एपिसोड 3: डायरी का कड़वा सच और अलमारी का राज़
कबीर की मौत को तीन दिन बीत चुके थे। पहाड़ी शहर पर अब भी कोहरे का साया मंडरा रहा था। अमन हर वक़्त ज़ोया के साथ साये की तरह रहता था। ज़ोया का रो-रोकर बुरा हाल था, और अमन इसी कमजोरी का फायदा उठाकर उसे यह यकीन दिलाने में लगा था कि अब इस दुनिया में उसका ख्याल रखने वाला सिर्फ वही बचा है।"ज़ोया, तुम इस कॉटेज में अकेली सुरक्षित नहीं हो," अमन ने बहुत ही प्यार से ज़ोया का हाथ थामते हुए कहा। "तुम्हें मेरे घर शिफ्ट हो जाना चाहिए। वहाँ पुलिस की तफ्तीश का तनाव भी नहीं रहेगा और मैं हर पल तुम्हारे पास रहूँगा।"बेबस ज़ोया ने केवल सिर हिला दिया। वह नहीं जानती थी कि वह उसी कातिल के जाल में फंस रही है जिसने उसकी दुनिया उजाड़ी थी। उसी शाम, अमन ज़ोया को लेकर अपने पुश्तैनी मकान में आ गया। अमन ने ज़ोया को ऊपर का कमरा दिया और खुद नीचे के कमरे में रहने लगा।रात के करीब 1:30 बज रहे थे। पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। ज़ोया को नींद नहीं आ रही थी। उसकी आँखों के सामने बार-बार कबीर का वो खून से लथपथ चेहरा आ जाता था। वह बिस्तर पर करवटें बदल रही थी, तभी उसे प्यास लगी। कमरे का जग खाली था। ज़ोया पानी लेने के लिए दबे पाँव नीचे की तरफ बढ़ी।सीढ़ियों से उतरते वक्त उसने देखा कि नीचे अमन के कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था। अंदर ज़ीरो वॉट का लाल बल्ब जल रहा था, जिससे कमरा किसी डरावने साये जैसा दिख रहा था। ज़ोया ने देखा कि अमन कमरे में नहीं था। वह शायद वॉशरुम गया था।
ज़ोया जैसे ही अमन के कमरे के सामने से गुज़री, अचानक उसके दिमाग में इंस्पेक्टर राघव की कही बातें और कबीर की अधूरी डायरी की वो आखिरी लाइन गूंज उठी:‘मुझे आज ही अमन की अलमारी से वो...’ज़ोया के कदम वहीं ठहर गए। उसके दिल की धड़कनें अचानक तेज हो गईं। कबीर ने मरने से ठीक पहले अमन की अलमारी का ज़िक्र क्यों किया था? क्या सचमुच कोई ऐसी चीज़ थी जो अमन छिपा रहा था? एक तरफ अमन पर उसका अटूट भरोसा था, और दूसरी तरफ कबीर के आखिरी शब्द।डरते हुए ज़ोया ने दबे पाँव अमन के कमरे के अंदर कदम रखा। कमरे के कोने में सागौन की एक भारी, पुरानी अलमारी खड़ी थी। ज़ोया ने कांपते हाथों से अलमारी के हैंडल को पकड़ा। किस्मत से अलमारी लॉक नहीं थी। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, कपड़ों की महक के साथ एक अजीब सी खामोशी बाहर आई।ज़ोया ने जल्दी-जल्दी अमन के कपड़ों को हटाकर देखना शुरू किया। अलमारी के सबसे निचले हिस्से में, कपड़ों के पीछे एक लोहे का छोटा सा लॉकर था, जिसकी चाबी वहीं ऊपर लटकी हुई थी। ज़ोया ने चाबी घुमाई और लॉकर खोल दिया।लॉकर के अंदर जो कुछ था, उसे देखकर ज़ोया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके मुँह से चीख निकलने ही वाली थी कि उसने अपने हाथ से अपना मुँह बंद कर लिया।वहाँ एक छुपी हुई फ़ाइल थी। उस फ़ाइल में ज़ोया की कॉलेज के पहले दिन से लेकर अब तक की सैकड़ों तस्वीरें थीं—सोते हुए, हंसते हुए, कॉलेज जाते हुए। अमन ने ज़ोया के बिना जाने उसकी पूरी ज़िंदगी की जासूसी की थी। लेकिन सबसे खौफनाक चीज़ उस फ़ाइल के नीचे थी—एक मेडिकल रिपोर्ट, जिस पर अमन का नाम लिखा था। वह रिपोर्ट किसी मनोचिकित्सक (Psychiatrist) की थी, जिसमें साफ लिखा था कि अमन 'साइकोपैथ और ऑब्सेसिव लव डिसऑर्डर' (दीवानगी की हद तक किसी को चाहने की बीमारी) से पीड़ित है।और उसी फ़ाइल के बगल में रखा था कबीर का वो कीमती पेन, जो खून से सना हुआ था और एक शर्ट जिस पर कबीर के खून के गहरे धब्बे थे! अमन ने सबूत मिटाने के बजाय उन्हें अपनी 'जीत की निशानी' (Trophy) समझकर वहाँ छिपा रखा था।
ज़ोया का पूरा शरीर कांपने लगा। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे, लेकिन इस बार ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि उस खौफनाक सच के थे जो उसके सामने आ चुका था। उसका सबसे पक्का दोस्त, जो तीन दिनों से उसके आंसू पोंछ रहा था, वही कबीर का बेरहम कातिल था!"मिल गया वो सब... जो तुम ढूँढ रही थी?"अचानक पीछे से एक ठंडी, पथरीली आवाज़ गूंजी। ज़ोया ने झटके से पीछे मुड़कर देखा। दरवाज़े पर अमन खड़ा था। उसकी आँखों में अब कोई हमदर्दी नहीं थी, बल्कि वही हिंसक और पागलपन से भरी मुस्कान थी जो उसने कबीर को मारते वक्त पहनी थी। उसके हाथ में वही चमचमाता हुआ चाकू था जिससे उसने कबीर का सीना चीरा था।(जारी है )
लेखक _समीर खान