चलो दूर कहीं..! - 6 Arun Gupta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

चलो दूर कहीं..! - 6

चलो दूर कहीं... 6

"कौन प्रतीक्षा..कौन अनाह..?न मैं किसी प्रतीक्षा को जानती हूं और न ही किसी अनाह को .. ? वैसे भी तुम जो कोई भी हो सामने आओ..!" उसके गूंजते आवाज से इधर उधर देखते हुए प्रतीक्षा ने कहा तो वह बोला,"मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं..!" 

"यानी कि तुम अनाह हो .. अरे वाह तुम बोल सकते हो.. वो भी हिंदी में..! और ये प्रतीक्षा कौन है?

"ये मुझे नहीं पता कि मैं क्या बोल रहा हूं और कौन सी भाषा में बोल रहा हूं...मैंने तुम्हारे ब्रेन को हाइजेक कर लिया है.. अब तुम्हारा ब्रेन जो सोचता है, करना चाहता है.. कहना चाहता है वह सब मुझे पहले पता चल जाता है.. एक प्रकार से मैंने तुम्हारे दिमाग के भाषा केन्द्र पर नियंत्रण कर लिया है और तुम्हारे ब्रेन के तीनों क्षेत्र मेरे नियंत्रण में है...तुम्हारे ब्रेन के सेव डाटा के अनुसार प्रतीक्षा तुम्हारा नाम है।"

" क्या मैं प्रतीक्षा हूं..मुझे नहीं मालूम..? मै अपने अतीत को भूल चूकी हूं..मै कहां की रहने वाली हूं, मेरे मां बाप कौन है, मेरे दोस्त,मेरी सहेली कौन है मुझे कुछ याद नहीं..? क्या तुम मेरे ब्रेन के सेव डेटा को पढ़कर मेरे अतीत को बता सकते हो..?" प्रतीक्षा व्याकुलता से पूछी तो उसने कहा,"उसके लिए मुझे अपने आपको अपग्रेड करना होगा.. उसमें थोड़ा वक्त लगेगा लेकिन फिलहाल मैं तुम्हारे ब्रेन का उपयोग अपने लिए कर सकता हूं..!" 

प्रतीक्षा हैरत भरी नजरों से उसे घूरते हुए आश्चर्य से पूछी, " तुम कोई जादूगर हो..?" 

"जादूगर..ये क्या होता है.. ?" 

"तुम जादूगर को नहीं जानते.. अरे बाबा वो भी तुम्हारे जैसा ही हैरतअंगेज कारनामा करता है..!" 

"अच्छा कोई बात नहीं तुम मुझे जादूगर ही समझो.. लेकिन मैं कोई जादू नहीं कर रहा जो हकीकत है वही बता रहा हूं..! "

" अच्छा जादूगर नहीं तो भूत हो क्या..? तुम्हारा हुलिया तो एकदम भूत के हुलिया से मिलता है..! वैसे तुम्हारा घर कहां है..? "

"ये उलूल जूलुल क्या बक रही हो ..न मैं कोई जादुगर हूं और न ही भूत .. और हां ज्यादा बक-बक की तो तुझे भूतनी जरुर बना सकता हूं..! और ये क्या पूछ रही हो मेरा घर कहां है..? ये तुम्हारा ब्रेन है न बहुत घटिया है तुम्हारे भाषा को हमारे भाषा में ट्रांसलेट ही नहीं कर पाता.. इसलिए मुझे नहीं मालूम..! "

" क्या कहा मेरा ब्रेन घटिया है.. घटिया तू है और तेरी सोच है..!" कहकर वह उसे झिंझोड़ने लगी तो उसने कहा," लगता है तुम्हें भूख लगी है इसलिए मुझे ही खाने पर तुली हो..?"

उसका इतना कहना था कि उसे जोरों से भूख का एहसास हुआ उसे छोड़कर खाने का इशारा करते हुए कहा ," तुम्हें भूख नहीं लगा है..?"तो उसने उसके इशारे को समझते हुए कहा, "हमें न भूख लगती है न प्यास..हम इन झंझटों से मुक्त है.. लगता है तुम्हारे पेट में चूहे कूद रहे है..? "

प्रतीक्षा ने 'हां' में सिर हिलाई तो उसने कहा," क्या खाना पसंद है तुम्हें..? "

" बस पेट भरने के लिए कुछ भी मिल जाए यही बहुत है..! "

" ऐसा क्यों सोच रही हो तुम जो आर्डर करोगी तुम्हारा अनाह पूरा करने का भरसक प्रयास करेगा..!" 

" अच्छा मज़ाक कर लेते हो अनाह.. जहां इस बंद गुफा से बाहर निकलना नामुमकिन है और तुम मेरी मनचाही इच्छा को पूरा करने की बात करते हो..या तो तुम मुझे बेवकूफ बना रहे हो या तुम पागल हो..?" 

" तुमने ठीक ही कहा तुम्हारे खुबसूरती ने हमें पागल बना दिया है...जी चाहता है सारे जहां की खुशियां तुम्हारे कदमों में लाकर रख दूं...बस एक बार मौका देकर तो देखो.. तुम्हारा ये अनाह तुम्हारी फरमाइस को पुरा करता है या नहीं..?"

अनाह ने मासूमियत से कहा तो प्रतीक्षा को पानी पुरी खाने की इच्छा हुई.. अभी वह उसके आंखों में देखते हुए सोच ही रही थी कि अनाह ने कहा," तुम पानी पुरी खाना चाहती हो न..?"

" अरे वाह.. तुम तो मेरे मन की बात भी जान जाते हो.. हां मैं पानी पानी पुरी खाने के बारे में सोच रही थी..!"

" तुम अपनी आंखें बंद कर बस पानी पुरी के बारे में सोचती रहो..देखना मैं उसे हाजिर करता हुं या नहीं..?"

प्रतीक्षा आंखें बंद किए पानी पुरी के बारे में सोचती रही.. और अनाह के बदन से चमकीला प्रकाश निकला और देखते ही देखते वह गायब हो गया... करीब आधे घंटे बाद प्रतीक्षा की आंखें खुली तो अनाह एक दोने में पुरी और प्लास्टिक के थैले में पानी लिए उसके सामने बैठा था! अनाह को पानी पुरी हाथ में लिए सामने बैठा देख उसके आश्चर्य का ठिकाना न था, उसने भावाद्वेग में उसके गले लग कर बोली,"तुम बहुत अच्छे हो अनाह.. सचमुच तुमने साबित कर दिया कि तुम कुछ भी कर सकते हो.. तुम कौन हो अनाह ..और तुम्हारे पास ये अदृश्य शक्ति कैसे है..?" 

" मैं कौन हूं जानकर क्या करोगी .. तुम्हें आम खाने से मतलब होना चाहिए.. गुठली गिनने से क्या फायदा..?"

" कहीं तुमने अपने जादू से मुझे भेड़ या बकरी बना दिया तो..?" प्रतीक्षा उससे अलग होते हुए बोली तो उसने कहा,"पृथ्वी के जानवर इंसान से भले है..वे हमेशा नंगे रहते हैं इसके बाद भी कोई व्यभिचार नहीं..अगर तुम इस नग्न अवस्था में अपने समाज में चले जाओ तो तुम्हारा क्या हाल होगा तुम्हें पता है.. इससे अच्छा तो भेड़ बकरी ही है न..? लो अपने मनपसंद पानी पुरी खाओ ..!" 

प्रतीक्षा उसके हाथ से पानी पुरी का दोना लेकर एक पानी पुरी तैयार कर उसके ओर बढ़ाते हुए बोली,"ये लो पहले तुम खाओ..!"

उसने उसकी आंखों में देखते हुए उसके हाथ से पानी पुरी लिया और कहा," तुमने खा लिया तो समझो मैंने खा लिया..!" कहकर पानी पुरी उसके मुंह में डाल दिया.. प्रतीक्षा जैसे उसके हाथों की कठपुतली थी, उसके वश में कुछ न था..वह जैसा चाहता वैसा उसके साथ कर रहा था...!

प्रतीक्षा की आंखें बंद थी और अनाह एक एक कर पानी पुरी उसके मुंह में डाल रहा था.. और उसके इस प्रेममय जुड़ाव ने प्रतीक्षा की तड़पती आत्मा को प्यार के बारिश से सराबोर कर दिया था, उसका हृदय तृप्त हो गया था, उसके मन में एक अनाह ने स्थान बना लिया था...! जब पानी पुरी खत्म हुआ और उसकी आंखें खुली तो वह उस बंद गुफा से बाहर एक घने जंगल में थी.. चारों ओर अंधेरा पसरा था, हवा के झोंके से फड़फड़ाते पेड़ के पत्तों की सरसराहट से खौफनाक वातावरण उत्पन्न हो रहा था..दूर कहीं जंगली जानवरों के चिंघाड़ने से पुरा जंगल थर्रा रहा था... और इस भयावह माहौल में प्रतीक्षा आंखें फाड़े अनाह को ढूंढ रही थी परंतु उसका कहीं कोई अता पता न था...!

                                                    क्रमशः....