🌿 बुझता दीपक 🌿(एक मार्मिक कथा)
कोयले की धूल और लाल मिट्टी से घिरे छोटे-से गाँव में झींगुर और जगा की दोस्ती मिसाल मानी जाती थी।
लोग कहते—
“एक लँगड़ा है, दूसरा आलसी…
फिर भी दोनों की जोड़ी राम-लखन जैसी ।”
दोनों सुबह साथ नदी जाते,
साथ हाट में सब्जियाँ बेचते
और शाम को किसी पेड़ के नीचे बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाते।
जगा बचपन से लँगड़ा था।
चलते समय उसका दायाँ पैर घिसटता था।
वह तेज काम नहीं कर सकता था,
पर मन का बहुत साफ था।
और झींगुर…
वह ताकतवर था, मेहनत भी कर सकता था,
लेकिन उसकी एक आदत उसे भीतर से खोखला कर रही थी—
काम टालना।
आज नहीं तो कल।
कल नहीं तो परसों।
धीरे-धीरे यही आदत उसकी जिंदगी पर भारी पड़ने लगी।
उसकी पत्नी चमेली अक्सर झुँझलाकर कहती—
“देखो किशुन को!
तुमसे छोटा है।
मेहनत करके बच्चा शहर पढ़ाने भेज दिया।
और एक तुम हो…
दिनभर उस जगा के साथ घूमो!”
झींगुर हर बार हँसकर बात टाल देता।
उसे लगता—
दुनिया मेहनत से नहीं, चालाकी से चलती है।
इसी सोच में अब दोनों मुर्गा-लड़ाई और छोटी-मोटी बाजियों में भी पैसा लगाने लगे थे।
झींगुर कहता—
“थोड़ी अक्ल दौड़ाओ, पैसा अपने आप बनता है।”
लेकिन किस्मत हर बार साथ नहीं देती।
एक दिन बाजी में दोनों मुर्गा और पैसा दोनों हार गए।
मुरझाया चेहरा, भूख से धँसी आँखें, सूखा हुआ गला…
झींगुर ने जेब टटोली।
पचास का एक फटा नोट निकला।
दोनों के माथे में एक ही विचार कौंधा—
“क्यों न पत्ती में भाग्य आजमाया जाए?”
लँगड़ा ताश में प्रोफेसर था।
पास की झाड़ी में छुपकर दोनों पत्ती खेलने लगे।
जगा ने एक के बाद एक ऐसी चाल चली कि सबकी जेब ढीली पड़ने लगी।
कुछ ही देर में दोनों के हाथ नोटों से भर गए।
दोनों ऐसे खुश हुए जैसे कोई सल्तनत जीत ली हो।
पैसा आते ही भूख-प्यास जाग गई।
दोनों बगुन मुंडा के यहाँ छककर हँड़िया पीने लगे।
नशे में दोनों करोड़ों की बातें करने लगे।
वहाँ बैठे कई नशेड़ी झटके में भारत को विकास की ऊँची जगह पर पहुँचा देते।
वह अलग ही दुनिया थी—
जहाँ हर आदमी खुद को तीसमारखाँ समझता था।
कुछ दिन आराम से कटने लगे।
लेकिन जुए की लत अब सिर चढ़कर बोलने लगी।
अब दोनों सब्जी भी अनमने ढंग से बेचते।
चमेली को कुछ पता न था।
बिना मेहनत का धन दो नहीं, दस पैर लेकर भागता है।
कब पैसा निकला, पता ही नहीं चला।
धीरे-धीरे सब्जी की पूरी पूँजी भी जुए में स्वाहा हो गई।
अब झींगुर वास्तव में लँगड़ा हो चुका था—
न काम बचा था, न पूँजी।
एक सुबह जगा लाल-पीली चमकदार शर्ट पहनकर झींगुर को बुलाने आया।
मोहल्ले के कुत्ते उसे देखकर भौंकने लगे।
अंदर बैठी चमेली गुस्से में बाहर निकली।
जगा को देखते ही बरस पड़ी—
“खबरदार!
जो दोबारा मेरे घर आया।
निकम्मा बना दिया है मेरे आदमी को!
तेरा क्या है?
न बाल-बच्चा, न जिम्मेदारी।
कहीं भीख माँगकर भी खा लेगा!”
हर शब्द जगा के कान में तीर की तरह चुभ रहा था।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस लड़खड़ाते कदमों से वापस मुड़ गया।
उधर झींगुर खटिया पर उदास बैठा रहा।
चमेली चिल्लाती रही—
“आज के बाद अगर उस लँगड़े के साथ दिखे,
तो मैं बच्चों को लेकर रहमत मियाँ के चिमनी-भट्ठे में काम करने चली जाऊँगी।
मेहनत करूँगी,
पर बच्चों का भविष्य बरबाद नहीं होने दूँगी!”
झींगुर सकपका गया।
धीरे से बोला—
“तो… सब्जी का क्या होगा?”
सब्जी जाय भांड में " पैर पटकते हुए बोल पड़ी
चमेली का गुस्सा और बढ़ गया।
असल में झींगुर गाँव से ताजी सब्जियाँ खरीद लाता था,
लेकिन बची हुई सब्जियों को सँभालता नहीं था।
कभी धूप में सड़ा देता, कभी यूँ ही छोड़ देता।
घाटा बढ़ता गया।
चमेली कई बार मायके से पैसे लाकर दे चुकी थी,
पर हर बार सब डूब जाता।
उसी समय रास्ते से गुजरते छोटन ने झगड़ा सुन लिया।
छोटन कभी बहुत गरीब था।
लेकिन उसने राजमिस्त्री और सेंटरिंग का काम सीख लिया था।
अब मोटरसाइकिल पर चलता था।
बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ते थे।
वह आँगन में आकर बोला—
“का हो भाभी, सुबह-सुबह महाभारत?”
चमेली ने सारी बात बता दी।
छोटन ने झींगुर की ओर देखकर कहा—
“मैंने कितनी बार कहा था मेरे साथ चलो।
आज तुम भी मिस्त्री होते।
लेकिन तुम तो उसी लँगड़े के फेर में पड़े रहे।”
फिर छोटन ने अकाल वाली कहानी सुनाई—
दो दोस्तों की कहानी…
जहाँ एक आदमी अपने लँगड़े दोस्त को कंधे पर उठाकर नदी पार करता रहा,
और अंत में दोनों अनाज से वंचित रह गए।
कहानी खत्म कर छोटन बोला—
“भाभी, कहीं तुम लोगों की जिंदगी भी ऐसी न हो जाए…”
उस रात झींगुर सो नहीं पाया।
पहली बार उसे लगा—
शायद सचमुच जिंदगी हाथ से निकल रही है।
सुबह वह चुपचाप जगा के घर पहुँचा।
जगा टूटी चौकी पर बैठा था।
झींगुर को देखकर मुस्कराया—
“आओ भइया…
भाभी का गुस्सा ठंडा हुआ?”
झींगुर की आँखें झुक गईं।
वह धीमे स्वर में बोला—
“जगा…
क्या सचमुच मैं निकम्मा हो गया हूँ?”
जगा कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“भइया…
दुनिया में वही लोग मौज करते हैं जो दिमाग चलाते हैं।
छोटन के फेर में मत पड़ो।
तुम्हें मजदूर बना देगा।
पैसा अक्ल से कमाया जाता है।
अब बैलों जैसा खटने वाला जमाना नहीं रहा।
आज दिवाली की रात है।
मैंने मजबूत बकरी का पट्ठा बेचा है।
आज आखिरी बार भाग्य आजमाते हैं।
अगर किस्मत चल निकली,
तो सब्जी मंडी में अपना बड़ा दुकान होगा।
गाड़ियों से माल भर-भरकर आएगा…”
लेकिन झींगुर का मन अब डोल रहा था।
उसे जुए से डर लगने लगा था।
जगा हँस पड़ा—
“लगता है तू मजदूर ही बनेगा!”
दोस्ती के खिंचाव में आखिर झींगुर उसके पीछे हो लिया।
दिवाली की रात थी।
दीयों की रोशनी से गाँव जगमगा रहा था।
फटाखों की आवाज से पूरा गाँव काँप रहा था।
बच्चे फुलझड़ियाँ जला रहे थे।
गोप-ढोल, मादळ और करताल से चँवरा गा रहे थे ।
महिलाएँ सूप में अरवा चावल और धान लेकर गायों को चूम रही थीं।
इमली के पेड़ के नीचे पूरी जुआ टोली जमा थी।
आज किस्मत जगा के साथ थी।
अच्छा हाथ लगा।
पत्ती पे पत्ती आज जगा की चल निकली थी ।
झींगुर की जेबें नोटों से भर गईं।
अब दोनों पूरी दुनिया से कटकर दूसरी ही दुनिया में पहुँच चुके थे।
इधर चमेली की छाती में तेज दर्द उठा।
उसने छोटे बेटे तपना को भेजा—
“जा… बाबू को बुला ला…”
तपना दौड़ता हुआ पहुँचा—
“बाबू चलो…
माँ को छाती में बहुत दर्द है…”
लेकिन झींगुर को लगा—
उसे घर बुलाने की कोई चाल है।
कुछ देर बाद बड़ा बेटा किशुन भी रोता हुआ पहुँचा—
“बाबू… चलो न…
माँ मर जाएगी…”
एक तरफ रुपयों की गठरी…
दूसरी तरफ पत्नी की पुकार…
झींगुर का मन डोल उठा।
जगा बोला—
“जा भइया…
एक बार देखकर आओ…”
झींगुर तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ा।
जैसे-जैसे वह घर के पास पहुँचा,
महिलाओं के रोने की आवाज साफ सुनाई देने लगी।
उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
आँगन में भीड़ लगी थी।
चमेली जमीन पर शांत पड़ी थी।
दोनों छोटे बच्चे माँ से लिपटकर आकाश-पाताल एक किए हुए थे।
तपना तोतली आवाज में माँ का हाथ हिलाते हुए रो पड़ा—
“उठो न माँ…
मंगली दादी… माँ क्यों नहीं बोलती…?”
किशुन सुबकते हुए बोला—
“बाबा… माँ को क्या हुआ?
माँ… अब हमसे बात नहीं करोगी?
दादी… अब हमें कहानी कौन सुनाएगा?
तपना को खाना कौन खिलाएगा…?”
यह सुनते ही वहाँ खड़े कई लोगों की आँखें भर आईं।
कोई कह रहा था—
“हार्ट अटैक था…
जल्दी अस्पताल ले जाते तो जान बच जाती…”
गाँव की सहिया पूनम बोल उठी—
“अभी हमलोग अन्न नहीं, केमिकल खाते हैं।
समय-समय पर बीपी का चेक जरूरी है…”
मंगली चाची बच्चों को सीने से लगाकर रो रही थी—
“हाय रे तेरी जुआ झींगुर…
तू पैसा नहीं हारा…
चमेली को ही हार गया…”
इतने में बुधन चाचा लाठी पटकते आए—
“हाय रे किस्मत!
अब क्या-क्या देखना बाकी है?
मेरी बेटी का लड़का मोबाइल खेल में पैसा हार गया…
छोरा ने छत से कूदकर जान दे दी...
हे प्रभु! ये कौन सा युग आ गया…”
उसी समय गाँव का बूढ़ा हाकिम भारी आवाज में बोला—
“अरे हमलोग क्या चीज हैं?
जुए ने पांडवों को नहीं छोड़ा।
न जुआ होता, न द्रोपदी दाँव में चढ़ती…”
पास खड़ा रोहित बोला—
“अरे दादू, अब तो हर तरफ जुआ ही जुआ है।
ऑनलाइन गेम, क्रिकेट का सट्टा, मोबाइल ऐप…
लोग घर बैठे बरबाद हो रहे हैं…”
लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे।
उधर जगा एक कोने में दुबका रो रहा था।
आज पहली बार उसे लगा—
मेहनत से कमाया रुपया भले कम हो,
लेकिन उसमें किसी की हाय नहीं होती।
झींगुर काँपते हाथों से चमेली का सिर अपनी गोद में रखे बैठा था।
उसकी आँखों में अब न जुए की चमक थी,
न धन का मोह…
बस अथाह पछतावा था।
वह चमेली के ठंडे माथे को सहलाते हुए रो पड़ा—
“चमेली…
काश मैं तेरी बात मान लेता…
तेरे मन की आवाज सुन पाता…
सच तो यह है कि मैं कभी तेरे लायक था ही नहीं।
मुझे माफ कर दे…
आज मेरे ही कर्मों ने बच्चों को तेरी ममता से दूर कर दिया…”
इतना कहते ही झींगुर फफक पड़ा।
उधर जगा चमेली के पैरों से लिपटकर बिलख रहा था—
“भाभी…
सबसे बड़ा गुनहगार मैं हूँ…
मैंने दोस्ती के नाम पर अपने ही भाई को गलत राह दिखाई।
दोस्त वह नहीं जो साथ बैठकर जुआ खेले…
दोस्त तो वह होता है जो अंधेरे में भी सही राह दिखाए…
मैं दोस्त नहीं…
दुश्मन निकला…”
पूरा आँगन सिसकियों से भर गया।
दूर कहीं दिवाली के पटाखे अब भी फूट रहे थे…
लेकिन झींगुर के घर का दीपक हमेशा के लिए बुझ चुका था।
उस दिन के बाद झींगुर रोज शाम चमेली की मिट्टी पर उसकी याद में एक छोटा-सा दीपक जलाता।
जयगुरु 🙏 🙏 🙏
वंदे पुरुषोत्तमम