरू- सरकार....जनता सड़क पर आ गई है......
कटियार- (उछलकर) जनता सड़क पर? बिल्कुल नहीं....ऐसा कैसे हो सकता है? जनता सरकार की जय जयकार कर रही है।
मटरू- सरकार....जनता सड़क पर आ गई.....दंगा हो गया सरकार. ...और मेरी झोपड़ी जल गई।
कटियार- तेरी झोपड़ी जल गई तो कोई बात नहीं मटरू। पर जनता को सड़कां पर नहीं आने दिया जायगा। सड़कें खत्म कर दी जायेंगी मटरू। सड़कों को खोदकर नाले बना दिए जायेंगे.... ।(मटरू...मटरू पुकारता हुआ किश्नू तेजी से आता है।)
किश्नू- मटरू।
 (किश्नू गिर पड़ता है। मटरू दौड़कर उठाता है।)
मटरू- क्या हुआ किश्नू?
किश्नू- दंगे में सरकार ने गोली चला दी.......।
कटियार- क्या सरकार ने गोली चला दी?
 (कटियार तेजी से भागता है।)
किश्नू- हाँ मटरू....सरकार ने.....
 (विह्वल होकर) और तेरे.....।
मटरू- मेरे? क्या हुआ किश्नू? क्या हुआ?
किश्नू- तेरे दोनों बच्चे.....।
मटरू- मेरे बच्चे।......
किश्नू- हाँ, तेरे दोनों बच्चे गोली खा गए।
 (मटरू गिर पड़ता है। फिर चीख उठता है।)
मटरू- किश्नू-....बातुल कहाँ है? मैंने कहा था किश्नू कि सरकार को नींद आनी चाहिए....लेकिन....लेकिन मैंने गलत कहा था... .गलत कहा था....गलत कहा था किश्नू.....
 (किश्नू मटरू को खींचकर ले जाता है। दूसरी ओर से कमाण्डर और नायकम बात करते हुए प्रवेश करते हैं।)
कमाण्डर- मैंने सोचा नहीं था?
नायकम- और मैंने भी नहीं......
कमाण्डर- जनता इतनी एहसान फरामोश हो सकती है, इसकी मुझे कल्पना तक न थी।
नायकम- हो सकती नहीं, कमाण्डर साहब होती है। जनता एहसान बहुत जल्दी भूलती है...नहीं तो सरकार के कन्धा देने के तीसरे दिन ही सरकार के विरोध में.....।
कमाण्डर- हाँ ठीक तीसरे दिन सरकार के विरोध में इतना बड़ा प्रदर्शन बरदाश्त के बाहर था। 
नायकम- बिल्कुल बाहर था कमाण्डर साहब। जनता लाठी गोली की ही भाशा जानती है....।
कमाण्डर- इसीलिए तुमने सबको भुनवा दिया। बिल्कुल ठीक किया मि. नायकम।
नायकम- मैंने इतना ही नहीं किया बल्कि ऐलान करवा दिया कि यह देश सरकार की सम्पत्ति है। वे चाहे इसे गिरवी रखें या बेच दें। तुम्हें कुलबुलाने का कोई हक नहीं....।
कमाण्डर- बिल्कुल ठीक। यही करना चाहिए था....सुना है बातुल के भी पर उग रहे हैं और वह मिस राव भी....।
नायकम- वे गुड़ के चींटे हैं कमाण्डर साहब....उन्हें मसल देनें में समय नहीं लगेगा।
कमाण्डर- लेकिन चींटे भी दाँव पाकर काट लेते हैं। हमें सावधान रहना चाहिए। जनता आखिर चाहती क्या है मि. नायकम?
नायकम- यह तो जनता भी नहीं जानती कमाण्डर साहब। एक रोटी दीजिए तो दो की माँग करती है....दो दीजिए तो चार की। हर एक की सीमा होती है पर जनता के माँगां की कोई सीमा नहीं. ...
कमाण्डर- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जनता की जबान सिल दी जाय......।
नायकम- अभी तक दुनिया की कोई भी मशीन इसे सिल नहीं सकी।
कमाण्डर- तब हमारे वैज्ञानिकों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। 
नायकम- क्यों?
कमाण्डर- जब एक छोटी सी जबान को नहीं सिल सकते तो.....
नायकम- मधुकर का मसला भी तूल पकड़ रहा है कमाण्डर साहब। लोग उसके बारे में सवाल पूछते हैं।
कमाण्डर- सवाल ही नहीं पूछते, खोज भी कर रहे हैं। इसीलिए मैंने कटियार को भेजा है।
 (कमाण्डर और नायकम बातें करते चले जाते हैं। बातुल प्रवेश करता है किन्तु उसकी वेश-भूशा बदली हुई। दाढ़ी मूँछ के कारण वह पहचान में नहीं आता)
बातुल- तो पता चला......मधुकर यहीं कैद है।
 ठीक है.....फिर तो। यह क्या कहने लगा मैं?(एक पिपिहरी जैसी चीज निकालकर बजाने लगाता है। कुछ क्षण बाद दौड़कर
  इधर-उधर झाँकता है फिर बीच में आ जाता है। दर्शकों को संकेत कर बोलने लगता है।) 
 भाइयों.....नहीं......नहीं......बहनों और भाइयों मेरे गोदाम में कुछ चीजें जमा हो गई हैं। फुटकर बिक रही हैं लेकिन गोदाम खाली नहीं हो रहा है। मैं थोक में बेचना चाहता हूँ। बहुत सस्ते में.....पैसा न हो तो उधार दे दूँगा यह भी संभव न हो तो मुफ्त ले जाइए। मेरा गोदाम खाली कराइए। चीज बहुत बड़ी है पर बाजार मंदा हो गया है इसीलिए.....। चोरी, बेईमानी,मूल्यहीनता दनादन उछल रही हैं पर ईमानदारी और निश्ठा को कोई टके सेर भी नहीं पूछता। बस थोड़ी सी ईमानदारी अपनी जेब में डाल लीजिए न। बस...थोड़ी सी... ....
 (अपनी पिपिहरी फिर बजाने लगता है। एक बनजारा जिसकी मूँछे बड़े-बड़े एक लबादा ओढ़े प्रवेश करता है। उसके एक हाथ में एक छोटा सा डंडा है और दूसरे हाथ में उससे भी छोटा डंडा है। दोनों डंडों से एकतारा बजाने का अभिनय करते हुए गाता है)
 मैं बनजारा।
 दूर-दूर तक उगा कुहासा,
 कैसे दिखे किनारा। मैं.....
 (बातुल पिपिहरी बजाना बन्द करके बनजारे को सावधानी से देखता है, बनजारा गाने में मग्न रहता है, बातुल उसे विभित्र कोणों से देखने में।)
बातुल- मित्र, तुम बहुत निराश दिख रहे हो।
बनजारा- मैं.....मैं तुम्हें निराश दिखता हूँ?.....
बातुल- तुम्हारा गीत.....।
बनजारा- मेरा गीत तुम्हें पसन्द आया। सुनना चाहते हो?
 (बनजारा फिर गाने लगता है। बातुल उसे देखता रहता है।
बातुल- मित्र, सुनो तो। तुमने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया।
बनजारा- मित्र प्रश्न का उत्तर कौन देता है? सभी तो प्रश्न ही करते हैं।
बातुल- मित्र तुम काफी बुद्धिमान लगते हो।
बनजारा- मैं.....मैं और बुद्धिमान......
 मेरी माँ मेरे स्वप्नों को सुनकर मूर्ख ही समझती थी।
बातुल- क्या था आपका स्वप्न?
बनजारा- स्वप्न था नहीं, स्वप्न है।
बातुल- क्या है? मैं भी तो सुनूँ
बनजारा- क्या तुम स्वप्न नहीं देखते?
बातुल- देखता हूँ मित्र....इसीलिए.....
बनजारा- मैं....मैं सरकार बनने का स्वप्न देखता हूँ।
बातुल- (ठठाकर हंस पड़ता है।)
बनजारा- क्यों हँसते हो मित्र? मैं देश और जनता को बहुत अच्छी तरह बेच सकता हूँ।
 ‘लाठी जिसकी भैंस उसी की’ यह कानून बना दूँगा।
बातुल- लाठी के साथ भैंस जोड़ दोगे बहुत खूब....(हँसना बन्द नहीं होता है।)
बनजारा- सज्जनों की प्रतिश्ठा नीलाम कर दूँगा। तस्करों और माफिया सूमहों को पूरी छूट होगी। वे खुद भी मालामाल हों ओर सरकार को भी......
बातुल- (हँसते-हँसते रुक जाता है।) और सरकार को भी....
बनजारा- इतना ही नहीं मित्र जनता की हड्डियों पर जो खाल चिपकी हुई है उसे उधेड़वाने में षासन का पूरा तंत्र लगा दूँगा.....
बातुल- बालू से तेल निकालने के कारखाने लगाओगे क्यों मित्र?
बनजारा- छि....छि....तुम नाराज़ हो गए।
बातुल- तो तुम जनता की खाल खिंचवाओगे?
बनजारा- मैं कोई नई बात नहीं कर रहा हूँ मित्र।
बातुल- नई बात तुम क्या करोगे? जनता की खाल इतनी सस्ती नहीं है....इतनी सस्ती नहीं है....
 (उछलकर बनजारे को झकझोर देता है इसी में बनजारे की मूंछ गिर जाती है। मिस राव का चेहरा स्पश्ट दिखता है।)
 तो मिस राव तुम? मैं बातुल हूँ। जनता की खाल निकलवाने का काम तुम करोगी?
मिस राव- बातुल जिस काम में तुम लगे हो मैं भी उसी काम में लगीं हूँ......मुझे गलत न समझो । मैंने यह वेश इसी काम के लिए 
 धारण किया था।
बातुल- मैं तुम्हें गलत नहीं समझूँगा.....मैं भी तो छद्म वेश धारण कर घूम रहा हूँ।
 (अपनी मूँछ उखाड़कर फेंक देता है। एक तरफ से किश्नू दौड़ता आता है।)
किश्नू- बातुल भैया...कहाँ कहाँ छानता रहा आपको...कैसे आप हमारा काम करोगे जब आप मिल ही नहीं पाते।
बातुल- कहो क्या है?
किश्नू- है....बहुत कुछ है मैं जान नही पाता....कहाँ से बताऊँ? बताया था मटरू के बच्चों को गोली लगी थी न....वे इस दीन-दुनिया से चले गए.... 
बातुल- और मटरू....
किश्नू- मटरू बेकाबू हो गया
 किसी की सुनता नहीं....
 बातुल भैया आप ही को पुकारता रहा....
बातुल- मुझे पुकारता रहा मिस राव।
 हमें....(दोनों चलने लगते हैं। किश्नू रास्ते में खड़ा हो जाता है।)
किश्नू- उससे भेंट नहीं कर पाओगे। वह बड़े दरबार गया है......
मिस राव- बड़े दरबार.....
किश्नू- हाँ उसने सरकारी खिड़की पर पत्थर मारा....खिड़की के षीशे टुकड़े-टुकड़े हो गए....और मटरू सीखचों के अन्दर.... लेकिन मटरू ने सरकारी खिड़की में छेद कर दिया बातुल भैया
 (बातुल मिस राव के डंडे को पकड़कर खींच लेता है।)
बातुल- मिस राव...मटरू ने छेद कर दिया....छेद कर दिया।
 (मटरू....मटरू पुकारता हुआ बातुल तेजी से भागता है पीछे-पीछे मिस राव और किश्नू भी जाते हैं। एक ओर से कमाण्डर और नायकम आते हैं।)
कमाण्डर- मि.नायकम अभी कटियार लौटे नहीं।
नायकम- उन्हें आना चाहिए।
कमाण्डर- मुझे कभी-कभी स्थितियाँ उल्टी दिखने लगती हैं।
नायकम- स्थितियाँ उल्टी दिखती हैं या होती हैं।
कमाण्डर- जो भी मान लो.....कभी-कभी लगता है कि सत्ता पर कुण्डली मार बैठा जा सकता है पर कभी जब एक छोटी सी घटना पर नियंत्रण नहीं हो पाता तो........
नायकम- तब यही लगता है कि कुण्डली बिखर जाएगी....
 (कटियार मधुकर के साथ प्रवेश करता है। कमाण्डर और नायकम कुर्सी पर बैठ जाते हैं। कटियार भी एक कुर्सी पर बैठ जाता है। मधुकर को भी बैठने का संकेत करता है किन्तु वह बैठता नहीं।)
मधुकर- एक बन्दी कुर्सी पर कैसे बैठ सकता है?
नायकम- हम एक बन्दी को भी सम्मान देते हैं।
नायकम- सरकार तुम्हें छोड़ने के लिए तैयार है।
मधुकर- छोड़ने के लिए!
नायकम- हाँ एक षर्त पर 
कमाण्डर- और वह षर्त कोई बड़ी नहीं है क्यों मि. कटियार!
कटियार- बहुत छोटी सी षर्त है।
मधुकर- पर मैं किसी छोटी या बड़ी षर्त पर छूटना नहीं चाहता।
कमाण्डर- तो जेल में पड़े-पड़े सड़ जाओगे। कोई नाम लेने वाला नहीं मिलेगा।
मधुकर- इससे कोई फर्क नहीं पडे़गा कमाण्डर साहब! जेलों से जीवन्तता का अटूट रिश्ता रहा है।
कमाण्डर- तुम्हें अपनी देश भक्ति पर गर्व है।
मधुकर- हाँ है।
कमाण्डर- जैसे देश को तुमने अपने कन्धों पर रखा हो......
मधुकर- यह मैं कैसे कह सकता हूँ कमाण्डर साहब? लेकिन मैरे जैसे न जाने कितने नवजवान इस देश का भला- बुरा सोचते हैं।
कमाण्डर- लेकिन तुम्हारी तरह सबको जेल में सड़ा दिया जाय तो.. .।
मधुकर- इससे आग और धुँआ कम नहीं होगा।
नायकम- लेकिन देश हम भी बना रहे हैं मधुकर जी....।
 हम तो जेल जाना आवश्यक नहीं समझते।
मधुकर- यह तो दृश्टि भेद है। हम जिस तरह देश की कल्पना करते हैं आप उस रूप में नहीं करते होंगे....।
कमाण्डर- हम भी तो सुनें जरा.....तुम क्या सोचते हो?
मधुकर- हम वही सोचते हैं जो देश के सपूतों ने राश्ट्र की कल्पना करते समय सोचा था। स्वतंत्रता समानता, न्याय एवं भ्रातृत्व की कल्पना नई नहीं है कमाण्डर साहब! हम उसके क्रियान्वयन से हटते रहे हैं। आपने हर आलोचक को देशद्रोही मान लिया है।
नायकम- लेकिन राम कृश्ण, गौतम सभी के प्रयासों के बाद मोलई जहाँ था, वहीं अब भी है।
मधुकर-घर का कूड़ा एक ही दिन नहीं, हर दिन साफ करना पड़ता है।
 मोलई क्यों नहीं बढ़ सका इस पर विचार करें मुझे खुशी होगी।
कमाण्डर- और आदमी की षैतानियत पर भी तो विचार करें।
मधुकर- क्यों नहीं उस पर भी।
कमाण्डर- और तुम्हारे देशद्रोह पर भी।
मधुकर- मेरे देशद्रोह पर!
कमाण्डर- हाँ जिस अपराध में तुम बन्दी हो उसे देश द्रोह कहते हैं।
मधुकर- तो मुझ पर मुकदमा चलाइए कमाण्डर साहब।
कमाण्डर- यह सरकार की इच्छा पर निर्भर करेगा। सरकार चाहेंगे तो तुम्हें बिना कुछ बताएँ जेल से सड़ा देंगे।
मधुकर- यह अन्याय होगा।
कमाण्डर- इस अन्याय को न्याय में बदलने के लिए हमारे पास न्याया
 धीश है, बुद्धिजीवी हैं, संचार माध्यम हैं.....और हाँ देशद्रोही को न्याय पाने का हक नहीं होता क्यों मि.नायकम?
मधुकर- आप बार-बार मुझे देशद्रोही बता रहे हैं। कौन तय करेगा इसे?
कमाण्डर- हम...हमारी अदालतें, बुद्धिजीवी और संचार माध्यम.... और यह बहुत पहले हम तुम्हें बता भी चुके हैं लेकिन हम तुम्हें कोई सजा देने के पहले एक मौका देना चाहते है..... तुम्हारा बाप गिड़गिड़ा रहा था इसलिए.....
मधुकर- मेरे पिता! यहाँ कैसे आ गए वे? यह भी आप लोगों का एक शड्यंत्र हो सकता है.....बहुत सोचा समझा शडयंत्र।
कटियार- सन्देह करने वाले को हर जगह शडयंत्र ही दिखता है।
मधुकर- जहाँ सरकार में सरकार हों वहाँ विश्वास उग ही कैसे सकता है?
कमाण्डर- उपदेश सुनने का मैं आदी नहीं। इसको इसके पिता से मिला दो फिर देखते हैं.....। 
कटियार- ठीक है सर।
 (नायकम और कमाण्डर चले जाते हैं। कटियार मधुकर से पिता कुंजीलाल को बुलाकर लाता है।)
मधुकर-(पिता के पैर छूकर) बापू....आप यहाँ?
 (कटियार भी चला जाता है।)
कुंजीलाल- हाँ बेटा....तुम्हारे बारे में कुछ पता नहीं चला। इसीलिए मन बहुत परेशान रहा....यह तो कटियार साहब की कृपा से मैं तुमसें भेंट कर सका.....बेटा तुम्हारी माँ....बैठने नहीं देती....रो....रोकर।
मधुकर- बापू.....इसमें रोने की क्या बात है? मैंने चोरी नहीं की है। ....देश के लिए बलिदान होना गर्व की बात है....
कुंजीलाल- पर माँ नहीं मानती.....उसे कौन समझाए? मेरा भी मन. ....ये लोग तुम्हें जेल में सड़ा देंगे।
मधुकर- बापू....इसमें क्या फर्क पड़ेगा? कितने नौजवान इस देश की आज़ादी के लिए जेल में सड़ गए। कितने फाँसी के तख्ते पर खुशी-खुशी लटक गए। आज़ाद भारत में यदि मैं आर्थिक और सामाजिक आजादी के लिए सड़ा दिया जाऊँ, तो खाद बनूँगा। और उस पर आज़ाद भारत का स्वस्थ पौधा उगेगा।
कुंजीलाल- पर मैं और तुम्हारी माँ.....
 तुम्हीं एक घर के दीपक हो....
 हमें क्या मिलेगा बेटे?........
मधुकर- गौतम,गाँधी और भगत सिंह के माता-पिता को क्या मिला बापू? बिस्मिल लाहिड़ी और अश्फाक के माता-पिता ने कुछ चाहा था?
कुंजीलाल- पर मैं वैसा नहीं हूँ। जिनके बेटे हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे पर झूल गए उनके माँ-बाप इसी आज़ाद भारत में रोटी के लिए तरसते रहे। यह मेरा देखा हुआ है बेटा।
मधुकर- उन्होंने किसी तरह का प्रतिदान लेने से इन्कार किया होगा बापू। देश सेवा का प्रतिदान कोई कैसे ले सकता है?....कोई कैसे ले सकता है बापू?
कुंजीलाल- तुम्हारी ही बात मान लूँ तो भी.....बात हल कहाँ हुई? मैं एक छोटा किसान रहा हूँ। जी तोड़ मेहनत के बाद किसी तरह तवा सीधा होता रहा। जो कुछ बचा पाया वह तुम्हारी पढ़ाई और पालन- पोशण पर खर्च कर दिया। बुढ़ापे के लिए....एक कौड़ी भी....जिस दिन ये हाथ-पैर धरती को चीर नहीं सकेंगे क्या वह कुछ दे सकेगी? और तब?.....मैंने किसी के आगे हाथ नहीं पसारा है बेटा....अपने पौरुश की ही कमाई खायी है। क्या तुम चाहते हो बुढ़ापे में हाथ पसार कर......?
मधुकर- नहीं बापू। हाथ कैसे पसारेंगे आप?
कुंजीलाल- तब?....इसीलिए जब कटियार साहब ने कहा कि बच्चे को तैयार करो कि वह माफी माँग ले, मैं तुमसे मिलने चला आया।
मधुकर- बापू आपने किसी के आगे हाथ नहीं पसारा.....क्या मैं अपनी ज़िन्दगी के लिए भीख मागूँ?
कुंजीलाल- उँह यह कैसे हो सकता है? नहीं बेटा मैं यह कैसे कह सकता हूँ?
मधुकर- तब?
कुंजीलाल- लेकिन, बुढ़ापे का भी सवाल है।
मधुकर- हाँ.....है।
कुंजीलाल- वैसे यह भी हो सकता है कि हाथ-पैर न चलने पर हम किसी पेड़ की डाल से लटक कर....।
मधुकर- बापू!
कुंजीलाल- सुनो तो....आत्महत्या भी एक तरह की कायरता है,और मन इस काम से दूर भागता है।
मधुकर- बापू!
कुंजीलाल- सुनो तो.....अपने अन्त का कुछ हिसाब तो करना ही है. ...है.....और रास्ता भी है.....हम भी.....यह आग यदि बुला रही हो.....।
मधुकर- बापू!(पैर पकड़ लेता है।)
कुंजीलाल- बस...अब हो गया....मैं भी ......(तेजी से निकल जाता है। दूसरी ओर से कमाण्डर प्रवेश करता है।)
कमाण्डर- क्यों मधुकर जी, निर्णय लिया अपने कुछ?
मधुकर- ले चुका हूँ कमाण्डर साहब
कमाण्डर- क्या निर्णय लिया? हम भी तो सुनें
मधुकर- अपना निर्णय बहुत पहले आपको बता चुका हूँ।
कमाण्डर- हुँह....बता चुके हो.....जिस बाप ने तुम्हें पैदा किया उसकी बात भी.....लेकिन कमाण्डर बात मनवा लेता है।
 (कमाण्डर तड़ातड़ तीन-चार थप्पड़ मधुकर को मारता है किन्तु वह कोई प्रतिरोध नहीं करता।)
 जब उल्टा लटकाकर तुम्हें बिजली के झटके दिए जायँगे तुम. ...हाँ तुम्हीं गला फाड़-फाड़कर चिल्लाओगे कि हम माफ़ी माँगते हैं.....सोच लो....बहुत समय नहीं हैं......यह देश सरकार का है। वे चाहे इसे गिरवी रखें या बेच दें......तुम्हें कोई हक़ नहीं है.....।
मधुकर- यही मैं समझ नही पाता कमाण्डर साहब.....देश हम सबका है जो इसमें रहते हैं.....हमें इसी मिट्टी के लिए जीना है.... इसी के लिए मरना है.....।
कमाण्डर- तो मरने के लिए तैयार हो जाओ।
 कमाण्डर मरने के लिए भी बहुत समय नहीं देता....।
 (कमाण्डर अपना बेंत तान लेता है। इसी बीच बातुल,मिस राव,मोलई और किश्नू दौड़ते हुए आते हैं। बातुल मिस राव के साथ झपट कर कमाण्डर और मधुकर के बीच में आ जाते हैं। किश्नू और मोलई कमाण्डर के उठे हुए बेंत को पीछे ही पकड़ लेते हैं।)
बातुल- कमाण्डर साहब अपना दण्ड छोड़ दीजिए।
 आप बन्दी है.जनता आपको बन्दी बना चुकी है(कमाण्डर बेंत छोड़ देता है।)
कमाण्डर- तो बातुल.....तुम्हारी यह हिम्मत.....टुकड़े पर पलने वाली मिस राव तुम......भी।
मिसराव- हाँ हम्हीं है.......हम यह बताने आए हैं कि देश जनता का है।
कुंजीलाल- (प्रवेशकर) हम भी आ गए हैं बेटे।
 (इसी बीच एक जाल एक ओर से फेंक दिया जाता है। सभी उसी में उलझ जाते हैं। जाल कसता जाता है। कुलबुलाहट,चीख का स्वर उभरता है।)
 (अन्धेरा/परदा गिरता है।)
 नेपथ्य से गीत का स्वर उभरता है-
 नए विहान के लिए 
 नई उठान के लिए
 यह देश माँगता तुम्हें
 अश्रु पी रहे जवाँ का 
 प्यार माँगता तुम्हें
 नए निदान के लिए
 नए विहान के लिए।