दोहा:१५
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥
कथा: "ऊँचाई का खालीपन"
एक नगर में एक बहुत ऊँचा और विशाल खजूर का पेड़ था। उसे अपनी लम्बाई पर बड़ा गर्व था। वह आसमान की ओर देखता और ज़मीन पर उगे छोटे-छोटे पौधों को हिकारत से देखता। एक दिन तपती दुपहरी में एक थका हुआ मुसाफ़िर वहाँ से गुज़रा। वह साये की तलाश में था, पर खजूर का पेड़ इतना ऊँचा और उसकी पत्तियाँ इतनी ऊपर थीं कि नीचे ज़मीन पर ज़रा भी छाँव नहीं थी।
मुसाफ़िर ने ऊपर लगे फलों की ओर देखा, पर वे इतनी दूर थे कि उसे पत्थर मारना भी मुमकिन नहीं था। वह मुसाफ़िर प्यासा और बेहाल होकर आगे बढ़ गया और बुदबुदाया, "ऐसी ऊँचाई का क्या फायदा, जो न धूप से बचा सके और न भूख मिटा सके।" खजूर का पेड़ अपनी जगह खड़ा रहा—ऊँचा तो था, पर एकदम अकेला और व्यर्थ।
सीख :
अहंकार हमेशा 'ऊँचा' होना चाहता है। वह चाहता है कि उसके पास सबसे बड़ी डिग्री हो, सबसे बड़ा बैंक बैलेंस हो और सबसे बड़ा पद हो। लेकिन कबीर पूछते हैं—इस 'बड़प्पन' का अर्थ क्या है?
अगर तुम्हारी सफलता किसी और के काम नहीं आ सकती, अगर तुम्हारी अमीरी किसी का दुख कम नहीं कर सकती, तो तुम बस उस खजूर के पेड़ की तरह हो—दिखने में बड़े, पर असल में बेकार।
सच्ची महानता 'पद' में नहीं, 'उपयोगिता' (Utility) में है। एक छोटा सा झाड़ू का पौधा खजूर से बेहतर है क्योंकि वह कम से कम ज़मीन को छाँव तो देता है। कबीर कह रहे हैं कि अगर तुम अपनी ऊँचाई के साथ विनम्र और उदार (Giving) नहीं हुए, तो तुम्हारी सफलता महज़ एक सजावट है, सार्थकता नहीं।
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दोहा: १६
चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाय।
वैद बिचारा क्या करे, कहाँ तक दवा लगाय॥
कथा: "भीतर का चोर"
एक बार एक स्वस्थ और हट्टे-कट्टे आदमी को एक तांत्रिक ने मज़ाक में कह दिया, "अरे, तुम्हारे चेहरे पर तो पीलापन दिख रहा है, कहीं तुम्हें कोई लाइलाज बीमारी तो नहीं लग गई?" वह आदमी घर आया और बस उसी एक बात के बारे में सोचने लगा। उसे लगा कि सच में उसका शरीर कमज़ोर हो रहा है।
धीरे-धीरे उसने खाना-पीना कम कर दिया और दिन-रात इसी फ़िक्र में रहने लगा कि "अब मेरा क्या होगा?" हफ़्तों बाद वह सच में इतना बीमार हो गया कि बिस्तर से लग गया। बड़े से बड़े डॉक्टर (वैद्य) आए, उन्होंने जाँच की और कहा कि शरीर में कोई बीमारी नहीं है, सब ठीक है। लेकिन वह आदमी मानने को तैयार नहीं था। उसकी 'चिंता' उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रही थी। अंत में डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए और कहा, "मैं दवा शरीर की दे सकता हूँ, तुम्हारे डरे हुए मन की नहीं।"
सीख :
चिंता को कबीर ने 'डाकिनी' (डायन) कहा है। क्यों? क्योंकि यह बाहर से नहीं आती, यह तुम्हारे भीतर ही पैदा होती है और तुम्हारा 'करेजा' यानी तुम्हारी जीवन-शक्ति को कुतर-कुतर कर खा जाती है।
आज के समय में हम जिसे 'स्ट्रेस' या 'एंजायटी' कहते हैं, कबीर उसे सदियों पहले पहचान चुके थे। वे कह रहे हैं कि दवाइयाँ केवल शरीर के लक्षणों को ठीक कर सकती हैं, लेकिन जो आग तुम्हारे विचारों ने सुलगाई है, उसे कोई डॉक्टर नहीं बुझा सकता।
अहंकार हमेशा 'भविष्य' को कंट्रोल करना चाहता है, और जब वह ऐसा नहीं कर पाता, तो चिंता पैदा होती है। कबीर की सलाह साफ़ है—होश में आओ। जो हुआ नहीं है, उसके डर में आज को मत जलाओ। चिंता चिता के समान है; अंतर बस इतना है कि चिता मुर्दे को जलाती है और चिंता जीवित को।
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