अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 10 Shivraj Bhokare द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 10

दोहा:१९

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करै कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय॥

कथा: "शर्तों वाली भक्ति"

एक बहुत बड़ा व्यापारी था, जिसका मन हमेशा मुनाफे और वासनाओं में उलझा रहता था। उसे किसी ने कह दिया कि 'भक्ति' करने से पुण्य मिलता है और व्यापार में बरकत होती है। उसने घर में एक शानदार मंदिर बनवाया और रोज़ दो घंटे पूजा करने लगा।
लेकिन पूजा के दौरान भी उसका मन तिजोरी की चाबियों, दुश्मनों से बदला लेने और नए सौदों में लगा रहता। वह सोचता, "मैंने इतना चढ़ावा चढ़ाया है, अब तो भगवान को मेरा काम करना ही पड़ेगा।" एक दिन एक फकीर उसके द्वार पर आया और बोला, "सेठ, तुम भक्ति नहीं कर रहे, तुम भगवान के साथ 'डील' (deal) कर रहे हो। भक्ति कोई व्यापार नहीं है जिसे तुम अपने लालच और क्रोध के साथ कर सको। भक्ति तो वह आग है जिसमें तुम्हें अपनी पुरानी पहचान जलानी पड़ती है।" व्यापारी को समझ आया कि वह अपनी शर्तों पर सत्य को पाना चाहता था, जो कि मुमकिन ही नहीं था।

सीख :

भक्ति को हमने बहुत सस्ता और आसान समझ लिया है। हम सोचते हैं कि थोड़ा मंदिर हो आए या कोई मंत्र पढ़ लिया, तो हम 'भक्त' हो गए। कबीर यहाँ साफ मना कर रहे हैं।
जब तक तुम्हारे भीतर कामनाएँ (Desires), क्रोध और लालच अपनी जड़ें जमाए बैठे हैं, तब तक तुम्हारे अंदर भक्ति के लिए जगह ही नहीं है। भक्ति कोई 'साइड-बिजनेस' नहीं है जो तुम अपने बाकी विकारों के साथ-साथ कर लोगे।

कबीर कहते हैं कि भक्ति कोई 'सूरमा' (Warrior) ही कर सकता है। क्यों? क्योंकि असली युद्ध बाहर नहीं, अपने ही 'जाति, वर्ण और कुल' के अहंकार के खिलाफ है। अपनी सामाजिक पहचान और अपनी ईगो (Ego) को दांव पर लगाना सबसे बड़ी बहादुरी है। जो खुद को मिटाने को तैयार नहीं, वह उस विराट सत्य से कैसे जुड़ सकता है? भक्ति का मतलब है—स्वयं को पूरी तरह विसर्जित कर देना।
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दोहा: २०

कबीरा गरब न कीजिए, कबहूँ न हँसिए कोय।
अजहूँ नाव समुद्र में, का जानै का होय॥

कथा: "किनारे की चूक"

एक बहुत ही अनुभवी नाविक था जिसने अपनी पूरी उम्र समुद्र की लहरों से लड़ते हुए बिताई थी। उसे अपनी कुशलता पर इतना भरोसा हो गया कि वह खुद को समुद्र का 'मालिक' समझने लगा। एक बार वह एक विशाल जहाज लेकर किनारे के बहुत करीब पहुँच गया था। बंदरगाह की रोशनी साफ दिखाई दे रही थी।

नाविक ने गर्व से चिल्लाकर कहा, "देखो! मैंने फिर से समुद्र को हरा दिया। अब तो हम पहुँच ही गए, अब मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" वह जश्न मनाने लगा और उसने जहाज के पतवार (Steering) पर ध्यान देना छोड़ दिया। तभी अचानक पानी के नीचे छिपी एक अदृश्य चट्टान से जहाज टकरा गया। किनारे से महज़ कुछ मीटर की दूरी पर जहाज डूबने लगा। डूबते हुए नाविक को समझ आया कि जब तक पैर ठोस ज़मीन पर न पड़ जाएँ, तब तक जीत का अहंकार करना सिर्फ़ मौत को दावत देना है।

सीख :
यह दोहा आपकी किताब का सबसे ज़रूरी 'अलार्म' (Alarm) है। अहंकार की सबसे बड़ी चाल यही है कि वह आपको जीत के करीब पहुँचकर 'असावधान' कर देता है।
कबीर कह रहे हैं—'गरब न कीजिए'। कभी घमंड मत करो कि तुमने बहुत कुछ जान लिया है, या तुम बहुत बड़े भक्त या सफल इंसान बन गए हो। और कभी दूसरों की नाकामयाबी पर मत हँसो, क्योंकि तुम भी उसी 'जीवन रूपी समुद्र' में हो जिसमें वो हैं।
जब तक सांस चल रही है, तुम्हारी नाव बीच समंदर में है। अभी खतरा टला नहीं है। अध्यात्म की यात्रा में भी कई लोग सोचते हैं कि "अब तो मुझे बोध हो गया," और यहीं उनका पतन शुरू हो जाता है। कबीर सिखाते हैं कि आखिरी दम तक विनम्र और सजग (Alert) रहो। 'का जानै का होय'—यानी अनिश्चितता ही जीवन का स्वभाव है। यहाँ सुरक्षित वही है जो हमेशा होश में है।
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इन 20 दोहों में से किस दोहे ने आपकी सोच को सबसे ज़्यादा बदला? कमेंट में ज़रूर बताएँ। आपकी एक समीक्षा (Review) अन्य पाठकों के लिए मशाल का काम करेगी।