मुक्त - भाग 14 Neeraj Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मुक्त - भाग 14

 (एक लकीर का धारावाहिक) परसुत करने को हूँ, मगर ये बात कहने को याद आ गयी बिलकुल टाइम पर।         

                         (एक लकीर ) 

कहने को जो मर्ज़ी कह लो, खुली छूट है। महत्मा ज़ी ने कितना कहा था " धर्म किसी से मत जोड़ो, शांत रहो, मत लड़ो, भारत मे ही एक लकीर कयो हद कयो, मुस्लिम का वखरा सूबा बन जायेगा जिया ज़ी, धर्म मे रूचि नहीं लोगो की एक देश मे जिसे हम भारत कहते है। " जिया को ये बात हजम नहीं होती थी, अक्सर वो लहू की होलियो मे पाकिस्तान बना देना चाहते थे.... पर कयो... एक देश भारत ही कयो नहीं। पहले 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान आजाद हो गया... 15 अगस्त 1947 को भारत.. एक रात मे शमशीरो से लड़ाई, आग ही आग, आपने देश मे ही प्रवासी... पाकिस्तान जाने को... इज्जतो की धजिया उड़ने दी... सरकार के कभी कभी फैसले गलत होते है... इतनी मार धाड़ लड़ाई... पूछो मत। जिया ने पाकिस्तान का प्रधान मंत्री अमानत अली को सौंप दिया... और इधर प्रधान मत्री जवाहर लाल नेहरू ज़ी..... "भारत हमारा सलामत रहे " ये नाहरे थे। राजनीति रणनीति किस बाग की मूली है... नेहरू ज़ी को कया पता... अंग्रेजो के भरोसे फिर देश को धकेल दिया। इतहास की हद आने वाले पीढ़ियों को याद रहेगी। कितना कट कटाव हुआ... आगे लगी गाड़ियों को, ट्रांसपोर्ट को, बज़ारो को, घरो को.... कोई भारत नहीं छोड़ना चाहता था..... कोई पाकिस्तान नहीं, कुछ हिंदू पाकिस्तान मे आपना घर छोड़ कर रो रहे थे, कोई भारत मे मुस्लिम रो रहे थे... हरे भरे मुल्क को छोड़ना कितना दुखदायी होगा... ये तो उस वक़्त की घड़िया ही बता सकती थी... जिया को कया... प्रधान मंत्री नेहरू ज़ी को कया पता... वो तो सवेदना दे रहे थे, जैसे आकाशबानी से------" प्यारे भाईयों लड़ो नहीं, धर्म के प्रति तो बिलकुल नहीं, हमारे देश के ज़ख्म बहुत गहरे होते जा रहे है... सत्भवना कम, आज की कमेट्री लग रही थी... आँखो मे पानी सिसकियाँ चाहिए थी... कहा गयी सब। सिगरेट जिस आदमी के मुँह मे धकेली रहे... अमीरों का चोचला, शेपिन की बोतल, कयो ऐसा किया गया... कयो बनाये गए ये खून की होली मे ऐसे मनसूबे,

                               कयो दो महजबो को लेकर भेद भाव की वोट, जीत ही कया कभी हार हो सकती है। कयो ऐसा किया गया। इतिहास कभी भी खुले गा तो बस एक आग उतरेगी हर किसी की क़लम मे, दूध पीते बच्चे लवारस हो गए। सब किस्मत पर छोड़ दिया गया।

भूख से तड़पते माँ बाप बच्चे शरणार्थी टेंटो मे.... मौते पूछो मत कितनी हुई... ये घर अलग किये गए थोड़ी थे,

देश से अलग हुआ था उसका जिगर.... इतना खुनखुराबा शायद कभी भी मालिक कभी न दूराये। कयो ऐसा हुआ जान कर आज भी मन दुखता है। महसूस करो, तो रो पड़ोगे। कंगाली मे मरने वाले पता ही नहीं कितने थे। जो जानना चाहते हो, वो कभी सत्य नहीं हुआ.... सच एक बारूद है फटा तो गया सब का सब। मेरी ये उपन्यास की कड़ी यही खत्म इसलिये हुई.. कयो की इसकी बंतर मे खून खराबा जयादा था, लाशो को जिंदा ही जला दिया गया था, ये भी एक कांड था... कुछ भी कहो जो जान एक जुट हो कर है, वो अकेले मे नहीं होंगी सच कहता हूँ।            (समाप्ति )

अगला उपन्यास धारावाहिक मे जल्द परसुत होने जा रहा है, इंतज़ार करो, नाम है, बूझो तो जानू.... (चाल पे चाल )"नीरज शर्मा, शहकोट, जलधर 144702।