आख़िरी हिसाब: एक अधूरी डायरी - 2 Shaziya Khan द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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आख़िरी हिसाब: एक अधूरी डायरी - 2

एपिसोड 2: शक का घेरा और बंद कमरा
कबीर की मौत की खबर ने पूरे पहाड़ी शहर को हिलाकर रख दिया था। सुबह के छह बज रहे थे, लेकिन आसमान पर अब भी घने काले बादल छाए हुए थे। वुडन कॉटेज के बाहर पुलिस की पीली टेप (Crime Scene Tape) हवा में लहरा रही थी। फॉरेंसिक टीम कमरे के कोने-कोने से उंगलियों के निशान और सबूत इकट्ठा करने में जुटी थी।ज़ोया लिविंग रूम के सोफे पर बेसुध बैठी थी। उसकी सूजी हुई आँखें और कांपते हाथ उसकी मानसिक हालत बयां कर रहे थे। अमन उसके ठीक बगल में बैठा था, लगातार उसका हाथ थामे उसे दिलासा देने का नाटक कर रहा था।"खुद को संभालो ज़ोया, अगर तुम इस तरह टूट जाओगी तो कबीर के कातिल को सज़ा कौन दिलवाएगा?" अमन की आवाज़ में दुनिया भर की हमदर्दी थी, लेकिन उसके भीतर एक अजीब सी जीत की ख़ुशी छिपकर मुस्कुरा रही थी।तभी कॉटेज के भारी दरवाज़े को धकेलते हुए इंस्पेक्टर राघव ने अंदर कदम रखा। राघव अपनी तेज तर्रार तफ्तीश और शातिर अपराधियों के दिमाग को पढ़ने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपनी गहरी नजरों से पूरे कमरे का मुआयना किया—चाय के कप, सोफे पर बिखरी चादर और फिर ज़ोया और अमन पर आकर उनकी नजरें ठहर गईं।"मैं इंस्पेक्टर राघव। कबीर के कत्ल की तफ्तीश मेरे हाथ में है," उन्होंने अपनी कैप टेबल पर रखते हुए कहा। "मुझे आप दोनों से कुछ सवाल पूछने हैं।"अमन तुरंत खड़ा हो गया, "इंस्पेक्टर, ज़ोया की हालत बात करने जैसी नहीं है। जो पूछना है आप मुझसे पूछिए। मैं कबीर का सबसे पक्का दोस्त हूँ।"राघव ने अमन को ऊपर से नीचे तक देखा। अमन की आँखों में दुख तो था, लेकिन उसकी उंगलियां लगातार उसके कोट की जेब को छू रही थीं—यह घबराहट का एक बारीक सा संकेत था जिसे राघव की खोजी आँखों ने भांप लिया था। 
सवालो-जवाब तो दोनों से होंगे मिस्टर अमन," राघव ने ठंडे लहजे में कहा। "फॉरेंसिक रिपोर्ट कहती है कि कबीर की मौत रात के करीब 2 से 2:30 के बीच हुई है। कलाई की नस कटी हुई है और सीने पर चाकू का गहरा घाव है। पहली नज़र में यह आत्महत्या लगती है, क्योंकि चाकू पर कबीर की उंगलियों के निशान हैं। लेकिन...""लेकिन क्या इंस्पेक्टर?" ज़ोया ने रोते हुए अपनी सिसकी रोकी।"लेकिन कबीर के फोन से रात के ठीक 2:20 पर आपको एक मैसेज गया है ज़ोया," राघव ने अपना फोन निकालते हुए कहा। "मैसेज में लिखा है—ज़ोया मैं तुम्हारी जिंदगी से हमेशा के लिए जा रहा हूँ, खुश रहना। ज़ोया, क्या कबीर डिप्रेशन में था? क्या आप दोनों के बीच कोई झगड़ा हुआ था?""नहीं! कभी नहीं!" ज़ोया चिल्ला पड़ी। "कबीर मुझसे बहुत प्यार करता था। वो अगले हफ्ते मुझे प्रपोज करने वाला था। वो आत्महत्या नहीं कर सकता!"राघव ने नोटपैड में कुछ लिखा। फिर वह अमन की तरफ घूमे, "मिस्टर अमन, जब यह सब हुआ, आप कहाँ थे?"अमन ने बिना पलक झपकाए झूठ बोला, "मैं बगल के गेस्ट रूम में सो रहा था। ज़ोया लिविंग रूम में सोई थी। रात को जब मुझे कबीर के कमरे से कुछ गिरने की आवाज़ आई, तो मैं भागा हुआ आया। मैंने ज़ोया को जगाया और जब हमने दरवाज़ा खोला... तो कबीर फर्श पर था।""अजीब बात है..." राघव कबीर के कमरे की तरफ बढ़ते हुए बड़बड़ाए। अमन और ज़ोया भी उनके पीछे-पीछे आए।कमरा वैसा ही था—बिखरा हुआ खून, पलटी हुई लाल स्याही। राघव स्टडी टेबल के पास गए। कबीर का कत्ल बहुत चालाकी से किया गया था, लेकिन अमन से एक बहुत बारीक चूक हो गई थी। राघव की नजर फर्श पर गिरी कबीर की नीली डायरी पर पड़ी। डायरी का आधा हिस्सा कबीर के खून और लाल स्याही से सना हुआ था, लेकिन डायरी के पन्ने खुले थे।
राघव ने ग्लव्स (दस्ताने) पहनकर डायरी को उठाया। अमन के दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक गई। उसे याद आया कि कबीर मौत से ठीक पहले कुछ लिख रहा था। अमन की कनपटी पर पसीने की एक बूंद उभर आई।राघव ने डायरी का वो पन्ना पढ़ा जिसे कबीर ने आखिरी वक्त में लिखा था। उस पर लिखा था:'आज रात मुझे एक बहुत बड़ा सच पता चला है। मेरा सबसे करीबी इंसान, जिस पर मैंने खुद से ज़्यादा भरोसा किया, वो मेरी पीठ में छुरा घोंपने वाला है। ज़ोया की जान खतरे में है। मुझे आज ही अमन की अलमारी से वो...' इसके आगे शब्द अधूरे थे, क्योंकि वहीं पर चाकू लगा था और खून फैल गया था।राघव ने डायरी बंद की और अमन की तरफ देखा। अमन का चेहरा सफेद पड़ चुका था, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाला।"इंस्पेक्टर, कबीर शायद किसी और अमन की बात कर रहा होगा। मेरा तो उससे कोई विवाद नहीं था," अमन ने अपनी आवाज़ को सामान्य रखने की पूरी कोशिश की।राघव मुस्कुराए, पर उनकी आँखों में एक बर्फीला शक था। "मैंने ऐसा कब कहा कि वह आपके बारे में लिख रहा था, मिस्टर अमन? लेकिन इस डायरी ने एक बात साफ कर दी है—यह आत्महत्या नहीं, बल्कि एक बेहद सोची-समझी साज़िश और मर्डर है।"राघव ने डायरी को सबूत के बैग में डाला और कॉटेज से बाहर निकलने लगे। दरवाज़े पर रुककर उन्होंने अमन की तरफ देखा और कहा, "इस शहर से बाहर जाने की कोशिश मत करना अमन। कातिल कितना भी शातिर हो, वो अपनी परछाईं छोड़ ही जाता है। बहुत जल्द मुलाकात होगी।"इंस्पेक्टर राघव के जाते ही अमन ने राहत की सांस ली, लेकिन उसका डर अब बढ़ चुका था। कबीर की अधूरी डायरी ने खेल बिगाड़ दिया था। अब उसे जल्द से जल्द ज़ोया को अपने जाल में फंसाना था और उस अलमारी वाले सबूत को नष्ट करना था, इससे पहले कि पुलिस उसके घर तक पहुँच जाए।(जारी है )
लेखक _समीर खान