तेरे मेरे दरमियान - 108 CHIRANJIT TEWARY द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तेरे मेरे दरमियान - 108

अनय :- अरे शमिका ये तुमसे झुट बोला है , ये मेरे कंपनी का मामुली सा एम्पलाई है , ये कबसे कंपनी का मलिक हो गया ।

अनय से इतना सुनकर शमिका का गुस्सा सातवे आसमान पर था , भागकर विकी के पास जाती है और उसे एक जोरदार तमाचा मारती है ।

पूरा माहौल एक पल के लिए शांत हो जाता है। उसी समय आदित्य भी आगे आता है और विकी से कहता है —

आदित्य (कड़क आवाज़ में): - अब तुझे तेरे किए की सज़ा मैं दिलाऊँगा विकी। दूसरों की जिंदगी से खेलने का बहुत शौक है ना तुझे? अब तेरी दुश्मनी मुझसे है। मैं भी देखता हूँ… तू जेल से बाहर कैसे आता है।

विकी हल्की हँसी हँसते हुए कहता है —

विकी: - तू… एक मामूली सा आदमी… मुझे जेल में रखेगा? मैं बस दो दिन में बाहर आ जाऊँगा। क्या होगा… कोर्ट में माफी मांग लूँगा और मोनिका से शादी कर लूँगा।”

विकी आदित्य से इतना सुनकर हल्की मुस्कान के साथ कहता है --

विकी :- तु ... एक मामुली सा आदमी , मुझे जेल मे रखेगा । मैं बस दौ दिन मे बाहर आ जाउगां । क्या होगा , मैं कोर्ट मे माफी मांग लूगां और मोनिका से शादी कर लुगां । 

तभी वहां पर अनय आता है और कहता है --

अनय :- जिसे तु मामुली आदमी समझ रहा है , जानते हो वो कौन है ?

विकी हैरानी ये आदित्य की और दैखता है तभी अनय आदित्य की सारी सच्चाई उसे बता देता है । 

ये सुनकर विकी की हालत और खराब हो जाती है , लेकिन वह फिर भी घमंड में कहता है —

विकी: - ठीक है… पहचानने में गलती हो गई। पर फिर भी मैं कोर्ट में माफी मांग लूँगा… और मोनिका से शादी कर लूँगा। तब तो मैं छूट ही जाऊँगा। और मोनिका के पास मेरे अलावा कोई रास्ता भी नहीं है।

इतना सुनते ही पीछे से आवाज़ आती है —

“इसका तो चेहरा ही काला पड़ गया।

सब पीछे मुड़कर देखते हैं…विकास वहाँ खड़ा था। विकास आगे आकर हाथ जोड़ता है।

विकास: - मैं फिर से आप सबसे माफी माँगना चाहता हूँ… खासकर तुमसे आदित्य। मैंने बहुत बड़ी गलतियाँ की हैं।

फिर वह मोनिका की तरफ देखता है और कहता है —

विकास: - अगर आप लोगों को बुरा ना लगे… तो मैं मोनिका से शादी करना चाहता हूँ। शायद किसी की जिंदगी सँवार कर मैं अपने पापों का थोड़ा प्रायश्चित कर सकूँ।

वह धीरे से मोनिका के पास जाता है।

विकास: - मोनिका… अगर तुम चाहो तभी ये हो सकता है। क्या तुम मुझसे शादी करोगी? मैं बदल चुका हूँ। मैं वादा करता हूँ… मैं तुम्हें और तुम्हारे बच्चे को हमेशा खुश रखूँगा।

मोनिका कुछ पल उसे देखती रहती है। उसकी आँखों में भावुकता थी। फिर वह धीरे से हाँ में सिर हिला देती है।

ये देखकर उसके माँ-पापा की आँखों में खुशी के आँसू आ जाते हैं।
आसपास खड़े लोगों के चेहरों पर भी हल्की मुस्कान आ जाती है।

आज बहुत सारी सच्चाइयाँ सामने आई थीं…कुछ रिश्ते टूटे थे…पर कुछ नई शुरुआत भी होने वाली थी। और उसी भीड़ में खड़े आदित्य और जानवी…अब भी एक-दूसरे को चुपचाप देख रहे थे क्योंकी उनकी कहानी…अभी खत्म नहीं हुई थी। ।

जानवी का घर ...घर का दरवाज़ा खुलता है। जानवी धीरे-धीरे अंदर आती है। उसके हाथ में वही फाइल थी जिसमें डिवोर्स के पेपर थे।
घर में सन्नाटा था। जैसे ही उसकी नज़र उन कागज़ों पर पड़ती है… उसका दिल फिर टूट जाता है। वह सोफे पर बैठ जाती है और फाइल खोलती है। उसमें आदित्य का साइन दिखाई देता है।

बस…इतना देखते ही उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं।

जानवी (रोते हुए खुद से): - मैंने क्या कर दिया…? जिस इंसान ने मुझे सबसे ज्यादा प्यार किया… मैंने उसी को अपनी जिंदगी से निकाल दिया…

वह अपना चेहरा दोनों हाथों में छुपाकर जोर-जोर से रोने लगती है। उसे बार-बार आदित्य की बातें याद आ रही थीं —उसका ख्याल रखना हर मुसीबत में उसके सामने खड़ा होना बिना शिकायत के सब सह लेना

जानवी: - आदित्य… तुम इतने अच्छे क्यों थे…? अगर तुम भी बाकी लोगों की तरह होते…तो शायद मुझे इतना पछतावा नहीं होता…

उसी समय अशोक कमरे में आते हैं। वे अपनी बेटी को उस हालत में देखकर दुखी हो जाते हैं। अशोक धीरे से उसके पास बैठते हैं।

अशोक: - बेटा… खुद को इतना मत सज़ा दे।

जानवी आँसू भरी आँखों से अपने पापा की तरफ देखती है।

जानवी: - पापा… मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मैंने एक अच्छे इंसान का दिल तोड़ दिया…और आज शायद उसी का सजा मुझे मिला है ।

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

जानवी: - आज समझ आया…आदित्य मुझे कितना प्यार करता था…आज मेरी हालत ऐसी है तो आदित्य को कितना अब तक कितना दुख हूआ होगा ।

वह रोते हुए कहती है —

जानवी :- पापा… मैं उससे प्यार करती हूँ… मैं उसके बिना नही रह पा रही हूँ पापा ...

ये सुनकर अशोक कुछ पल चुप हो जाते हैं फिर धीरे से कहते हैं —

अशोक: - कभी-कभी इंसान को अपनी गलती समझने में देर हो जाती है बेटा…पर अब सब खत्म हो गया। काश तुम मेरी बात पहसे समझ जाती ।

लेकिन जानवी सिर हिलाती है।

जानवी: - नहीं पापा , मुझे समझ नही आ रहा है के मैं क्या करु , मैं आदित्य के बिना नही रह पा रही हूँ ।

जानवी फूट-फूट कर रोने लगती है अशोक अपनी बेटी को ऐसे रोते हूए दैखकर मन ही मन सौचता है --

अशोक :- मुझे एक बार आदित्य से बात करनी चाहिए । एक आखिरी बार ..


उधर – आदित्य का घर ...उधर आदित्य अपने कमरे में खड़ा था।

उसके सामने एक बैग रखा था। वह अपने कपड़े उसमें रख रहा था।
कमरे में उसकी माँ, पापा, भाई और दोस्त खड़े थे। सबके चेहरों पर चिंता थी।

आदित्य की माँ (आँखों में आँसू): - बेटा… तू सच में जा रहा है?

आदित्य हल्की मुस्कान देने की कोशिश करता है।

आदित्य: - हाँ माँ…अब यहाँ रुककर क्या करूँगा?

उसकी आवाज़ में दर्द छुपा हुआ था।

अनय :- भाई… शायद अभी भी सब ठीक हो सकता है। तुम ओक बार जानवी से बात तो करो । 

आदित्य सिर हिलाता है।

आदित्य: - नहीं… अब सब खत्म हो चुका है। अगर उसके मन मे कुछ भी होता तो वो आज कोर्ट मे जरुर कुछ कहती । पर वो चुप थी और उसकी चुप्पी ही सब सवालों का जवाब था ।

वह बैग बंद करता है। उसकी आँखें भीग जाती है और फिर कहता है --

आदित्य (धीरे): - शायद… हमारी कहानी यहीं तक थी…अब कोई फायदा नही है ।

उसकी आवाज़ भारी हो जाती है।

आदित्य: - मैं यहाँ रहूँगा… तो हर जगह मुझे उसकी याद आएगी।

बेग को बंद करते हूए कहता है --

आदित्य: - इसलिए जा रहा हूँ…उससे दूर… उसकी यादों से दूर।

लेकिन वह खुद भी जानता था… कुछ यादें… कभी दूर नहीं होतीं और उसी समय…दूसरी तरफ जानवी भी उसी दर्द में रो रही थी।
दोनों एक-दूसरे से दूर थे…पर आज भी उनके दिल एक ही दर्द में बंधे हुए थे।

शाम का समय था। आदित्य अपना बैग लेकर घर से निकलने ही वाला था। तभी दरवाज़े पर अशोक आ जाते हैं। घर में मौजूद सभी लोग उन्हें देखकर चौंक जाते हैं। अशोक की नज़र सीधे आदित्य पर पड़ती है।

आदित्य भी उन्हें देखता है… पर उसके चेहरे पर अब एक शांत दर्द था। अशोक धीरे-धीरे उसके पास आते हैं।

अशोक: - आदित्य… बेटा मुझे तुमसे—

लेकिन आदित्य तुरंत हाथ उठाकर उन्हें रोक देता है।

आदित्य (शांत पर भारी आवाज़ में): - प्लीज़… अंकल। आज कुछ मत कहिए।

अशोक चुप हो जाते हैं।

आदित्य: - मैं जानता हूँ आप क्या कहने आए हैं। आप जानवी के लिए आए हैं… है ना?

अशोक की आँखें झुक जाती हैं।

आदित्य: - अंकल… मैंने आज तक जानवी से कभी कोई शिकायत नहीं की और आज भी नहीं है। पर इस बार मैं आपकी बात नही रख सकता , मुझे इस बार माफ कर दिजिए ।


उसकी आँखों में हल्का दर्द झलकता है , आदित्य को लगता है के अशोक इसके पास जानवी को मनाने के लिओ आया है ।

आदित्य: - पर अब सब खत्म हो चुका है। आज कोर्ट में जो होना था… वो हो गया।

अशोक कुछ बोलने की कोशिश करते हैं —

अशोक: - बेटा… अगर तुम दोनों एक बार—

आदित्य धीरे से सिर हिलाता है।

आदित्य: - नहीं अंकल। अब वापस मुड़ने का कोई मतलब नहीं है।

कुछ पल की खामोशी छा जाती है।

आदित्य: - आप बस इतना समझ लीजिए… मैं आज भी जानवी की खुशी चाहता हूँ अगर वो मेरे बिना खुश है…तो यही सही है। अब उसे खुश रहने दिजिए । 

यह कहते हुए उसकी आवाज़ थोड़ी काँप जाती है। फिर वह अपना बैग उठाता है।

आदित्य: - आप अपना ख्याल रखिए अंकल।

और बिना कुछ और सुने…आदित्य वहाँ से चला जाता है। अशोक उसे जाते हुए देखते रह जाते हैं। उनकी आँखों में भी पछतावा था। 

अशोक उसे कहना तो बहुत कुछ चाहता था , अशोक अपनी बेटी की हालत कहना चाहता था पर आदित्य अब और कुछ सुनने को तैयार नही था और वो वहां से चला  जाता है ।
To be continue....1027

Note :- अब ये कहानी अपने अंतिम छोर की और है और 6 एपिसोड आखिरी बचे है । इस कहानी को आपलोगो ने बहुत प्यार दिया , आपके अच्छे रेटिंग आये , अच्छे कमेंट आए । मैं ... अपने कुछ खास जिन्होंने इस कहानी के हर एपिसोड पर अच्छे कमेंट और रेटिंग दिए । जिन्होने सुरु से अंत तक साथ दिया , उनका धन्यवाद करता हूँ । Vaishnavi shukla ji ,  Vaibhavi tamboli ji , Jayshree s hadsni ji , Deep kumar , Ravi , Rekha ji , Gitortha dev nath ji , antima ji , pal ji , Taraben chouhan ji , Anamika kumari ji . और भी मेरे पाठक है जिनका मुझे दिखाई नही पड़ता है क्योंकी शायद फोलो नही है इसिलिए । और भी बहुत लोग है जो बाद मे कहानी को पड़ेगें और कंमेट और रेटिंग करगें उन सबको भी  बहुत - बहुत धन्यवाद । इसमे मेरी एक और कहानी आती है Shrapit ek prem kahani , उसे भी पडिए और इसके बाद मै एक और कहानी आप लोगो के बिच लाना चाहूँगा , जिसका नाम है अनजाने रिश्ते ।