गीत गाने दो मुझे - 2 Dr. Suryapal Singh द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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गीत गाने दो मुझे - 2

अंक- 2
 (दृश्य वही। दीवाल पर बने चित्र धूमिल पड़ गये हैं। दरवाजे के दाँई ओर सारस के एक जोड़े का चित्र बना है। तख्ता थोड़ा बाईं ओर हटा हुआ है। उस पर कोई बिस्तर नहीं है। नट-नटी का बातें करते हुए प्रवेश।)
नटी- वाने ना करी
 बेटा बेटी एक
 उन्हीं को मत्था टेक
 वाने ना करी।
नट- वाने ना करी
नटी- हाँ, हाँ वाने ना करी।
नट- वह तो सिर्फ बाइस का था!
नटी- वह केवल उन्नीस की थी!
नट- वह गया था बंगाल।
नटी- वह रहती मैके या ससुराल।
नट- इतनी नाजुक उम्र में प्रिया परलोक गई!
नटी- मंत्र ऐसा कौन दे गई?
नट- जिससे निराला रात-रात ष्मशान का चक्कर लगाता
नटी- दूसरे विवाह के लिए दबाव पर दबाव,
नटी- लेकिन निराला ने ना करी, तो फिर ना करी।
नट- वाने ना करी।
नटी- न हूँ करी, न हाँ करी, सीधे-सीधे ना करी।
नट- ना करी.....ना करी......?
नटी- ना करी......ना करी.....ना करी.....।
 ऐसी नाजुक उम्र में ना करी......।
नट- एक पण्डित ने कहा-तुम्हारा दो विवाह लिखा।
नटी- वाने फिर क्या कहा ?
नट- ‘मेट दूँगा ब्रह्मा की लकीर मैं निराला हूँ।’
नटी- ‘मैं निराला हूँ’!
नट- इधर वह कलम से आड़ी-बेड़ी लकीरें खीचता रहा, कुछ छपता. ...
नटी- कुछ सखेद लौटता रहा।
नट- वह रोजी-रोटी की तलाश में भटकता रहा।
नटी- कभी बंगाल, कभी लखनऊ, कभी गढ़ाकोला रहा।
नट- बेटी सरोज बढ़ती गई।
नटी- कली खिलती गई।
नट- तेरह की उम्र में कर दिया उसका भी व्याह।
 न हो हल्ला ,
नटी- न पूछ-पुछल्ला,
नट- चुने गिने प्रिय आए अति उत्साह।
नटी- ढोल मँजीरा बाजा।
नट- न कोई धूम धड़ाका।
नटी- न कोई रिश्ता-नाता।
नट- हाँ-हाँ न कोई रिश्ता-नाता,
 महीना सावन का!
नटी- अरे मोती इधर आ रहा है.....चल यहाँ से।
नट- चल।
 (दोंनो जाते हैं। मोती आता है। मस्सों के कारण मोती का चेहरा थोड़ा कुरूप लगता है।टखने तक धोती एवं कुर्ता पहने है। आते ही कुर्ते की बाँह समेटता है। हाथ की पिण्डलियों पर एक दृश्टि डालता है। दो-चार दण्ड बैठक लगाता है। कुर्तें की बाँह पुनःसमेटता है। भुजाओं की पिण्डलियों पर दृश्टि डालकर पुनःदण्ड - बैठक लगाता है। दीनू खुरपा डलिया लिए 
 आता है। उम्र तीस के आस-पास । मोती नाक से बोलता है।)
दीनू- अरे बड़े भैया ई का कर रहे हो ?
मोती- (अपने ही गाल पर थप्पड़ लगाकर) अपना भाग्य सेंक रहा हूँ।
दीनू- (निकट आकर) अपुनै से नाराजी?
मोती- (रहस्यपूर्ण मुद्रा में) तुमसे क्या छिपाना दीनू....अपनी भी लालसा रही कि सिर पर मौर बँधै....।
दीनू- बड़े भैया.....लालसा तो सोरह आना जायज है लेकिन वहिके लिए यह कसरत?
मोती- दीनू क्या तुम नहीं जानते काका के दोहा बियाहु की खातिर पण्डित लोगों ने आकाश-पाताल एक कर दिया? अपने मूढ़ मन ने हिसाब लगाया कि षायद काका की पहलवानी देखकर लोग आखुर खाँद रहे हैं।......
 यही सोचकर एकान्त देख दो-चार दण्ड बैठक लगा लेता हूँ।
दीनू- खूब सोचा मोती भैया........लेकिन काका के नेम कानून सब अलग हैं।
मोती- हमको भी कुछ कम न समझो दीनू।
 हमने ब्रह्मा से पूरी दुश्मनी ठान ली है। अब तुम्हीं बताओ हमारा ही चेहरा मिला था उन्हें रामायन-महाभारत लिखने के लिए....अब अपना चेहरा हम कहाँ छिपाएँ? चेहरा देखते ही लोग राम-राम कहने लगते हैं......
 (परामर्श की मुद्रा में) एक पहुँचे पण्डित कह रहे थे कि चेहरा ठीक हो सकता है.......क्या सही में?
दीनू- मोती भैया हमें तो कुछ पता नहीं......लेकिन आज के ज़माने में कुछ कहा नहीं जाय सकत.....
मोती- पता लगाना। कोई जुगुत बने तो एक आध बीघा खेत ही...
 (कुर्तें की बांह समेटता चला जाता है।)
दीनू- इस दुनिया की रीति अजब है.....काका और मोती भैया यहि गाँव के दो छोर हैं...काका बरदेखुआ देखतै भड़क जात हैं और एक मोती भैया हैं जिनका मालपुआ खाय कोई पहुँचतै नहीं....लड़का ब्याहने के लिए सत्तू चबेना......
 (मोती लौट आता है। कुर्तें की बाँह समेटकर हाथ की मांस पेशियाँ देखने की आदत में कोई अन्तर नहीं पड़ा है।)
मोती- दीनू-भाई....आज षंकर जी का दिन है न (दीनू के कंधे पर हाथ रखकर) तुम्हारा अन्तर तो भगवान भी नहीं पा सके... कुछ बताओगे न ?
 (दीनू नाक दबाकर प्राणयाम करता है। जमीन पर उंगली से चौखटे खींचता है। गणना करता है। मोती सम्पूर्ण क्रिया कलाप को उत्सुकतापूर्वक देखता है।)
दीनू- मोती भैया अभी चले जाओ.....
मोती- कहाँ?
दीनू- दुई कोस उत्तर.....एक कोस पूरब उहाँ से पचास गज दक्खिन....देवीजी का मन्दिर है न.....काम पूरा होई।
मोती- जुगाड़ बैठे, तो मोती सरग तरोई लै आवे
दीनू- बैठी.....जरूर बैठी
मोती- (आश्चर्य से) बैठी?
दीनू- हाँ, हाँ बैठी।
मोती- (खुशी से नाच उठता है)
 मोतिउ कै भगिया दमादम दमकी,
 घरमा बहुरिया छमाछम छमकी,
 बरसी रस कै धार हो।
 (दीनू निकल जाता है। मोती भावुकता में बह जाता है। फिर याद करने लगता है।)
 दो कोस उत्तर.....एक कोस.....नहीं, नहीं दो कोस.....हाँ दो कोस उत्तर....एक कोस पूरब.....पचास गज दक्खिन
 बरसी रस कै धार हो।
  (सरोज घर से निकलती है)
सरोज- मोती हैं....और किसके यहाँ सबेरे-सबेरे रसधार बरसेगी?
 (एक ओर मोती जाता है, दूसरी ओर से पण्डित का प्रवेश। अधेड़ अवस्था, धोती कुर्ता पहने तथा हाथ में छड़ी लिए हैं।)
पंडित- सरोज....बेटी सरोज?
सरोज- ताऊ जी....आज सबेरे ही?
पंडित- हाँ तेरी खोज खबर लेने चला आया।
सरोज- ताऊ जी, मैं खोने वाली चीज नहीं हूँ।
पंडित- जानता हूँ.....तेरे पिता से कहता हूँ अपनी ज़मीन देखो लेकिन....
सरोज- उन्हें बहुत काम रहता है ताऊ जी।
पंडित- लोग कहते हैं कि वे कहीं टिक नहीं पाते।
सरोज- तो इसमे क्या हुआ?
पंडित- तुम भी कश्ट उठाती हो।
 कैसा कश्ट ताऊ जी, हम तो बहुत खुश रहते हैं।
पंडित- जानता हूँ.....हर्श और विशाद छिप नहीं पाता। तुम्हारे पिता जी की चिट्ठी आई है कि बेटी को रूपये पैसे की आवश्यकता हो तो....
सरोज- नहीं ताऊ जी.....अभी तो काम चल रहा है, ताऊ जी आसनी ले आऊँ?
 (अन्दर चली जाती है। पंडित दीवाल पर बने सारस के जोड़े को देखता है। हाथ से छूता है और भावुक हो उठता है।)
पंडित- अब जोड़ा कहाँ रहा? अकेला सारस मँडरा रहा है....पंडित भी इस घर से जुड़ गया है....सरोज के पिता जैसा अगाध विश्वास कोई दे सका है?
 (सरोज आसनी लेकर तख्ते पर बिछाती है।)
सरोज- ताऊ जी आप बैठ जाँय।
पंडित- नहीं बेटी.....जरा जल्दी में हूँ। कभी-कभी खुश होता हूँ कि तुम्हारे पिता का नाम अखबारों में छपता है। सभाओं में उनकी आवाज़ पर तालियाँ पिटती हैं। पर जब यह देखता हूँ कि रामसहाय तिवारी का घर बिखर रहा है तो.......
सरोज- ताऊ जी आप क्यों सोच में पड़ते हैं?....हमें तो तनिक भी तकलीफ नहीं होती। जब किसी को काका का कोई गीत गुनगुनाते सुनती हूँ तो लगता है मुझे दुनिया की सम्पत्ति मिल गई है। कोई सुख बाहर से पाता है कोई अन्दर से।
पंडित- ठीक ही तो है बेटी। वैभव और सम्पत्ति के पीछे तो साधारण लोग भागते हैं। अच्छा, मैं चलता हूँ...यदि कोई आवश्यकता हुई...यह चिट्ठी ले लो।
 (जाता है सरोज के चेहरे पर प्रसन्नता का भाव उभरता है।)
सरोज- काका आज मैं कितनी खुश हूँ? तुम मुझे कितना प्यार करते हो? इतना प्यार क्या मैं......
 लेकिन इस बार आओगे तो मैं तुमसे लड़ँगी झगडूँगी। कहूँगी काका तुम मुझे इतना नादान क्यों समझते हो?.....तुम्हारी कविता से लोग प्रेरणा लेते हैं और मुझे आप इतना अबोध समझते हैं कि मैं सम्पत्ति के पीछे-पीछे दौडूँगी। ?
 नहीं काका तुम दुनिया समझते हो, मुझे भी तो समझो।
 तुम्हारा फड़ककर कविता पाठ करना और मुझे माँ की तरह सिखाना.....है कोई लड़की जो पिता से इतना प्यार पा सके? मुझे सुख नहीं चाहिए.....सम्पत्ति नहीं चाहिए.....चाहिए तुम्हारा स्नेह....
 मैं इतनी कमजोर नहीं हूँ काका....चिट्ठियों में मेरे सुख की ही चर्चा क्यों करते रहते हो?......क्या मैं इतनी अभागी हूँ मंदबुद्धि हूँ कि काका के रास्ते का रोड़ा बन जाऊँ?......नहीं यह मुझसे न होगा.......
 मेरी ये हड्डियाँ भी यदि काका के काम आ जायँ तो कितनी खुश हो जाऊँगी मैं?
 काका......सोचती हूँ कि तुम मेरी भावना को समझते हो लेकिन माँ जैसा प्यार तुमसे वह सब लिखवा लेता है जो चिट्ठियों में लिख देते हो।
 (दीनू घबड़ाया हुआ आता है।)
 कहो दीनू कैसे हो?
दीनू- का कही सरोज.....हमार पीठ देख लो। लागत है अब यहि गाँव मा न रह पाइब।
 (सरोज पीठ देखकर हैरान हो उठती है।)
सरोज- तुम्हारी पीठ पर ये डंडे के निशान (सिहर उठती है) हे भगवान!
दीनू- भगवानौ आँख मूँढ़ि लिहे हैं, वे हैं तो उन्हैं हमार पीठ काहे नाहीं देखात ; न खाना न कपड़ा चौबीसों घण्टा काम और ऊपर से यह मार.....काका नहीं आए न, केहिका सुनाई ई कथा? के सुनत है?
सरोज- पंचायत?
दीनू- (बीच ही में बोलकर) पंचायत तो बड़कन की मुहँदेखी करत है।
सरोज- तो तुम्हीं बताओ दीनू भैया मैं क्या कर सकती हूँ?
 (यमुना लाठी लिए प्रवेश करता है। उसे देखते ही दीनू भग जाता है।)
यमुना- (लाठी के एक सिरे को ज़मीन मे पटककर)
 हम बताते हैं....कडुवा तेल और हल्दी की मालिश, यही न? कितना चढ़ा लिया है तुम लोगों ने इन्हें? अब तुम्ही बताओ हल का मुठिया क्या हम लोग थाम्हेंगे? अब पता चलेगा कचूमर निकाल दिया है। काका होते तो उनसे रगड्डौ करता। यह दीनू है पंचायत में कहता है मजदूरी एक आना नहीं डेढ़ आना.. ..चले हैं डेढ़ आना मजदूरी लेने? तुम्हें पीठ दिखा रहा था न?....
 (सरोज ठगी सी खड़ी रहती है।)
 तिवारी का खानदान इन्हीं लोगों की तेल मालिश करेगा न? चाहते हैं कि हम लोग भी कंगाल हो जाएँ। खुद तो खेती सम्हलती नहीं, हमारे भी काम में अड़ंगा डालते हैं........
 खेती हम (लाठी की ओर संकेत कर) इसके बल पर करते हैं। बकरी की तरह मिमियाने से कौन खेती कर सका है?.....वह तो कहो भग गया नहीं तो.......(पंडित लौटकर आ जाता है।)
पंडित- क्यों भाई? तुम्हारी नाक क्यों दण्ड बैठक कर रही है? बेचारी सरोज के दरबाजे पर नौटंकी करते हो? क्यों बेटी क्या कह रहा था यह?
 (सरोज के मुख से आवाज़ नहीं निकलती है।)
 यह जहाँ भी जाता है कोई न कोई बखेड़ा खड़ा कर देता है।
 .......चलो तो यहाँ से....चिलम चढ़ाओ और सुलफा खीचों 
 । (यमुना पंडित को क्रोधपूर्ण ह्श्टि से देखता हुआ निकल जाता है।)
 कैसे-कैसे जानवर हैं इस गाँव में?
 क्यों बेटी सरोज? तुम्हें परेशान तो नहीं कर रहा था?
सरोज- नहीं ताऊ जी, जहां आप लोग हैं वहां परेशानी कैसी? लेकिन इन लोगों को दूसरों की परेशानी दिखाई क्यों नहीं पड़ती ?
पंडित- दिखाई पड़ती है बेटी.....लेकिन बिना मेहनत के खाने का जब चस्का लग जाता है, जल्दी छूटता नहीं।
सरोज- कैसे छूटेगा यह सब?
पंडित- लोग कहते हैं ‘सुराज’ आयेगा तब सब ठीक हो जायेगा।
सरोज- सुना मैंने भी है लोगों को ऐसा कहते......
 लेकिन क्या आदमी बदल जायगा?
पंडित- कौन जाने बेटी? आज तो सब लोग यही सोचते हैं।
 (दीनू घबड़ाया हुआ आता है।)
दीनू- सरकार, हमारे भाई को फिर मार रहे हैं।
पंडित- यह यमुना पागल हो गया है क्या?
दीनू- पागल नहीं समरथ हैं सरकार।
 (पंडित और दीनू जल्दी से जाते हैं। सरोज एक क्षण         
 निस्तब्ध खड़ी रहती है।)
सरोज- यह मेरा गाँव है......काका का गाँव है.....यमुना का गाँव है......लेकिन इस दीनू का भी तो है......
 पर सब के लिए इस गाँव की ममता का अर्थ अलग-अलग है।
 (निराला प्रवेश करते हैं एक हाथ में छड़ी दूसरे में एक छोटा झोला। दाढ़ी और बाल बढ़े हुए। चेहरा संघर्शशीलता का परिचायक । निराला को देखते ही सरोज खुशी से चीख पड़ती है।) काका!
निराला- (प्रसत्र मुद्रा में) मेरी चिट्ठी मिल गई थी न।
सरोज- हाँ......
निराला- सरोज.....।
सरोज- काका....मुझे इतना नादान क्यों समझते हो?
निराला- कौन कहता है?
सरोज- आपकी चिट्ठी.....। 
निराला- (मुस्कराते हुए) मेरी चिट्ठी। क्या वह भी कुछ कहती है?
सरोज- और नहीं क्या? अपने लिए तो तनिक भी चिन्ता नहीं करते और हमारे लिए.....।
निराला- बेटी मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं कर सका।
सरोज- काका, यह सब क्या कहते हो? अरे.....हाँ......
 (सरोज दौड़कर घर के अन्दर जाती है। निराला उठकर चहलकदमी करते हैं। सरोज एक कटोरी में बताशा और गिलास में पानी लाती है। निराला गिलास ले लेते हैं। एक बताशा मुँह में डालकर पानी पीते हैं। गिलास सरोज ले लेती है।)
निराला- यह झोला रख लो....।
 (सरोज झोला लेकर अन्दर चली जाती है। दीनू आ जाता है। ‘काका’ कहकर पैर पकड़ लेता है। निराला उसका हाथ पकड़कर उठाते हैं।)
 दीनू.......
दीनू- काका......।
 (दीनू निराला का मुँह देखता रहता है।)
निराला- मैं सुन चुका हूँ.....तुम्हारी पीठ हमारी पीठ में अन्तर ही क्या है? लेकिन देश बदल रहा है दीनू......आज़ादी मिलेगी. ....। 
दीनू- वहिमा हमहूँ का कुछ मिली काका?
निराला- जरूर मिलेगा?
दीनू- काका ऐसा कुछ करो कि हमहूँ का कुछ मिले।
निराला- करूँगा, जरूर करूँगा दीनू।
 (सरोज दीनू को पुकार कर अन्दर बुला लेती है। निराला का स्वर बदलने लगता है।)
 करूँगा.....जरूर करूँगा। लेकिन मैं स्वयं देख कुछ और ही रहा हूँ। स्वराज्य की लड़ाई में भी तो कहीं सत्ता की भूख पनप चुकी है।
 (एक क्षण चहलकदमी करते हुए।)
 राजनीति में ही क्यों? साहित्य में भी क्या उखाड़-पछाड़ की राजनीति नहीं चलती। इस पूरे देश में दीनू कहाँ है? उसकी सिसकियाँ भी कोई सुनता है यहाँ?
 (एक क्षण चुप रहते हैं।)
 कौन किसकी सुनता है यहाँ? सभी केवल अपनी सुनते हैं.... .मेरी भी परीक्षा हो रही है। नौकरी छोड़कर कलम की 
 साधना प्रारम्भ की, लेकिन लोगों की आँखें जैसे मुझे निगल लेना चाहती हैं।.....मैं जैसे एक अजनबी आ गया हूँ...... और लोग कहते हैं कि उन्हें सता रहा हूँ.....आखिर क्या है मुझमें? ठीक है जो भी कहो।
 (स्वर तीखा हो जाता है।)
 लेकिन वीणावादिनि! मैं भी कच्ची गोलियाँ नही खेलता। मैं प्रिंस द्वारिकानाथ का नाती नहीं.....किसी लक्षपति का कुमार नहीं. .....क्या इसीलिए मुझे कलमजीवी होने का हक नहीं?
 (एक क्षण चुप रहते हैं।)
 मैं वह सारे दायरे तोड़ दूँगा जो तुम सब मेरे चारों ओर बना रहे हो।.....
 तुम चाहते हो निराला के गले में विक्षिप्त की माला पहना दी जाय...करो न, खूब करो, विक्षिप्त होने का प्रचार करो।
 एक कलम के मजदूर की मौत के लिए इससे अधिक तुम कर ही क्या सकते हो?
 ‘प्रसाद’ जी को ही तुम लोग सहन कहाँ कर पा रहे हो? यह सोच लो विक्षिप्त पैदा नहीं होते बनाये जाते हैं।......
 तुम्हारे चढ़ते उतरते रंग मुझे विक्षिप्त नहीं बना पायेंगे।
 मेरा अपने से बातें करना तुम्हें खलता है क्यों कि तुम अपनी आवाज़ नहीं सुन पाते....।
 कभी सोचा है आदमी अपने से बातें क्यों करता है? तुम तो केवल परिणाम देखते हो, तुम्हें कारण कहाँ दिखाई पड़ता है?
 (दीनू चुपचाप आकर खड़ा हो जाता है।)
 निराला को सन्निपातग्रस्त बताकर तुम कमा सकते है।..... कमाओ......खूब कमाओ......
 (स्वर धीमा होता जाता है। निराला छड़ी उठाकर बाग की ओर निकल जाते हैं। अन्दर से सरोज आ जाती है।)
सरोज- काका कहाँ गये दीनू?
दीनू- काका लागत है कुछ परेशान हैं......
 बगिया की ओर गए हैं।
सरोज- परेशान हैं?
दीनू- वे अपने से बात करत रहे.......अजीब अजीब बात....।
सरोज- कैसी बातें कुछ बताओ तो.....
दीनू- वे कहत रहे कमाओ......खूब कमाओ ओैर न जाने का.... का ?
सरोज- (घबड़ा जाती है) काका अपने से बातें करते हैं। क्यों?कैसे?हम उनसे पूछेंगे।
 काका से जरूर पूछेंगे.....
 काका ......काका......काका
 (पुकारती हुई बाग की ओर जाती है। पीछे-पीछे दीनू भी जाता है। दूसरी ओर से युगल गान करते हुए नट-नटी का प्रवेश।
नट-नटी-बिटिया भोली काका की उलझन क्या समझे?
 बिटिया का भोला संसार,
 काका की उलझनें अपार
 वह मुहँ बोली,काका की उलझन क्या समझे?
 काका सुखी रहें वह रटती,
 उनको बिटिया की धुन रहती,
 नव कलिका वह, काका की उलझन क्या समझे?
 उसको सुखी बनाते, आते,
 अपनी पीर छिपाते जाते,
 षुभ्र कमलिनी, काका की उलझन क्या समझे?
नट- पर एक दिन ऐसा हुआ।
नटी- क्या हुआ?
नट- पर एक दिन ऐसा हुआ,
 सुन्न बैठा था सुआ।
नटी- सुन्न बैठा था सुआ?
नट- हाँ, हाँ सुन्न बैठा था सुआ।
 रोशनी फिर यों ढली,
 उड़ गई उगती कली।
नटी- क्या? उड़ गई उगती कली?
नट- हाँ, हाँ उड़ गई उगती कली?
 बेटी को आता रहा बुखार,
 औ काका पैसे से लाचार।
 तड़प चाहे जितनी हो बड़ी,
 भला कैसे होता उपचार?
नटी- किन्तु बेटी तो कवि की थी?
नट- कहाँ लेकिन धनपति की थी?
नटी- बेटी तो गई, पर काका क्या हुआ?
नट- उनकी आँखों का खून जम गया।
 ज्वालामुखी धधक कर फूटता,
 मगर उसे एक रास्ता मिल गया।
 (प्रकाश नट-नटी से हटकर पद्भासन मुद्रा में बैठे निराला पर पड़ता है। चेहरा विशादयुक्त, सरोज - स्मृति की पंक्तियाँ उभरती हैं।)
 मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल, 
 युग वर्श बाद जब हुई विकल।
 दुःख ही जीवन की कथा रही 
 क्या कहूँ आज जो नहीं कहीं?
 (प्रकाश धीरे- धीरेतिरोहित हो जाता है।)