"त्रिशा.........."
"जल्दी कर लो ना यार!!!!!!!
आधे दिन की ही छुट्टी मेरी!!!!!!! जल्दी चलो ना!!!!!!" बाहर से आते राजन की तेज आवाज ने त्रिशा को उसके ख्यालों से जगाया और वह अपने विचार दर किनार करके बोली," अरे बस पांच मिनट हो गया!!!!!!!! आ रही हूं!!!!!!"
आज राजन और त्रिशा दोनों गुनगुन का एडमिशन करने के लिए स्कूल जा रहे है। और इसके लिए राजन आधे दिन की छुट्टी पर है और इस आधे दिन में उसे वापस आकर अपनी मां का चैक अप भी कराना है ताकि अगली छुट्टी वह पूरी तरह से अपने स्टार्ट अप में इस्तेमाल कर सके।
तैयार होने के बाद त्रिशा भागती भागती कमरे से बाहर आई जहां राजन गुस्से में बड़बड़ाता जा रहा है," मैंने कल रात में ही बता दिया था कि सुबह गुनगुन के स्कूल चलना है और फिर मुझे तुम दोनों घर छोड़कर मम्मी को लेकर जाना है तो आज जल्दी काम खत्म नहीं कर सकती थी तुम!!!!!! पता क्या करती रहती हो दिन भर तुम!!!!!!! टाईम से काम नहीं कर सकती हो!!!!!!!!!"
राजन की बात सुनकर त्रिशा के मन में आया तो कि वह कहे कि मैं भी सुबह पांच बजे से काम में ही लगी हूं पर मेरा काम पता नहीं क्यों तुम्हें नहीं दिखता। पर हालात की नजाकत देखकर त्रिशा चुप ही रही और आकर बोली," अब तो आ गई ना मैं चलिए अब जल्दी!!!!!!! नहीं तो देर हो जाएगी!!!!!!!"
"हां चलो अब !!!!!" राजन ने आगे आगे चलते हुए कहा और फिर त्रिशा भी गुनगुन का हाथ पकड़ कर उसके पीछे आने लगी।
कुछ समय बाद वह तीनों स्कूल पहुंचे जहां जाकर रिसेप्शन पर राजन ने एडमीशन फार्म लिया और उसे फटाफट भरने लगा। फार्म के साथ उसे तीनों के आधार कार्ड की फोटोस्टेट और बिजली का बिल जो उनके स्थानीय निवास का प्रमाण उसकी भी फोटोकाॅपी लगानी थी। राजन ने फार्म भरने के बाद उस पर अपने हस्ताक्षर कर त्रिशा से हस्ताक्षर करवाए और फिर त्रिशा से कहा," वो सारे कागज दो जो हम फोटोस्टेट करा के लाए है"।
त्रिशा ने एक फोल्डर से एक एक कर सारे कागज राजन को दिए और राजन ने फटाफट सभी को पिन अप किया स्टेपलर से और फार्म जमा कराने चला गया। त्रिशा गुनगुन का हाथ पकड़े वहीं एक साईड सोफे पर बैठी राजन का इंतजार करने लगी।
त्रिशा ने देखा कि राजन वापस उनकी ओर आ रहा है। "लगता है सारा काम हो गया और अब हमारी गुनगुन भी स्कूल जाया करेगी।" त्रिशा ने मन ही मन खुश होते हुए सोचा। तभी उसने देखा कि राजन उसे बाहर चलने की ओर इशारा कर रहा है। तो उसके संकेत को पाते ही त्रिशा ने गुनगुन का हाथ पकड़ा और वह भी चल दी उसके पीछे पीछे।
"गुनगुन का एडमीशन हो गया क्या?????" त्रिशा ने खुशी से राजन से पूछा जब वह उसके पास पहुंची पर राजन ने कोई जवाब नहीं दिया और स्कूल के मैन दरवाजे से बाहर निकल कर पार्किंग में अपनी गाड़ी की ओर बढ़ने लगा।
इस समय पार्किंग में कुछ भीड़ सी थी। इसलिए गुनगुन का हाथ त्रिशा ने कस कर पकड़ लिया। और त्रिशा को लगा कि आस पास कि चहल पहल के कारण राजन ने शायद उसकी बात सुन नहीं पाई और चलते चलते राजन उससे थोड़ा आगे भी निकल गया है तो वह गुनगुन को लेकर और भी तेजी से आगे बढ़ी और जब वह लगभग उसके पास पहुंच सी गई तो उसने दोबारा पूछा," बताइए ना??????? गुनगुन का एडमीशन हो गया ना?????"
इस बार भी राजन ने कोई जवाब नहीं दिया तो त्रिशा ने अपने दूसरे हाथ से राजन का हाथ पकड़ कर उसे रोका कर पूछा," अरे बताइए...........ना........"
त्रिशा के मुंह से केवल इतने शब्द ही बाहर निकल पाए थे कि अपने हाथ पकड़ कर रोके जाने वाला राजन पीछे त्रिशा की ओर पलटा और फिर बिना कुछ बोले, बिना कुछ कहे बस एक कस कर थप्पड़ त्रिशा के गाल पर रख दिया।
त्रिशा जिसके चेहरे पर अपनी बच्ची के एडमीशन की खुशी शामिल थी वह खुशी तो एकदम से गायब हो गई और उसके मुंह से निकलते शब्द भी रास्ते में हीं गायब हो गए। त्रिशा की आंखे जो खुशी से चमक रही थी अब उनमें हैरानी, कुंठा, दुख, पीड़ा के मिले जुले भाव आ गए वह समझ नहीं पा रही है कि इस समय इस घड़ी उसे किस तरह से रिएक्ट करना चाहिए।
त्रिशा ने राजन का हाथ उसी समय झटके से छोड़ा और फिर उसी हाथ से अपने गाल को छुआ और पहले तो राजन की ओर देखा जिसके चेहरे पर सिवाए गुस्से के कुछ ना था, पछतावे एक अंश मात्र भाव ना था उसके चेहरे या आखों में। वह बहुत कुछ जवाब में कहना चाह रही है पर अपनी बात कहने के शब्द उसके पास है भी नहीं और खोजने पर मिल भी नहीं रहे है। उसे राजन की ओर देख कर उसकी अजीब सी फिलिंग आ रही है। और वह अपनी इस फिलिंग को समझ नहीं पा रही है इसलिए बस बहती आंसूओं की धारा के हाथ वह चुपचाप बिना कुछ कहे राजन की आखों में झांक रही है। ताकि शायद उनमें कहीं अफसोस , दुख या पछतावे को देख सके पर सिवाए गुस्से के उसे यहां कुछ ना दिखा।
त्रिशा ने राजन की आंखो के साथ साथ आसपास भी देखा तो महसूस किया कि वहां मौजूद लगभग सभी लोग उनकी ओर देख रहे है। त्रिशा को यह और भी अजीब और दुखद लगा। उसे लगा जैसे यहां खड़े यह सभी लोग उसे ही घूर रहे है। कोई उसे देख कर उस पर हंस रहा है, कोई मजाक उड़ा रहा है कोई दया दिखा रहा है। कोई तरस खा रहा है। पर जो भी हो यह सब उसे बहुत ही अजीब सा लग रहा है। एक अजीब सी शर्मींदगी उसे महसूस हो रही है। वह अपने आपको ना जाने क्यों बड़ा असहाय, अबला और निम्न महसूस कर रही है।
"क्या?????????"
"ऐसे क्या देखे जा रही हो तुम मुझे??????"
"ऐसे क्यों घूरे जा रही हो तुम???????" राजन ने एक हाथ से त्रिशा के झटकते हुए गुस्से में तेज आवाज में कहा।
लेकिन त्रिशा ने कोई हरकत नहीं की वह चुपचाप खड़ी सुनती रही और राजन भी बिना रुके अपनी बात कहता रहा, " तुम्हें पता है तुम्हारी वजह से मेरा बना बनाया काम रह गया!!!!!!!!!!!" "आज सारा काम हो जाता यहां का और फिर बाद में अस्पताल का भी पर तुमने सारे काम बिगाड़ दिए!!!!!!!!" जब मैनें तुमसे कहा था कि सारे कागज देते हुए तो तुमने गुनगुन के बर्थ सर्टिकेट का फोटोस्टेट क्यों नहीं रखा???????????"
" अब उस एक सर्टिफिकेट की वजह से उन्होनें फार्म वापस कर दिया है!!!!!!!!!" "अब या तो आज दोबारा लौट कर आओ या फिर कल आकर जमा करो!!!!!!!!! और अगली छुट्टी तक रुक नहीं सकते नहीं तो एडमीशन बंद हो जाएगे!!!!!!!!"
" मुझे समझ नहीं आता त्रिशा तुम इतनी बेवकूफ कैसे हो सकती हो???????? तुम्हें नहीं पता क्या कि बर्थ सर्टिफिकेट लगता है स्कूल में!!!!!!!!!!! तो रखा क्यों नहीं????????? और घर से निकलने से पहले चैक क्यों नहीं किया?????????"
" मैं यहां अपनी एक छुट्टी बचाने की सोच रहा था और तुमने एक छुट्टी और बढ़ा दी!!!!!!! तुम्हें क्या लगता है वो आॅफिस तुम्हारे पापा का है इसलिए मै जब बोलूंगा मुझे वहां छुट्टी मिल जाएगी????????"
" अरे दस बाते सुननी पड़ती है पर यह सब तुम कैसे जानोगी????? तुम्हें तो मिल रही है ऐश बस!!!!! बस साले दिन घर पर पड़े रहो और आराम करते रहो!!!!!! और काम ही क्या है??????"
राजन बिना रुके बिना जगह देखे बस अपनी भड़ास निकालता रहा और त्रिशा बस चुपचाप सुनती रही। उसके दिमाग ने फिलहाल के लिए काम करना बंद कर दिया था। अपनी भड़ास उसपर उतार लेने के बाद राजन ने गाड़ी का दरवाजा खोला उसमें जाकर बैठ गया। और त्रिशा वहीं खड़ी रही बुत बन कर।
त्रिशा को होश तब आया जब राजन ने जोर जोर से गाड़ी का हार्न मारा और अंदर से चिल्लाते हुए बोला," अब घर जाना है या नहीं????????? अगर जाना है तो अंदर आकर बैठ जाओ!!!!!!!"