दोहा:१७
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥
कथा: "जरूरत और लालच की लकीर"
एक गांव में एक लकड़हारा रहता था। वह रोज़ जंगल जाता, लकड़ियाँ काटता और उन्हें बेचकर जो मिलता उससे अपना और अपने परिवार का पेट भरता। वह हमेशा खुश रहता था। एक दिन उसे जंगल में एक जादुई मटका मिला, जो हर रोज़ सोने का एक सिक्का देता था।
लकड़हारे की ज़रूरतें पूरी होने लगीं, पर उसके साथ ही उसका लालच भी बढ़ने लगा। उसने लकड़ियाँ काटना छोड़ दिया। अब वह हर समय यही सोचता कि काश ये मटका दिन में दो सिक्के दे, या दस सिक्के दे। वह दिन-रात मटके के पास बैठा रहता। उसने अपने दोस्तों की मदद करना बंद कर दिया, यहाँ तक कि उसके घर आने वाले भूखे मुसाफिरों को भी वह दुत्कार कर भगा देता ताकि उसका ध्यान मटके से न हटे। वह अमीर तो हो गया, पर उसकी शांति छिन गई। अब वह सोने के ढेरों के बीच भी 'भूखा' और डरा हुआ महसूस करता था।
सीख :
यह दोहा 'गरीबी' का नहीं, बल्कि 'पर्याप्तता' (Sufficiency) का उत्सव है।
हमारा अहंकार कभी 'बस' (Stop) कहना नहीं जानता। उसे और चाहिए, और ज़्यादा चाहिए। कबीर यहाँ भगवान से विलासिता (Luxury) नहीं माँग रहे, वे 'संतुलन' माँग रहे हैं। वे कह रहे हैं कि मुझे उतना ही दो जितने में मेरा परिवार सम्मान से जी सके और मेरे दरवाज़े पर आने वाला कोई व्यक्ति खाली हाथ न जाए।
आज के उपभोक्तावादी (Consumerist) युग में यह बात समझना बहुत ज़रूरी है। जब तुम ज़रूरत से ज़्यादा इकट्ठा करने लगते हो, तो वह धन तुम्हारी सुरक्षा नहीं, तुम्हारी 'बेचैनी' बन जाता है। असली अमीरी वह नहीं है कि तुम्हारी तिजोरी कितनी भरी है, बल्कि वह है कि क्या तुम्हारा मन इतना भरा हुआ है कि तुम दूसरों के साथ बाँट सको? 'मैं भी भूखा न रहूँ'—यह स्वाभिमान है, और 'साधु न भूखा जाय'—यह तुम्हारी करुणा है।
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दोहा:१८
कथनी थोथी जगत में, करनी निकसी सार।
कथनी तजि करनी करै, विष से अमृत होय॥
कथा: "बिना चखे शहद"
एक बहुत बड़ा पंडित था जो गाँव-गाँव जाकर 'शहद' की मिठास पर प्रवचन देता था। वह घंटों बोलता कि शहद कैसा दिखता है, उसके औषधीय गुण क्या हैं और उसे खाने से कैसी स्फूर्ति आती है। लोग उसकी बातें सुनकर प्रभावित तो होते, पर किसी के जीवन में कोई बदलाव नहीं आता था।
एक दिन एक छोटे बच्चे ने भरी सभा में पूछा, "पंडित जी, आपने शहद के बारे में इतना बताया, पर क्या आपने कभी उसे चखा है?" पंडित सकपका गया। सच तो यह था कि उसने केवल शहद के बारे में किताबें पढ़ी थीं, उसे कभी चखा नहीं था। उसी सभा में एक अनपढ़ किसान बैठा था, जिसने कभी प्रवचन नहीं दिया था, लेकिन वह रोज़ शहद का सेवन करता था। किसान मुस्कुराया और बोला, "साहब, शब्दों से मिठास नहीं आती, मिठास तो उसे चखने (अनुभव) से आती है।" पंडित को समझ आ गया कि उसके शब्द 'थोथे' (खोखले) थे क्योंकि उसके आचरण में वो अनुभव नहीं था।
सीख :
हमारा समाज 'कथनी' के शिकार लोगों से भरा हुआ है। हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं—ईमानदारी पर, प्रेम पर, अध्यात्म पर। लेकिन जब बारी 'करने' की आती है, तो हम बिल्कुल उलट व्यवहार करते हैं।
"तुम्हारे शब्द तुम्हारी जेब में रखे 'नकली नोट' की तरह हैं, जिनकी बाज़ार में कोई कीमत नहीं है।" कबीर कह रहे हैं कि बोलना बहुत आसान है, लेकिन उसे जीना (Execution) ही असली 'सार' है।
अगर तुम ज़हर जैसे कड़वे स्वभाव को अमृत जैसा बनाना चाहते हो, तो शब्दों का जाल बुनना बंद करो और छोटे-छोटे सही कदम उठाना शुरू करो। जो तुम कहते हो, अगर वह तुम्हारे काम में नहीं दिखता, तो तुम सिर्फ़ एक शोर मचा रहे हो। दुनिया तुम्हारे उपदेशों से नहीं, तुम्हारे उदाहरण (Example) से बदलती है।
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अगले अध्याय में: उस 'अहंकार' की आखिरी परत, जो भक्ति के पर्दे के पीछे छुपी होती है।"