निलु की बात सुनकर कुंम्भन गरजते हूए कहता है।
हे मुर्ख मानव । कदाचित मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है के तुम मेरे वस्त्र की बात कर रहे हो।
निलु बिड़ी का एक गहरी कस्त लगाकर कहती है।
कदाचित , प्रतीत ! हे भगवान ये किस आदी मानव से पाला पड़ गया आज मेरा । इसकी आधी भाषा मुझे वैसे ही समझ मे नही आ रही है। लगता है नाटक कंपनी मे एक ही केरेक्टर का रोल प्ले कर करके इसका इसका भाषा भी वैसी ही हो गई है।
कुंभ्मन निलु से कहता है।
देखो मानव मैं अंतिम बार चेतावनी दे रहा हूँ । इतनी रात्री को इस जंगल मे ना आया करो। ये जंगल तुम मानवो के लिए सुरक्षित नही है।
कुंम्भन के बार बार मानव कहने से निलु को अब गुस्सा आने लगता है। निलु गुस्से से बिड़़ी को एक कस्त लगाता है और फिर बिड़ी को जमीन मे फेंक कर उसे अपने पैर से मसल कर कहता है।
क्या तुम मानव नही हो या क्या हो । कोई देवता हो या दानव हो। तबसे मैं तुम्हारा नोंटकी दैख रहा हूँ । मानव मानव बोल बोल कर मेरा दिमाग खराब कर दिया है। अब तुम यहां से भागते हो या नही । वरना कही तुम यहां पर असुरक्षित ना हो जाओ।
निलु की बात सुनकर कुंभ्मन मुस्कान देता है। जिसे दैखकर निलु कहता है।
कौन हो तुम । कहां से आए हो। और यहां इस जंगल मे इतनी रात को क्या कर रहे हो ?
कुंम्भन कहता है।
मैं यहां इसी जंगल मे रहता हूँ । और मैं यहां पर अपनी पुत्री को बचाने के लिए आया हूँ । मैं किसी की खोज मे निकला हूँ।
कुंभ्मन की बात पर निलु इधर उधर दैखने लगता है। जिसे दैखकर कुंम्भन कहता है।
क्या हुआ मानव तुम क्या दैख रहे हो। यही के यहां पर कोई नाटक की सुटिंग तो नही चल रही है । क्योकी तुम्हारी बात मुझे कुछ अजीब लग रहा है।
निलु कहता है।
निलु की बात सुनकर कुंम्भन कहता है।
बात तो मुझे तुम्हारा भी सुनकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है। क्योकी मेरे इतना प्रयास करने पर भी तुम नही समझ रहे हो। हे मानव मैं तुम्हें अंतिम चेतावनी दे रहा हूँ । अब तुम यहां से चले जाओ। तुम एक सुंदर मन वाले मानव लगते हो। इसिलिए मैं तुम्हें बार बार समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ ।
निलु फिर अपनी जबान चलाते हूए और कुम्भन के कंधे पर हाथ रखते हूए कहता है।
वैसे तो ये जगह तुम्हारे लिए भी सुरक्षित नही है। तो फिर तुम यहां कर रहे हो।
अब कुंम्भन गुस्से से लाल हो गया था कुंम्भन गुस्से से कहता है।
मुर्ख हो तुम मानव जो मेरे इतना समझाने पर भी नही समझे । और तुम्हारी इतनी दुस्साहस के तुम मेरे कंधे पर हाथ रखो ?
कुंम्भन के गुस्से को दैखकर निलु डर से कहता है।
अच्छा बाबा ठीक है। ठीक है। मैं चला जाऊगां पर अभी नही । तो फिर कब प्राण त्यागने के बाद ।
कुंम्भन गुस्से से कहता है।
तुम भाग्यसाली हो मुर्ख मानव जो मेरे हाथ से बचकर जाओगे। क्योकी मैं वचन बध्द हूँ । अन्यथा अभी तक तुम यहां पर मृत पड़े होते । अच्छा भाई ठीक है मैं चला जाता हूँ कुछ समय के बाद । क्योकी मेरे मालिक को आने दो उसके बाद मैं चला जाऊगां।
निलु कहता है।
कुंम्भन कहता है।
कहां गया है तुम्हारा मालिक वो भी इतनी रात्री को ?
निलु कहता है।
वो जंगल के अदर गये है। किसी अघोरी बाबा से मिलने के लिए। अघोरी का नाम सुनकर कुंम्भन गुस्सा हो जाता है और गुस्से से निलु से पूछता हे।
अघोरी बाबा ? ये तुम्हारा मालिक अघोरी बाबा से क्यो मिलने के लिए गया ।
कुंम्भन के अघोरी बाबा के बारे मे पूछने पर निलु अपने दांत दिखाते हूए कहता है।
तुम्हें उससे क्या । तुम ये सब जानकर क्या करोगे ? और भाई तुम होते कौऩ हो मुझसे ये सवाल करने वाले ।
कुंम्भन अपनी आखे बड़ी बड़ी करके पूछता है।
" ऐ मुर्ख मानव अपनी मृत्यु को पहचान दैख मुझे मैं स्वयं तेरा काल हूँ। हे मुर्ख ! अब और विवाद ना कर और मेरे धेर्य की परीक्षा ना लो अन्यथा ....?
अन्यथा क्या ....! क्या कर लोगे तुम ?
निलु अपनी सर्ट को उपर करते हूए कहता है।
अजीब पागल से पाला पड़ा है यार कभी रो रहे हो कभी कहते हो मेरी पुत्री को बचाना है कभी मुझे मानव कह रहे हो और तुम्हे अब ये भी जाननी है के मेरा मालिक कौन हो और अघोरी के पास क्यों गया है।
निलु अपने कमर पर हाथ रखकर कहता है :
" वाह बेटा ! अब तुम्हें मैं अंतिम क्या कहते है उसे ..! "
अपना सर खुजाते हूए याद करके कहता है :
" हां मैं तुम्हे भी अंतिम चेतावनी दे रहा हूँ । "
निलु कुंम्भन से उसी के भाषा मे बोलने की कोशीश करता है ।
अगर तुम यहां पर अ.....! अगर तुम यहां से शीघ्र नही गये तो मैं ... मैं पता नही क्या करुगां । क्योकी मेरा मतीष्क ऐसे ही जल कर ताप हो रहा है।
निलु धिरे से अपने आप से कहता है।
पता नही मैं भी क्या कह रहा हूँ।
निलु चिल्लाते हूए कुम्भन से कहता है :
अब तुम एक भी वर्ड.... मेरा मतलब शब्द ना कहो और यहां से निशब्द होकर निकल जाओ वरना ...!
निलु फिर रुककर कहता है :
" ओ हाँ याद आया .... माफ करना....वरना को क्या कहते है .... अन्यथा हाँ । अन्यथा मैं तुम्हें कुंम्भन को
सौंप दुगां। जानते हो ना के यहां पर रात्री मे कुंम्भन निकलता है। "
निलु किसी तरह अपनी गलत भाषा से कुम्भन को कहता है।
"कही भुल से भी तुम उसके ...! "
निलु सौचते हुए कहता है ।
" छोडो यार मैं इसकी भाषा मे क्यों बोलु मैं इसे अपनी भाषा मे ही समझाता हूँ । कहीं तुम उसके हाथ मे लग गए ना बेटा तो तेरा फिर राम नाम सत्य है हो जाएगा।"
कुंम्भन अपना नाम सुनकर कहता है।
" बहुत ज्यादा जानकारी रखे हो कुंम्भन के बारे मे ! कभी उससे भेंट भी हुआ है तुम्हारी ? अगर कुम्भन का वास्तविक रुप दैख लोगे ना तो यही पर तुम मृत्यु को प्राप्त करोगे।"
निलु कुंम्भन से अकड़ कर कहता है।
" क्या मृत्यु ? अरे मैं उससे नही डरता वो मुझसे डरता है , और हाँ दैखा नही तो क्या हुआ । पर अगर वो कभी गलती से भी मेरे पास आ गया ना तो उसी दिन कुंम्भन का आखिरी दिन होगा। "
कुंम्भन अपनी आंखे बड़ी बड़ी करके कहता है।
" अच्छा ! ऐसी कौन सी शक्ती है तुम्हारे पास जो तुम्हें ये भ्रम हो गया है के तुम कुंभ्मन को परास्त कर सकते हो ? "
निलु कहता है।
" अगर शक्ती नही होती तो क्या ऐसे ही कुंम्भन को इस जंगल मे इतने वर्षो से कैद करके रखा हूँ । "
निलु के मुह से ये बात सुनकर कुंभ्मन गुस्से से लाल हो जाता है। और गरजते हूए निलु से कहता है।
" अच्छा ! वो तुम हो जो मुझे इस जंगल मे इतने वर्षो से बंदी करके रखा है। लगता है ईश्वर की मेरे उपर आज कृपा हूई है। ऐ दुष्ट मैं तुझे ही इतने वर्षो से ढूंढ रहा था। मैं कबसे आज के इस क्षण का प्रतिक्षा कर रहा था । और आज वो क्षण आ गया है । अब मैं तुम्हे मृत्यु दंण्ड दुगां ।"
निलु कुंम्भन की बात को सुनकर हैरान था वो डर से कुछ भी नही बोल पा रहा था । निलु किसी तरह अपनी लड़खड़ाते हूए आवाज से पूछता है।
" त.....ततत....तुम क..कक कौन हो ? "
कुम्भन कहता है।
" मैं ही कुंभ्मन हूँ । "
कुंम्भन के इतना कहते ही मानो निलु की जान हलक मे आ जाती है। निलु डर से कांपते हूए कहता है।
" क..क..क..कक कुंम्भन ! प..पप..पर म..म मैं कैसे मान लुं के तुम क..क..कुंम्भन हो?"
कुंम्भन जौर जौर से हंसते हुए कहता है।
" मृत्यु की तुम परिचय मांग रहे हो मुर्ख । आज तेरा
अंतिम रात्री है। और तेरे पास केवल कुछ ही छण शेष है। इससे पूर्व के मैं तुम्हें मृत्यु दंण्ड दूं । बता के मेरी पुत्री कुंम्भनी का मणी कहां है?"
To be continue.....1242