अंक तीन
(निराला का वही घर । ओसारा जर्जर हो चुका है। तख्ते पर रजाई बिछी है। तकिए की जगह ईट रखी है। दीवाल के निकट ही पानी से भरा घड़ा रखा है। घड़ा एक कुल्हड़ से ढका है। दीवाल के सहारे पक्षियों की मिट्ठी की मूर्तियाँ टँगी हैं तथा खूंटी पर कुर्ता। धीरे - धीरे मंच पर प्रकाश बढ़ता है। दाएँ से नट एवं बाएँ से नटी प्रवेश करती है।)
नट- जिस पौरुश ने लीक दिखाई लोक दिखाया,
नटी- वह माटी की मूरत कैसे बन सकता था।
नट- जो उतरा था बनकर मशाल इस धरती पर,
नटी- कैसे वह फागुन को सावन कह सकता था।
नट- जो समाज मिमियाहट की ही भाशा समझे,
नटी- औसत से ही नाप चले धरती का कण-कण।
नट- पैमाने की खोट कहाँ है उसको दिखती,
नटी- जीता जो पैमाने में ही सीमित हर क्षण।
नट- यहाँ का दस्तूर यही है।
नटी- क्या है दस्तूर?
नट- हर सुकरात को ज़हर का प्याला मिला है,
समवेत- हर सुकरात को ज़हर का प्याला मिला है।
नटी- दस्तूर यही फिर निराला को क्या गिला है।
(समवेत गान करते हुए नट-नटी दाएँ पार्श्व से जाते हें। बाँई ओर से मोती और दीनू बात करते हुए आते हैं। मोती नाक से बोलता है।)
मोती- दीनू तुम तो कहते रहे........
दीनू- ऊ तौ अबहूँ कहत हैं।
मोती- ई कही-कहा में जिनगी.......
दीनू- तो का करी भैया.....काका केरी बातन पर हमहूँ कूदत रहेन. ....वै कहत रहे आज़ादी मिली तब तुमहूँ का.........
मोती- आज का काका नहीं कहत.....
दीनू- अब तो काका के सामने जात डर लागत है.....
मोती- ई काहे?
दीनू- कहत हौ काहे.....।
मोती- का काका बात नहीं करत?
दीनू- मन मा आवत तो अकेले बोलत रहत और नहीं मन मा आवा तो एक चुप हजार चुप। काका से पूछै का है। काका देश तो आज़ाद होइगा.....ई आज़ाद देश मा भइया.....
मोती- मोती के घर में मेहरिया नदारद।
दीनू- देश देखो मोती भैया.......।
मोती- घर से ही देश........
दीनू भैया घर से ही देश......।
(दीनू और मोती बातें करते निकल जाते हैं। दूसरी ओर से एक युवा कवि नीरज प्रवेश करता है। इधर-उधर देखकर निराला की प्रतीक्षा में तख्ते पर बैठ जाता है। कुछ क्षण बाद निरालाआधी बाँह की बनियाइन पहने तथा धोती को लुंगी की भाँति लपेटे घर से निकलते हैं। नीरज उठकर अभिवादन करता है किन्तु निराला ध्यान नहीं देते हैं। कुछ क्षण यों ही बीत जाता है। निराला की दृश्टि नीरज पर पड़ती है.....)
नीरज- महाकवि के दर्शनार्थ.....
निराला-(जैसे चौंक कर) क्या कहा? दर्शनार्थ महाकवि निराला? भाई वह तो कब का मर गया। तुम देर से आए......तुम्हें यह भी पता नहीं.......।
(युवा सिटपिटा जाता है। वह मुड़ता है किन्तु निराला डपट कर पूछते हैं)
नीरज- (घबड़ाहट में ही) मैं.....जी महाकवि से मिलने आया था... .मैं एक साधारण आदमी हूँ.....।
निराला- हुँह....साधारण आदमी.......निराला से मिलने चले आए. ...हुँह यह भी पता नहीं निराला कब का चुक गया.....यह भी कोई बात हुई.....हुँह......कोई लाश को कहाँ छिपा ले. ....क्यों जी ....निराला से मिलने आए थे?
नीरज- जी.......
निराला- बैठो (तख्ते पर बैठने का संकेत करते हैं। नीरज सकपकाया हुआ तख्ते पर बैठ जाता है। निराला खूँटी पर टँगे कुर्तें की जेब से टटोलकर एक रूपया निकालते हैं। उसे रूपया देते हैं। वह लेना नहीं चाहता किन्तु डर के मारे पकड़ लेता है।)
जलपान कर लेना.....निराला मर चुका तो क्या हुआ उसका भूत जब तक है उसे निराला का भार ढोना ही है.....समझे. .....।
(नीरज कुछ समझ नहीं पाता किन्तु स्वीकृति में सिर हिला देता है।)
नीरज- जी......।
निराला-मैं कोई भीख माँगता हूँ?.......
महाकवि दया का पात्र है।....
कम से कम निराला नहीं है.....
मेरी ही पूँजी से लोग कमा रहे हैं
किन्तु......
(निराला की दृश्टि एक ओर स्थिर हो जाती है।)
प्रेमचन्द को क्या मिला.....परदे से ढका हुआ उनका कमरा. ....शय्या पर बीमार पड़े प्रेमचन्द.....आसपास घेरे नाबलिग बच्चे....क्या यही नियति है?....क्या यही?......क्या इसीलिए लेखक अपने को होम कर दे......?(एक क्षण बाद)
हाँ.....।
(पुनः एक क्षण बाद)
क्यों जी तुमने हाँ कहा है।?
नीरज- (धबड़ाकर) नहीं....नहीं.....हमने कुछ नहीं कहा है.....।
निराला- (स्वर बदल जाता है।)
किसी ने कहा है.....हाँ कहा है......तुमने कुछ नहीं कहा है. .....तुम क्यों कहोगे?......हाँ मैने कहा है। अच्छा तुम जाओ.....निराला को अधिक जानने की कोशिश न करो.... .समझे...... .....जितना जान गए बहुत है.....उसके अन्दर न झाँको.....तुम उसे न जानो तो ठीक है.......।
(नीरज जाने को उद्यत होता है। रूपया उसी तख्ते पर छोड़ देता है। निराला की दृश्टि उस रूपये पर पड़ जाती है तो वे उसे डाटने लगते हैं।)
क्यों जी?.....मैंने कहा था इसका जलपान कर लेना...... तुम्हारी समझ मोटी है क्या? (मुस्कराकर) तुमने सोचा होगा निराला गरीब है.....इसका पैसा क्यों खर्च कराएँ......तुम्हें
धोखा हुआ है। मैं तो स्वेच्छा से इस स्थिति में रहता हूँ....मुझे सामान्य जन की तरह रहने में खुशी होती है।
(चेहरा चमक उठता है। स्वर भी तेज हो जाता है।)
अपने राम को क्या लेना है....निराला तो मर गया लेकिन . .....वह दाता रहा है......केवल दाता.....अब इस लाश को भी निराला की आन निभानी है.....समझे.......
नीरज- जी.....।
निराला- फिर तुमने रूपया तख्ते पर क्यों रख दिया? इसका मतलब तुम कुछ नहीं समझे......निराला को लोग समझ कहाँ सके?. ...
(स्वर तीखा हो जाता है तेवर बदल जाता है।)
अब उसका भूत उसे कौन समझे?.....जानते हो देश किधर जा रहा है? आदमी को पावभर आटे के लिए लाइन लगानी पड़ती है.....सोच सकते हो निराला ऐसे में क्या करता है?. ....
(नीरज के निकट आकर उसके चेहरे पर दृश्टि टिका देते हैं।)
तुम किस लिए आए थे?......तुमसे बात ही नहीं हुई..... किस लिए?......
नीरज- महामानव का दर्शन करने आया था।
निराला- क्या कहा महामानव?........
(नीरज से थोड़ा हटकर सख्त स्वर में)
बिल्कुल गलत.....महामानव बनाकर तुम पूजा करोगे और वह भी मरने के बाद.....और यह कहोगे कि महामानव के पेट नहीं होता......।
(समझाने की मुद्रा में)
मैं तो कहता हूँ निराला मर गया......लेकिन वह इन्सान था. .....एक अदना इन्सान......आदमीयत को उसने छुआ भर न था। छूकर......देखकर.....हाय करने वाले क्या कम हैं?. ....उसका जीवन मानवता निभाने में ही चुक गया.....निचुड़ गया.......लेकिन हारा नहीं.....ढह जाना......टूट जाना और हार मान लेना.....दोनों में अन्तर है न?
नीरज- (हड़बड़ा जाता है। आवाज निकल जाती है।)जी!
निराला- तुमने ‘जी’ के अतिरिक्त कुछ सीखा नहीं है क्या?
नीरज- जी!
निराला- ठीक है देश में ‘जी हुजूर’ की आवाज़ लगाने वाले फ़ायदा उठा रहे हैं। उठा रहे हैं न?
नीरज- जी।
निराला- साहित्यकारों की भी खरीद-फरोख्त जारी है........जानते हो?
नीरज- जी!
निराला- सत्य को परिभाशित करने में छोटे-छोटे दायरे बनाए जा रहे हैं.....दलगत सत्य की सीमाएँ खींची जा रहीं हैं। यद दलगत सत्य समाज को किस दिशा में मोडे़गा क्या तुम जानते हो?
नीरज- जी!
निराला- तुम नहीं जानते.....पेट पूजा से फुर्सत मिले तब न आदमी कुछ सोचे।......सोचना भी कितना कश्टकर होता है..... सोचने वालों को यह समाज.....(कुछ रुक जाते है)
यदि यही नियति है सोचने की तो कोई क्यों सोचे?....क्यों सोचे?
(कुछ क्षण बाद विश्वासपूर्वक)
लेकिन नहीं लोग सोचेंगे.....भूखों मरेंगे....सोचना बन्द नहीं होगा.....अपनी स्थापनाओं के लिए लोग प्राण दे चुके हैं... .आगे भी देंगे......।
नीरज- जी।
निराला- तुम कुछ नहीं सोचते......समय आएगा तुम भी सोचोगे... ....अपने को सामान्य जन कहते हो न.....ठीक है सामान्य जन भी सोचेगा....। यहाँ ऐसे भी लोग आते हैं जो चोरी से मेरी आवाज़ टेप करना चाहते हैं.....उनसे बचकर रहना है।
नीरज- जी।
निराला- साहित्यिक संस्थाओं में राजनीतिज्ञ हावी हो रहे हैं ऐसे में बोलो निराला का क्या काम?......राजनेता और नौकरशाह षायद सबसे बड़ा साहित्यकार होता है......तुम्हारी आँखें बन्द नहीं हैं
(नीरज की आँखों में झाँककर।)
तुम भी देखते होगे.....लेकिन देखकर अनदेखा करने की आदत हो गई है.....पर .....(चहलकदमी करते हुए) हर आदमी के लिए आँखें मूँद पाना क्या सहज है? नहीं...नहीं.. ..आँखें मूँदने की मेरी आदत नहीं है.....इसलिए....इसलिए. ....(चुप हो जाते हैं। एक क्षण के लिए दृश्टि एक ओर स्थिर हो जाती है।) जानते हो?
नीरज- जी।
निराला- निराला को राजनीति में घसीटा जा रहा है। मैं कहता हूँ निराला.....निराला है......तुम जो चाहे अर्थ लगा लो..... तुम्हारे पैमाने छोटे पड़ने लगें तो निराला क्या करे?.....तुम्हारे पैमाने के हिसाब से लिखे......यह नहीं होगा......यह नहीं होगा.....तुम्हें थाह लेनी है तो पैमाने बदलो......तुम्हारे पैमाने में खोट पैदा हो गया है......तुम अपने को साधारण जन मानते हो न......?
नीरज- जी।
निराला- ठीक है......ठीक है।
(निराला बाहर निकल आते हैं नीरज जो अब तक किसी प्रकार हाँ हूँ कर रहा था निराला के जाने के बाद राहत की साँस लेता है।)
नीरज- आया था महाकवि का दर्शन करने। पर यह नहीं जानता था कि महाकवि का दर्शन करने में पसीना छूट जाएगा। मेरी तो धुकधुकी दण्डबैठक करने लगी। घर से सोचकर चला था कि महाकवि का बंगला होगा लोग-बाग हाथ बाँधे खड़े होंगे। जो गांधी , नेहरू की ज़बान पकड़ सकता है.........उन्हें सीख दे सकता है.....कितना महान होगा वह?.....लेकिन यहाँ आते ही महानता की मेरी धारणा ही बदल गई.....मैं यह सोच भी नहीं सकता कि महाकवि रजाई को तख्ते पर बिछाकर लेटता है......सब्जियाँ उबालकर पेट भर लेता है......रजाई और तख्ता भी किसी के काम आ जाये तो देने में देर कहाँ...... ? फर्श पर आधी धोती बिछाकर नींद का सुख लेने वाला महाकवि.....
(आसपास एक नज़र डालता है।) मैंने भी दो कविताएँ लिखी हैं सोचा था एक दिन महाकवि नहीं तो कवि जरूर बनूँगा...... ..लेकिन यहाँ पहुँच कर सारा स्वप्न हवा हो गया। मैं क्षुद्र जीव हूँ। महाकवि की................................
साधना तक मेरी पहुँच नहीं......मैं तो.......
मैं कवि हो सकता हूँ किन्तु संन्यासी नहीं हो सकता । महाकवि का नुस्खा......(इसी बीच निराला और दीनू आ जाते हैं। नीरज फिर सिटपिटा जाता है। दीनू के हाथ में एक दोना है जिसे वह नीरज को देता है।)
जाओ.....निराला के यहाँ से................
निराला- (नीरज चरण स्पर्श कर चल देता है। निराला पुनःअन्दर चले जाते हैं। एक ओर से मोती कुर्तें की बाँह सरकाता हुआ आ जाता है।)
मोती- (नाक से ही बोलकर ) दीनू इस पार कि उस पार?
दीनू- यह का भैया?
मोती- यहै चलन है दीनू, तुम बताओ इस पार कि उस पार?
दीनू- मोती भैया यहु बुझौवल कहाँ से सीखा?
मोती- अब जबाना यही है दीनू। तुम कहाँ हो ? हमने जो सवाल किया वहिका उत्तर देव........
दीनू- (हँसते हुए) न यहि पार न वहि पार।
(दीनू के इतना कहते ही मोती तमतमा उठता है।)
मोती- अब तुमहूँ से निपटै का परी.....हम पूँछा कि हमार बियाहु करावा चाहत हैं कि नाहीं.....अब तू कहत हैं न एहि पार न वहि पार.....का तुम्हारी बात का कोई अर्थ है?.......
दीनू- अर्थ-अनर्थ तौ हमरी समझ मा आवत नाहिन........।
मोती- फिर अभी तक हमै झाँसा देत रहेन?.......
दीनू- नाही भैया तुम्हार बियाहु राम कहौ के न चाही.......लेकिन हमरे दिमाग में यहु बात नाहीं धँसत.......
मोती- का?
दीनू- यहै कि यहु पार तौ सौ खून माफ और वहि पार तौ चिउँटी के मारे फाँसी......।
मोती- सही...सही....नाहीं रहिगा दीनू......गलत का गलत कहै वाले नाहीं रहे......
दीनू- हमरै नहीं अब तौ तौहरौं हड्डी सूखै लाग भइया......।
मोती- दीनू अब फैसला करै का पड़ी तुमही बताओ हम खेत बेंचा. ....चाँदी जस खेत.....जो बाप-दादे हमें दे गए रहा....तबौं जुगाड़ नाहीं बैठ.....तू कहत रहेउ जुगाड़ बैठी.....आज़ादी मिली तब.....हम हूँ यहि देश का आज़ाद करावै बदे आपन जमा पूँजी......अब तौ देश आज़ाद है न.....घर अबौ भूत का डेरा.....हम जैसन रहेन वहू से....अब तो यहि समाज का मसल देय का पड़ी......यहु सिर्फ खून चूसत है. ......लाल......लाल खून. ......दीनू तुम्हें साथ देना पड़ी ....... बोलो साथ देहो
दीनू- बहाव मा नाही सोचि कै चलौ भइया।
मोती- ठीक है कान खुजाओ और सोचो........
(मोती तमतमा उठता है, वह झटके से चला जाता है। दीनू मोती की ओर देखता है। जो देखता है उसे षब्द देता जाता है।)
दीनू- अरे मोती.....ताल मा कूदिगा......अरे...रे....अरे. ..ई....का ऊ.......तौ ताल के सबै कमल सुन्दर....सुन्दर कमल तोरि डारिस....मसल दिहिसि.....अरे....अरे.....ऊ. ...तौ जरि से ही उखारै लाग सुन्दर....अरे.....रे.....सारा ताल........ उजरिगा.....अरे....रे....अरे.....मोती..... मोती....मोती....
(मोती...मोती कहता हुआ उसी ओर दौड़ जाता है। निराला एक पत्र हाथ में लिए आते हैं)
निराला- तुम लोग फिर वही सब करने लगे। महादेवी से कहना पड़ेगा कि वे मुझे किसी पुरस्कार योजना में न घसीटें......पुरस्कार. ...कितना बड़ा पुरस्कार (ठठाकर हँस पड़ते हैं जब हँसी रुकती है तो एक जगह खड़े हो जाते हैं।)
कोई मेरे अन्तस् की पीड़ा को क्या समझेगा? हवा और पानी के सहारे निराला जीवित रह सकता है.....वह निराला है... ...नहीं.....नहीं तुम लोग भी ऊब गए हो ...... ठीक है मैं लिखूँगा.....अनुवाद करूँगा तब तो रोटी मिल जाएगी...... बोलो बोलते क्यों नहीं?.....बोलो न.....कोई नहीं बोलता. ..... कोई क्यों बोले?.....हाँ कोई क्यों बोले?
(‘कोई क्यों बोले’ बुदबुदाते हुए दीवाल पर टँगे कुर्ते की ओर बढ़ते हैं जेब से कुछ निकालने लगते हैं कि कुर्ता खूँटी सहित गिर पड़ता है। निराला कुर्ते को उठाकर तख्ते पर रख देते हैं। खूँटी दीवाल में धीरे-धीरे ठोक कर गाड़ते हैं चिड़ियों की मिट्टी की मूर्तियाँ गिरकर टूट जाती हैं। निराला खूँटी ठोकना बंद कर देते हैं। दीर्घ निश्वास लेकर मूर्तियां के टुकड़े उठाते हैं।)
निराला- अब तुम्हीं कैसे साबुत रह सकती हो?....मानस मराली गई......प्रतिकृति भी नहीं रही......अब यह घर -घर न रहा....मेरा भी ठिकाना क्या?...कहाँ रहूँ?.....क्या करूँ?. ....
(मूर्ति का टुकड़ा हाथ से छोड़ देते हैं। ज़मीन पर गिरकर उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।)
जाओ।.....तुम सब जाओ....।(आकर तख्ते पर उढँग जाते हैं।)
मैंने भी तो एक बार घर छोड़कर संन्यास लेने का प्रयास किया था ........ लेकिन उस समय लौट आया था.....पर अब अन्तर ही क्या रहा......लखनऊ हो या कर्वी.....गढाकोला हो या प्रयाग.....अन्दर या बाहर।
(झपकी आ जाती है, चेहरे पर आशा-निराशा के चित्र उभरते हैं....एक क्षण अन्धेरा । पुनः प्रकाश होने पर मनोहरा चिड़िया के टूटे हुए टुकड़े उठाती है, निराला तख्ते पर बैठे हुए कुछ लिख रहे हैं मनोहरा को देखते ही क्रुद्ध हो जाते हैं।)
निराला- मेरे सामने से हट जाओ....
(मनोहरा अपना काम करती रहती है।) हट जाओ......।
मनोहरा- मैं तुमसे बात करने आई हूँ।
निराला- मुझे बात नहीं करनी है(दृश्टि दूसरी ओर कर लेते हैं।)
मनोहरा- पर मुझे तो करनी है...क्या मेरे यहाँ आने के लिए इतना पर्याप्त नहीं.....बोलो....नहीं बोलोगे?....क्या सचमुच नहीं बोलोगे?.......कितना कश्ट उठाकर आई हूँ।
निराला- और मैं जैसे फूलों की सेज पर सोता रहा हूँ।
मनोहरा- तुम भी कश्ट उठाते रहे......किन्तु.....
निराला- तुम्हारी मौत पर लगा था सब कुछ लुट गया है मेरा.... श्मशान जैसे मेरा घर हो गया हो......भयानक अन्धेरे में ष्मशान की साँय-साँय जैसे मेरी धड़कन हो......।
मनोहरा-अपार्थिव होकर भी जैसे वह सब देखती रही.....सुनती रही. .....कितनी विवश थी मैं......।
निराला- मेरी ज़िन्दगी एक बियाबान रेगिस्तान बन गई जिसमें चारो ओर मुझे अपनी ही आवाज़ें कसकतीं दिखाई देती हैं......एक ऐसा रेगिस्तान जिसमें कहीं स्नेह जल के एक कण का भी अस्तित्व नहीं.....नियतिचक्रों के घरौंदे जहाँ प्रतिपल अपनी परिधि छापते रहते हैं और व्यक्ति मार्गहीन हो उन्ही चक्रों के चरित्र का उपादान बन जाता है.....कभी सोचा भी न था निराला एक उपादान मात्र रह जाएगा.....अपनी सामर्थ्य को छीजते देखना.....केवल देखना और कुछ कर न पाना....।
जीवन का यह गहन अन्धवन जिसमें तुमने भी साथ छोड़ दिया....तुम पार्थिव षरीर से जा सकती थी मेरे मानस से निकल पाना सम्भव न था। तुम मेरी भावभूमि से जा कैसे सकती थी?
मनोहरा- क्या इसे भी बताने की आवश्यकता है? तुम अपने को दहते रहे और मैं झुलसती गई.....तुम लिखते रहे और मैं बाँचती रही....तुम जीवन और जगत की लकीर मेटते रहे और मैं सोचती रही कि मैं भी सार्थक हो रही हूँ। मेरा वह क्षणिक जीवन अर्थहीन नहीं था। उसने कुछ खोया तो बहुत कुछ पाया भी । तुम आगे बढ़ते रहे......अप्रत्यक्ष ही सही मैं मंगल कलश लिए तुम्हारा स्वागत करती रही.....सोचती...और वहीं पहुँच जाती जहाँ तुम जीवन के अर्थ खोज रहे होते..... कामना करती तुम्हारा मार्ग प्रशस्त हो....मार्ग के अवरोधों को हटाती....रोती और फिर गुनगुनाती....सोचती काश! तुम इसे भी देखते....कहती इस गहन अन्धकारा में भी तुम अकेले नहीं हो.....मैं हूँ और तुम्हारे साथ हूँ....तुम्हारे पग तो ब्रह्मा की लकीर मिटा देते हैं यह तो क्षुद्र अन्धकारा है......बढ़ो आगे बढ़ो.....उशा तुम्हारे स्वागत के लिए प्रस्तुत है, मैं स्चयं उशा बन तुम्हारे सामने खड़ी होती.....क्या तुम सोचते हो कि तुम अकेले हो......?
निराला- सोच लेता था किन्तु अब नहीं.....।
मनोहरा- फिर इस तरह अपने को पीड़ित क्यों करते हो?....‘वह रहा एक मन और राम का जो न थका’ यह क्या तुम्हारे मन की थकान नहीं है। तुम्हीं ने दुहराया था.....‘जागो फिर एक बार ’ और अब अपने को तोड़कर किसको जगाओगे? तुम्हें इस तरह देखना क्या मुझे अच्छा लगता है?......तुम अपने को मुझसे अलग समझते रहे....सोचते रहे कि मैं........।
निराला- यह क्या कह रही हो?......मेरे मानस ने तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य की पूजा नहीं की......‘विजन वन वल्लरी पर सोने वाली जुही की कली’ से ‘वह तोड़ती पत्थर’ तक किसकी यात्रा है।‘सखि वसन्त आया’ का आह्नान करने वाली क्या तुम नहीं हो? ‘बेला’‘अर्चना’‘गीत गुंज’और सान्ध्य काकलीं’ में किसकी अनुभूतियाँ चित्रित हैं? मेरे काव्य का वसन्त किसका वसन्त है?....साहित्य में मैंने जब भी नारी को प्रेयसी, पत्नी, माँ के रूप में देखा, केवल तुम्हें देखा और तुम्हें ही फिर-फिर चित्रित किया।
जहाँ नारी की पीड़ा देखी ....तुम्हारी पीड़ा देखी..और वह मानव की षाश्वत पीड़ा बन गई।
(मनोहरा सिसकियाँ लेने लगती है।) यह क्या कर रही हो?
मनोहरा-(बात काटकर कातर स्वर में) अब मत कहो....कुछ मत कहो?
निराला- कैसे न कहूँ....वर्शों बाद आज मैं तुम्हें पा सका हूँ.....हर आदमी चाहता है कोई उसकी वेदना को अनुभव करे...... प्यार करे.....कोई हो जिससे वह अपनी अनुभूतियों को बाँट सके....समझ सके और समझा सके।
मनोहरा- (सिसकियाँ लेते हुए) वह वेदना मैं अनुभव करती हूँ। अब उसे नहीं.....।
निराला- (बीच में) नहीं.....तुम्हें सुननी होगी....तुम नहीं सुनोगी तो और कौन सुनेगा ? बता सकती हो कोई और नाम जिसके सामने मैं अपनी पीड़ा खोलकर रख सकूँ?.....समाज में निराला कितना अकेला है यह षायद निराला जानता है और कोई नहीं....तुम्हारे अतिरिक्त और कौन उसकी पीड़ा को समझेगा? सभी उपहास करेंगे....भाग्य रेख मिटाने वाले निराला के हृदय की दरार देखो।.....यह नहीं सुन सकूँगा..... क्या तुम भी.......?
मनोहरा- (थोड़ा षान्त होती हुई) तुमने क्या नहीं सहा? अकेलेपन की वेदना ..... । जीवन की कटुता , बेघर का अवसाद ...... और आशा की कली वह सरोज भी........
निराला- उसकी बात मत करो.....मत करो.....तुम्हारी वह धरोहर भी मुझसे छिन गई। मैं इतना असहाय हो गया था कि उसे बचा नहीं सका ...... प्रकाशक जो मेरे ही हाड़ - मांस का रस खींचते है केवल सिर खुजलाते रहे.....मैंने उनसे कितना कहा....मेरा हिसाब कर दो....हिसाब न हो सके तो अग्रिम ही दे दो.....स्वयं गया डाँ0.शर्मा को भेजा....वैधानिक कार्यवाही की धमकी दी......लेकिन उनके कान पर जूँ क्यों रेंगती ? मैंने चवन्नी पृश्ठ पर काम किया था क्या इसीलिए ? .....मेरी सरोज तड़पती रही....कहती रही ‘काका क्षमा करना..... काका’ और मेरी असहाय आँखें केवल उसकी मौत देख सकती थीं ...मैं सब को क्षमा कर सकता हूँ किन्तु क्या अपने को भी क्षमा कर सकता हूँ? यह कलम की साधना का कर्म.....सरोज की वेदना मैं सह गया.....पत्थर हो गया....मात्र शिलाखण्ड. ....काश! सरोज के स्थान पर मेरी मौत हुई होती....तुम्हें देखकर मेरे हृदय में भी धड़कन पैदा हुई अभी तक तो यह मात्र एक यंत्र था और तुम कहती हो कि.......
मनोहरी- अब न कहो मेरा मन....।
निराला- तो तुम भी सुनना नहीं चाहतीं....सोचा था तुम आई हो कुछ अपनी कहूँगा कुछ तुम्हारी सुनूँगा।.....लेकिन तुम हो कि सुनना नहीं चाहती.........।
मनोहरा- तुम्हारा जीवन पारदर्शी रहा है, हर कोई उसे बाँच लेता है। क्या उसमें भी कुछ बताने की आवश्यकता है?
निराला- देखने की दृश्टि तो हर व्यक्ति की अलग होती है। क्या इससें अन्तर नहीं पड़ता ? और तुम क्या वही सब देखोगी जो और लोग देखते हैं?
मनोहरा- नहीं...नहीं...मेरी दृश्टि ने ही विवशकर आपके सामने ला खड़ा किया है।
निराला- और तुम हो कि मुझे सुनना नहीं चाहती । ठीक है निराला कुछ नहीं कहेगा.....उसे अपनी पीड़ा का उपहास नहीं कराना है।......हे अश्रुविन्दु! शिलाखण्ड बन जाओ। निराला का जो चित्र लोगां के हृदय में अंकित है उसे खंडित न करो। पी जाओ अपनी सारी पीड़ा......सम्पूर्ण कडुवे-मीठे अनुभव.... अपनी लेखनी रख दो......तुम्हारी लेखनी अब केवल पीड़ा लिख सकेगी जिसे कोई नहीं सुनेगा।.....कोई नहीं गुनेगा। तुम तो प्रस्तर को मात करते रहे अब प्रस्तर बन जाओ। विशपायी! गरल को अपने भीतर उतार लो। गई.... निराला की सारी पीड़ा गई.....कहीं कुछ नहीं हुआ है....सब कुछ वैसा ही है जैसा तुम देखना चाहती हो।
(मुद्रा बदल जाती है। चेहरे पर प्रसन्नता दौड़ जाती है।)
जलपान करोगी?
मनोहरा- (वेदनापूर्ण स्वर में)मैं कहती हूँ तुम मुझे भी समझो..... मुझसे....।
निराला- छोड़ो इन बातों को। ये.....
मनोहरा- मैं पूछती हूँ तुम ऐसे क्यों रहते हो? कुछ अपना ध्यान रखा करो।
निराला- निराला अब मात्र शिलाखण्ड है.....उसका ध्यान रखने की अब न उसे आवश्यकता है, न किसी और को.........।
मनोहरा- यह सब क्या कहते हो।
निराला- मैं कहता हूँ क्या अब भी बचा है कुछ? तुमने पार्थिव षरीर छोड़ा.....सरोज भी चली गई.....इस अन्धगह्नर में अकेला बच गया निराला और सामने ‘गहन है यह अन्धकारा।’ क्या अब भी कुछ बचा है?
मनोहरा- (सम्हलती हुई) तुम अपने को पाशाण बनाओगे?
निराला- बिल्कुल शिलाखण्ड.....
मनोहरा- शिलाखण्ड....बोलो बना सकोगे?
तुम्हें कवि मैंने बनाया था.....तुम्हारे अन्दर का गीतकार मैं हूँ.....हूँ न? बिना मेरी अनुमति के तुम पाशाण..बन सकोगे? पाशाण..हुँह.....शिलाखण्ड......कभी सोचा है मेरे जीवन की भी कोई साध थी.....मैंने भी कुछ चाहा था और उसी चाह ने तुम्हें सँवारा था....सरोज भी केवल तुम्हें बनाती रही..... उसने अपने को कभी नहीं चाहा....केवल तुम्हारी नींव का पत्थर बनी.....और अब जब तुम समर्थ हो.....अपने को सुखा दोगे?....तुम पत्थर बनोगे और मैं देखती रहूँगी? तुम्हारे सौ- सौ गुनाह माफ़ करके तुम्हें देवता बनाया था....क्या इसलिए कि तुम हम सब के जीवन पर प्रश्न चिह्न लगा दो?यह जीवन क्या केवल तुम्हारा है?केवल तुम्हारा?....हम सबका कुछ नहीं?....मैं तुम्हें पाशाण नहीं इन्सान बनाने आई हूँ.....बोलो?....
(निराला मौन रहते हैं)
बोलो?....बोलो....बोलते क्यों नहीं?
निराला- गुरू की आज्ञा.....सिर माथे....इन्सान बनकर ही जीवित रहेगा निराला। जानती हो इन्सानियत के लिए कितना बड़ा मूल्य देना होगा?
मनोहरा- अच्छी तरह जानती हूँ....धरती की करुण चीत्कार सामर्थ्य की याचना करती है....आगे बढ़ो.......
निराला- अब मैं कुछ नहीं कहूँगी। जब जब मैं अशान्त होता रहा तुम कविता सुनाती रही। मैं लिखता रहा, मेरे मानस में बैठकर तुम गाती रही....आज फिर गा दो न.....मेरी वीणा के तार झंकृत हो उठें।मेरी अशान्ति काव्य की अनुभूतियों में खो जाय. .....।
मनोहरा- फिर वही पुरानी मचलन......गाऊँगी मैं तुम्हारा ही गीत.. ..
(सस्वर गाती है)
स्नेह निर्झर बह गया है
रेत ज्यों तन रह गया है।
आम की यह डाल जो सूखी दिखी
कह रही है-अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते, पंक्ति मैं हूँ वह लिखी
ु नहीं जिसका अर्थ,
जीवन दह गया है।
दिए हैं मैंने जगत को फूल-फल,
किया है, अपनी प्रभा से चकित चल,
पर अनश्वर था सकल पल्लवितपल
ठाठ जीवन का वही
जो ढह गया है।
अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
ष्याम तृण पर बैठने को निरुपमा,
बह रही है, हृदय पर केवल अमा,
मैं अलक्षित हूँ,
यही कवि कह गया है।
(गीत समाप्त होते ही मनोहरा का प्रस्थान)
(एक क्षण अन्धेरा। कुछ क्षण बाद तख्ते पर लेटे निराला पर प्रकाश पड़ता है।)
निराला- गुरूजी प्रणाम.....(कोई उत्तर नहीं मिलता)....सिखा दोगी न?.....मनु सिखा दोगी न?(प्रकाश धीरे-धीरे तिरोहित होता है। निराला
‘गीत गाने दो मुझे तो
वेदना को रोकने को’.....गुनगुनाने लगते हैं।)
(अन्धेरा)