जीवंत देवता prem chand hembram द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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जीवंत देवता

🌿 जीवंत देवता 
अदालत खचाखच भरी थी…
पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था—
जैसे दीवारें भी आज कुछ अलग सुनने को तैयार हों।
कटघरे में पंडित रामदीन खड़े थे…
सूरज की तपिश से झुलसा चेहरा…
पर आँखों में एक अद्भुत शांति का प्रकाश।
कपाल पर चंदन का तिलक,
कंधे पर राम-नाम का गमछा,
और पीछे झूलती लंबी चोटी—
पर आज उनकी सबसे बड़ी पहचान यह नहीं थी…
👉 आज वह केवल एक बेटा बनकर खड़े थे।
“आप रामदीन पाठक हैं?”
“जी हुजूर…”
“क्या करते हैं?”
“गाँव के बाहर पुराने मंदिर में रहता हूँ हुजूर…
बच्चों को संस्कृत सिखाता हूँ—ताकि वे अपने जड़ों से जुड़े रहें…
गीता का अर्थ और उसका जीवन में प्रयोग भी समझाता हूँ…
और… अपने माँ-बाप की सेवा करता हूँ…”
“पर आपके भाई ने आपके खिलाफ मुकदमा किया है…”
यह सुनते ही पंडित जी की आँखें भर आईं।
“हुजूर…”
उन्होंने काँपती आवाज में कहा—
“मेरा छोटा भाई रघुवर…
वह बहुत अच्छा है…
वह भी माँ-बाप की सेवा करना चाहता है…”
थोड़ा रुके… फिर गहरी साँस ली—
“पर हुजूर…
जब यह छोटा था…
तो मैंने ही इसे पढ़ाया-लिखाया…
अपने हिस्से की रोटी छोड़कर इसे खिलाया…
क्योंकि मैं चाहता था—
मेरे माँ-बाप को खुशी हो…”
उनकी आवाज भर्रा गई—
“आज वही भाई…
मुझसे मेरे माँ-बाप को अलग करना चाहता है…
तो दिल… सह नहीं पाता हुजूर…”
पूरा न्यायालय स्तब्ध था।
फिर पंडित जी ने दोनों हाथ जोड़ लिए—
और जज की ओर देखते हुए बोले—
“हुजूर…
मैं इस अदालत के माध्यम से
सभी पुत्रों से कहना चाहता हूँ…”
अब उनकी आवाज धीमी थी, पर अत्यंत गहरी—
“जो बच्चे माँ-बाप की पसंद-नापसंद का ख्याल रखते हैं…
वही इतिहास रचते हैं…”
“हमारे देश में उन्हें ही जीवंत गुरु कहा गया है…
क्योंकि उन्होंने सेवा में ही भगवान को पाया है…”
अब अदालत में बैठे लोग
सिर्फ सुन नहीं रहे थे…
👉 वे उसे अपने भीतर अनुभव कर रहे थे।
जज की आँखें नम हो चुकी थीं…
तभी छोटा भाई रघुवर खड़ा हुआ—
“हुजूर…
भैया झूठ नहीं कह रहे…”
उसकी आवाज टूट गई—
“उन्होंने मुझे पढ़ाया…
मुझे संभाला…
मैं जो हूँ… उन्हीं की वजह से हूँ…”
वह रो पड़ा—
“पर मैं भी माँ-बाप से दूर नहीं रह सकता…”
अब यह मुकदमा नहीं था…
👉 यह दो हृदयों की पुकार बन चुका था।
जज ने गंभीर स्वर में निर्णय सुनाया—
“माँ-बाप किसी की संपत्ति नहीं…
वे दोनों के जीवन का आधार हैं…”
“दोनों बेटे मिलकर उनकी सेवा करेंगे…”
फिर धीमे, पर स्पष्ट शब्दों में कहा—
“और याद रखिए—
सेवा अधिकार से नहीं…
समर्पण से होती है…”
इतना सुनते ही—
रघुवर दौड़कर बड़े भाई के चरणों में गिर पड़ा—
“भैया… मुझे माफ कर दो…”
रामदीन ने उसे तुरंत उठाया…
और गले लगा लिया…
“अरे पगले…
तू मुझसे एक बार पूछ तो लेता…
मैंने अपना पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित किया है…
मैं तो यह अधिकार भी तुझे ही दे देता…”
भरे गले से बोले—
“मुझे खुशी है…
आज तेरी अच्छी आमदनी है…
तू माँ-बाप की सेवा मुझसे भी बेहतर कर सकता है…”
रघुवर फूट पड़ा—
“मुझसे बड़ी भूल हुई भैया…
मैं सीधे आपसे कहने की हिम्मत नहीं कर पाया…”
दोनों भाई गले लगकर रो पड़े।
कोर्ट में बैठे लोग…
चुपचाप अपनी आँखें पोंछ रहे थे।
कोर्ट खचाखच भरा था—
पर आज वहाँ एक अद्भुत दृश्य उपस्थित था…
किसी ने धीमे से कहा—
“भाई हो तो ऐसा…”
दूसरी आवाज आई—
“कलियुग में भी ऐसे लोग हैं…”
और किसी ने मन ही मन सोचा—
“ऐसे ही सच्चे लोगों के कारण पृथ्वी अभी भी अपनी गति पर है…”
उस दिन अदालत के हर कोने में बस एक ही चर्चा थी…
👉 यह केवल एक निर्णय नहीं था…
यह एक जागृति थी।
लोग अपने आप से प्रश्न करने लगे—
क्या हम अपने परिवार में ऐसा प्रेम रखते हैं?
क्या हम माँ-बाप की सेवा के लिए इतने तत्पर हैं?
मीडिया भी पीछे नहीं रहा…
कोर्ट के बाहर पंडित जी को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी।
उसी भीड़ में से एक पत्रकार ने पूछा—
“पंडित जी, गीता में ऐसी कौन सी बात है जिसने आपको माँ-बाप को जीवंत देवता मानने की प्रेरणा दी?”
पंडित जी हल्के से मुस्कुराए—
“गीता जीवन का दर्शन है…
वह हर परिस्थिति में मनुष्य को मार्ग दिखाती है…”
फिर बोले—
“कुंती के एक वचन ने द्रौपदी को पाँचों पांडवों की पत्नी बना दिया…
अर्जुन ने विरोध नहीं किया…
क्योंकि माता का वचन सर्वोपरि था…”
“और दुर्योधन…
यदि वह गांधारी की बात मान लेता…
तो महाभारत का परिणाम कुछ और होता…”
“पर उसने माँ की बात नहीं मानी…
और सब कुछ होते हुए भी हार गया…”
कुछ क्षण रुककर उन्होंने गहरी बात कही—
“इसलिए…
माँ-बाप रूपी अमूल्य धन
हमेशा अमृत बरसाने वाले वृक्ष हैं…”
उस दिन…
लोगों के भीतर एक नया भाव जागा—
👉 सेवा का भाव।
🌼 अंतिम संदेश
“जिस घर में माँ-बाप हैं…
वहाँ भगवान दूर नहीं रहते…”
👉 और जो उनकी सेवा करता है—
वह पूजा नहीं करता…
वह साक्षात भगवान को जीता है।
जयगुरु 🙏 🙏 🙏
वंदे पुरुषोत्तम