चलो दूर कहीं.. 17
प्रतीक्षा घंटों मां के पास बैठी कभी उसका सिर दबाती तो कभी उसका पैर..! मां की दशा देख वह बहुत बैचैन थी..! उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें मां को इस हाल में छोड़ कर जाय या नहीं..? एक सप्ताह के बुखार में ही ऐसा बिछावन पकड़ी है कि जैसे महीनों से बीमार हो..न ठीक से खाती पीती है और न ही चल फिर सकती है..अगर मैं इसे इस हाल में छोड़ कर गई तो यह जीते जी मर जाएगी..नही नहीं..मैं ये पाप नहीं कर सकती..! काफी सोच-विचार करने के बाद उसने रोहन को फोन करके उन लोगों के साथ भीमबेटका नहीं जाने के बारे में बताने का निश्चय किया.. और मां के पास बैठे बैठे ही रोहन को फोन लगाई.. और फोन रिसीव होते ही बोली,"रोहन.. मैं तुम लोगों के साथ नहीं जा पाऊंगी..!"
"ये क्या बचपना है प्रतीक्षा.. सुबह हमें निकलना है और तुम अभी बता रही हो कि नहीं जाऊंगी.. ! वैसे तुम जाना क्यों नहीं चाहती..?अगर फाइनेंशियल प्रोब्लेम है तो तुम निश्चिन्त रहो..मैं सब संभाल लूंगा..!"
"नहीं रोहन ऐसी बात नहीं है.. दरअसल मां की तबियत बहुत खराब है और इस हाल में छोड़ कर जाने की इच्छा नहीं हो रहा है..!"
"जब ऐसी स्थिति है तो मत जाओ.. मैं भी नहीं जाऊंगा..!" कहकर रोहन ने फोन काट दिया तो प्रतीक्षा का पहले से मुरझाया चेहरा जैसे कुम्हला गया..! उसकी मां ने उसके कुम्हलाए चेहरे को देखा तो उठकर बैठते हुए पूछी, "क्या हुआ बेटा किसका फोन था.. और तुम कहां नहीं जाने की बात कर रही थी..?"
"कुछ नहीं मां.. तुम उठ क्यों गई सोए रहो..!"
"अपने संतान के उदास चेहरे को देखकर कौन मां सो सकती है बेटा..बताओ क्या परेशानी है?"
"कोई परेशानी नहीं है मां.. मैं उदास कहां हूं..!"
प्रतीक्षा बोल ही रही थी कि कमलनाथ अंदर आए और एक हजार रुपए प्रतीक्षा के साथ में थमाते हुए कहा," ये रख ले बेटा इतना ही जुगाड़ हो सका.. और तुमने अपना बैग पैक कर लिया है न..?"
प्रतीक्षा ने रुपए वापस करते हुए कहा,"अब इसकी जरूरत नहीं है पापा.. मैं मां को इस हाल में छोड़कर नहीं जा सकती इसलिए मैंने प्रोग्राम कैंसल कर दिया है..!"
"अच्छा अब प्रतीक्षा इतनी बड़ी हो गई है कि अपनी मां से भी बातें छिपा लेती है.. इसलिए मैं सोच रही थी कि मेरी लाड़ो इतनी उदास क्यों है..अब समझ आया..! तुमने कैसे सोच लिया कि मेरे कारण अपना प्रोग्राम कैंसल कर दोगी..? मैं तुम्हारे खुशियों के बीच बाधा नहीं बनूंगी बेटा.. तुम मेरी चिंता छोड़ो और जहां जाना है खुशी खुशी जाओ..!"
मां की बातें सुन भावुक स्वर में प्रतीक्षा बोली," नहीं मां मैं तुम्हें इस हालत में छोड़कर नहीं जा सकती..!"
" और मेरे पास रहकर मेरे हालत को सुधार दोगी.. अरे बेटा तुम्हारे रहने या ना रहने से मेरे सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला..! हां तुम्हारे नहीं जाने से मुझे जो ग्लानि होगी उससे मुझे बहुत दुख होगा..! इसलिए तू जा बेटा.. मैं ठीक हूं।"
उस रात उसकी आंखों में नींद न थी, रातभर करवटें बदलते अपने भविष्य के बारे में सोचती रही.. उसे विश्वास था कि वह अपने मेहनत के दम पर गरीबी के इस कुचक्र को जरुर भेद पाएगी..! सुबह शिखा जब उसके घर आई तो वह तैयार होकर अपने मां के पास बैठी थी। शिखा ने उनका पैर छूते हुए पूछा,"अब आपकी तबियत कैसी है आंटी..?"
"देख नहीं रही हो..भली चंगी बैठी हूं..! प्रतीक्षा तो खामखां चिंता करते रहती है..! देखना बेटा प्रतीक्षा का ध्यान रखना और दोनों साथ रहना..!"
" जी आंटी..आप निश्चिंत रहें मैं प्रतीक्षा का ध्यान रखूंगी..!" शिखा अभी बोल ही रही थी कि प्रतीक्षा अपना बैग लेकर आई और मां का पैर छुते हुए बोली," आ रही हूं मां.. तुम अपना ध्यान रखना..!"
उसने अपने आंचल के गांठ में बंधे एक सौ रुपए के नोट को खोलकर निकाली और उसे प्रतीक्षा के हाथ में थमाते हुए बोली,"ये रख ले बेटा...!"
"नहीं मां.. ये तुम रखो मेरे पास पैसे है..!"
"सगुन समझ कर रख ले बेटा.. क्या पता फिर मुलाकात हो या न हो..?" कहते कहते उसका गला भर्रा गया।
ये सुनते ही वह मां के गले लग रो पड़ी.. रोते रोते उसकी तंद्रा टुटी तो वह अनाह के कंधे पर सिर रखे सिसक रही थी..! अभी अभी जो कुछ भी अपने अतीत के बारे में जाना था वह किसी सपने की भांति मानस पटल पर तैर रहा था! लेकिन उसका अंतर्मन उसके अपने वजूद के साथ उन अपनों को ढूंढ रहा था। वर्तमान और भूत में द्वंद मचा था और इन दोनों के बीच पीस रही थी उसकी आत्मा... उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी भयंकर विस्फोट के साथ उसकी आत्मा उसके शरीर से मुक्त हो जाएगी..! अंतर्द्वंद्व के उस भयंकर वेदना से वह पसीने से तरबतर थी, आंखें लाल, आंसूओं से सराबोर चेहरे के साथ उसने अनाह के आगे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा," मेरी मां के साथ क्या हुआ..? मेरे बापू कैसे हैं..? शिखा और रोहन..हमारे दोस्त कहां है? मैं कौन हूं मैं जान गई अनाह..बस इतना बता दो कि अब मेरी मां कैसी है..?"
अनाह ने बेहद रुखे स्वर में कहा," तुम्हारी मां के साथ क्या हुआ मुझे क्या पता..?"
"प्लीज़ अनाह एक बार दिखा दो मेरी मां को..जब मैं भीमबेटका के लिए निकली थी तो वह बहुत बीमार थी.. प्लीज़ एक बार फिर तुम जो कहोगे मैं मानूंगी..!" कहते कहते प्रतीक्षा रो पड़ी तो अनाह उसके खूले बदन को धोती से ढकते हुए कहा,"ये अभी संभव नहीं है..! मुझे तुम्हारे अतीत में कोई दिलचस्पी नहीं है और न ही मैं तुम्हारा गुलाम हूं कि तेरी हर ख्वाहिश को पुरी करुं..! एक बात कान खोलकर सुन लो तुम अपने अतीत से रुबरु होने के बाबजूद भी अपनों से नहीं मिल सकती..कभी नहीं..! तुम सिर्फ मेरे इशारे पर नाचोगी..तुम मेरे गुलाम हो..दुनिया की कोई ताकत तुम्हें मुझसे जुदा नहीं कर सकता..! कोई जुदा नहीं कर सकता..! " चिल्लाते हुए वह वहां से निकल गया।
उस शांत वातावरण में हवा के वेग से फड़फड़ाते पत्ते किसी पिशाच की भांति अट्टहास करते प्रतीत हो रहा था। अनाह का अहंकारी अट्टहास, उसकी क्रुरता, अदृश्य शक्ति, और सबसे बड़ा उसके प्रति सहानुभूति..उसका पल पल बदलता व्यवहार .. उसे सोचने पर मजबूर कर रहा था कि आखिर वह चाहता क्या है..?अब उसे एहसास हो रहा था कि इसके चंगुल से निकलना आसान नहीं है...।
सांझ की धूंधलिका में उसका चेतन अपने अवचेतन से गुफ्तगू कर रहा था .. और एक नए मार्ग का तलाश जारी था।
क्रमशः...