पण्डित सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ यह नाम उनका अपना दिया हुआ था। स्कूल का नाम सुर्ज कुमार घर पर भी चलता था या नहीं इसे कौन बताए? घर गढ़ाकोला उन्नाव में, पिता पंडित राम सहाय तिवारी। तिवारी एक दिन खुरपा लेकर घास छीलने निकले। खुरपे को खेत में गाड़कर बंगाल की राह पकड़ ली । महिषादल में सिपाही बने। आखिर गाँव में चार पैसा कैसे मिलता? कुछ कमाया, घर बनाया। बच्चे को पाला-पोसा , बड़ा किया। विवाह 1911 में मनोहरा से कर दिया जिसे संगीत-साहित्य में विशेष रुचि थी। साक्षात् अपोलो की तरह दिखने वाला बच्चा हाई स्कूल पास नहीं कर सका। पर अपोलो को भी
पेट की भूख सताती है। रोजी की तलाश में भटकना और कविताई की लीक पर इस तरह चलना कि लीक ही भरभरा जाय उसके लिए सहज हो गया। माँ के स्नेह से वंचित रहा ही, प्रिया भी 1918 में ही चल बसी । पर मनोहरा का अल्प सान्निध्य कितना कुछ दे गया? निराला ने श्मशान का चक्कर लगाया। अपार्थिव रूप में वह उनके सपनों में बस गई। दूसरे विवाह के लिए पंडितों के ही नहीं बल्कि ससुराल के दबाव को भी राम कृष्ण और सरोज का मुँह निहारते टाल गया।
पर क्या सरोज को भी वह बचा सका? 1935 के सावन में बिना किसी गाजे-बाजे के उसका विवाह श्री शिव शेखर द्विवेदी से किया। पर वह भी बहुत दिन जीवित कहाँ रह सकी? बीमार पड़ी और निराला उसकी सुमचित चिकित्सा नहीं करा सका जो महाकवि होने का स्वप्न देखता रहा । बेटी के जाते ही निराला का अन्तर्मन तड़प उठा -‘हो इसी कर्म पर वज्रपात’।
सामर्थ्य और संशय क संघर्ष में पलता यायावर कलम की मजदूरी करता हुआ अपने अस्तित्व को स्वीकार कराता गया। पर उसे सन्निपात ग्रस्त बताकर नकारने की कोशिश क्या कम हुई? वह झुका नहीं। उसका अन्तर्मन अन्तस्थ होकर मनोहरा के सामने ही अपने को खोल सकता था । बाहर भाग्य रेख मिटाने वाला निराला ही रहा-‘मैं
अकेला ।’ क्या यह अकेलापन हर प्रवर्तक को भोगना पड़ता है?
निराला आखिर राम सहाय तिवारी , एक साधारण सिपाही का बेटा था। उसे स्वीकित मिलने में अनेक बाधाएँ। आजा़दी के पहले हो या उसके बाद, स्थितियाँ बहुत नहीं बदली हैं। यह नाटक 1977 में मंचित करने के लिए अल्प समय में ही लिखा गया था। मंचन हुआ- ‘कलम जीवी निराला’ के नाम से। उसके बाद मैं गढ़ाकोला गया।
निराला के भतीजे बिहारी लाल के बेटे लक्ष्मी नारायण तथा अर्जुन (निराला साहित्य का एकपात्र) से भेंट हुई। निराला सदन की आघारशिला देखी। कुछ परिवर्तन भी किया। कलमजीवी निराला के नाम से ही गोण्डा में विभित्र अवसरों पर चार बार इसका मंचन भी हुआ । योगेश, राकेश, कृष्णकान्त, चक्रधर, सुरेश, कृष्ण कुमार, गोपाल, चन्द्रशेखर, अजय, रवीन्द्र, चन्द्र प्रकाश अवस्थी , शुभा, पुष्पा, दीपू, मंजुला, वाटिका, ललिता, रंजना, प्रणीता सभी ने मनोयोग पूर्वक मंचन में भाग लिया। यद्यपि सभी जीवन यात्रा के विभित्र मोड़ां पर अग्रसर हैं पर मैं सब को शुभकामना के अतिरिक्त और दे ही क्या सकता हूँ?
ज्यों ज्यों नाटक पर मनन करता गया ‘अर्चना’ की ये पंक्तियाँ मन में उभरने लगींः
गीत गाने दो मुझे तो
वेदना को रोकने को।
चोट खाकर राह चलते
होश के भी होश छूटे
हाथ जो पाथेय थे, ठग
ठाकुरों ने रात लूटे़
बुझ गई है लौ पृथा की
जल उठो फिर सींचने को।
इसीलिए नाम ‘गीत गाने दो मुझे’।
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अंक एक
(नट एक ओर से प्रवेश करता है। मंच पर एक दृष्टि डालकर वन्दना प्रारंभ करता है।
नट- सिद्धि श्री गजवदन विनायक
पुरवहु काज गणन के नायक
आ जाओ .... आओ भाई ........नाटक शुरू करें .....
(पुनः प्रारम्भ करता है)
सिद्धि श्री गजवदन विनायक
आ जाओ भाई..... यहाँ दर्शक बन्धु प्रतीक्षा कर रहे हैं , कितने सुसंस्कृत लोग पधारे है.... ऐसा मौका बार - बार कहाँ मिलता है?......... जब दर्शक् सभ्य हों....... सुसंस्कृत हों....... कला की परख करना जानते हों तो
नटी- (प्रवेश कर) शुरू कर दिया चापलूसी न ....... माना कि दर्शक प्रबुद्ध हैं लेकिन उनके अन्दर भी एक धुकधुकाता हृदय है... .....प्रतीक्षा वे न करेंगे तो कौन करेगा ......... प्रतीक्षा में लोग ज़िन्दगी काट देते है, यहाँ तो........
नट- आते ही लन्तरानी .... (दर्शकों से) क्षमा कीजिएगा ... ...नाटक करना कितना मुष्किल हो गया है? ...... जो भी मंच पर एक बार उतर जाता है उसका नक्शा ही नहीं मिलता. .......
नटी- चुप भी रहोगे या........
नट- यह देखिए ........ हमें यहाँ नाटक करना है और यह कह रही है ......... चुप भी रहोगे? अब आप ही बताएँ?..... हम चुप रहें? कैसा ज़माना आ गया है? ........ सही बात कहने वाले को लोग कहते हैं चुप रहो ..........
नटी- आखिर नाटक भी शुरू करोगे या.......
नट- फिर यहाँ आये किस लिए हैं? और हमारे प्रबुद्ध दर्शक....
नटी- हाँ ....... हाँ ......... ये प्रबुद्ध दर्शक ........(भाव नृत्य करते हुए गायन)
फनकार होंगे तो फन देखेंगे।
धरती पै बैठे गगन देखेंगे।
तन देखेंगे और मन देखेंगे।
दर्शक हुए तो मगन देखेंगे।
नट- बहुत खूब ........ जल्दी शुरू करो .........
सिद्ध श्री गजवदन ............
नटी- फिर वही पिटी पिटाई लकीर ......... अरे दर्शक प्रबुद्ध हैं ......... नए ज़माने के हैं........
नट- तो ?
नटी- तो क्या ?
नट- वन्दना भी नहीं करेंगे ?
नटी- तुम्हारी घिसी - पिटी वन्दना में ........
नट- उन्हें रस नहीं मिलेगा ?
नटी- वे आए हैं कुछ सोचने , कुछ समझने , कुछ देखने .......
नट- राम राम ......... सोचना, समझना और देखना सब एक ही जगह .........
नटी- तो क्या तू सोचता है सोचेंगे कहीं अलग ....... समझेंगे कहीं अलग और देखेंगे कहीं अलग ..........
नट- और नहीं क्या ? सोचने में सिर खुजलाना पड़ता है। आँखें धीरे- धीरे बन्द करनी पड़ती हैं और देखने में तो ..........
नटी- तू फिर दर्शकों के चक्कर में पड़ गया। मैं कहती हूँ तू अपना काम कर ......... दर्शक अपने लिए कोई जुगाड़ कर ही लेंगे । आखिर यह टेक्नेट्रानिक युग है कोई आदम हव्वा का ज़माना नहीं। और हाँ तुम्हारे दर्शक भी तो प्रबुद्ध हैं।
नट- तू भी रीति पकड़ रही है। भला आजकल कोई काम देखता है सभी..........
नटी- केवल लटके देखते हैं यही कहना चाहते हो न ?
नट- तुम्हारा पारा .........
नटी- सातवें आसमान पर रहता है, बस। तू ही कहता है कि दर्शक प्रबुद्ध हैं इन्हीं के सत्प्रयास से समाज बदलेगा , ये नया युग लायेंगे।
नट- बिल्कुल ठीक....... ये चाहते हैं नया युग आ जाए लेकिन उसके लिए चवन्नी भर भी मेहनत करने को तैयार नहीं...... नया युग आना है तो छप्पर फाड़कर आए। परिश्रम और सक्रियता से इनका कोई नाता नही।
नटी- तब तो नाटक मैं ‘ना’ करूँगी।
नट- क्यों?
नटी- ऐसे दर्शक के सामने नाटक करने से फायदा ?
नट- नफा - नुकसान देखना मेरा काम है।
नटी- तो नाटक भी तू ही कर।
नट- जानती नहीं कि मैं नट हूँ।
नटी- तू नहीं जानता कि मै नटी हूँ। (गायन करते हुए )
नाटक तू मुझसे करायेगा क्या, दर्शकों की यहाँ जब पकड़ ही नहीं।
बीन की नवसुरों से है क्या फायदा, ताल लय की यहाँ जब परख ही नहीं ।
नट- नहीं ....... नहीं ......... परख होगी। मै दर्शकों से प्रार्थना करूँगा .......... उन्हें तैयार करूँगा ......... वे सुनेंगे ....
गुनेंगे ......... हमारे दर्शक बड़े भोले हैं। मैं स्तुति करूँगा
(स्तुति करने लगता है )
जय दर्शक भगवान
सींग-पूँछ कुछ आज हिलाओ,
निर्बल की ताकत बन जाओ
जिससे जगे जहान। जय दर्शक ....... ।
नव विहान की दिशा टटोलो,
अधमूँदी आँखों को खोलो
तुम हनुमत बलवान। जय दर्शक।
देखा, दर्शकों के चेहरे खिल रहे हैं
नटी- ज़रूर ...... ज़रूर .........
नट- तो फिर जल्दी से शुरू करो
नटी- क्या षुरू करें ?
नट- अरे वही जिसमें एक मामूली राम सहाय का बेटा सुर्जकुमार चलते चलते ...........
नटी- चलते ......... चलते !
नट- अरे नहीं .......... समाज की भयावह शृंखलाओं को काटते - पाटते .......
नटी- परिधि - दर - परिधि लाँघता गया।
नट- कहानी कवि - कर्म की है,
नटी- यात्रा सामान्य जन की है।
नट- चलो चलें उन्हीं के गाँव ,
नटी- गढ़ाकोला की छाँव ।
(प्रकाश नट नटी से हटकर सुर्ज कुमार के घर के सामने दीवाल से लटकते छप्पर के ओसारे में पड़ता है। दीवाल में मुख्य द्वार के दोनों ओर ‘मइहर’ बना है।
दरवाजा खुला है। भीतर से युगल नारी स्वर में यह गीत गाया जा रहा है।)
कारे बदरा कजरारे बदरा।
मोर हियरा के उजियारे बदरा।
आयो मोरे अँगना,
कँगना के रंग मा,
बिजुरी नहाये उड़ि जायो।
देशवा के प्यारे , कारे-कारे बदरा।
कारे - बदरा , कजरारे बदरा।
जायो उन अँगना
पिउ के पिहकना
भरि-भरि लायो बरसायो।
धरती से न्यारे धुंधियारे बदरा।
कारे बदरा कजरारे बदरा।
(गीत की गुनगुनाहट और संगीत का स्वर धीमा होते ही युवक दीनू के साथ सुर्जकुमार प्रवेश करते हैं।)
सुर्ज. क्यों दीनू ताल अच्छी दे लेते हो ?
दीनू- काका , काकी के गौनई से मन फुदके लागत है।
सुर्ज. संगीत से तो पेड़-पौधे भी पनप जाते हैं हम तुम तो मनुष्य हैं
दीनू- हम तो जानवर हैं काका ........ पूरे हरहा
सुर्ज. जानवर तो पढ़े लिखों में भी होते हैं दीनू।
दीनू- काका.......पढ़ा-लिखा हरहा........
सुर्ज. केवल हरहा ही नहीं ....... सुरसुराते तिलचट्टे भी अपनी जमापूँजी ........
मनोहरा- (प्रवेश कर) यदि यह जानती कि मेरे गाने से तिलचट्टे पनपते हैं तो...
सुर्ज. केवल तिलचट्टे ही क्यों और भी बहुत कुछ .........
(नेपथ्य से दिनुआ की आवाज आती है। दीनू दौड़ जाता है। मनोहरा घर के अन्दर जाने लगती है।)
सुर्ज. सुनो तो........
मनोहरा- (लौटकर) कहो ?
सुर्ज. (मेघों की ओर संकेत कर) आज मेघों की छटा देखने लायक है......... (मेघ गर्जन) देखो कितने सुन्दर श्यामल मेघ घिर आए है.......... और तुम्हारा स्वर तो ..........
मनोहरा- आज प्रशंसा का व्रत है क्या ?
सुर्ज. (झुँझलाहट) तुम भी कुछ का कुछ समझ लेती हो।
मनोहरा- इसके लिए तुम क्या करोगे ? अर्थ करने के लिए तो हर आदमी स्वतंत्र है।
सुर्ज. मै कहाँ कहता हूँ........ नहीं है ? लेकिन........
मनोहरा- लेकिन तुम्हें अपनी बात कहने में कठिनाई होती है। षब्द खोजने से मिलते नहीं....... अभी कहोगे कि बादल तुम्हारा गीत सुनकर उमड़ पड़े हैं (निकट आकर) फिर कहोगे तुम्हारी आँखें हिरनी की आँखें लगती ओर फिर..........
सुर्ज- मैं यह सब नहीं कहने जा रहा हूँ ........ मैं तो केवल मेघों की छँटा दिखाना चाहता हूँ..........
मनोहरा- मेघ तो मैं स्वयं देख लूँगी ....... उसके लिए कोई ष्लोक तो पढ़ना नहीं है।
सुर्ज. जानती हो ष्लोक पढ़ना और बादलों की छटा निहारना दोनों में अन्तर है।
मनोहरा- जानती नहीं और जानना भी नहीं चाहती........
सुर्ज. बात ऐसी करती हो जैसे इस घर की दादी तुम्हीं हो.......
मनोहरा- अच्छी बात दादी ही सही......अब चलूँ घर का काम भी तो है..... मेघों की छटा निहारने से पेट नहीं भरेगा।
सुर्ज रुको तो......केवल यही एक काम नहीं है।
मनोहरा- काम तो बताइए।
सुर्ज- मै सोचता हूँ.......
मनोहरा- क्या ?
सुर्ज. यही कि आखिर ऐसा क्यों होता है ?
मनोहरा- क्या होता है?
सुर्ज- मेरे मन की उलझन नहीं मिटती।
मनोहरा- कैसी उलझन ?
सुर्ज. कभी-कभी इतना विचलित हो जाता हूँ कि........
मनोहरा- कुछ कारण भी बताओगे या..........
सुर्ज. कारण मैं स्वयं नहीं जानता........
मनोहरा- आखिर कुछ तो..........
सुर्ज. कोई मेरे अन्तर में बैठकर कुरेदता रहता है.... तुम समर्थ हो, सब कुछ कर सकते हो और वहीं एक दूसरा मन उपस्थित हो संशय का सूत्रपात करता है....... मैं बराबर सामर्थ्य और संशय के बीच झूलता रहता हूँ ।
मनोहरा- इसमे कोई नई बात नहीं..... गवहीं में भी तो यही संशय तुम्हें परेशान करता रहा।
सुर्ज. तुम्हीं बताओ - घर से निकाल दिया गया था ....... ससुराल में टिकना पड़ा । जब लोग खुसुर-फुसुर करते थे........ ‘दूबे का दामाद निठल्ला है, गवहीं क्या चार-छः महीने होती है’...... खून का घूँट पीकर रह जाता था।
मनोहरा- (मुस्कराती हुई) लोग ससुराल जाने के लिए मनौतियाँ करते हैं और आप हैं कि.......
सुर्ज. लेकिन ससुराल किसी की छट्ठी-बरही में पड़ जाय तो.....
मनोहरा- जीवन सहज हो जाता है.... पर सोच-सोच कर अपने को दुबला क्यों करते हो ? उतना ही सोचो जितना.....
सुर्ज. बिना सोचे हुए जीना मुश्किल है।
मनोहरा- अब तो तुम परदादा को भी मात कर रहे हो।
सुर्ज. जाने क्या है मुझमें...... मेरा मन मानता ही नहीं। मैं स्वप्न देखने लगा हूँ....... बिल्कुल दिवास्वप्न।
मनोहरा- यह सब क्या कहते हो...... स्वप्न , दिवास्वप्न ज़मीन भी तो देखते हो।
सुर्ज. हाँ......यह भी देखता हूँ कि पेट की भूख आदमी को आदमी नहीं रहने देती...... दीन और निर्धन की कोई नियति नहीं होती...... हर कोई उन्हें एक लात.......
मनोहरा- इसे मैं भी देखती हूँ किन्तु....
सुर्ज. यह ‘किन्तु’ ही तो मुझे बैठने नहीं देता.....स्कूली जीवन की किताबें मुझे बिल्कुल असंगत लगीं जैसे वे मेरे दिमाग को सुन्न कर रही हों.... यह समाज, इसकी रीतियाँ तो हमें जकड़ लेना चाहती हैं। एक असहाय इनमें छटपटा कर रह जाता है।
मनोहरा- आप की बात सच हो सकती है, पर रीतियों को तोड़ पाना क्या सरल है...... और तुम तो ष्यामल मेघों की बात कर रहे थे।(बादलों की ओर संकेत कर ) देखो ये मेघ हर रोज नया रूप धारण कर.......
सुर्ज. धरती की कोख में समा जायेंगे।
मनोहरा- तभी तो बजबजाई धरती से फसलों के अंकुर लहलहा उठेंगे।
सुर्ज. (मनोहरा के चेहरे पर दृष्टि टिकाकर )जानती हो ?.......
यहाँ धरती और आकाश में द्वन्द्व चल रहा है..... लोग यह नहीं सोचते कि आकाश के परिन्दे भी धरती की ही षरण लेते हैं।
मनोहरा- वे सोचें या न सोचें.....आकाश उन्हें षरण कैसे दे सकेगा
? ; यदि स्वयं नहीं उतरना चाहते हो धरती पर गिरेंगे ही...
सुर्ज. गिरना कितना कश्टकर होता है वह भी आकाश से , थके-हारे पक्षी की तरह। लोग असहायों को रौंदते हुए निकल जाते हैं उन्हें उनकी आह भी सुनाई नहीं पड़ती।
मनोहरा- पहले हम आप तो सुने.... फिर औरों की बात सोचेंगे।
सुर्ज. हमारे अन्तर में भी अन्धेरा है क्या ?
मनोहरा- अन्धेरे से छुट्टी किसे मिली है ?
सुर्ज. घने अन्धेरे में भी अपनी खोज तो करनी ही होगी। आज मन में बड़ी उलझन है। तुलसीदास जी का वह छन्द सुना दो।
मनोहरा- यह भी अच्छी बात है.......मन उलझे तो छन्द सुनाऊँ। फिर सुना दूँगी..... इस समय घर में काम है.....
सुर्ज. नहीं-नहीं इसी समय....आखिर मन को सुलझाना भी जरूरी है......(मनोहरा तख्ते पर एक किनारे बैठकर गाती है। )
श्रीराम चन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं।
नव कंजलोजन कंजमुख करकंज पद कंजारुणं।
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरं।
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं।
भजु दीन बन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्दकंद कोशलचन्द दशरथ नन्दनं।
सुर्ज. (मुस्कराकर हाथ जोड़ते हुए) गुरूजी प्रणाम । आज से मैं चेला बन गया। स्वर साधना सिखा दोगी न ?
मनोहरा- अवश्य....अवश्य......यदि आज्ञाकारी शिष्य मिले तो क्यों नहीं ?
सुर्ज. कोशिश करूँगा कि तुम्हारी परीक्षा पास कर सकूँ ।
मनोहरा- और मैं कोशिश करूँगी कि तुम्हें......
सुर्ज. फेल कर सकूँ। फेल होना तो मेरी कुंडली में लिख गया है...
.....लिख गया है न ?
मनोहरा- मैं नहीं जानती।
सुर्ज- लेकिन मैं जानता हूँ । इस समय तो हर नाच नाच सकता हूँ।
मनोहरा- तुम्हें नचाना क्या आसान काम है? बहुत कुशल मदारी चाहिए।
सुर्ज. उसका टोटा कहाँ है ? लेकिन मेरे साथ का मदारी एक घुड़की में स्वयं नाचने लगता है।
मनोहरा- हेकड़ी बैसवाड़े की नस-नस में है क्या?
सुर्ज. जिस दिन हेकड़ी खत्म हो जायेगी, बैसवाड़ा खत्म हो जायेगा।
मनोहरा- अच्छा हेकड़ी सम्राट! अब मैं चलती हूँ।
(जाने लगती है)
सुर्ज. अभी हम लोग श्यामल मेघ देख कहाँ पाये ?
मनोहरा- उसके लिए अभी बहुत समय है।
(मनोहरा घर के अन्दर चली जाती है। मेघों की गड़गड़ाहट।
प्रसन्न मुद्रा में दीनू तेजी से आता है।)
दीनू- काका!
सुर्ज. क्या है दीनू?
दीनू- बहुत मजा आवा!
सुर्ज- किसमें?
दीनू- षन्नो की मौसी है न.... उनके माथे भवानी
सुर्ज- भवानी......
दीनू- हाँ हाँ भवानी , लोग दौड़े.... लगे विनती करै लेकिन भवानी जिद्द पे उतर आईं..... वह तो कहो पंडित दादा दुइ डंडा जमाइन भवानी का नशा गायब। काका .... देवी .... देवतौ .......
सुर्ज- देवी - देवता के बारे में तो कहना मुश्किल है, लेकिन षन्नो की मौसी तो नखरा करती है।
दीनू- सच काका.....
सुर्ज- बिल्कुल सच।
मनोहरा- (अन्दर से आकर) तुम भी तो किसी समय मारण-उच्चाटन मंत्र की सिद्धि कर रहे थे।
दीनू काकी, काका देश - दुनिया जानै के बरे.....
(सुर्जकुमार घर के अन्दर चले जाते हैं)
मनोहरा- दीनू दादा कहाँ हैं ?
दीनू- बगिया से चल चुके हैं
(दीनू दौड़कर देखता है , पुनः आकर) बाबा आ रहे हैं।
(मनोहरा अन्दर चली जाती है। दीनू एक ओर हट जाता है । राम सहाय बड़बड़ाते हुए आते हैं । अपनी छड़ी तख्ते के सहारे रखते हैं। उम्र ढली हुई। रोगग्रस्त , धोती कुर्ता पहने हुए।)
रामसहाय- कैसे लड़के हैं ? यह भी ध्यान नहीं कि हमारे न रहने पर घर कैसे चलेगा ? सुना है कविताई में रस पाने लगे हैं। अब बताओ कविताई से किसी का पेट भरा है ? हम तो आज मरें या कल..... यह घर हमने अपने बूते बनाया.....अब आगे तुम लोग जानो.....
(मनोहरा एक गिलास पानी लाकर तख्ते पर रख देती है)
रामसहाय उसे देखकर थोड़ा और तेज बोलने लगते हैं। मनोहरा दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो जाती है।)
सपूत के क्या विचार हैं ? कुछ रोजी-रोटी का जुगाड़ करेंगे ?
(मनोहरा पैर के अंगूठे से धरती कुरेदने लगती है। राम सहाय बोलते जाते हैं।)
हुँह कितना समझाया , बच्चा दसवाँ पास कर ले..... नौकरी मिल जायेगी......मुला बच्चा क्यों सुनें.....पढ़ाई में तो मन लगा नहीं अब दर दर की धूल छानो।..... यही गांव की मिट्टी खोदोगे न ?
हमारा भी मन था कि बच्चा कुछ बन जाय लेकिन.....
(खाँसी आ जाती है। सुर्ज कुमार अंदर से ताश की गड्डी लिए आते हैं। राम सहाय को देखकर ताश छिपा लेते हैं। मनोहरा अन्दर चली जाती है। रामसहाय उबल पड़ते हैं।)
रामसहाय- तुम गा-बजाकर पेट भर सकोगे ? हुँह हम नरहेंगे तब इस गाँव में तुम्हें कोई पूछेगा ? सबै तो हड्डीचूस बसे हैं। अब तक जो कुछ उड़ाया वह राम सहाय की कमाई रही... राम सहाय तेवारी की.... बंगाल की कमाई....
भजन हमें भी अच्छा लगता है लेकिन संगीत और कवित्त पैसे वालों के लिए हैं..... तुम्हारे जैसे रामसहाय के लड़के के लिए नहीं.....कुछ समझ में आता है ?
कान खोलकर सुन लो....हमें बहुत दिन नहीं जीना है तुम्हें देखने न आऊँगा। चूल्हा चक्की देखे रहोगे तो कश्ट नहीं होगा।.... यह ताश की गड्डी, यह संगीत सब धरा रह जायेगा।
सुर्ज- लेकिन ?
रामसहाय- लेकिन क्या ? अखाड़ों का जमघट ...... ताश और दोस्तों के बीच टेम गँवाना बन्द करो । हमारा कहना मानो . ..... रोजी रोटी का जुगाड़ करो। इस गांव में क्या है ? रोजी तो परदेश में मिली । खुरपा खेत में गाड़कर हम बंगाल भगे , तब यह घर बना है। बच्चा , तुम्हारी देह में रूह की मालिश कराया। ये बोतल सी जाघें ऐसे नहीं बनीं।.......सोचो...... .तुम रामसहाय के बेटे हो किसी लखपती के नहीं।
(साँस बढ़ जाती है। एक क्षण बाद)
हमें जाना है रमुआ की पंचायते......बच्चा अब इस घर की नाक तुम्हीं हो।
(राम सहाय छड़ी उठाकर धीरे-धीरे जाते हैं। सुर्ज कुमार तख्ते पर गुमसुम बैठ जाते है। अन्दर से मनोहरा आती है।)
मनोहरा- (हाथ जोड़कर) कविवर प्रणाम.......
(सुर्जकुमार क्रुद्ध दृश्टि से उसे देखते हैं।)
महाप्रभु। क्यों विचारमग्न हैं? चरण पादुका लाऊँ।
(पुनःआँखों से तरेरते हैं।)
आर्यपुत्र! जीवन नश्वर है उसकी चिन्ता व्यर्थ है।
(कुछ क्षण बाद)
गणित के पर्चें में पद्भाकर का कवित्त लिखने वाले महाकवि! मौन तोड़ने का उपाय क्या है ?
सुर्ज- तुम भी पागल हो गई हो क्या ?
मनोहरा- पागल ही सही......वाणी तो फूटी...
सुर्ज- मैं ही बचा हूँ जितना भी तीर छोड़ना हो छोड़ लो।
मनोहरा- पत्थर पर तीर मारने से लाभ ?
(स्नेहपूर्ण स्वर में) चलो भोजन कर लो....
सुर्ज- नहीं करूंगा....
मनोहरा- क्यों ? (निराला चुप रहते हैं)
दादा ने डाँट दिया है इसलिए न ? उनकी डाँट में क्या तुम्हें उनका प्यार नहीं दिखाई पड़ता ? ठीक ही तो है.... वे चाहते हैं कि तुम्हें कोई काम मिल जाय।
सुर्ज- तो तुम्हीं यह डाँट क्यों नहीं सुन लेती ?
मनोहरा- तुम सुनते हो तो क्या मैं नहीं सुनती? और क्या हमें नही डाँटते ? उनकी कमाई खत्म हो रही है। बीमार रहते है। तुम्हारा हाथ -पाँव कहीं चलता नहीं.......
उनका इस तरह चिड़चिड़ाना क्या......
सुर्ज- लेकिन उनकी डाँट मन को छील देती है....
मनोहरा- कहो मथ देती है तभी तो लक्ष्मी प्रकट होंगी
सुर्ज- फिर वही....
मनोहरा- मैं क्या गलत कहती हूँ पिता की बात और मन की गहराई को छू न सके....
सुर्ज- अच्छा , आज जो गीत गाया था तुम्हें अच्छा लगा।
मनोहरा- फिर हमें भी डाँट खिलाना चाहते हो क्या ?
अभी दादा जी आवेंगे तो हमसे पूछेंगे...... (स्वर की नकल करते हुए) सुपुत्र क्या कर रहे हैं? (सहज स्वर में) और हमें कहना पडे़गा......
सुपुत्र सुन्दर उंगलियों की उपमा ढूँढ रहे हैं.....
सुर्ज- तुम यह भी कह देती हो ?
मनोहरा- क्यों न कहूँ ? तुम्हारे लिए झूठ बोलने जाऊँ?
सुर्ज- चाहती हो घर से भगा दिया जाऊँ
मनोहरा- हाँ भी, नहीं भी...
सुर्ज- (मनोहरा की नकल करते हुए) हर बात में हाँ भी और नहीं भी.......
मनोहरा- (रुष्ट होती हुई) यह मेरी नहीं तुम्हारी आदत है।
सुर्ज- मेरी ?
मनोहरा- और नहीं क्या......मेरी? हर काम में करूँ या न करूँ, जाऊँ या न जाऊँ? कभी-कभी तो मैं तंग आ जाती हूँ....
सुर्ज- वैसे तंग करना मेरी आदत नहीं..... लेकिन कोई तंग होना ही चाहे तो.....
मनोहरा- इसका मतलब मैं बेकार ही......
सुर्ज- और नहीं क्या? अच्छा यह बताओ अधरों की उपमा दाड़िम से दी जाती है न?
मनोहरा- (रुष्ट होकर) मैं नहीं जानती....
सुर्ज- पारा गरम?
मनोहरा- (तीखे स्वर में) गरम क्यों न हो? दादा जी दिन भर में दस बार पूछते है.....‘सुपुत्र’ क्या कर रहे हैं? और हर बार मैं कह तक कहूँ कि सुपुत्र अधरों की उपमा ढूँढ रहे हैं।
सुर्ज- तुम्हारी माया भी विचित्र है। कभी मेरे कविता प्रेम पर खुश होती हो कभी ऐसे देखने लगती हौ जैसे बिल्ली चूहे को देखती है।
मनोहरा- जानते हो पंडित लोग बिल्ली और चूहे का विवाह नहीं कराते।
सुर्ज- लेकिन चूहे-चुहिया में भी कौन कब बिल्ली बन जाय इसका उन्हें क्या पता?
मनोहरा- (स्नेह से आग्रह करती हुई) छोड़ो यह चूहे चुहिया की बात
.......चलो भोजन कर लो......
सुर्ज- पहले यह बताओ चिट्ठी तुम्हें कविता में लिखा करूँगा या....
मनोहरा- डाँट खाना होगा तो कविता में लिखना लेकिन चिट्ठी लिखो ही क्यों?
सुर्ज- क्या काम हमें यहाँ मिलेगा? हम सब के ललाट पर बंगाल लिख गया है बहुत मोटे-मोटे अक्षरों में। अब वह मिट नहीं पाएगा।..... मुझे कष्ट नहीं होगा। वहाँ की धरती भी मुझे बहुत प्रिय है किन्तु......
मनोहरा- किन्तु क्या?
सुर्ज- तुम साथ नहीं रह सकोगी।
मनोहरा- मैं श्यामल मेघों से सन्देश भेजा करूँगी।
सुर्ज- यह तुम नहीं , मैं कर सकूँगा और चाहिए भी यही। सन्देश तो यक्ष को भेजना होता है।
मनोहरा- चलो भोजन कर लो....नहीं तो अभी दादा जी आ जायेंगे और फिर तुम्हारी सिट्टी-पिट्टी गुम।
सुर्ज- निराला (तख्ते पर से उठते हुए) अब तो परदेशी होना ही पड़ेगा। फिर तुम्हारे हाथ का.......
मनोहरा- ऐसा क्यों सोच लेते हो?.....जीवन भावना ही नहीं कर्म भी तो है। हम दोनों में संगति क्यों न बिठाएँ।
सुर्ज- जरूर बिठाना चाहिए । अभी आता हूँ (निराला बाहर चले जाते हैं। मनोहरा एक क्षण खड़ी रहती है। दीनू आ जाता है।)
दीनू- काका बंगाल जायेंगे काकी?
मनोहरा- हाँ जाना तो चाहते हैं।
दीनू- काकी यहाँ काम न मिली ?
मनोहरा- यहाँ कौन काम मिलेगा दीनू?
दीनू- सोने जैसी देह गारद होई काकी। परदेशी सब यहैं लौट के आवत हैं। महीना दुई महीना मा कहूँ एक मनीअडर सवाती बूँद अस टपकी । चिट्ठी जोहत-जोहत आँखी.....
मनोहरा- मैं जानती हूँ दीनू । मैं तो खुद बंगाल देख आई हूँ।
दीनू- वहाँ कै धरती सोना उगलति है काकी? इहाँ कै धरती बाँझ है न?
मनोहरा- धरती कहीं की भी बाँझ नहीं होती दीनू।
दीनू- फिर वहाँ रोजी है यहाँ नाहीं?.......न जाने कितने लोग कलकत्ता,बम्बई,किराँची कै धूल छानत हैं।
मनोहरा- जानती हूँ