आख़िरी हिसाब: एक अधूरी डायरी - 1 Shaziya Khan द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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आख़िरी हिसाब: एक अधूरी डायरी - 1

"प्यार, दोस्ती और अंतहीन सस्पेंस से बुनी एक ऐसी दास्तान, जहाँ हर कदम पर एक नया राज़ छिपा है। तीन दोस्त—अमन, कबीर और ज़ोया, जिनकी ज़िंदगी एक आलीशान कॉटेज में हमेशा के लिए बदल जाती है। जब आधी रात के सन्नाटे में एक बेरहम मर्डर होता है, तो शक की सुई अपनों पर ही आकर टिक जाती है। क्या कातिल का शातिर दिमाग पुलिस की तफ्तीश से बच पाएगा? या कबीर के खून से सनी वो नीली डायरी खोलेगी अमन की अलमारी का वो खौफनाक सच? पढ़िए एक गहरी दिमागी जंग और आख़िरी हिसाब की कहानी


एपिसोड 1: आधी रात का सन्नाटा और बिखरा हुआ खून


पहाड़ी शहर की वह रात आम रातों जैसी नहीं थी। खिड़की के बाहर घने कोहरे की चादर लिपटी हुई थी और देवदार के पेड़ों से टकराकर चलने वाली सर्द हवाएं एक अजीब सी साय-साय की आवाज़ पैदा कर रही थीं। शहर के कोने में बने उस आलीशान वुडन कॉटेज के भीतर का माहौल भी उतना ही खामोश और भारी था।कमरे के बीचों-बीच रखे कांच के टेबल पर चाय के तीन कप आधे खाली पड़े थे। ज़ोया सोफे पर सिर टिकाए गहरी नींद में सो रही थी। उसकी सांसें स्थिर थीं, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकावट साफ दिख रही थी। बगल वाले कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था, जहाँ से मद्धम पीली रोशनी बाहर आ रही थी।तभी उस खामोशी को चीरते हुए किसी के भारी कदमों की आहट हुई। कोई बहुत धीरे-धीरे, अपनी सांसों को रोककर ज़ोया के सोफे के पास से गुजरा। उसकी नजरें ज़ोया के शांत चेहरे पर टिकी थीं। उसने यह पक्का किया कि ज़ोया की नींद गहरी है, और फिर वह दबे पांव उस रोशनी वाले कमरे की तरफ बढ़ गया।कमरे के अंदर कबीर अपनी स्टडी टेबल पर झुका हुआ कुछ लिख रहा था। टेबल लैंप की रोशनी सीधे उसकी डायरी पर पड़ रही थी। कबीर इतना खोया हुआ था कि उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी का अहसास तक नहीं हुआ।"इतनी रात को जागकर क्या लिख रहे हो कबीर?" एक ठंडी और जानी-पहचानी आवाज़ कमरे में गूंजी।कबीर ने चौंककर पीछे देखा। सामने अमन खड़ा था। अमन के चेहरे पर हमेशा रहने वाली वह दोस्ताना मुस्कान गायब थी, उसकी आँखों में एक अजीब सा खालीपन और गुस्सा था।"अमन? तुम अभी तक सोए नहीं? और तुम्हारी आँखों को क्या हुआ है?" कबीर ने अपनी कलम टेबल पर रखते हुए पूछा।अमन बिना कुछ बोले धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ा। उसने अपने कोट की जेब में हाथ डाला और एक मखमली डिब्बी निकालकर टेबल पर रख दी। यह वही अंगूठी थी जिसे कबीर ने अगले हफ्ते ज़ोया को प्रपोज करने के लिए खरीदा था और जिसे उसने अमन को दिखाया था।"तुमने मुझसे कहा था न कबीर, कि तुम ज़ोया से बहुत प्यार करते हो?" अमन की आवाज़ में एक कड़वाहट थी। "लेकिन तुमने कभी मुझसे यह नहीं पूछा कि मैं किससे प्यार करता हूँ। कॉलेज के पहले दिन से लेकर आज तक, ज़ोया पर सिर्फ मेरा हक था। तुमने मेरी दोस्ती का फायदा उठाकर उसे मुझसे छीन लिया।"कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। "अमन, तुम होश में तो हो? ज़ोया मेरी मंगेतर बनने वाली है। और तुम मेरे सबसे पक्के दोस्त हो...""दोस्त?" अमन के चेहरे पर एक हिंसक मुस्कान उभरी। "दोस्ती का नाटक तो मैं कर रहा था कबीर। ताकि मैं तुम दोनों के करीब रह सकूं। लेकिन अब बहुत हुआ। अब यह नाटक खत्म होने का वक्त आ गया है।"कबीर कुछ समझ पाता या चिल्लाकर ज़ोया को आवाज़ दे पाता, उससे पहले ही अमन ने जेब से चमचमाता हुआ चाकू निकाला और पूरी ताकत से कबीर के सीने में घोंप दिया। कबीर की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके होठों से सिर्फ एक बेबस कराह निकली। टेबल पर रखी लाल स्याही की दवात पलट गई, और कबीर का खून उस नीली डायरी के पन्नों पर स्याही के साथ मिक्स होने लगा। कबीर का शरीर धीरे से फर्श पर गिर गया। उसकी खामोश आँखें दीवार पर टंगे अमन और ज़ोया के साथ वाले ग्रुप फोटो को तक रही थीं।अमन ने गहरी सांस ली। उसने अपनी कलाई घड़ी देखी—रात के ठीक 2:15 बज रहे थे। उसने बड़ी चालाकी से चाकू को साफ किया, कबीर के हाथ की उंगलियों के निशान उस पर लगाए ताकि यह आत्महत्या या किसी बाहरी चोर का हमला लगे, और फिर कबीर के फोन से एक मैसेज ज़ोया के फोन पर टाइप करके सेंड कर दिया।कमरे से बाहर निकलकर अमन ने ज़ोया को धीरे से हिलाया। "ज़ोया... ज़ोया उठो। देखो कबीर के कमरे से कोई आवाज आ रही है।"ज़ोया ने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं। वह अमन के साथ कबीर के कमरे की तरफ भागी। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसके सामने फर्श पर कबीर की लाश पड़ी थी। चारों तरफ खून बिखरा हुआ था।"कबीर!!!" ज़ोया की एक दर्दनाक चीख उस सन्नाटे को चीरती हुई बाहर निकल गई। वह फर्श पर बैठ गई और कबीर के बेजान शरीर को हिलाने लगी। उसके कपड़े खून से सन चुके थे।अमन तुरंत पीछे खड़ा हो गया और उसने ज़ोया को अपने कंधों से पकड़कर पीछे खींचने का नाटक किया। उसकी आँखों में बनावटी आंसू थे। "ज़ोया, खुद को संभालो! यह कैसे हो गया? कौन आया था यहाँ?"ज़ोया का रो-रोकर बुरा हाल था। वह उस धोखेबाज़ दोस्त के सीने से लगकर रो रही थी, जिसने अभी-अभी उसके प्यार का कत्ल किया था। अमन ने ज़ोया को गले लगाते हुए कबीर की लाश की तरफ देखा और मन ही मन मुस्कुराया। उसे लगा कि उसका रास्ता साफ हो चुका था, लेकिन वह यह भूल गया था कि कबीर की पलटी हुई दवात के नीचे उसकी वह नीली डायरी आधी खुली रह गई थी, जिसमें कबीर ने मौत से ठीक 5 मिनट पहले कुछ ऐसा लिख दिया था जो अमन के इस परफेक्ट मर्डर का काल बनने वाला था।(जारी है )

लेखक _समीर खान