जंगल - 40 Neeraj Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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जंगल - 40

 51 वा धारावाहिक "अर्थ " कहानी के माधम से जान लो।जिंदगी का मतलब समझ जाओ, तो ये बे अर्थ सी लगती है अगर स्टॉक मार्किट की तरा लोगे तो मतलब और होगा... तुम इस से खेलो नहीं, हरी को आपने अंदर ढूंढो। बनवारी की आँखे भरी हुई थी, जैसे किसे प्रिये को छोड़ कर चले हो। गुरू जी से आशीर्वाद ले कर आ गया था... पता कयो उसे पता था गुरू जी से उलट की अभ वो कभी यहां न आ सकेगा.... अकल आराम से गाड़ी चलाते जा रहे थे। सवा चार वजे के करीब पुरानी छावन्नी अम्बाला की कार हल्के से रोक दी। अकल ने बहुत गंभीर और मुस्कान भरे लहजे से पूछा, " महाराज उतरिये.. अंबाला है। सामने क्वाटर आपना है ----" बनवारी ने चद समान पकड़ा नीद मे ही.. कुछ अकल ने पकड़ा। वो दोनों धीरे धीरे पहुंच गए... उस क्वाटर के फर्स्ट फ्लोर पे । " अकल साथ मे गाड़ियों का जक्शन ये कया ----" अकल मुस्करा के बोले, " बेटा बनवारी ये मेरे दादा की नौकरी का नतीजा बाद मे यहां कोई आया ही नहीं... बाकी जो मैनजर थे वो मेरे दादा और मेरे अच्छे मित्र थे बस उन्होंने फर्स्ट फ्लोर मेरे नाम ही रख दिया। " बनवारी पहले कमरे मे था... अकल ने स्विच ऑन किया। अब पांच वज रहे थे। " सुषमा को उठाने वो बेडरूम मे चला गया। बनवारी चेयर पर ही बैठ गया... इधर उधर देखा.. उत्साहित नहीं था इतना वो... तभी पटरी नजदीक से ही चीखती ट्रेन गुज़री... " उसने मन मे कहा हरी हरी राधे राधे... काम निपटा के चले जाऊगा जल्दी ही... उसकी आँखो को कैद खाना से जयादा कुछ नहीं लगा... हाथो से गिनती की... तीन कमरे मरके होंगे... टबर एक लड़का ही होगा, आटी होंगी... अकल बस और नीचे करते काम वर्कर। थोड़ा थोड़ा सवेरा हो चूका था... अभी तक़ कोई आया ही नहीं... हैरान था बनवारी। याद कर रो रहा था आपने बनारस वाले कृष्णा को, मन मे ही कहा, " रूठ गए मुझसे कन्हैया " फिर कलाक की टिक टिक टिक.....

                            तभी सामने आये बनवारी के अकल जी उसकी वाइफ जिसको वो सुषमा बुला रहा था... एक और लड़की जो दिखने मे आकर्षक थी.. फिर उसका छोटा भाई.... ये परिवार था... अकल ने कहा। बनवारी बड़ा लड़का अभी सामने नहीं आयेगा... हमें जाना होगा... बनवारी झट मे बोला " कहा अकल "

"यही घर मे ही...." सबके चेहरे उतरे हुए थे।

फिर सुषमा ने उसकी लड़की ने चाये और मेहमान की आओ भगत की। बनवारी इतने मे खुश हो गया था। नहाने के लिए अकल टावल उठा कर बाथरूम मे चला गया। उसकी बेटी जिसने आपना नाम खशबू बताया था... उसका चेहरा मोटा था नाक तीखी... कंधे आगे को गिराए हुए... बनवारी को सुस्त सी लगी। छोटा भाई जिसे समझता था वो बड़ा था, कद लबायी मे छोटा था।

लेकिन काम तीस मार जैसे... वो बनवारी को आपने कमरे मे ले गया था.. ब्रसली के पोस्टर, सजय दत्त के फ़िल्म के पोस्टर... "खलनायक हूँ " बड़ा सा दीवार पे लगा हुआ था। नाम भी उसका सजय ही था। " उसने सोचा ये तो मेरे से भी एक नंबर आगे होगा.... मुझे तो मुरली वाले ने गयान दे दिया, पर इसका कैसे " " बनवारी ने कहा, " आपका छोटा भाई किधर है " सजय हसने लगा। " बनवारी मुरली वाले से पूछ तो लेते, वो तो गुज़र चूका है, ट्रक एक्सीडेंट से, उसके पास सब पैसे थे जूते के काम के... पिता जी उसे छोड़ ही नहीं रहे... अब हम कया करे... तुम बताओ। " ठोकर सी लगी बनवारी को ----" उसके प्यार मे पागल हो गए... ये ही समझ ले... " शार्ट कट मे समझाते हुए बनवारी ने कहा "---ये सट जिसके लगती है उसी को पता लगता है।" वो उस कमरे से निकल कर माता जी के पास आपना बेहद नजदीकी समझ बैठ गया ---"माता जी आज कया बनाना है आपने... " माता मीठी आवाज मे बोली " कया खाएगा बनवारी पुत्र। " समझने मे देर नहीं लगी, अकल आये, " कया हमारा पसंद आया घर, फैक्ट्री.. बड़ा लड़का, छोटा..... " छोटा तो मेरे जैसा है हसमुख। " उनकी बहन के पैरो तले जमीन निकल गयी। " कहा देखा उसे। " हसते हुए बोला " खसबू तुम भी बस, मैंने आपने अंदर देखा.... " खशबू जैसे रोती रोती हस पड़ी। अकल ने कहा, "फैक्ट्री कैसे लगी।" "बहुत खूब ---- हरी की फोटो मे लगाऊंगा।" बनवारी बोला..... फिर अकल इतना रोया... इतना रोया.... किसी को खोना दर्द देता है...... "  घर से अपुन का रिश्ता अकल जी आपना तो पक्का है अब.... जैसे भी मर्जी समझ लो।बनवारी की आँखे भरी हुई थी... इतना सदमा झेले हुए वो जीत गया था, कयो  हरी की किर्पा से बनवारी इतनी दूर से आ गया था। वो ही जानता है 

वो कयो आया है। ये हरी ही जानता था। उनकी चाये की शॉप काम अब बनवारी और बड़ा लड़का ही करता था। बस यही हरी किर्पा थी। -----------------(समाप्ति )