उन्हें नींद नहीं आती-1-II Dr. Suryapal Singh द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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उन्हें नींद नहीं आती-1-II

बातुल- मि. कटियार तुम तो कहते हो कि देश में गरीबी नहीं है। कोई भूखों नहीं मरता। यहाँ आकर क्यों नहीं देखते? फर्जी आंकड़ो से देश नहीं चलता। मोलई की भूख किस किस को डसेगी। जगरूप तुम पानी लाओ। मि.कटियार आकर देखो.....।
कटियार-(प्रवेशकर) क्यों चिल्ला रहे हो मि. बातुल?
बातुल- तुम्हें दिखाना चाहता हूँ कि देखो इस देश में लोग भूख से मर रहे हैं और तुम कहते हो कि सरकार को चैन से सोने दो।
कटियार- इतनी बड़ी आबादी में दो-चार लोग मर ही जायेंगे तो पहाड़ नहीं टूट पडेगा बातुल। सरकार को नींद आनी ही चाहिए।
बातुल- ठीक कहते हो इसी सोच से तुम लोगों ने देश को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। सच्चाई से आँखे मूँदकर भ्रम मत पालो मि. कटियार।
कटियार- भ्रम नहीं धन्धा है मि.बातुल।
बातुल- लेकिन ऐसा धन्धा न करो जो तुम्हें ले डूबे।
 (जगरूप पानी लेकर आता है। बातुल पानी से चेहरा पोंछता है। एक बार मोलई की आँख खुलती है वह थोड़ा तड़पता है और उसी के साथ उसका सिर एक तरफ लटक जाता है)
बातुल- देख रहे हो मि. कटियार।(युवा मधुकर आ जाता है। वह कुर्ता पाजामा पहने है।)
मधुकर- (मोलई को देखकर) बातुल जी आखिर भूख से मौत हो ही गई।
कटियार- कौन कहता है इसकी भूख से मौत हुई। यह व्यक्ति सरकार के स्वास्थ्य लाभ हेतु उपवास कर रहा था। महामहिम की प्राण रक्षा के लिए इसने अपने जीवन को अर्पित कर दिया है। क्यों दर्शक बन्धु मेरी बात सच है न?
बातुल- इतना सफेद झूठ? दर्शक बन्धु आप तो प्रत्यक्ष साक्षी हैं।
मधुकर- षासन में लिप्त लोग भूख से मौत छिपाते फिरते हैं। तुम भी वही कर रहे हो। लगता है तुम षासन के आदमी हो।
कटियार- मैं किसका आदमी हूँ यह अच्छी तरह जानता हूँ। लेकिन तुम लोग जनता में भ्रम मत फैलाओ। इस आदमी की मौत भूख से नहीं हुई है। इसने स्वेच्छा से प्राण त्याग किया है। इसके लिए सरकार भरपूर प्रतिदान देंगे।
मधुकर- सरकार और प्रतिदान? भूख से मरने वालों के लिए प्रतिदान? तुम तो मँजे हुए खिलाड़ी लगते हो।
 (कटियार जल्दी-जल्दी कुछ लिखता है फिर जल्दी से बँगले के अन्दर चला जाता है।)
 बातुल जी, जनता को बताना होगा कि भूख से मौत हो रही है। षासन की ओर से झूठे दावे पेश किए जा रहे हैं।
बातुल- झूठ को सच और सच को झूठ बनाना बुद्धिजीवियों का खेल है।
मधुकर- इसे झुठलाया नहीं जा सकेगा। मैं इसे जनता मैं ले जाऊँगा। आप मेरी मदद करें। इसे यहाँ से ले चलना है।
 (तीनों उसे पकड़कर ले जानें की तैयारी करतें हैं। इसी बीच कमाण्डर और कटियार आ जाते हैं, कटियार एक चद्दर लिए है।)
कमाण्डर- तुम लोग इसे कहाँ लिए जा रहे हो? यहीं छोड़ दो। इसने अपना प्राण सरकार के स्वास्थ्य के लिए अर्पित किया है। यह राश्ट्र की सम्पत्ति है।
मधुकर- यह झूठ है कमाण्डर साहब। इसकी मौत भूख से हुई है। यहाँ की जनता इसकी गवाह है।
 (कटियार मोलई को चादर से ढक देता है। उसके षरीर में कुछ खोजता है। टेट से कुछ निकालता है)
कटियार- (लोगों को दिखाते हुए) यह देखो इसके टेट से सौ रू0 का नोट निकला। अब बताओ जिसकी टेट में सौ रू0 हों, वह भूख से कैसे मर सकता है?
बातुल- सौ रू0 का नोट?
कटियार- हाँ सौ रू0का नोट । तुम भी देख सकते हो।
बातुल- लेकिन यह कैसे हो सकता है?
कटियार- हो सकने का सवाल नहीं , यह हुआ।
कमाण्डर- जनता स्वयं फैसला कर देगी। क्यों भाई सौ0 का नोट रखकर कोई भूख से कैसे मरेगा?
कटियार- ये देशद्रोही हैं सर। झूठे जाल बनाकर सरकार को बदनाम कर रहे हैं। 
 (कटियार अन्दर जाता है)
कमाण्डर- मधुकर-(मधुकर की ओर संकेत कर) देशद्रोह की सजा क्या है, जानते हो?
मधुकर- जानता हूँ...लेकिन देशद्रोही कौन है?
कमाण्डर- यह मैं तय करूँगा तुम नहीं । यह मेरी अदालतें तय करेगीं जिनमें हमने ऐसे जज बनाए हैं जो हमारा सहयोग करेंगे। हमारे ये प्रतिबद्ध जज आखिर कब काम आयेंगे?
 (नेपथ्य से रेडियो समाचार। पड़ोसी देश द्वारा सीमा पर फौजी जमाव सुरक्षा हेतु विमान एवं हथियारों की भारी खरीद। एक व्यक्ति द्वारा सरकार की स्वास्थ्य कामना हेतु प्राण अर्पित । सरकार द्वारा उसके वारिसों को पाँच हजार रूपये का अनुदान)
कमाण्डर- रेडियो भी हमारी बात की पुश्टि कर रहा है। तुम लोग क्या सोचते हो? एक सीधी बात को घुमा फिराकर कहने से क्या लाभ?....सच...सच ही है। 
बातुल- (मधुकर की ओर देखकर) हाँ सच...सच ही है
कटियार- (प्रवेश कर) सर टी.वी. और रेडियो भी यही चिल्ला रहै हैं कि एक व्यक्ति ने सरकार की स्वास्थ्य कामना के लिए प्राण अर्पित किया है और सरकार ने.....।
कमाण्डर- ठीक कहते हो कटियार। ये देशद्रोही हैं। इन्हें जेल में ठूँस दो।
मधुकर- इस व्यक्ति की मौत भूख से हुई है इसे झुठलाना ही देशद्रोह है।....देशद्रोही.......आप लोग हैं।
कमाण्डर- हम देशद्रोही! और तुम सच्चे सेवक। कटियार इन्हें हथकड़ी चाहिए।
कटियार- ये पढ़े-लिखे मालूम होते है सर....स्वेच्छा से जेल जाना पसन्द करेंगे।
कमाण्डर- ठीक है इन्हें अच्छी तरह.....(कटियार मधुकर से चलने को कहता है। मधुकर एक नज़र बातुल और जगरूप पर डालकर प्रभावी डग भरता हुआ कटियार के साथ चल देता है।)
बातुल- हमें भी जेल भेज दो कमाण्डर साहब।
जगरूप- बाबू जी हमें भी
कमाण्डर- जेल तुम दोनां के लिए नहीं है। हम तुम्हें आदमी बनाएँगे।
बातुल- नहीं सर, जेल ठीक है....
कमाण्डर- तुम आदमी नहीं बनना चाहते ?हम तुम्हें जेल नही भेजेंगे। मुझे घुड़सवारी का षौक है। मेरे घोड़े के लिए घास और दाने का इन्तजाम करो।
बातुल- सर....
कमाण्डर- जो मैंने कहा है फटाफट करो। अभी जाओ
 (बातुल चल देता है।)
 (जगरूप से) तुम्हें कुछ पता है...इस आदमी का वारिस कौन है?
जगरूप- सरकार इसका अपना कोई नहीं है।
कमाण्डर- कोई नहीं।
कटियार- (प्रवेश कर के) तब तो बहुत अच्छा है। ऐसा करो तुम्हीं इसके वारिस बन जाओ।
जगरूप- मैं?
कटियार- हाँ तुम्हीं। तुम अन्तिम समय में इसके साथ रहे हो। तुमसे अच्छा वारिस और कौन मिलेगा? तुम्हें इसके लिए सौ रूपये मिल जायेंगे।
जगरूप- सौ रूपये।
कटियार- हाँ पूरे सौ.....।
जगरूप- हमें क्या करना होगा सरकार?
कटियार- कुछ नहीं एक कागज पर दस्तखत।
जगरूप- सरकार मैं पढ़ा लिखा नहीं हूँ।
कटियार- कोई बात नहीं अँगूठा लगा दो......।
 (कटियार एक कागज निकालता है। अँगूठा लगवाता है और उसे सौ रूपये देता है।)
कमाण्डर- अभी घर चले जाओ। किसी से भेंट मत करना। तुम्हारे इन रूपयों पर किसी की नज़र लग सकती है।
कटियार- हाँ किसी से कोई बात नहीं।
जगरूप- सरकार, लेकिन मोलई.....
कटियार- मोलई! कुछ नहीं....उसकी लाश को हम ठिकाने लगा देंगे। तुम इसके वारिस हो तो हम भी तो उसके कुछ हैं।
 (जगरूप धीरे धीरे निकल जाता है।)
कमाण्डर- बहुत खूब, तुमने तो कमाल कर दिया।
कटियार- इसे कहते है बुद्धि का उपयोग.....आप देखते रहिए....।
 (मोलई की ओर संकेत कर) इसे भी ठिकाने लगाना है।
 (इधर-उधर झाँकता है मोलई के षरीर में कम्पन,अँगड़ाई और कराहने की आवाज़। कटियार घबड़ाकर बोल उठता है।)
 यह देखो लाश में कम्पन और आवाज़
 (कमाण्डर चादर अलग करता है। कराहने की आवाज तेज हो जाती है मोलई अपना पेट मलने लगता है।)
कमाण्डर- यह आदमी अभी जीवित लगता है।
कटियार- जी.... कभी...कभी लोग मर कर फिर जी उठते हैं।
कमाण्डर- लेकिन हमारे रेकार्ड में यह आदमी मर चुका है। इसके वारिसों को अनुदान भी मिल गया।
कटियार- हम यहीं मानेंगे कि यह आदमी मर चुका है।
 (मोलई छटपटाने लगता है कुछ आवाज़ करता है। कटियार और कमाण्डर उसके पास बैठकर उसकी आवाज समझने का प्रयास करते हैं। मोलई पानी माँगता है।)
कमाण्डर- यह आदमी पानी माँगता है कटियार।
कटियार- पानी?
कमाण्डर- हाँ...पानी....।
कटियार- पानी पीकर यह आदमी जीवित हो सकता है।
कमाण्डर- तब?
कटियार- इसके ज़िन्दा होने पर दिक्कतें आ जायेंगी।
मोलई- पा...नी...पा...।
कमाण्डर- दिक्कतें।
कटियार- हाँ दिक्कतें.....। हमारे रेकार्ड में यह आदमी मर गया । सरकार ने इसके वारिसों को पाँच हजार रूपये का अनुदान दिया है।
कमाण्डर- फिर....।
कटियार- इसके जीते ही झमेला खड़ा हो जायेगा। जनता को सड़क पर आने का बहाना मिल जायगा।
मोलई- पा...नी...पा....नी....।
कमाण्डर- तो क्या इसे मरने दिया जाय?
कटियार- इसके जीने से सरकार की नींद में.....।
कमाण्डर- हाँ सरकार की नींद में ज़रूर....।
कटियार- फिर....इसका मरना ही ठीक है।
कमाण्डर- लेकिन पानी के लिए तड़प-तड़प कर मरना....।
कटियार- यह आप क्या कहने लगे? यह तो विपक्षी की भाशा है।
कमाण्डर- लेकिन यह सच भी है....।
कटियार- जो हमारे पक्ष में है वही सच है....।
मोलई- पा..नी....पा....नी।
कमाण्डर- क्यों न इसे पानी देकर जीवित रखा जाय? इससे काम लिया जाय। इसके कोई नहीं है....खाना कपड़ा देकर ही इससे काम लिया जा सकता है ज़िन्दगी भर.....।
कटियार- ज़िन्दगी भर....।
कमाण्डर- हाँ ज़िन्दगी भर।
कटियार- तब तो ज़िन्दगी भर के लिए नौकर मिल गया।
कमाण्डर- हाँ मिल गया।
कटियार- मगर वह भाग गया तो।
कमाण्डर- तब तों उसे जेल मे डाल देंगे, वह तो मर चुका है।
कटियार- तब?
कमाण्डर- हाँ तब....? उसे पानी देना चाहिए।
कटियार- सोच लें.....।
कमाण्डर- मुझे सोचने की जरूरत नहीं। सोचो तुम। उसे पानी दिया जाय।
कटियार- हाँ उसे पानी दिया जाय।
मोलई- पा...नी...पा...नी।
कटियार- लेकिन पानी उसे नुकसान भी कर सकता है।
कमाण्डर- तुम फिर बाल की खाल निकालने लगे।
कटियार- वह तो अपना धन्धा है।
कमाण्डर- इसे पानी पिलाया जाय। यदि मर गया तो कोई बात नहीं लेकिन यदि जी गया तो ज़िन्दगी भर के लिए नौकर मिल जायगा।
कटियार- तो ठीक है। पानी पिला ही दिया जाय पर इसका नाम बदल देना होगा।
कमाण्डर- हाँ हाँ पहले पानी तो पिलाओ।
कटियार- पर पानी कहाँ है यहाँ तो षेम्पेन....।
कमाण्डर- पानी की जगह षेम्पेन पिलाओगे?
 तुम भी....इसे पानी पिलाओ।
कटियार- तो फिर प्रबन्ध करना होगा।
कमाण्डर- तो जल्दी करो.....
 (दोनों उसे चादर से ढक कर जाते हैं। बातुल का प्रवेश। मोलई कराहता है। कराहते हुए पानी माँगता है। बातुल एक क्षण उसकी कराह को सुनकर चकित हो जाता है। चादर का एक कोना उठाकर उसे देखता है।)
बातुल- तो मोलई अभी ज़िन्दा है। अभी ज़िन्दा है।
 (तेजी से मोलई के चारों ओर चक्कर लगाकर झपटकर उसे पीठ पर लादकर बाहर हो जाता है।)
 (नेपथ्य में रेडियो की घोषणा सुनाई पड़ती है-
 देश की सीमाओं पर सेना का जमाव- सरकार के स्वास्थ्य लाभ हेतु एक व्यक्ति द्वारा प्राण अर्पित । सरकार द्वारा उसके वारिसों को पाँच हजार का अनुदान)