एपिसोड 4: आख़िरी हिसाब और न्याय की गूंज
अमन ने बहुत धीरे से पैर आगे बढ़ाए और कमरे का मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। कुंडी गिरने की आवाज़ ज़ोया के कानों में किसी मौत की घंटी जैसी गूंजी। कमरे की लाल रोशनी में अमन का चेहरा किसी हैवान जैसा लग रहा था।"मैंने कबीर को बहुत समझाया था ज़ोया, कि वो हमारे बीच में न आए," अमन ने चाकू की धार को अपनी उंगली से सहलाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक डरावना सुकून था। "लेकिन वो नहीं माना। वो मेरी अलमारी तक पहुँच गया था, बिल्कुल तुम्हारी तरह। अब तुम ही बताओ, जो मेरी सबसे कीमती चीज़—यानी तुम्हें—मुझसे छीनना चाहेगा, उसे तो मरना ही होगा न?""तुम पागल हो अमन! तुम एक दरिंदे हो!" ज़ोया चिल्ला पड़ी। वह पीछे हटते हुए अलमारी से सट गई। उसके हाथ में अभी भी खून से सना कबीर का वो पेन था। "कबीर तुम्हें अपना भाई मानता था। तुमने दोस्ती और प्यार दोनों का कत्ल किया है।""प्यार?" अमन ज़ोर से हँसा। उसका पागलपन अब पूरी तरह बाहर आ चुका था। "प्यार तो सिर्फ मैं तुमसे करता हूँ ज़ोया। कॉलेज के पहले दिन जब तुमने मुझे देखकर मुस्कुराया था, उसी पल मैंने तय कर लिया था कि तुम सिर्फ मेरी हो। कबीर तो बस एक काँटा था, जिसे मैंने रास्ते से हटा दिया। और अब, जब तुम सब कुछ जान चुकी हो, तो मुझे तुम्हें भी अपने पास हमेशा के लिए सुला देना होगा।"अमन ने चाकू ऊपर उठाया और ज़ोया पर झपट्टा मारा। ज़ोया ने फुर्ती से खुद को दाईं ओर खींचा। चाकू हवा को चीरता हुआ सीधे लकड़ी की अलमारी में जा धंसा। अमन को संभलने का मौका मिलता, उससे पहले ही ज़ोया ने पूरी ताकत से अपने हाथ में थामे कबीर के उस नुकीले फाउंटेन पेन को अमन के कंधे में घोंप दिया।"आह!!!" अमन दर्द से चीख उठा। कंधे से खून की धार फूट पड़ी। उसका चाकू हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया।ज़ोया ने एक सेकंड भी बर्बाद नहीं किया। वह तुरंत दरवाज़े की तरफ भागी, कुंडी खोली और सीढ़ियों की तरफ दौड़ पड़ी। लेकिन अमन का पागलपन उसके दर्द पर भारी था। उसने अपने कंधे से पेन खींचकर निकाला और खून से लथपथ हालत में ज़ोया के पीछे भागा।जैसे ही ज़ोया नीचे के लिविंग रूम में पहुँची, अमन ने पीछे से आकर उसके बाल पकड़ लिए और उसे फर्श पर पटक दिया। ज़ोया का सिर मेज के कोने से टकराया और उसके सामने अंधेरा छाने लगा।अमन ने फर्श पर गिरा चाकू उठा लिया था। वह ज़ोया के ऊपर आ गया और चाकू उसकी गर्दन पर टिका दिया। "खेल खत्म ज़ोया। तुम सिर्फ मेरी हो... या फिर इस दुनिया में किसी की नहीं।"ज़ोया ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने मन ही मन कबीर को याद किया। अमन ने जैसे ही चाकू नीचे की तरफ चलाने के लिए हाथ उठाया—'धाड़!!!'कॉटेज का मुख्य दरवाज़ा एक झटके में टूटकर फर्श पर आ गिरा। इससे पहले कि अमन पीछे मुड़कर देखता, एक भारी बूट उसके चेहरे पर आकर लगा। अमन हवा में उछलकर दूर जा गिरा।"कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं अमन, और कातिल चाहे कितना भी शातिर हो, वो पुलिस से तेज नहीं दौड़ सकता।"सामने इंस्पेक्टर राघव हाथ में रिवॉल्वर लिए खड़े थे। उनके पीछे फॉरेंसिक टीम और पुलिस बल कमरे में दाखिल हो चुका था। दो कांस्टेबलों ने तुरंत अमन को दबोच लिया और उसके हाथों में लोहे की हथकड़ी पहना दी।राघव ने आगे बढ़कर ज़ोया को संभाला, जो कांप रही थी। "आप ठीक हैं ज़ोया? हमें समय पर ना आने के लिए माफ़ करना।""इंस्पेक्टर... आपको कैसे पता चला?" ज़ोया ने हांफते हुए पूछा। राघव ने मुस्कुराते हुए अपनी जेब से कबीर का फोन निकाला। "कबीर के फोन से जो मैसेज तुम्हारे फोन पर रात 2:20 पर भेजा गया था, वो इस कॉटेज के वाई-फाई (Wi-Fi) नेटवर्क से नहीं, बल्कि अमन के पर्सनल मोबाइल हॉटस्पॉट से भेजा गया था। फॉरेंसिक टीम ने जब आईपी एड्रेस (IP Address) ट्रैक किया, तो अमन का झूठ उसी वक्त पकड़ा गया था। मैं बस सही वक्त पर सबूत के साथ इसे रंगे हाथों पकड़ना चाहता था।"अमन हथकड़ियों में जकड़ा हुआ भी पागलों की तरह हंस रहा था। "ज़ोया! तुम मेरी हो! मैं वापस आऊंगा!" पुलिस उसे घसीटते हुए जीप की तरफ ले गई। उसकी ये चीखें धीरे-धीरे कोहरे में गायब हो गईं।कुछ महीनों बाद, अदालत ने अमन को कबीर के मर्डर और साज़िश के जुर्म में उम्रकैद की सज़ा सुनाई।पहाड़ी शहर में आज धूप खिली थी। ज़ोया कबीर की कब्र के पास खड़ी थी। उसके हाथ में वही नीली डायरी थी जिसे पुलिस ने केस खत्म होने के बाद उसे सौंप दिया था। ज़ोया ने डायरी के आखिरी पन्ने पर, जहाँ कबीर के शब्द अधूरे छूट गए थे, अपनी कलम से कहानी का अंत लिखा:"धोखे की बुनियाद पर खड़े साम्राज्य चाहे जितने ऊंचे हों, सच की एक हल्की सी गूंज उन्हें मिट्टी में मिलाने के लिए काफी होती है। अलविदा कबीर... हमारा प्यार सरहदों और मौतों से परे हमेशा ज़िंदा रहेगा।"ज़ोया ने डायरी बंद की। उसने महसूस किया कि एक ठंडी हवा का झोंका उसके गालों को छूकर गुजरा, जैसे कबीर ने खामोशी से उसे आखिरी बार चूमा हो। अब ज़ोया के चेहरे पर डर नहीं, बल्कि एक सुकून था। न्याय हो चुका था। _समाप्त
दोस्तों कैसी लगी आप लोगों को मेरी ये कहानी कमेंट में ज़रूर बताना।
लेखक _समीर खान