चलो दूर कहीं..! - 16 Arun Gupta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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चलो दूर कहीं..! - 16

चलो दूर कहीं... 16

"तेरी मां को टीबी हो गया है बेटा..!" कमलनाथ ने डॉक्टर की पर्ची अपने जेब से निकाल कर प्रतीक्षा को थमाते हुए भर्राए स्वर में कहा,"डॉक्टर ने एक्स-रे और कुछ ब्ल्ड टेस्ट जल्द से जल्द कराने के लिए कहा है..!" कहते कहते वह भावुक हो गया और आंखें छलछला आई तो प्रतीक्षा बोली, "इसमें इतना घबराने की कोई बात नहीं है बापू..! अब ये बीमारी लाइलाज नहीं है.. डॉक्टर के दिशा निर्देश अनुसार दवा खाने से ये बीमारी पुरी तरह ठीक हो सकती है..!" 

"ये हमें मालूम है प्रतीक्षा.. लेकिन तू अपनी मां को जानती है.. एक तो ये दवा खाना नहीं चाहती और इतना लंबा इलाज..? तुम्हें क्या बताऊं खेती बाड़ी का समय आ गया है और तेरी मां भी बीमार पड़ गई है.. जो थोड़ी बहुत मदद की आस थी वो भी गई..! कोई बात नहीं मैं सब संभाल लूंगा.. जा तू पढ़ाई में ध्यान दें..!" 

कमलनाथ की बातें सुन प्रतीक्षा की हिम्मत नहीं हुई की उनसे भीमबेटका जाने की बात करें..! वह चुपचाप अपने कमरे में चली गई और बिछावन में लेटी तो आज की घटनाएं चलचित्र की भांति उसके आंखों के सामने चल रहे थे.. उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें मां को इस हाल में छोड़ कर भीमबेटका जाए या नहीं..? काफी सोच-विचार कर उसने तय किया कि वो भीमबेटका नहीं जाएगी.. वो रोहन को मना कर देगी..! उसे अफसोस हो रहा था कि मेरे कारण रोहन का पैसा बर्बाद हो जाएगा.. मेरे हामी भरने मात्र से वह कितना खुश था, जब उसे पता चलेगा कि मैं नहीं जा रहा हूं तो उसे कितना दुख होगा.. कहीं वो भी जाना कैंसिल न कर दे..? लेकिन मैं क्या करूं.. मां को इस हाल में छोड़कर जाना ठीक है क्या..? बापू को कौन खाना पकाकर खिलाएगा.. बापू खेती बाड़ी का काम देखेंगे कि मां को.. कि खाना पकाएंगे.. नहीं.. नहीं.. मैं नहीं जाऊंगी..! वह ध्यान मग्न थी कि उसकी सहेली शिखा चुपके से आई और बड़े शरारत भरे लहजे में बोली, "आखिर किसके ख्याल में खोई है हमारी लालपरी..?" शिखा के आवाज से उसकी तंद्रा टुटी और वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसके सूजी हुई आंखें और उतरा हुआ चेहरा देखकर शिखा ने व्याकुल स्वर में पूछा, " क्या हुआ लालो..? ये चेहरा उतरा हुआ क्यों है और किस ग़म में छुप छुप के आंसू बहा रही हो..?" 

"रो कहां रही हूं.. सोई थी इसलिए पलकें भारी है..!" प्रतीक्षा बोली ही रही थी कि शिखा ने कहा, "चल झूठी.. ये आंखें झूठ नहीं बोलती..! साफ़ साफ़ बता बात क्या है..?" 

"मैं भीमबेटका नहीं जा पाऊंगी..!" 

"क्यों..?" प्रतीक्षा की बात सुनकर शिखा उछलते हुए बोली, " तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या.. जो एक बार हां और एक बार ना करती हो..?" 

"किस बारे में हां - ना हो रहा है शिखा बेटा..?" शिखा के अंतिम वाक्य को सुनकर दरवाजे पर खड़े कमलनाथ ने पूछा तो जैसे दोनों को सांप सूंघ गया। उन्हें चुप देख उसने फिर पूछा, " कोई परेशानी है क्या..? अगर कोई बात है तो निसंकोच कहो..! "

" दरअसल अंकल..! " शिखा ने अटकते हुए कहा," हमलोग कॉलेज के तरफ से कल भीमबेटका जा रहे हैं और आज प्रतीक्षा जाने से मना कर रही है..!" 

"प्रतीक्षा बेटा..!" कमलनाथ ने अंदर आकर प्रतीक्षा के झुके चेहरे को उठाकर गालों पर लुढ़के आंसू को पोंछते हुए कहा, " मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं बेटा.. मैं भी तुम्हारी हर ख्वाहिश पुरी करना चाहता हूं लेकिन मैं क्या करूं.. परिस्थिति के आगे बेबस हूं..? जा बेटा जा.. हमारा जीवन तो इसी तरह घसीटता रहेगा.. हमारे साथ तू भी क्यों घिसटे .. जाओ अपने अरमानों का गला मत घोंटो..! "

कमलनाथ के छाती से लगकर सुबकते हुए प्रतीक्षा बोली, " मां को इस हाल में छोड़कर कैसे जाऊं बापू.. तुम अकेले क्या करोगे.. मां की देखभाल करोगे कि खेती बाड़ी करोगे.. फिर तुम्हारे लिए खाना कौन पकाएगा..?" 

बेटी की बातें सुन कमलनाथ भावुक था, उसने अपने भावनाओं पर काबू करते हुए मुस्कुरा कर कहा, " देखो तो प्रतीक्षा बेटी इतनी बड़ी हो गई है कि अपने मां बापू की इतनी फिक्र है कि अपनी खुशी को कुर्बान करने पर उतारू है.. मुझे तुम पर फख्र है बेटा.. तुम जाने की तैयारी करो यहां मैं सब संभाल लूंगा..!" 

कहकर कमलनाथ कमरे से बाहर निकले तो शिखा खुशी से उछलते हुए प्रतीक्षा के गले लग कर बोली, "चलो अब तो तुम्हारे पापा ने भी इजाजत दे दिए.. अब क्या टेंशन है..? देखो प्रतीक्षा ज्यादा मत सोचो जीवन में जितना ज्यादा सोच विचार करोगी उतना ज्यादा टेंशन होगा.. बस एक ही फंडा रखो टेंशन फ्री रहो और बिंदास रहो..! "

जब शिखा के बातों का उसपर कोई असर नहीं हुआ तो उसने उसके आंखों में आंखें डालकर कहा," तुम लाख दुखी हो जाओ .. रात दिन बैठकर रोती रहो.. चाहे अपना सिर पटक कर फोड़ लो.. अपने घर के हालात को सुधार सकती हो..? "

शिखा के बातों को सुन प्रतीक्षा ने कहा तो कुछ नहीं ..  अपने आंसू पोंछे और खुले बालों का खोपा बनाकर शिखा को गले लगाकर बोली," कल कितने बजे ट्रेन है..? "

शिखा का खुशी का ठिकाना न था वह उसके गालों पर एक चुम्बन देते हुए बोली," छः बजे.. मैं ठीक पांच बजे तुम्हें लेने आ जाऊंगी तैयार रहना..! " कहकर वह वहां से दौड़ते हुए भागी ।

शिखा के जाने के बाद वह कुछ देर बैठी सोचती रही, फिर उठी और मां के पास गई और माथा को छूकर देखी तो बुखार उतर रहा था और पसीने से माथा भींगा हुआ था। उसके स्पर्श मात्र से ही मां की आंखें खुल गईं और उसने उसके कोमल हथेलियों को पकड़ कर करवट बदली और अपने गाल के नीचे दबाकर क्षीण स्वर में बोली," प्रतीक्षा.. अपने बापू का ध्यान रखना बेटा..! तुम तो जानती ही है कि तुम्हारे बापू खाने पीने में कितने लापरवाह है उसे समय से खाना खिला देना..! मैंने तेरे लिए और तुम्हारे दुल्हे के लिए कुछ गहने बना रखे हैं जो मेरे बक्सा में रखा है। हो सके तो अपने बापू को अपने साथ रखना बेटा..!" 

मां के क्षीण स्वर में ये ऊटपटांग बातें सुनकर प्रतीक्षा बोली," ये क्या ऊटपटांग बातें बोल रही हो मां.. तुम कहां जा रही हो जो ऐसी बातें बोल रही हो.. तुम बहुत जल्द ठीक हो जाओगी..!"

प्रतीक्षा अभी बोल ही रही थी कि उसे अपने हथेलियों में गीलेपन का एहसास हुआ तो उसने अपने हथेली को बाहर खींच कर मां के आंखों से लुढ़कते आंसू को पोंछते हुए भावुक स्वर में बोली,"तुम रो क्यों रही हो मां..शांत हो जाओ सब ठीक हो जाएगा..!" 

" कुछ ठीक नहीं होगा बेटा…लगता है अब बुलावा आ गया है..!अपना और अपने बापू का ध्यान रखना बेटा..!"

" तुम्हें कुछ नहीं होगा मां.. धैर्य रखो तुम ठीक हो जाओगी..!" कहते कहते वह फफक पड़ी।

                                            क्रमशः...