काली धरती का देवदूत prem chand hembram द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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काली धरती का देवदूत


धनबाद उस समय सिर्फ एक शहर नहीं था—
वह कोयले, धुएँ, पसीने और बीमारी से बना एक जीवित नरक था।
धरती के नीचे साँस लेते मजदूर,
ऊपर भूख से लड़ते परिवार,
और चारों ओर टीबी का भय।
अविभाजित बिहार के दिनों में जब कोलियरियों का राष्ट्रीयकरण हुआ, तब दूर-दूर के गाँवों से पासी, मुसहर, भुईयाँ, संताली, मुंडा, उराँव और बावरी समुदाय के लोग रोजगार की आस में धनबाद आ पहुँचे।
किसी ने खेत छोड़ा,
किसी ने जंगल,
किसी ने पुश्तैनी मिट्टी।
पर यहाँ उन्हें मिला क्या?
टीन की तपती छतें,
सड़ी नालियाँ,
खदानों से निकला जहरीला पानी,
और अंधेरी सुरंगों में मौत से रोज़ का सामना।
उस समय ओपन कास्ट खदानें कम थीं।
अधिकतर डोली खदानें थीं।
सुबह जब मजदूर नीचे उतरते, तो लगता जैसे पृथ्वी उन्हें निगल रही हो।
और रात में जब वे ऊपर आते, तो सचमुच भूतों की टोली प्रतीत होते।
पूरा शरीर कोयले की कालिख से काला,
कमर में बैटरी वाली बत्ती,
कंधे पर बेंत की टोकरी,
हाथ में छोटी गैंती।
अंधेरे में जब वे हँसते,
तो केवल उनके दाँत चमकते थे।
टीबी उस समय मृत्यु का दूसरा नाम थी।
एक आदमी को हुई नहीं कि पूरा घर उसकी चपेट में आ जाता।
खाँसी…
खून की उल्टी…
और फिर अचानक मौत।
दारू की भट्टियाँ हर गली में थीं।
कोई मजदूर कहता—
“अरे भाई, कोयला पेट में चला जाता है…
दारू न पीएँ तो मैला कैसे कटेगा?”
दूसरा बोलता—
“फलाँ हाजिरी बाबू बड़ा साधु बनता था।
दारू नहीं पीता था।
टीबी हुआ और दो दिन में खून थूककर मर गया।
हम तो पिएँगे।”
धीरे-धीरे पूरा धनबाद शराब और टीबी के शिकंजे में जकड़ गया।
ऐसे समय में पीएमसीएच के छाती रोग विशेषज्ञ डाक्टर पदम् झा धनबाद आए।
सरकारी डॉक्टर थे,
पर सरकारीपन उनमें रत्ती भर नहीं था।
शाम को बैंक मोड़ के पास बैठते।
फीस— मात्र दस रुपए।
और यदि किसी के पास पैसे न हों,
तो अपने पैसे से दवा खरीद देते।
उनकी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि गरीब मरीज एक बार दवा लेकर फिर लौटकर नहीं आते थे।
कई डॉक्टर इसे मरीजों की लापरवाही कहते,
पर पदम् झा जानते थे—
गरीबी आदमी को बीमारी से पहले मार देती है।
वे खुद उन बस्तियों में पहुँच जाते।
सड़ी हुई माड़ की गंध,
कीचड़ में घूमते सूअर,
टूटी चारपाइयाँ,
धुएँ से काले बच्चे,
और बकरियों के बीच बैठा पूरा परिवार।
कई घरों में इंसान और जानवर साथ खाते-सोते थे।
डाक्टर पदम् झा ऐसे वातावरण के अभ्यस्त नहीं थे।
पर जब वे किसी टीबी से मरते मजदूर के पीछे रोते बच्चों को देखते,
तो उनकी आत्मा काँप उठती।
वे केवल दवा नहीं देते थे—
हौसला देते थे।
एक दिन उन्होंने काली भुईयाँ को बुलाकर कहा—
“देखो, वेतन तुम्हारी मेहनत का है।
पहले घर का राशन लाओ।
बच्चों की पढ़ाई देखो।
फिर किसी महाजन को पैसा देना।
और अकेले कभी हिसाब मत करना।”
काली भुईयाँ चुप रहा।
डॉक्टर साहब फिर बोले—
“ये कौन-सा कर्ज है जो जिंदगी भर नहीं उतरता?”
धीरे-धीरे मजदूरों के भीतर चेतना जागने लगी।
अब बस्ती में कुछ बदलाव दिखने लगा था।
कई मजदूरों ने दारू छोड़ दी।
कुछ औरतों ने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू किया।
मजदूर अब महाजन के सामने अकेले नहीं जाते थे।
और जब कोई नया आदमी शराब की बोतल खोलता,
तो कोई न कोई कह देता—
“अरे… डाक्टर बाबू कहते थे—
गरीब आदमी की सबसे बड़ी ताकत उसका होश है।”
यही बात महाजनों और कुछ डॉक्टरों को चुभने लगी।
कई डॉक्टर कहते—
“इतना सस्ता इलाज करोगे तो पेशे की इज्जत खत्म हो जाएगी।”
कुछ महाजन खुलकर विरोध करने लगे।
क्योंकि बीमार और शराबी मजदूर ही उनके सबसे बड़े ग्राहक थे।
उनमें सबसे प्रभावशाली था— बलराम सिंह।
पुरानी सफेद एम्बेसडर कार,
मोटी सोने की चेन,
और आँखों में ऐसा घमंड जैसे पूरा धनबाद उसी की मुट्ठी में हो।
एक दिन वह सीधे डाक्टर पदम् झा के दफ्तर पहुँचा।
कार के रुकते ही बाहर खड़े मजदूर सहम गए।
बलराम सिंह भीतर आया, कुर्सी खींचकर बैठा और मुस्कुराकर बोला—
“डाक्टर साहब…
बहुत समाज सुधार हो रहा है आजकल?”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
पदम् झा ने चश्मा उतारकर शांत स्वर में पूछा—
“कहिए, क्या तकलीफ है?”
बलराम सिंह हँसा—
“तकलीफ हमें नहीं… आपको हो जाएगी।
डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं, मेरी माँ ने मुझे सिखाया है।
पर समाज सुधारक होते हैं— ऐसा उसने नहीं कहा।”
डाक्टर साहब ने धीमे स्वर में कहा—
“भूखे, फटेहाल, नरकंकाल जैसे इंसानों की सेवा करना अगर समाज सुधार है…
तो हाँ, मैं वही कर रहा हूँ।”
बलराम सिंह का चेहरा कठोर हो गया।
“देखिए डॉक्टर,
बीमारी का इलाज कीजिए।
समाज बदलने का ठेका मत लीजिए।”
कुछ क्षण मौन रहा।
फिर पदम् झा बोले—
“अगर बीमारी की जड़ मन और शरीर दोनों में हो,
तो डॉक्टर चुप कैसे रहे?”
बाहर खड़े मजदूरों ने पहली बार किसी पढ़े-लिखे आदमी को महाजन की आँखों में आँख डालकर बोलते देखा था।
उस दिन खबर आग की तरह पूरे धनबाद में फैल गई—
“डाक्टर साहब ने बलराम सिंह को जवाब दे दिया!”
लेकिन सत्य अक्सर अकेला होता है।
धीरे-धीरे अस्पताल के भीतर भी विरोध बढ़ने लगा।
एक दिन अस्पताल के निर्देशक ने उन्हें बुलाया।
“डॉक्टर पदम्,
हम भगवान की दी हुई जिंदगी बचा नहीं सकते,
लेकिन सेवा भावना से इलाज करें तो लोग डॉक्टर को भगवान मानते हैं।
पर समाज सेवा करना हमारे प्रोफाइल में नहीं आता।”
पदम् झा शांत स्वर में बोले—
“सर, बीमारी सिर्फ शरीर की नहीं होती।
मन भी बीमार होता है।
अगर मेरे दो प्रेम भरे शब्द किसी को जीने की ताकत दें,
तो मैं यह अवश्य करूँगा।”
निर्देशक ने गहरी साँस ली—
“फिर तो आपको नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा।”
बिना कुछ कहे पदम् झा वहाँ से निकल आए।
उस रात घर लौटकर उन्होंने चुपचाप अपना झोला रखा।
पत्नी सरला ने पूछा—
“आज बहुत थके लग रहे हैं?”
पदम् झा धीमे स्वर में बोले—
“सरला, बताओ तो लोग महाभारत-रामायण क्यों पढ़ते हैं?”
सरला मुस्कुराई—
“अगर शास्त्र न होते, तो इंसानियत कब की मर गई होती।”
पदम् झा कुर्सी पर बैठ गए।
“यही तो दुःख है।
एक डॉक्टर तब तक अधूरा है जब तक मरीज उसे अपना न समझे।
सिर्फ दवा देना मशीन का काम है।
शास्त्र हमें हर इंसान में उसी का रूप देखने की शिक्षा देते हैं…
पर लगता है मेरे पेशे में यही सबसे बड़ा दुर्गुण है।”
एक कोने में उनका बूढ़ा पिता अखबार पढ़ रहा था।
उसने गंभीर आवाज़ में कहा—
“बेटा,
यह दुर्गुण नहीं— सद्गुण है।
नौकरी चली जाए तो जाए,
पर अपनी अंतरात्मा मत खोना।”
कुछ देर मौन छाया रहा।
फिर पदम् झा धीमे स्वर में बोले—
“आज एक बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—
‘माँ, बाबूजी अब कभी नहीं आएँगे?’
मैं डॉक्टर हूँ…
पर उस बच्चे को कौन-सी दवा दूँ?”
सरला चुपचाप थाली रखते हुए आँसू पोंछने लगी।
उसी समय बाहर कहीं दूर मांदर की धीमी थाप सुनाई दी।
कुछ संताली औरतें बुझते चूल्हे के पास बैठी गा रही थीं—
“धरती माँ…
हमारे आदमी को फिर लौटा दे…”
डाक्टर पदम् झा खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए।
उन्हें लगा—
इस मिट्टी का दुःख शब्दों से बड़ा है।
अगले ही दिन खबर मिली—
भौंरा के चार नंबर चाणक में धंसान हो गया है।
करीब बीस मजदूर भीतर फँसे थे।
वे तुरंत वहाँ पहुँचे।
पूरा इलाका चीखों से काँप रहा था।
औरतें रो रही थीं।
बच्चे अपनी माँओं से पूछ रहे थे—
“बाबूजी कब आएँगे?”
खदान के भीतर जहरीली गैस भर चुकी थी।
बाहर प्रबंधन के खिलाफ नारे लग रहे थे।
महेंद्र राय, आनंद महतो और संताली नेता शिवा सोरेन मजदूरों को संगठित कर रहे थे—
“एक नौकरी और पाँच लाख मुआवजा!”
“सुरक्षा दो!”
“मजदूर जानवर नहीं!”
भीड़ गरज रही थी।
डाक्टर पदम् झा घायल मजदूरों को संभालने लगे।
कल ही की तो बात थी।
उन्होंने कल्लू पासवान को हल्के बुखार में आराम करने को कहा था।
काश… वह मान लेता।
अब उसकी पत्नी यशोदा अपने चार साल के बच्चे को सीने से चिपकाकर बिलख रही थी।
किसी को दौरा पड़ रहा था,
कोई अचेत हो रहा था,
जिसका जवान बेटा अंदर फँसा हो, वैसे बूढ़े माँ-बाप का रोना वातावरण को चीर रहा था।
राह चलते लोग बोलते—
“हाय रे नसीब… भगवान कितना निष्ठुर है…”
कोई कहता—
“जन्म लिया है तो जाना ही पड़ेगा…”
कोई कहता—
“भाग्य का लिखा कभी नहीं कटता…”
काफी मशक्कत के बाद केवल दो मजदूर निकाले जा सके—
और दोनों मरणासन्न थे।
एक जवान मजदूर ने उनका हाथ पकड़ लिया—
“डाक्टर बाबू…
हम बच जाएँगे न?”
पदम् झा की आँखें भर आईं।
उन्होंने उसके माथे पर हाथ रखा—
“तेरा बच्चा इंतजार कर रहा है…
तू अभी नहीं हार सकता।”
उस रात पहली बार पूरा धनबाद एक हो गया।
विभिन्न यूनियनें, विभिन्न जातियाँ, विभिन्न भाषाएँ—
सब सिर्फ मजदूर बन गए।
लंबे संघर्ष के बाद प्रबंधन को झुकना पड़ा।
मजदूरों को सुरक्षा उपकरण मिले।
मृत मजदूरों के परिवारों को नौकरी मिली।
महँगाई भत्ता बढ़ा।
और भुगतान व्यवस्था में बदलाव हुआ।
अब वेतन सीधे खाते में जाने लगा।
दलाल और महाजनों की चालें कमजोर पड़ने लगीं।
लेकिन इस जीत की कीमत भी थी।
बलराम सिंह और उसके लोग अब पदम् झा को खुला दुश्मन मानने लगे थे।
एक रात जब वे बस्ती से लौट रहे थे,
कुछ गुंडों ने उनकी स्कूटर रोक ली।
“बहुत नेता बन रहे हो डॉक्टर?”
एक ने धक्का दिया।
पदम् झा गिर पड़े।
चश्मा टूट गया।
पर उन्होंने केवल इतना कहा—
“मार लोगे…
पर बीमारी, गरीबी और अन्याय को कैसे मारोगे?”
उन शब्दों ने कुछ क्षण के लिए सबको चुप कर दिया।
किसी ने धीरे से कहा—
“छोड़ो… बूढ़ा सच्चा आदमी लगता है…”
और वे चले गए।
समय बीतता गया।
इस आंदोलन ने पूरे लूटतंत्र को उजागर कर दिया था।
पदम् झा की आवाज दिल्ली तक पहुँची।
अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें फिर से नियुक्त किया।
उनके मार्गदर्शन में कोल इंडिया अस्पतालों में दवा की कमी कम होने लगी।
नई दवाइयाँ आने लगीं।
टीबी धीरे-धीरे घटने लगी।
खदानों का स्वरूप बदलने लगा।
पर धनबाद की बस्तियों में आज भी बूढ़े लोग याद करते हैं—
एक दुबला-पतला डॉक्टर,
पुरानी स्कूटर,
कंधे पर झोला,
और आँखों में करुणा।
कहते हैं—
जब किसी गरीब के घर चूल्हा नहीं जलता था,
तो कभी-कभी दवा के साथ राशन भी पहुँच जाता था।
जब कोई मजदूर मरता,
तो पदम् झा सबसे पीछे खड़े होकर चुपचाप रोते थे।
उन्होंने कोई बड़ी किताब नहीं लिखी।
कोई चुनाव नहीं लड़ा।
कोई महल नहीं बनाया।
पर उन्होंने हजारों गरीबों के भीतर यह भरोसा जगा दिया—
कि दुनिया में अभी इंसानियत जिंदा है।
बरसों बाद…
धनबाद की सड़कें चौड़ी हो चुकी थीं।
विशाल मशीनें धरती को चीर रही थीं।
मोबाइल टावर खड़े थे।
चमकती गाड़ियाँ दौड़ रही थीं।
पर बस्तियों की कई आँखों में वही पुराना धुआँ अब भी था।
एक दिन उसी पुराने अस्पताल की दीवार पर किसी ने चॉक से लिख दिया—
“डाक्टर बाबू,
दवा आज भी मिल जाती है…
पर दिलासा देने वाला आदमी अब नहीं मिलता।”
नीचे किसी अनजान हाथ ने जोड़ दिया—
“गरीब आदमी पहले बीमारी से नहीं,
अकेलेपन से मरता है…”
उसी शाम एक बूढ़ा मजदूर अपने पोते को खदान की तरफ इशारा करके कह रहा था—
“बेटा…
यहाँ कभी एक आदमी आता था।
हाथ में झोला… आँखों में दया…
वो गरीब का इलाज नहीं करता था—
उसका डर दूर करता था।”
बच्चा पूछ बैठा—
“नाम क्या था उसका?”
बूढ़ा मुस्कुराया।
उसकी झुर्रियों में जैसे पूरा धनबाद बस गया था।
“नाम तो पदम् झा था…
एक पदम् झा देवतुल्य थे।
पर आज कहाँ?
आज तो हर जगह लूट और कमीशनखोरी है।
जिंदगी जब हारती है,
तो उसे उम्मीद होती है डॉक्टर और दवा पर।
काश आज भी पहले जैसा होता…
तो शायद जिंदगी इतनी सस्ती न होती…”
बच्चा धीरे से बोला—
“पर दादा… मरता तो गरीब ही है न?”
बूढ़े ने दूर धुएँ से ढकी खदानों की ओर देखा।
फिर भारी आवाज़ में कहा—
“हाँ बेटा…
इसलिए किसी ने सही कहा है—
गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप है।”
कुछ देर मौन रहा।
दूर कहीं मांदर बज रहा था।
हवा में कोयले की हल्की गंध तैर रही थी।
और ऐसा लग रहा था—
मानो धनबाद की काली धरती अब भी किसी पदम् झा के कदमों की आहट सुनने की प्रतीक्षा कर रही हो…
🌿 समाप्त 🌿
जयगुरु🙏🙏🙏
वंदे पुरुषोत्तम