जंगल - 36 Neeraj Sharma द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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जंगल - 36

-------------------------------- "उलझन " उपन्यास जरूरी नहीं सब को पसंद ही आये, हो सकता है जो आप सोचते हो, वो नहीं हो.... आज लोगों की समस्या कया है " पोर्न कुछ देखा जाये.... " देख कर कया करते है, सोचते है, हम ऐसा कयो नहीं कर पाते... " बेवकूफ लोग है। "सोचते है जयादा ---- ये नहीं सोचते कि वो कया कितनी शिफ्ट लगी होंगी... कितने एक्शन बोलेगे... फिर कही जा कर फ़िल्म पोर्न तैयार होंगी।" कोई फर्क नहीं पड़ता..." बहुत तो ऐसा कहते है, स्त्री को कोई फर्क नहीं पड़ता... कयो ? यही उलझन आज सब के सामने रख रहा हूँ... कयो नहीं फर्क पड़ता " सुन कर सब चुप हो गए होंगे। "बोलू तो मै ही " चलो सुन लो... सुनाता हूँ। "आखियो के दायरो मे कलापन वो महिला की कमजोरी को ही प्रगट करता है " सुन रहे हो... "उसमे नूर और सकून खत्म हो जाता है " समझें हो या नहीं..... आदमी को मिलता रहे खाने को, और औरत का जिक्र कयो नहीं होता... सोच कर देखो।
                              " बच्चे के बाद वो खत्म हो जाती है... " पर किसी का धयान नहीं है मेरी ये बात पर। सास बोलेगी " मेरे सात बच्चे थे। " पूछो तो करते कया है ---- " किस्मत सब की गॉड ने लिखी होती है। " 
"मान ता हूँ मैं भी " पर एक समझदार "आदमी और जोरू दो से जयादा कभी करते ही नहीं.... " सच बोल रहा हूँ। छोटी फेमली और बोझ बड़ा ही है... सातों का कितना होगा..." कया करते होंगे वो सब.... "

                              चलो साथ मेरे बनारस चलते है... सीडीओ का सकून ले। गंगा की लहरों की ध्वनि भगती की तरंगे सुने..." वाह शिव की काशी... बनारस।" कितना आंनद ही आंनद... घंटीयो की आवाजे बाज़ारो मे सुन जाती है... गुनगुनाती चिड़िया शिव की नाम लीला... बच्चों की तारियो को देखना एक बार तो आँखो मे ताजगी आ जाती है... "बनारस की बड़ी बड़ी दुकानों मे शिव लीला का जाप.... वाह "

                         गंगा माँ सब के पाप काटती है... "करो न तो बहुत बढ़िया... " अब कहा से शरू करू चलो खुद ही हो जाएगी... मंदिर मे शिवलिंग देख कर आँखो मे एक नयी तृप्ति आ गयी थी। आसमान नीला दुपहर का वक़्त.... मेरी मस्ती आँखो की शिवलिंग को निहारे जा रही थी। बहुत अनाद की अनुभूति हो रही थी। दो कालज की स्टूडेंट ही लगी मुझे वो तो... लेडीज़ थी.. उन्हों ने भी हसते हसते डुबकी लगा दी थी... पर नहाने के बाद नीचे जीन पहने था ऊपर सफ़ेद सूट, मुझे अच्छा नहीं लगा... मैंने जल्दी से निगहा घुमा ली, दूसरी और... वो होड़ होड़ कर हसती रही... उसका शरीर जो पांच भूतों से बना था प्रगट रूप मे..... मैंने आँखे बंद कर ली। शिव शिव का जाप करने लगा.... ज़ब आँख खुली तो सूर्य धीरे धीरे मंदिर के पीछे जा रहा था... धीमे धीमे नीचे। मै इतनी देर कहा चला गया था... मुझे कुछ पता नहीं था। " भोले जैसे आपकी हसरत वैसे ही सब होता है " घंटिया वजनी शुरू और नगारे वजने शुरू हो चुके थे। आरती भोले की शुरू हो चुकी थी.... आज इतना आनंद था अल्फाजो मे ब्यान नहीं कर सकता था।                         (1---चलदा )