उन्हें नींद नहीं आती
पात्र-
बातुल
नायकम
कटियार
कमाण्डर
मिस राव/बनजारा
टोगो
मोलई
जगरूप
मधुकर
किश्नू
मटरू
कुंजीलाल
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अंक- 1
(सरकारी बंगले का लान। चार कुर्सियाँ लगी हैं बगल में एक छोटी मेज पर फोन रखा है। बातुल और नायकम बात कर रहे हैं। वे कमाण्डर तथा उनके साथियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।)
बातुल- समय तो हो गया।
नायकम-हाँ समय तो हो गया। कमाण्डर साहब आते होंगे।
बातुल- सरकार सुना है....
नायकम-जो अपने सुना वह सच है। सरकार की नींद हराम हो गई है. ....
बातुल- महंगाई और बेरोजगारी से उनकी नींद हराम होना.....
नायकम- बात यह नहीं है। उन्हें सबसे अधिक परेशानी जन आन्दोलन को लेकर है। आदमी कुछ भी बरदाश्त नहीं करना चाहता।
बातुल- लेकिन मँहगाई और बेरोजगारी होगी तो आन्दोलन होंगे ही..
नायकम- किन्तु ये समस्यायें पहले भी थीं। आदमी को जिस तरह हम चाहते थे हाँक देते थे लेकिन आज......
बातुल- आज आप उन्हें हाँक नहीं पाते। वे अपना भला बुरा स्वयं सोचने लगे हैं।
नायकम- यह बात बहुत सच तो नहीं है लेकिन आंदोलन होते हैं इतना सच है। सरकार सहनशील हैं अन्यथा उनके नज़र घुमाते ही यहाँ की हवा बदल सकती है। जो आज गला फाड़-फाड़कर सरकार को गालियाँ दे रहे हैं वे चूहों की बिल में समा सकते हैं.....
(नेपथ्य में प्रदर्शन का षोर....रोजी रोटी दे न सके जो वह सरकार निकम्मी है, जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है।
नायकम- देख रहे हो!
बातुल- इसमें गलत क्या है?
नायकम- क्या ये समस्यायें एक दिन में समाप्त हो जायेंगी?
बातुल- समाप्त न भी हों किन्तु उस दिशा में प्रयास तो होना ही चाहिए।
नायकम- प्रयास कौन देखता है मित्र? यहाँ तो लोग परिणाम देखते है।
(नेपथ्य में
भ्रश्ट प्रशासन की सरकार
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
लाठी डंडे की सरकार
नहीं चलेगी, नहीं चलेगी)
नायकम- सुन रहे हो?
बातुल- कान सुनने के लिए हैं ही।
(कमाण्डर कटियार के साथ प्रवेश करते हैं)
कमाण्डर- लेकिन सुनने से ही काम नहीं चलेगा
(बातुल और नायकम भी खड़े हो जाते हैं फिर चारों बैठते है)
बातुल- जो आज्ञा
कमाण्डर- आप जनता के बीच रहते हैं, जनता की नब्ज पहचानते होंगे। आखिर लोग सड़कों पर क्यों उतर आये हैं? क्यों मि. नायकम यह बात तो इन्हें मालूम होनी चाहिए।
नायकम- जरूर-जरूर.....
बातुल- जनता के बीच रहना और जनता को समझना दोनों दो बातें है इसलिए.......
कटियार- आप जनता को समझ नहीं पाये हैं
बातुल- हाँ जनता को समझना आसान काम नहीं है। आप जैसे बुद्धिजीवी अवश्य ही यह दावा कर सकते हैं।
(नेपथ्य में
फौजी षासन की सरकार
नहीं चलेंगी नहीं चलेगी
भ्रश्ट प्रशासन की सरकार
नहीं चलेगी नहीं चलेगी।
कमाण्डर घूमकर नेपथ्य की ओर देखता है उसका चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है लेकिन थोड़ा सम्हलता हुआ पुनः लौट आता है।)
कमाण्डर- क्यों मि. नायकम यह तमाशा हम लोग कब तक देखते रहेंगे? लोग सड़कों पर सरकार को गालियाँ दे रहे हैं और हम अपनी राइफलें लिए मूकदर्शक बने हैं। सरकार को अधिकार है कि.......
(नेपथ्य में
लाठी गोली की सरकार
नहीं चलेगी नहीं चलेगी)
सड़कें सरकार विरोधियों से भर गई हैं। सरकार की नींद हराम हो गई है।
कटियार- हमें भी इसका जवाब देना चाहिए।
बातुल- क्या है इसका जवाब? हम भी तो सुनें.....
नायकम- हाँ क्या है इसका उत्तर?
कटियार- जनता बहुत भोली होती है।
नायकम- तो?
कमाण्डर- हाँ हाँ बताइए मि. कटियार । देश में भयंकर सूखा पड़ गया है। कल रोटियाँ नहीं भी मिल सकतीं हैं तब आज की भूखी नंगी जनता क्या करेगी?
कटियार- वह कुछ नहीं करेगी।
कमाण्डर- कुछ नहीं करेगी?
कटियार- हाँ कुछ नहीं। जनता का आंदोलन सड़क से होकर पगडंडियो पर उतर जायगा। सरकार का बाल भी बाँका नहीं होगा।
नायकम- कैसे मि. कटियार?
कमाण्डर- मुझे भी जल्दी विश्वास नहीं हो रहा है।
कटियार- कमाण्डर साहब, जनता बहुत भोली होती है। ये लोग जो सड़कों पर उतर आये हैं उनमें से कुछ बिक सकते हैं। जिनके पेट खाली हैं उनमें से कुछ को रोटियाँ पहुँचाकर बहुतों को टरकाया जा सकता है। चूहों का कुलबुलाना बंद होते ही बहुतों को किनारे किया जा सकता है।
बातुल- लेकिन सभी बिकते नहीं मि. कटियार।
कटियार- उनकी भी दवा होगी। अखबार,रेडियो और दूरदर्शन केवल सरकार के पक्ष में काम करेंगे।
कमाण्डर- यह कोई मुश्किल काम नहीं है।
बातुल- मुश्किल है कमाण्डर साहब । रेडियो और दूरदर्शन पर आपका नियंत्रण भले ही बना रहे पर अखबार को साधना कठिन होगा(कटियार चला जाता है)
कमाण्डर- क्यों मि. नायकम आपका क्या विचार है?
नायकम- बातुल की बात कुछ अंश तक ठीक है।
कमाण्डर- हूँ... मुझे सोचने का समय दें।
(बातुल और नायकम उठकर चल देते हैं। कमाण्डर टहलने लगता है। थोड़ी देन में कटियार लौट आता है।)
कटियार- कमाण्डर साहब यह कोई मुश्किल काम नहीं है। जो भी अखबार सच कहेंगे....नहीं, नहीं जो विरोध करेंगे उन्हें बन्द करा दिया जायेगा। आखिर सत्ता भी कुछ अर्थ रखती है।
कमाण्डर- हूँ....सरकार की नींद हराम हो गई है.....
कटियार- सरकार को नींद आयेगी। वे सरकार बने रहेंगे.....
कमाण्डर- तभी वे सो सकेंगे।
कटियार- इसके लिए बस थोड़ा सा.....
बहुत थोड़ा सा......।
कमाण्डर- आखिर क्या?
कटियार- आप नाराज़ तो नहीं होंगे?
कमाण्डर- इसमें नाराज़गी की क्या बात है? आप कहें......
कटियार- वे सत्ता में बने रहें इसके लिए देश में थोड़ी आग लगानी होगी।
कमाण्डर- क्या कह रहे हो कटियार? षासन की ओर से लगाई गई आग थोड़ी कैसे हो सकती है? उसकी एक चिनगारी भी विश्व में....।
कटियार- बस, बहुत ठीक कहा आपने । आग लगाने के लिए चिनगारी ही काफी होती है....हाँ थोड़ी हवा जरूर करनी होगी। अन्दर आग बाहर हवा यही हमारा नुस्खा है।
कमाण्डर- मैंने समझा नहीं।
कटियार- देश के अन्दर लोगों को चकरघिन्नी कराना होगा, जनता को हम भेड़ों की तरह ‘डू बेटा’ करा देंगे धर्म, जाति, भाशा किसी का भी नाम लेकर।
सरकार का मनोरंजन भी होगा और वे चैन से सो सकेंगे।
कमाण्डर- लेकिन इससे समस्यायें भी पैदा होंगी.....।
कटियार- कुछ नहीं....तटस्थ भाव से मुस्कराते रहें लोग आपस में मरते कटते जब सरकार के पास आएँ न्यायपूर्ण मुद्रा में सिर हिला दें, थोड़ा आश्वस्त करें किन्तु मन में किसी संवेदनाको आने ही न दें....संवेदनहीनता ही निश्चिन्तता की कुंजी है...
यदि कोई भी ज्यादा पिट जाता है तो थोड़ी सी सहानुभूति... .और फिर काम बन गया......
निर्णय जल्दी कभी न करें उसे टरकाते जाएँ
कमाण्डर- आखिर इसकी भी कोई सीमा होगी?
कटियार- सीमा कोई नहीं होगी कमाण्डर साहब। कई-कई वर्श तक न्यायालय किसी मुकदमें का फैसला नहीं दे पाता तो कोई उसका क्या कर लेता है? सरकार निश्चिन्त रहें.....और हाँ पडा़ेसी देशों से थोड़ा सम्पर्क....थोड़ी परदे के पीछे बातचीत. ...
कमाण्डर- वह क्या?
कटियार- पड़ोसी देशों की सरकारें भी अपनी जनता से परेशान हैं। वे भी चाहेंगी कि थोड़ी युद्ध की हवा, सेनाओं का सीमाओं पर युद्धाभ्यास......इससे उन्हें भी राहत मिलेगी.....।
कमाण्डर-कटियार युद्ध की हवा कोई हँसी खेल नहीं है मि0 कटियार सेना को युद्ध में लगाने पर बहुत से जवान कट जायेंगे। देश में विन्तीय संसाधनों की भारी कमी हो जायेगी....पर कमाण्डर साहब नींद की भी कीमत होती है और फिर सरकारी नींद....।
कमाण्डर- हूँ.....।
कटियार- लेकिन इससे यह भी तो होगा कमाण्डर साहब कि सरकार को अगले कई वर्शो तक सरकार बने रहने का मौका मिल जायगा....
कमाण्डर- ऐं?
कटियार- युद्ध की हवा युद्धास्त्रों की खरीद...इसमें भावी चुनाव हेतु सारा खर्च.....
कमाण्डर- इतनी दूर की कौड़ी मार रहे हो....।
कटियार- यह सच है कमाण्डर साहब, देश दुनिया को पता नहीं चलेगा कि चुनाव का सारा खर्च कहाँ से पूरा किया....न किसी के आगे हाथ पसारना....न किसी को कानो कान खबर.....और जो चुनकर आएगा वही चिड़ी का गुलाम।
कमाण्डर- बात तो पते की है किन्तु......
कटियार- किन्तु परन्तु की कोई बात नहीं है कमाण्डर साहब। सत्ता को मजबूती से पकड़िये। हाँ.....पकड़िये ही नहीं कुण्डली मार कर बैठ जाइए, फिर देखिए......।
हाँ सम्पादक मिस राव से बात करना आवश्यक है उसका अखबार सरकार के विरोध में......।
कमाण्डर- ठीक कहा.......(फोन उठा लेता है)
हैलो...हैलो....मिस राव आपसे कुछ जरूरी....हाँ इसी समय. .....बहुत आवश्यक है......ठीक है......
यही बंगला नं.3....नमस्कार।
(फोन रख देता है, टोगो का प्रवेश...)
कटियार- आइए....आइए...आप हैं मि.टोगो युद्धास्त्रों के व्यापारी
(कमाण्डर और टोगो हाथ मिलाते है)
आप ठीक समय पर आए। हम लोग कुछ सरकारी योजनाओं पर ही चर्चा कर रहे थे।
टोगो- यह मेरे भाग्य में है। जहाँ कुछ योजनाएँ होती हैं वहीं मैं पहुँच जाता हूं।
कमाण्डर- लेकिन मि.टोगो....अभी कटियार साहब कर रहे थे कि आप सरकार का सारा चुनाव खर्च...
टोगो- कमाण्डर साहब केवल चुनाव का खर्च ही नहीं विजय की भी पूरी व्यवस्था कर देते हैं। हमारा तो धन्धा ही यही है.... युद्धास्त्रों की खरीद के साथ ही युद्ध की हवा बनाने में भी हम सहयोग करते हैं....।
कटियार- अगर युद्ध न हो तो कोई युद्धास्त्र क्यों खरीदेगा?
टोगो- ठीक कहते हैं आप? पर हमें तो अपने अस्त्र बेचने ही होते हैं।
कमाण्डर- जरूर-जरूर। बेचने वाले खरीदार तैयार कर लेते हैं।
टोगो- अच्छा मुझे.....।
कमाण्डर- हाँ-हाँ.....।
(टोगो हाथ मिलाता है और चल देता है।)
कटियार!
कटियार- जी साहब।
कमाण्डर- खेल बड़ा है।
कटियार- जी हाँ। खेल जरूर बड़ा है पर जीत हमारी होगी।(एक ओर से मिस राव का प्रवेश)
ेकमाण्डर- आइए मिस राव
मिस राव- नमस्कार साहब।
कमाण्डर- नमस्ते। (तींनो बैठते हैं)
कहिये मिस राव आप मजे में हैं?
मिस राव- दिन कट रहे हैं साहब।
कमाण्डर- दिन का सूर्य हमारे लिए रुका नहीं रहेगा। जिन्दगी आराम से कटे हमें यही प्रयास करना चाहिए।
मिस राव- जो स्थितियाँ उभर रही हैं उसमें....
कटियार- कैसी स्थितियाँ उभर रही हैं मिस राव? आप लोग तिल का ताड़ बनाने में.....।
मिस राव- हम केवल समाज के सही बिम्ब को उभारते हैं....।
कटियार- और सरकार की नींद हराम करते हैं.....।
मिस राव- अगर समाज का सही चित्र किसी की नींद मे बाधक बने तो हम उनमें क्या कर सकते हैं?
कटियार- लेकिन आप का अखबार तभी छपेगा जब षासन चाहेगा. ....शासन आपको जेल की हवा भी खिला सकता है।
मिस राव- आप ठीक कहते है.....पर कर्तव्य के लिए जेल की हवा खाना कोई ......
कटियार- क्या यही है आपका कर्तव्य.....कि आप षासन की नींद हराम करते फिरें......
मिस राव- कमाण्डर साहब आपने किसी काम से........
कमाण्डर- हाँ मिस राव आपका अखबार जरूरत से ज्यादा ही षासन की आलोचना कर रहा है....हम चाहते हैं कि आप सरकार की प्रशंसा भी करें.....आपके अखबार ने व्यवस्था विरोधी प्रकृति अपना ली है.....यह आपके अखबार के लिए घातक हो सकता है.......।
मिस राव- कमाण्डर साहब अखबार की नीति के सम्बन्ध में किसी परिवर्तन के लिए नीति निर्धारकों में विचार विमर्श होना आवश्यक है। तत्काल हम किसी प्रकार का वादा नहीं कर सकते।
कटियार- तो षासन अपनी नीति बदल सकता है और आप.....
मिस राव- कमाण्डर साहब आज्ञा दें......।
कमाण्डर- हाँ यह समाचार आप अपने पत्र में।
(कटियार समाचार की एक टंकित प्रति देता है। मिस राव प्रति लेते हुए प्रणाम कर निकल जाती हैं।)
कटियार- इसे देखना पडे़गा।
कमाण्डर- देख लेंगे.....यह तो अपना काम ही है......।
कटियार- लेकिन इसे ठीक से देखना होगा.....।
कमाण्डर- वह भी हो जायगा.....यह समाचार रेडियो और दूरदर्शन से भी प्रसारित होना है न......।
कटियार- हाँ हाँ इसमें कोई दिक्कत नहीं है। रेडियो और दूरदर्शन तो सरकार के संकेत पर नाचते हैं।
कमाण्डर- इसीलिए इनका विस्तार करना जरूरी है।
कटियार- जिससे सरकार की यशोगाथा का गुणगान निरन्तर होता रहे। देश के सभी गाँव और षहर इसकी परिधि में आने चाहिए।
कमाण्डर- जरूर-जरूर। समाचार की एक प्रति तुरन्त रेडियो एवं दूरदर्शन केन्द्र पर भेज दो।
कटियार- हाँ हाँ लेकिन मिस राव के अखबार को भी बन्द करना है। सरकार विरोधी कोई भी अखबार....।
कमाण्डर- नहीं छपेगा मि.कटियार। मैं अपने विश्वस्त आदमियों को इस काम मे लगा देता हूँ।
(दोनों तेजी से निकल जाते हैं दूसरी तरफ से मोलई और जगरूप आ जाते हैं। मोलई एक बनियाइन और धोती पहने हैं बनियाइन बिलकुल फटी है। हाथ में खाँची है। जगरूप एक फटा कुर्ता और धोती पहने है। एक कुदाल कंधे पर रखे हुए हैं।)
जगरूप- मोलई कुछ खाकर आये हो?
मोलई- कुछ था नहीं क्या खाकर आते?
जगरूप-क्यों कहीं काम नहीं लगा?
मोलई- खेती में तो काम सीजन पर लगता है न।
जगरूप- तो यह षरीर कैसे चलेगा?
मोलई- क्या किया जाए जैसे चल पाएगा चलेगा, और तुम?
जगरूप- हम क्या बताएँ मोलई? घर में हम दो प्राणी और दो बच्चे हैं। हमारी कमाई से पूरा नहीं पड़ता। रोज काम भी नहीं मिलता। आज चलने लगा तो सोचा था कहीं काम मिल जायेगा लेकिन चौराहे का गोल चक्कर लगा आया हूँ। कहीं काम नहीं मिला। क्या होगा मोलई? लोग हल्ला मचा रहे हैं कि सरकार बदलेगी। क्या कुछ होगा इससे?
मोलई- यह तो बहुत दिनों से सुन रहा हूँ जगरूप....कभी लोग कहते हैं कि धरम बदल लो तो रोटी मिल जायेगी। कभी कहते हैं कि हमारा साथ दो रोटी पक्की। मैं तो सब करके देख चुका हूँ। अपना धरम तीन बार बदल चुका हूँ पर रोटी का जुगाड़ नहीं बैठा। गरीबी और बीमारी से घरवाली भी चल बसी। अब बिल्कुल अकेला हूँ। भूख से अब तो रहा नहीं जाता (पेट दबा कर बैठ जाता है। पेट बराबर मलता रहता है। जगरूप उसे उठाने की कोशिश करता है लेकिन मोलई जमीन पर गिर पड़ता है। इसी बीच बातुल आ जाता है और जोर-जोर से मि. कटियार को पुकारने लगता है।)