🌧️ पीपल तले उम्मीद 🌧️कई दिनों से आसमान में बादल लुका-छिपी का खेल खेल रहे थे।
कभी लगता — बस अब मूसलाधार बारिश होगी,
पर तभी दक्षिणी हवा का एक तेज झोंका आता और बादलों को दूर उड़ा ले जाता।
सावन ढलने को था।
खेतों में लगे धान के बिछड़े सूखकर पीले पड़ने लगे थे।
धरती की फटी दरारें मानो किसानों की किस्मत पर पड़ी चिंताओं की लकीरों जैसी लगती थीं।
रामपुर गांव के किसान डोमन महतो की आंखों में गहरी उदासी तैर रही थी।
उसका पूरा परिवार खेती पर निर्भर था।
दो बेटे पास के मोदीडीह स्टील प्लांट में ठेकेदारी मजदूरी करते थे,
जहां रोज काम मिलना भी भाग्य की बात थी।
एक समय यही रामपुर गांव अन्न से लहलहाता था।
धान खेतों से उछल-उछल कर बाहर आता था।
मडुवा, कोदो, बाजरा, गुंदली और मकई इतनी होती कि लोग खाकर भी खत्म न कर पाते।
पर अब खेतों में हरियाली से ज्यादा चिंता उगती थी।
गांव के बीचोंबीच सदियों पुराना एक विशाल पीपल का पेड़ था।
उसकी जड़ों में जैसे पूरे गांव का इतिहास सांस लेता था।
उसी पीपल के नीचे हरखू और गिरिया हल ठोक-पीटकर तैयार कर रहे थे।
हल्की हवा चलती तो पीपल के पत्ते सरसराते —
मानो पेड़ भी आसमान की ओर टकटकी लगाए बारिश की राह देख रहा हो।
हरखू ने बादलों की ओर देखते हुए कहा—
“अगर हवा पश्चिम की होती…
तो आज पानी जरूर गिरता…”
इतने में डोमन वहां आ पहुंचा।
“अब क्या होगा भाई?”
उसने थकी आवाज में कहा,
“सावन खत्म होने को है…”
हरखू ने हल से मिट्टी झाड़ते हुए कहा—
“अपना काम करम करना है डोमन…
बाकी ऊपर वाले पर छोड़ दो।”
गिरिया अब तक चुप बैठा था।
अचानक उसकी आंखें भर आईं।
“तुम लोगों का फिर भी चूल्हा जल जाएगा…
दो-दो बेटे हैं।
पर मेरा क्या होगा?”
उसका गला भर्रा गया।
“आज मेरा सोहन होता…
तो बिरजू के जैसा दो बच्चों का बाप होता "
पीपल के नीचे एक भारी सन्नाटा छा गया ।
गिरिया का इकलौता बेटा सोहन एक साल पहले मर गया था।
दिनभर गुटका चबाना और शाम को यूरिया मिलावटी देसी शराब पीना उसकी आदत बन चुकी थी।
धीरे-धीरे उसका शरीर गलता गया।
जमीन बिकी…
गाय-गोरु बिके…
पर गिरिया अपने बेटे को बचा न सका।
कुछ देर बाद डोमन ने लंबी सांस ली—
“आजकल के लड़कों को गुटका और मोबाइल ने बरबाद कर दिया है…”
इतने में बुधन टुडू कंधे पर कुदाल रखे वहां आ पहुंचा।
“ये जहर बेचने वाली कंपनियों को सरकार बंद क्यों नहीं करती?”
वह गुस्से से बोला।
“हर छोकरा जेब में गुटका और हाथ में मोबाइल लेकर घूम रहा है…”
चारों पीपल के नीचे बैठ गए।
बात धीरे-धीरे पुराने दिनों की ओर मुड़ गई।
एक समय था जब गांव में डॉक्टर नहीं आते थे,
लोग न के बराबर बीमार पड़ते थे।
समय पर बारिश होती।
हर टांड़ फसल से भरा रहता।
लोग मडुवा, बाजरा, मकई, कोदो और गुंदली खाते थे —
और शरीर पत्थर जैसा मजबूत रहता था।
“विज्ञान भी अब इसे ‘पंच अन्न’ कहता है,”
हरखू बोला,
“इसे खाने से शुगर, बीपी, गैस्टिक जैसी बीमारियां कम होती हैं।”
फिर गांव के पास मोदीडीह स्टील प्लांट बना।
हजारों एकड़ जमीन चली गई।
सरकार ने नौकरी और मुआवजे का वादा किया,
पर दलालों ने किसानों और आदिवासियों की जमीन औने-पौने दामों में बिकवा दी।
धीरे-धीरे प्लांट की चिमनियों से निकलती कालिख खेतों पर जमने लगी।
अरहर, मडुवा, मकई और कोदो की खेती घटती चली गई।
गांव के लोग शहर की चमक में अपनी जड़ों से दूर होते गए।
तभी दूर स्कूल की घंटी बजी।
एक युवक साइकिल से आता दिखाई दिया।
“अरे! ये तो मास्टर शिवलाल सोरेन का लड़का बिरसा है!”
हरखू बोला।
बिरसा शहर से पढ़ाई करके लौटा था।
उसने आते ही सबको झुककर प्रणाम किया—
“जयगुरु दादा लोग।”
सबके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
बिरसा ने सूखते खेतों की ओर देखा।
फिर झुककर मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई।
“धान का बिचड़ा तो लगभग खत्म हो गया…”
वह धीमे स्वर में बोला।
डोमन कड़वाहट से हंस पड़ा—
“अब तुम पढ़े-लिखे लोग ही कोई उपाय बताओ बेटा…”
बिरसा कुछ देर चुप रहा।
फिर मिट्टी को हथेली में मसलते हुए बोला—
“दादा…
केवल बारिश कम नहीं हुई है।
हमारी मिट्टी भी बीमार हो गई है।”
“कैसे?” बुधन ने पूछा।
“पहले खेतों में गोबर, पत्ते और जैविक खाद जाती थी।
अब केवल रासायनिक खाद।
मिट्टी की जान खत्म हो रही है।”
गिरिया ध्यान से सुनने लगा।
बिरसा बोला—
“अगर हम फिर से केंचुआ खाद बनाएं…
नीम, गोमूत्र और जैविक तरीकों से खेतों को जिंदा करें…
तो धरती फिर सांस लेने लगेगी।”
हरखू अचानक बोल पड़ा—
“अरे! यही तो हमारे बाबा लोग भी करते थे!”
बिरसा मुस्कुराया—
“हां दादा…
आज विज्ञान भी वही कह रहा है।”
फिर उसकी आवाज गंभीर हो गई—
“और केवल धान के भरोसे जीना भी अब ठीक नहीं।
हमें वैकल्पिक खेती अपनानी होगी।”
सब उत्सुक होकर उसकी ओर देखने लगे।
“हमारी जमीन पर जड़ी-बूटी, अरंडी, तिल, काली हल्दी, अदरक और काली मिर्च जैसी खेती कम पानी में हो सकती है।
खाली पड़ी जमीन पर बांस और फलदार पौधे लगाए जा सकते हैं।
हर पेड़ पर गिलोय की लताएं चढ़ाई जा सकती हैं।”
बुधन ने आश्चर्य से पूछा—
“क्या इससे गांव चल सकता है?”
“क्यों नहीं?” बिरसा बोला।
“दुनिया फिर प्राकृतिक चीजों की ओर लौट रही है।
अगर गांव एकजुट हो जाए,
तो हम खुद बाजार तक पहुंच सकते हैं।”
डोमन की आंखों में पहली बार चमक उभरी।
“तो गांव अभी खत्म नहीं हुआ…”
बिरसा ने आसमान की ओर देखते हुए कहा—
“गांव तब खत्म होता है
जब लोग अपनी मिट्टी पर भरोसा छोड़ देते हैं।”
इतने में बिजली चमकी।
धीरे-धीरे बूंदें गिरने लगीं।
पहली बूंद डोमन के हाथ पर गिरी।
फिर दूसरी… तीसरी…
कुछ ही देर में मिट्टी से सोंधी खुशबू उठने लगी।
हरखू बच्चों की तरह हंस पड़ा—
“अरे! पानी आ गया रे!”
गिरिया ने दोनों हाथ जोड़ लिए।
उसकी बूढ़ी आंखों से आंसू बह निकले।
बरसात अभी हल्की थी…
पर उम्मीद गहरी थी।
समय बीतने लगा।
धीरे-धीरे गांव बदलने लगा।
महिलाओं ने जैविक खाद बनाना शुरू किया।
युवकों ने बांस की कारीगरी सीखी।
महिला समितियों की छोटी बचत से गरीब परिवारों को छोटे कर्ज मिलने लगे।
गांव में पुस्तकालय खुला।
सोलर ऊर्जा से गलियां जगमगाने लगीं।
सबसे बड़ी बात —
गांव में गुटका और कच्ची महुआ शराब लगभग बंद हो गई।
इस बदलाव के पीछे गांव की महिलाओं की सबसे बड़ी भूमिका थी।
चंपा हेम्ब्रम के नेतृत्व में “नशा मुक्ति वाहिनी” बनी।
महिलाएं शाम होते ही टोली बनाकर गांव की गलियों में निकलतीं।
ढोल बजता और गीत गूंजता—
“माटी बचाओ, गांव बचाओ…
नशा छोड़ो, जीवन अपनाओ…”
कई बार शराब बेचने वालों ने उन्हें डराने की कोशिश भी की,
पर चंपा पीछे नहीं हटी।
वह हमेशा कहती—
“जिस घर का चूल्हा शराब से बुझता है,
वह चूल्हा नहीं बुझता घर का दीपक बुझता है ।।
कुछ वर्षों बाद गांव में एक विशाल सभा आयोजित हुई।
अंचल के बीडीओ, स्थानीय विधायक और मोदीडीह स्टील प्लांट के अधिकारी भी आए।
पूरा गांव सजा हुआ था।
सड़क किनारे बांस की कतारें लहरा रही थीं।
हर घर के पीछे सब्जी बाड़ी थी।
महिलाएं जैविक खाद और जड़ी-बूटी उत्पादों की प्रदर्शनी लगाए खड़ी थीं।
मुखिया गोवर्धन महतो मंच पर खड़े हुए और गर्व से बोले—
“आज हमारा गांव पूरे राज्य में
जैविक खाद उत्पादन, जड़ी-बूटी खेती, बांस कारीगरी और वैकल्पिक खेती में अव्वल माना जाता है।”
तालियां गूंज उठीं।
मुखिया कुछ क्षण रुके।
फिर भर्राई आवाज में बोले—
“पर सबसे बड़ी खुशी यह नहीं है…”
पूरा मैदान शांत हो गया।
“सबसे बड़ी खुशी यह है कि
अब हमारे गांव का कोई युवक गुटका और जहरीली शराब से नहीं मरता…”
फिर उन्होंने मास्टर शिवलाल की ओर इशारा करते हुए कहा—
“आज हमारे गांव का मान बढ़ाने में
इनके सुपुत्र बिरसा सोरेन का सबसे बड़ा योगदान है।
हर युवक को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।”
मंच पर बैठे मास्टर शिवलाल की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।
आज उनके बेटे ने केवल उनका नहीं,
पूरे गांव का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया था।
तभी प्रखंड विकास पदाधिकारी ने घोषणा की—
“गांव के सभी स्कूल जाने वाले बच्चों को एक-एक टैब दिया जाएगा।”
तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूंज उठा।
उसी समय स्टील प्लांट के प्रबंधन अधिकारी खड़े हुए।
उन्होंने चारों ओर नजर दौड़ाई —
हरे-भरे खेत…
मुस्कुराते बच्चे…
आत्मविश्वास से भरे ग्रामीण…
फिर माइक संभालकर बोले—
“रामपुर ने हमें सिखाया है कि विकास केवल फैक्ट्री से नहीं होता…
बल्कि गांव, जंगल और इंसान को साथ लेकर चलने से होता है।”
पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा।
उन्होंने आगे कहा—
“आज से मोदीडीह स्टील प्लांट रामपुर गांव को गोद लेता है।
हम यह सुनिश्चित करेंगे कि गांव के हर खेत तक सालभर पानी पहुंचे।”
अब मुखिया जी ने सभा के अंत में माननीय विधायक जी से आग्रह किया।
विधायक रामचंद्र बेसरा मंच पर आए।
उन्होंने खचाखच भरी सभा को देखा।
इतनी भीड़ को लाने के लिए न कोई बस लगी थी, न किसी को भाड़ा दिया गया था।
पास के लगभग बीस गांवों के लोग स्वयं यहां पहुंचे थे।
विधायक भावुक स्वर में बोले—
“मैंने पूरे देश की यात्रा की है…
पर ऐसा दृश्य बहुत कम देखा है।
‘एकता ही बल है।’
‘एक आदेश से चले जो — उसे ही समाज कहते हैं।’
अभाव को भाव में कैसे बदला जाता है,
यह मैंने इस गांव के युवक-युवतियों और बड़े-बूढ़ों से सीखा है।”
उन्होंने पीपल की ओर देखते हुए घोषणा की—
“मैं आज इसी पीपल के नीचे घोषणा करता हूं कि यहां जल्द ही एक वृहद पारा मेडिकल संस्थान खोला जाएगा।
अब इस क्षेत्र का हर बच्चा तन और मन से स्वस्थ होगा।”
यह सुनते ही बुजुर्गों की आंखों में चमक उतर आई।
महिलाएं खुशी से एक-दूसरे का हाथ पकड़ने लगीं।
बच्चे उछल पड़े।
पीपल का वह पुराना पेड़ हवा में झूम रहा था…
मानो वर्षों बाद गांव को फिर से जीवित होते देख
वह भी मुस्कुरा रहा हो।
सभा समाप्त होने लगी।
लोग धीरे-धीरे अपने घरों की ओर लौटने लगे।
उसी समय सफेद साड़ी में लिपटी एक युवती धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसकी गोद में पांच-छह वर्ष का एक बच्चा था।
वह थी — सोहन की पत्नी फूलमनी।
गिरिया ने जैसे ही उसे देखा, उसकी आंखें भर आईं।
बच्चा दौड़कर दादा से लिपट गया—
“दादा! देखो… मास्टर जी बोले हैं मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा!”
गिरिया कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ फेरने लगा।
फूलमनी ने पीपल की ओर देखा।
फिर धीमे मगर दृढ़ स्वर में बोली—
“बाबा…
सोहन तो नशे में खुद को खो दिया…
पर मैं अपने बेटे को मिट्टी, किताब और मेहनत से जोड़कर बड़ा करूंगी।
अब गांव का कोई बच्चा गुटका और शराब में नहीं डूबेगा।”
इतने में पीछे से एक तेज लेकिन आत्मविश्वास भरी आवाज सुनाई दी—
“और ऐसा होने भी नहीं देंगे!”
सबने मुड़कर देखा।
वह थी — चंपा हेम्ब्रम।
गांव की “नशा मुक्ति वाहिनी” की प्रमुख।
उसके साथ दर्जनों महिलाएं खड़ी थीं।
किसी के हाथ में ढोल था,
किसी के हाथ में जागरूकता का लाल-हरा झंडा।
चंपा आगे बढ़ी और बोली—
“पहले लोग कहते थे औरतें क्या बदलेंगी?
आज देख लो —
जिस गांव में हर गली में गुटके की पीक दिखती थी,
वहीं अब हर घर में तुलसी, सब्जी बाड़ी और किताब दिखती है।”
महिलाओं के चेहरे गर्व से चमक उठे।
चंपा ने बच्चों की ओर इशारा करते हुए कहा—
“हमने ठान लिया है —
अब गांव की कमाई दारू में नहीं,
बच्चों की पढ़ाई और खेतों की हरियाली में लगेगी।”
तालियां फिर गूंज उठीं।
पीपल का पुराना पेड़ हवा में झूम रहा था…
उसकी पत्तियां लगातार सरसरा रही थीं।
मानो वह भी देख रहा हो —
कि जिन आंखों में कभी केवल अभाव और शोक था,
वहीं अब नई पीढ़ी के सपने जन्म ले रहे हैं।
गिरिया ने अपने पोते को सीने से लगाया।
फिर आसमान की ओर देखकर धीमे से बुदबुदाया—
“सोहन तो नहीं बचा…
पर लगता है…
उसका बेटा और गांव — दोनों बच गए…”
पीपल के पत्ते फिर सरसराए।
मानो पेड़ स्वयं उसकी पीड़ा और संतोष को सुन रहा हो।
✨ निष्कर्ष ✨
गांव केवल बारिश की कमी से नहीं उजड़ते —
वे तब उजड़ते हैं जब लोग अपनी मिट्टी, जंगल, बीज और परंपराओं पर विश्वास खो देते हैं।
और गांव केवल पानी से नहीं बचते —
उन्हें बचाते हैं जागरूक युवा, संगठित महिलाएं, शिक्षा, श्रम और अपनी जड़ों से प्रेम।
जिस दिन समाज
अपनी धरती को “मां” की तरह देखना शुरू कर देता है,
उसी दिन से उसके पुनर्जन्म की शुरुआत हो जाती है। 🌱
Jayguru 🙏 🙏 🙏
वंदे पुरुषोत्तमम