चलो दूर कहीं..! - 10 Arun Gupta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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चलो दूर कहीं..! - 10

चलो दूर कहीं... 10

रवि के अप्रत्याशित व्यवहार से प्रतीक्षा सकते में थी, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक से इसे क्या हो गया.. थोड़ी देर पहले तक एकदम ठीक ठाक था फिर ऐसी क्या बात हुई कि ये अनाप-शनाप बक रहा है। रवि मुंह लटकाए बैठा था और प्रतीक्षा भी चूल्हे के पास बैठी उसे घूर रही थी। चूल्हे का लकड़ी बुझ चुका था और उससे निकलता धुंआ बरामदे में फ़ैल गया था। धुंए से जब आंखों में जलन महसूस हुई तब प्रतीक्षा को चूल्हा बुझने का ध्यान आया और उसने पास पड़े माचीस की एक तीली जलाकर जैसे चूल्हे में डाली वैसे ही भक् से आग धधक उठा...उस धधकते आग के पीली रोशनी में उसका बदन कुंदन सा दमक रहा था...उस जंगल में अगर चूल्हे के सामने बैठी उस रुप की मल्लिका पर किसी की नजर पड़ जाती तो वह समझता जैसे देव लोक से कोई अप्सरा उतर आई है..! उसकी बड़ी-बड़ी आंखें भर आईं थीं,मन व्यथित था..इस वक्त उसे अनाह की बहुत याद आ रही थी.. उसका वो मुस्कुराता अजीब चेहरा बहुत याद आ रहा था..वह सोच रही थी,"तुम मुझे छोड़कर कहां चले गए अनाह .. तुम्हारे बिना मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा, तुम जहां भी हो मेरे पास आ जाओ .. मैं तुम्हें बहुत मिस कर रही हूं..!" 

वह चुपचाप बैठी सोच रही थी कि रवि उसके पास आया और बड़े प्यार से उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर कहा,"क्या सोच रही हो..?" 

"कुछ नहीं..जाओ तुमसे कोई मतलब नहीं है..! तुम चाहते हो न कि मैं तुमसे दूर चली जाऊं.. बहुत जल्द मैं तुमसे इतनी दूर चली जाऊंगी कि तुम मुझे ढूंढ ही नहीं पाओगे..!" 

"अरे यार.. तुम अबतक उन बातों से नाराज़ हो..?  मुझे खुद समझ नहीं आ रहा है कि मुझे क्या हो गया था जो तुमसे ऐसी बातें कह रहा था.. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे किसी और ने मुझसे ये सब करवा रहा है..!" 

"मैं सब समझती हूं रवि.. मैं कोई दुध पीती बच्ची नहीं हूं..? जरुर तुम किसी और को चाहते हो इसलिए मुझे यहां से जल्द से जल्द भगाना चाहते हो..!"

" अरे यार तुम्हारा दिमाग खराब है क्या.. अगर मैं किसी और लड़की से प्यार करता तो तुमसे क्यों छुपाता..? तुम कौन हो मेरी.. जिससे मैं डरुं..! अपना ये बकवास बंद करो और पानी डबक रहा है इसमें चावल दाल डालो..पेट में चूहे कूद रहे हैं..!"

लेकिन उसके बातों का प्रतीक्षा पर कोई असर न हुआ वह मुंह फुलाए चुपचाप बैठी रही तो रवि ने थैले से चावल दाल निकाल कर हांडी में डालते हुए कहा," गुस्से में सच में एकदम जंगली बिल्ली लग रही हो..आहा .. ये गुलाबी गाल..झील सी आंखें और ये शरबती होंठ.. ऐसा लगता है ये कातिल अदाएं मेरा जान लेकर ही छोड़ेगी..!"

रवि के शायराना अंदाज में इतना कहते ही वह बोली," मरे तेरे दुश्मन..अब ये मस्का मारना बंद करो.. और ये बताओ कि इस बीहड़ जंगल में तुम ये चावल दाल कहां से ले आए..?"

" यहां से थोड़ी दूर पर आदिवासियों का एक गांव है वहीं से..!"

" तब तो वहां मेरे लिए कपड़े मिल जाएंगे..?"

" मिलेंगे तो जरूर लेकिन पैसा कहां से आएगा..? वे खूद जिंदा रहने के लिए इतना जद्दोजहद करते हैं कि फ्री में उनसे कुछ भी लेने में मुझे खराब लगता है..!"

" तो तुम उनके साथ न रहकर यहां अकेले में क्यों रहते हो..?"

" उनका सामाजिक नियम कायदे बहुत कड़े है वे अपने जीवन में किसी भी बाहरी व्यक्ति के दखल को बर्दाश्त नहीं कर पाते.. उनका मानना है कि बाहरी लोग सिर्फ उनका शोषण करते हैं इसलिए..!"

" तुम यहां कैसे पहुंचे..?" प्रतीक्षा ने चूल्हे में लकड़ी को आगे धकेलते हुए कहा तो उसने कहा," मुझे कुछ याद नहीं कि मैं यहां कैसे पहुंचा ..गांव वालों को मैं नदी में बेहोश मिला था, उन्होंने ही मुझे बचाया है..! मैं जिंदा तो हूं लेकिन अपने अतीत को भूल चूका हूं..!"

चूल्हे पर चढ़े हांडी से उफनकर झाग गर्म चूल्हे पर गिर कर शांत वातावरण में छन छन का स्वर उत्पन्न कर रहा था... और प्रतीक्षा के मन में भी विचारों का तुफान उठा हुआ था,वह सोच रही थी कि रवि अपने अतीत को भूल चुका है और मैं भी.. ये महज संयोग है या नियति का कोई और ही प्रयोजन है? प्रतीक्षा को चुप देख रवि ने कहा," क्या संयोग है.. ईश्वर ने दो भुलक्कड़ को एक जगह मिलाया है.. जरुर उसके दिमाग में कोई खुराफाती सूझी होगी..?"

" क्या रवि कुछ भी बोलते रहते हो.. अरे यार इतने बड़े संसार में हमारी औकात ही क्या है.. हमें कौन जानता है...हम यहां से बस अपने माता-पिता के पास पहुंच जाएं वहीं बहुत है..!"

" आज नहीं तो कल हम पहुंच ही जाएंगे..उसकी चिंता करने से क्या फायदा, मैं तो बस अपने वर्तमान को जीने में विश्वास करता हूं...! कल किसने देखा है..?" 

कहकर रवि ने हांडी में डबकते चावल को डब्बू से उठाकर देखते हुए कहा,"खिचड़ी पक गया है..! चलो लकड़ी बाहर खींच लो..!" 

प्रतीक्षा ने तुरंत लकड़ी बाहर खींच ली और रवि ने हांडी से एक थाली में खिचड़ी निकाला और एक ताड़ के पंखा से हवा कर ठंडा करते हुए कहा,"तुम पहले खा लो.. फिर मैं खा लूंगा..!" 

"तुम भी निकाल लो फिर साथ में खाएंगे..!" 

"दरअसल एक ही थाली है..!" 

"तो क्या हुआ..आओ दोनों एक ही थाली में खाते हैं..!" 

कहकर प्रतीक्षा उसके चेहरे पर नजरें टिकाए रही उसकी पलकें झुकी हुई थी, सांवले सलोने चेहरे पर एक अजीब चमक थी..वह बैठा पंखा झेलकर खिचड़ी ठंडा करता रहा.. सुर्य की रोशनी झोपड़ी के छेद से सीधे प्रतीक्षा के चेहरे पर पड़ रहा था उसके गोरे गालों पर लाली छाई हुई थी, बड़ी बड़ी आंखों में लाल डोरे तैर रहे थे,खुला बाल कंधे पर बिखरा पड़ा था, सुर्ख होंठ थरथरा रहे थे और सफेद धोती में कसे गठीले बदन की कसावट उसके मन में उथल-पुथल मचाए हुए था।

जब दोनों की आंखें टकराई तो होंठों पर मुस्कान तैर गए.. जैसे आंखों ने दिल की बात पढ़ ली हो..! फिर क्या था रवि ने ताड़ के पत्ते के चम्मच से खिचड़ी उठाया और उसके मुंह के पास ले गया तो उसका मुंह अपने आप खुल गया.. फिर जैसे ही प्रतीक्षा ने उसे खिचड़ी खिलाना चाही वैसे ही उसके नजरों के सामने से एक आकृति गुजरी और उसके मुंह से निकला,"अनाह..

                                          क्रमशः...