पंछी का पिंजरा - भाग 2 Anil Kundal द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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पंछी का पिंजरा - भाग 2

हमारे घर की बड़ी सी खिड़की से तकरीबन एक नन्हें से बच्चे के नन्हें नन्हें दस बारह हाथ की ही दूरी पर  लगे हुए आम्रवृक्ष की ऊर्ध्वाधर तन्वंगी शाखा पर बने  छोटे से नीड़ में पल रहे दो पंछियों के नन्हें नन्हें बच्चे वक्त के बढ़ते कदमों की तरह अपने पंख लगा कर ना जाने कब के उड़ चुके थे और उस दीर्घकालिक थकान और उड़ान भरने के साथ ही ही मैं भी पहले से कुछ और बड़ी हो गई थी। उस वर्ष मैं बारह वर्ष की हो चुकी थी। लेकिन अभी तक भी मुझे मेरे बचपन ने छोड़ने के लिए मनाही दे दी थी। और मैं उसके उस स्वैच्छिक निर्णय से प्रसन्न भी थी।

उस दिन मैं घर पर अकेली थी। दादी अपने सबसे छोटे लड़के के जहाँ गई हुई थी और मेरी अम्मा पास पड़ोस के किसी घर में गपशप लड़ाने गईं हुईं थी। तीन चार घंटों के पहले कहाँ आने की थी वें! उन्हें तो लंबी चौड़ी गपशप करने में इतना मजा आता था कि उस लुत्फ़ की हद बताना तकरीबन यकीनन नामुमकिन ही थी। बस कोई शख़्स बातचीत करने के लिए होना चाहिए और उस शख़्स की केवल जबान और कान सही सलामत होने चाहिए, बाकी वो चाहे अंधा हो, लंगड़ा हो और चाहे कैसा भी रहा हो। बस बातों का रसिक हो। रसना बेइंतहा चलनी चाहिए। बस। 

और बाबूजी अभी अपने दफ़्तर में  अपनी साफ़ सुथरी आरामदेह कुर्सी पर बैठे बैठे अनगिनत सी दिखने वालीं मोटी लंबी चौड़ी और ऊबाउ गंदी धूल धूसरित फाइलों के रद्दी के पन्नों की तरह एक एक करके उनके पर्ण उलटने पलटने में लगे होंगे। रात के सात आठ बजे से पहले आतें कैसे? आते ही पूछते कि मेरी गुड़िया कहाँ है? तिसपर गुड्डी और बाकी सभी सदस्य चिढ़ने कुढ़ने लगतें। गुड्डी को संभवतः अम्मा जी अधिकाधिक स्नेह किया करती। और कभी कभार, मन चाहे तो, दादी भी। 

और मेरी छोटी बहन, गुड्डी, भी अम्मा जी के संग चली गई होगी। उसे भी बातें सुनने में बड़ा रस मिलता है। और यदि वार्तालाप कभी कभार अनंत सी प्रतीत लगने वाली अलिफ़ लैला जैसी कहानी की तरह शक्ल अख्तियार कर लेती आकार सी हो जाए, तो वो बिना हिले डुले कईं घंटों तक लगातार सुनते रहने की अजबगजब ललक थी उसके भीतर। 

मैं आज फिर बड़े से दर्पण के सामने खड़ी हो गई थी और बहुत देर तक मैं खुद के चेहरे को अपलक निहारती रही थी। 

अनायास ही हंस दी थी खिलखिलाती हुई मैं, अपनी अनिंद्य खुबसूरती देखकर। और कुछ देर, यकीनन एक दो छोटे छोटे लम्हों के गुजरने के पहले ही मुझे यूँ लगा था जैसे कि सहसा अपनी ही खूबसूरती पर मैं खुद ही खुद पर रीझ गई हूँ! 

उस शीशे के साथ ही छोटे से बक्से में मेरी अम्मा जी के हार श्रृंगार का पूरा समान रखा पड़ा था। जिसे वक्त वक्त पर वरत कर अम्मा जी एक विवाहित महिला की तरह पूर्णता पाती थी। 

मैंने बड़े से सूटकेस में से अम्मा जी की मनचीती नीली साड़ी निकाल ली थी। और कुछ एक चंदेक लम्हों के गुजरने के साथ ही फूहड़ता से जैसे तैसे अपने ऊपर औढ़ लिया था। मैंने जब उस वक्त उस दर्पण में अपनी सूरत देखी, तो मैं मंत्रमुग्धा सी रह गई और आश्चर्य चकित भाव के अतिरेक के रहते मेरी जिह्वा तनिक मुख से बाहर निकल आई। 

अभी मैं अपनी उस तन्द्रा की चपेट से निकल कर बाहर आती कि उसके पूर्व ही किसी के मिठास से भरे शब्दों ने मेरे कानों में यों अमृत घोल दिया हो, " आप कितनी खूबसूरत हो, दीदी! "

मैंने उस आवाज को सुनते ही मुड़कर देखा, तो फिर से दंग रह गई। मेरे सामने मेरी छोटी बहन, गुड्डी, खड़ी थी। उसे देखते ही मैंने झटपट से अपनी देह से लिपटी चिपटी उस बेशकीमती साड़ी को उतारने की कोशिश की। पर सहज ही उतार नहीं सकी थी कि गुड्डी ने मेरे हाथ को झकझोर के रोका और फिर से बहुत ही मधुर स्वर में वो चहकी, " ऐसा क्योंकर करतीं हैं आप? आप पर ये साड़ी कितनी जंचती है। ऐसे लगता है कि जैसे आप कोई यूनानी परी हो। गौरवर्णी मुख और गुलाब से भरे भरे होंठ। और आपकी पतली सी सुघड़ नासिका तो किसी के भी दिल पर गज़ब ढा देगी। मेरी कक्षा की सभी सहेलियाँ अक्सर यही सब कहा करतीं हैं कि गुड्डी तेरी दीदी इतनी खूबसूरत क्यों है? और वो गोरी तो इतनी है कि मानों कि वो कोई इंग्लिश गर्ल हो। दूध से श्वेत रंग है उनका! क्या सच में किसी अंग्रेज दंपत्ति की लड़की है वे? "

" तू भी गुड्डी क्या कमतर खूबसूरत है क्या? एकदम हिरोइन की लड़की के जैसे। हो ना? " मैंने भी गुड्डी का दिल रखने के लिए झूठ मूठ की उसके सौंदर्य की तारीफ की। पर गुड्डी सहज ही बोल उठी, " दीदी ये आपका बडप्पन है और है सच्चा प्रेम। जिसके स्पर्श मात्र से ही पत्थर भी फूल से और लोहा भी सोने सा बेशकीमती हो जातें हैं। अब मैं फिर से अम्मा जी के पास वापिस जाती हूँ। वरना मुझे ढूंढ ढूंढ कर खामखां परेशान हों जाएंगी और मुझपर बिगड़ेगी वो अलग। गुस्से के प्रभाव के सबब दो चार चांटें गालों पर भी रसीद कर सकतीं हैं। क्योंकि गुस्सा चंडाल होता है ना? ये अपने बाबूजी कहा करते हैं। "

 

बस उतना भर सब कुछ कहते ही गुड्डी वहाँ से चली गई। और उसके जाने के बाद मैं फिर से अपने हार श्रृंगार में डूब गई थी। 

और फिर से मैंने अपने खूबसूरत चेहरे को उस शीशे में देखा, तो मैं फिर से खुशी से सराबोर हो गई थी। 

मैंने यों ही रेड कलर्ड लिपिस्टिक अपने गुलाब से सुर्ख होंठों पर लगाई ही थी कि अपना झबरा वहाँ आ धमका और मुझे देखते ही जोर जोर से भौंकने लगा। 

लिपिस्टिक होंठों पर मलने के साथ ही मैं थोड़ा बहुत गुस्सा दिखाते हुए बोली, " अब तुम आ गए? और जरा आप ये बताने का कष्ट करोगे कि हम पर इतने खफ़ा क्यों हो? हमने आपका बिगाड़ा क्या है? "

झबरा अविलंब फिर से भौंकने लगा। मानों कहता है कि मारे भूख के पेट में चूहे उछल कूद मचा रहे हैं और सभी यूँ अनजान बने बैठें हैं कि जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं! "

" अच्छा तो ये बात है! भूख लगी है? सोचते हैं कुछ! थोड़ा तो वक्त दो! इतनी जल्दी सब कैसे इंतजाम हो जाए? " मैं भी एक मुस्कान अपने चेहरे पर बिखेरने के साथ ही बुदबुदाई। 

कुछ देर और अपने चेहरे पर लिपिस्टिक पोऊडर लीपने के बाद मैं दौड़कर अपने घर की किचन की तरफ पहुँची और बड़े से फ्रिज, जैम्स, में से एक बड़ा सा स्टील का डब्बा निकाला और उसके ढक्कन को खोलने के पूर्व ही हंसते हुए बोली, " झबरे! कल रात को बाबूजी ये रस मलाइयों से भरे डिब्बे को बाजार से खरीद लाए थे। संभवतः अम्मा जी और बाबूजी ने एक एक पीस बमुश्किल खाया होगा और बाकी बचे रह गए ये अनेकानेक पीस। जी भरकर खाएंगे। क्यों क्या कहता है? "

फिर से अपनी रौबदार आवाज में झबरा भौंका मानों कहता हो, " डालोगे भी कि यूँ ही व्यर्थ की बातें बनाने में वक्त बेकार गुजारने का इरादा है? "

" सब्र करो, बाबा! अभी कटोरियों में परोसती हूँ। वैसे तो एक दो ही खा कर पेट लबालब भर जाएगा। फिर भी तीन तीन पीस खा लेने में कोई बुराई नज़र नहीं आती। प्रयाप्त रहेंगे? क्यों झबरे, क्या कहते हो? " मैं फिर से बोली और तीन तीन पीस अलग अलग कटोरियों में बराबर बराबर डाल दिए। और फिर अविलंब हम दोनों जने उन बेचारे रस मलाई के पीसों पर टूट पड़ें। 

विजयी होने का सेहरा मेरे सर पर चढ़ा। तीनों पीस खत्म करने के साथ ही मैने अपने हाथों की उंगलियाँ फेरकर अपने मुंह को पोंछकर साफ़ किया। 

और जब मैंने देखा कि झबरा अभी तक भी अपनी सौगात से निबट रहा था। एकाएक मेरी तरफ देखते ही झबरा कुछ गुस्से से भौंका कि मानों कहता हो कि उसके साथ बेइंसाफी हुई है। पीस यकीनन बराबर बराबर नहीं थे। छोटे बड़े रहें होंगे। तभी तो वो अभी तक उनका काम तमाम करने में जुटा हुआ है और मैं कब से निवृत्ति पा चुका था। 

मैंने उसके कहे की कोई भी परवाह नहीं की और फिर से उस दर्पण के सामने आ खड़ी हुई थी। 

पहले तो झबरा कुछ कुछ देर रुक रुक कर भौंक रहा था। कि अचानक से ही वो भौंका और फिर एक दर्दनाक चीख़ भरने के साथ ही वहाँ से भाग खड़ा हुआ। 

मैं उसके उस रवैये से हैरान परेशान हो उठी और जब मैं शीशे से अपनी नज़रों को चुरा कर वहाँ से हटी और पीछे मुड़कर देखा, तो मेरे सारे के सारे बचे खुचे होशोहवास उड़ गए। मेरे सामने अब मेरी दादी खड़ी थीं और गुस्से में भरी हुई। उनकी आंखें अंगार उगल रहीं थीं। 

झबरा ना जाने कहाँ भाग गया था।