मृगा घर आई तो मां और उसकी छोटी बहनें बहुत खुश हुई ,मृगा आते ही नंदिनी का दिया पगार अपने मां के हाथ में थमा दिया ...
मां खुश थी चलो मृगा ने इस महीने की घर खर्च और बच्चों की फीस की व्यवस्था कर दिया ,और इसमें से कुछ पैसे बचा भी लेंगे ..
बहने मृगा को छोड़ नहीं रही थी वो अपने शिकायत मृगा से कर रही थी घर खुशियों से भर गई थी आज !!
दूसरी ओर शाम ढल चुकी थी और आसमान में तारे निकल आए थे ,दरवाज़ा खुलते ही जैसे दोनों की साँसें एक पल को थम गईं…
रिहान ने सामने खड़ी आलिया को देखा—रेड ड्रेस में वो सच में किसी ख्वाब जैसी लग रही थी। उसकी आँखों में वही शरारत, वही चाहत… जो हर बार रिहान को उसकी तरफ खींच लेती थी।
“वाह…” रिहान के होंठों से अनायास निकला,
“आज तो तुम कमाल लग रही हो…”
आलिया हल्के से मुस्कुराई, उसकी नजरें झुक गईं—
“सिर्फ आज?” उसने नटखट अंदाज़ में पूछा।
रिहान धीरे-धीरे उसके करीब आया, उसकी आवाज़ और भी मुलायम हो गई—
“नहीं… आज कुछ ज़्यादा ही…”
कमरे के अंदर हल्की खुशबू, धीमी रोशनी और बाहर शहर की चमक… सब मिलकर उस शाम को खास बना रहे थे।
आलिया ने टेबल की ओर इशारा किया और रिहान के कलाई पकड़ कर उसे काउच में बैठा दी —“आज थोड़ा रिलैक्स करते हैं…”फिर वो
टेबल पर दो ग्लास अल्कोहल के हल्की ड्रिंक पहले से तैयार थी , उसे आलिया ने मुस्कुराते हुए ग्लास उठाया और रिहान की तरफ बढ़ाया।
“तो… इस खूबसूरत शाम के नाम?”
“और हमारे नाम…” आलिया ने कहा और दूसरा ग्लास लिया फिर दोनों ने ग्लास टकरा कर एक साथ सिप लिया। माहौल में एक सुकून था… और उनके बीच बढ़ती हुई नज़दीकियाँ।
रिहान ने झट से ग्लास के ड्रिंक गटक लिया और ग्लास टेबल में रखकर आलिया को अपने गोद में खींच लिया..धीरे-धीरे बातों के साथ उसके हाथ चलना शुरू हुआ , छेड़छाड़, के साथ पुराने किस्से भी याद आए ,हर छुवन के साथ दोनों एक-दूसरे के और करीब आते जा रहे थे।
रिहान ने कहा मदहोशी भरे लहजे में,
“तुम्हारे साथ ये वक्त… हमेशा इतना खास क्यों लगता है?”
आलिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—“क्योंकि यहाँ सिर्फ तुम और मैं ,हम हैं।”
उनके बीच की दूरी अब सिर्फ नाम की रह गई थी।
रिहान के हाथ आलिया के शरीर पर चल रहा था और आलिया के गोलाई माप रहा था , आलिया बिना किसी झिझक के उसके करीब थी , रिहान की उत्तेजना बढ़ रही थी , और आलिया के कंधे पर कपड़े हटाकर चुमने लगा , आलिया ने मदहोशी में कहा “काश ये रात यहीं ठहर जाए…” फिर रिहान ने हल्के से उसके बालों को सहलाया—
“ मेरे बस में होता… तो मैं इसे कभी खत्म नहीं होने देता…”कमरे में सिर्फ उनकी धीमी साँसें और दिल की धड़कनें गूंज रही थीं।
बाहर की दुनिया जैसे कहीं दूर छूट गई थी…
उस रात उन्होंने किसी जल्दबाज़ी में नहीं… बल्कि हर पल को महसूस करते हुए,
अपनी नज़दीकियों से उस शाम को सच में हसीन बना दिया…
रात अब और भी गहराने लगी थी…
कमरे की हल्की रोशनी में रिहान और आलिया एक-दूसरे के करीब थे दोनों एक दूसरे के शरीर को छू रहे थे आलिया ने रिहान के ब्लेजर और शर्ट निकाल कर उसको चूमने लगी …”कमरे में फिर एक मीठी खामोशी छा गई…
रिहान ने आलिया को काउच पर पटक दिया और उसके ऊपर के हिस्से का कपड़ा नीचे खिसका दिया और आलिया के गोरे गोरे गोलाईयों से खेलने लगा दोनों हाथों में भरकर और आलिया के होंठों पर पैसोनिक किस करने लगा आलिया भी कम नहीं थी उसने भी रिहान के जीभ को अपने जीभ से उलझा दिया था और रिहान के पीठ पर निशान छोड़ रही थी ...
उस रात उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं की…
बस हर पल को अपने दिल में उतारते जा रहे थे एक-दूसरे की मौजूदगी को महसूस करते और उस एहसास को जीते हुए…
रिहान के दोनों हाथों पर लड्डू थे वो कभी लड्डू को होंठों से लगाकर आलिया को बेचैन कर रहा था कभी होंठों को होंठों पर रखकर आनंद ले रहा था ,प्रेम जो पूरे शबाब पर थी ,दो दिल एक मादक एहसास में खोए हुए थे...
आलिया चीखने लगी - मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहा मेरे अंदर आओ प्लीज़... लेकिन रिहान मज़ा लें रहा था उस आनंद को वो खुद भी इतना तप रहा था उसके हथियार अकड़ चुके थे वो भी अपने मंजिल पर जाने के लिए उग्र हो रहा था ...
आलिया रिहान को धक्का दिया, रिहान थोड़ा दूर हुआ तो आलिया उठकर रिहान को पटक दिया और उसके कपड़े हटाकर नाजुक से जगह पर बेतहाशा चूमने लगी और अपने होंठों को लगाने लगी ...
रिहान से तड़प उठा और आलिया के कपड़े फाड़कर फेंक दिया और उसे गोद में उठा बिस्तर पर ले जाकर पटक दिया उसके शरीर पर कोई पर्दा नहीं बचा था रिहान राक्षस बन गया था उसने अपने भी कपड़े निकाल कर फेंक दिया और आलिया पर टूट पड़ा...
आलिया जैसे चीखती रिहान को मृगा याद आता और वो जानवर की तरह पेश आने लगा रिहान के नजरों में आलिया अब मृगा का रूप ले लिया था और आलिया को निचोड़ रहा था आलिया को मज़ा भी आ रहा था तो कभी सज़ा लग रहा था ...
मृगा घर आई थी मां और बहनों से मिलने वो रात के खाना खाते समय अपने मां से बोली ," मां , मैं कहीं और काम ढूंढ लेती हुं ..??
मां बिस्तर पर बैठे खाना खा रही थी और मृगा के बहने मृगा के साथ जमीन पर बैठे खाना खा रही थी , मृगा के बात सुनकर मां ने कहा," बेटा , तुम्हें और पंद्रह हजार के पगार पर कोई काम नहीं देगा वरना मैं ही आसपास काम करती तुम लोगों को छोड़कर वहां क्यों जाती ,ये बस्ती है यहां रोज कमाने खाने वाले होते हैं या सरकारी नौकरी करने वाले यहां इतने पैसे नहीं मिलेंगे मृगा , तुम्हें मेरे ठीक होते तक काम करना है मैं ठीक हो जाऊंगी तो चली जाऊंगी तुम कहीं नौकरी के लिए पता कर लेना फिर...
जारी है कहानी...