The Deathless and His Shadow - 10 Dewy Rose द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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The Deathless and His Shadow - 10

भाग 10: परीक्षा चार, सच्चाई का बोझ


चौथे दिन की सुबह चंद्रनगर में एक अजीब सी नमी लेकर आई। रात की बारिश के बाद हवा भारी थी, और वर्मा हवेली के बरामदे में बैठे तीनों को एक अजीब सी बेचैनी घेरे हुए थी।

"सच्चाई," मृया ने फुसफुसाया, अपने नए सोने की गुलाब को घुमाते हुए जो उसे कल मिला था। "मुझे लगता है मैं सच्चाई से डरती हूँ।"

विजय ने अपनी लॉकेट को खोला, जिसमें मृया की तस्वीर थी। "शायद हम सभी डरते हैं। क्योंकि सच्चाई हमेशा वह नहीं होती जो हम चाहते हैं।"

आर्यन ने अपनी नई घड़ी देखी, जिसकी सुइयाँ आज विचित्र रूप से धीरे चल रही थीं। "पर सच्चाई के बिना हम कैसे आगे बढ़ेंगे? अगर हमें नहीं पता कि हम कौन हैं, तो हम कैसे जानेंगे कि हम कहाँ जा रहे हैं?"

तभी, हवा में वही सिहरन दौड़ गई। पर आज यह सिहरन अलग थी, यह एक कंपकंपी थी, जैसे कोई बड़ी घटना होने वाली हो।

सामने की हवा फटी, और एक पोर्टल खुला। पर इस बार यह पोर्टल काला और सफेद था, आधा अंधेरा, आधा उजाला।

काली और सुवर्ण एक साथ प्रकट हुए, पर आज उनके चेहरे गंभीर थे।

"चौथी परीक्षा का समय," काली ने कहा। "सच्चाई का सामना। तैयार रहो, क्योंकि यह तुम्हें बदल देगी।"

सुवर्ण ने आगे बढ़कर कहा: "और याद रखो, कभी-कभी सच्चाई सिर्फ एक परिप्रेक्ष्य होती है। तुम्हारी सच्चाई तुम्हारी अपनी है।"

पोर्टल ने तीनों को निगल लिया, और इस बार वे अलग-अलग जगहों पर गए।

°°°°°

आर्यन खुद को एक पुस्तकालय में पाया। यह कोई साधारण पुस्तकालय नहीं था, यह अनंत था। हर तरफ किताबों के रैक अनंत तक जा रहे थे, और हर किताब पर एक नाम लिखा था।

सुवर्ण एक रैक के पास खड़ा था, उसके हाथ में तीन किताबें थीं।

"यह है जीवन-पुस्तकालय," सुवर्ण ने कहा। "हर जीवित प्राणी की कहानी यहाँ लिखी है। और तुम्हारी... तुम्हारी कहानी बहुत लंबी है।"

उसने पहली किताब आर्यन को दी। उस पर लिखा था: "आर्यन वर्मा, वर्तमान जन्म।"

आर्यन ने किताब खोली। उसमें उसकी पूरी ज़िंदगी लिखी थी, उसका जन्म, उसके माता-पिता की मृत्यु, उसकी मेडिकल की पढ़ाई, उसकी बीमारी, मृया से मुलाकात... सब कुछ।

"यह तो मेरी ज़िंदगी है," आर्यन ने कहा।

"पर सिर्फ इस जन्म की," सुवर्ण ने कहा। "अब यह देखो।"

उसने दूसरी किताब दी। इस पर लिखा था: "अरिंदम, दूसरा जन्म। 1890-1923।"

आर्यन ने किताब खोली। उसमें एक युवक की कहानी थी, अरिंदम, एक डॉक्टर जो ब्रिटिश भारत में काम करता था। और उसकी प्रेमिका... मैत्रेयी। और उसका दोस्त... विजय।

"यह..." आर्यन की साँस अटक गई। "यह मैं था?"

"हाँ," सुवर्ण ने कहा। "और यह देखो तीसरी किताब।"

तीसरी किताब पर लिखा था: "अरुण, पहला जन्म। 1650-1689।"

इस किताब में एक राजपूत योद्धा की कहानी थी, अरुण। और उसकी पत्नी... मैया। और उसका भाई... वीर।

"तीन जन्म," सुवर्ण ने कहा। "तीन बार तुम तीनों मिले। और तीन बार... तुम अलग किए गए।"

"क्यों?" आर्यन ने पूछा, उसकी आवाज़ काँप रही थी।

"क्योंकि तुम्हारा बंधन प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है," सुवर्ण ने कहा। "एक मानव, एक मृत्यु दूत, और एक भटकती आत्मा... तुम तीनों अलग-अलग दुनिया के हो। पर तुम हर जन्म में एक साथ आ जाते हो।"

"पर इस बार हम अलग नहीं हुए," आर्यन ने कहा।

"अभी नहीं," सुवर्ण ने कहा। "पर तुम्हें चुनाव करना होगा। अगर तुम सच्चाई जान लेते हो, तो तुम्हें यह तय करना होगा, क्या तुम इस चक्र को तोड़ोगे? या फिर तुम फिर से अलग होने का रिस्क लोगे?"

आर्यन ने तीनों किताबों को देखा। तीन जन्मों का दर्द। तीन बार का अलगाव।

"मैं... मैं नहीं जानता," उसने कहा।

"तो फिर सोचो," सुवर्ण ने कहा। "और याद रखो, तुम्हारा निर्णय सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं, बल्कि तीनों के लिए होगा।"

°°°°°

मृया की दुनिया अलग थी। वह एक सफेद कमरे में थी, और सामने एक बड़ा शीशा लगा हुआ था।

काली शीशे के पास खड़ी थी। "तुम्हारी सच्चाई सबसे जटिल है, मृया। क्योंकि तुम दोनों हो, मैत्रेयी और मृया। एक इंसान और एक दूत।"

"मैं कौन हूँ?" मृया ने पूछा।

"देखो," काली ने कहा।

शीशे में एक दृश्य दिखाई दिया। मैत्रेयी, 1923 में, वर्मा हवेली में। वह विजय से प्यार करती है, पर उसके पिता को यह मंजूर नहीं।

फिर दृश्य बदला। मैत्रेयी की मृत्यु। उसकी आत्मा उठती है... और फिर कुछ अजीब होता है।

दो आत्माएँ बनती हैं। एक मैत्रेयी की आत्मा, जो शांति से अगले जन्म की ओर जाती है। और दूसरी... एक खाली खोल, जिसमें मैत्रेयी की यादें और दर्द भर जाते हैं।

"यह दूसरी आत्मा... वह तुम हो," काली ने कहा। "तुम मैत्रेयी नहीं हो। तुम उसकी यादों का संग्रह हो। उसके दर्द का प्रतिबिंब।"

मृया पीछे हट गई। "नहीं... यह सच नहीं हो सकता। मैं मैत्रेयी हूँ। मुझे याद है..."

"तुम्हें जो याद है वह उसकी यादें हैं," काली ने कहा। "तुम वह नहीं हो जो याद करती है। तुम वह हो जो याद किया जा रहा है।"

मृया का सिर चकरा गया। अगर वह मैत्रेयी नहीं है, तो फिर वह कौन है? एक प्रेत? एक भ्रम?

"पर मैं महसूस करती हूँ," उसने कहा, आँसू उसकी आँखों में थे। "मैं प्यार करती हूँ। मैं दर्द महसूस करती हूँ।"

"हाँ," काली ने कहा, उसकी आवाज़ में दया थी। "क्योंकि यादें भावनाएँ लेकर आती हैं। और तुम शुद्ध याद हो। शुद्ध भावना।"

"तो फिर... मेरा आर्यन और विजय से क्या रिश्ता है?"

काली ने शीशे को छुआ। दृश्य बदला। अब इसमें पिछले जन्म दिख रहे थे।

"हर जन्म में, मैत्रेयी की आत्मा विजय और आर्यन (या उनके पिछले रूप) से मिलती है। और हर बार, जब वह मरती है, तो उसके दर्द से एक नया प्रतिबिंब बनता है। तुम... तुम उन सभी प्रतिबिंबों का संग्रह हो।"

"मैं... मैं एक भ्रम हूँ?" मृया ने पूछा, उसकी आवाज़ टूट रही थी।

"नहीं," काली ने कहा। "तुम एक सच्चाई हो। एक दर्दनाक, खूबसूरत सच्चाई। पर सच्चाई तुम्हारी पहचान नहीं बदलती। तुम वही हो जो तुम हो, मृया। चाहे तुम किसी की याद ही क्यों न हो।"

मृया ने शीशे में अपना प्रतिबिंब देखा। वह वही थी, गहरी आँखें, दुखभरी मुस्कान।

"तो फिर... मैं क्या करूँ?"

"तुम्हें चुनाव करना होगा," काली ने कहा। "क्या तुम इस सच्चाई को स्वीकार करोगी? या तुम इसे नकारोगी? और अगर तुम स्वीकार करोगी... तो क्या तुम फिर भी आर्यन और विजय के साथ रहना चाहोगी? जानते हुए कि तुम वह नहीं हो जिसे वों प्यार करते हैं?"

मृया ने जवाब नहीं दिया। उसे जवाब नहीं पता था।

°°°°°

विजय की दुनिया सबसे कठिन थी। वह एक अंधेरे कमरे में था, और सामने... उसके पिता, राजेंद्र वर्मा खड़े थे।

पर यह राजेंद्र का भूत नहीं था। यह उसकी आत्मा थी, अब शांत और दुखी।

"विजय," राजेंद्र ने कहा।

"पिताजी," विजय ने कहा, उसकी आवाज़ में नफरत और दर्द का मिश्रण था।

"मुझे माफ़ करना," राजेंद्र ने कहा। "मैंने तुम दोनों को मार डाला।"

"हाँ," विजय ने कहा। "तुमने किया।"

"पर एक सच्चाई है जो तुम नहीं जानते," राजेंद्र ने कहा।

सुवर्ण प्रकट हुआ। "विजय, तुम्हारा पिता... वह तुम्हारी रक्षा कर रहा था।"

"रक्षा?" विजय हँसा, एक कड़वी हँसी। "उसने मुझे जहर दे दिया! वह कैसी रक्षा है?"

"तुम्हें एक शाप से बचाने के लिए," सुवर्ण ने कहा। "तुम्हारे और मैत्रेयी के बंधन से।"

विजय चुप रहा। शाप?

राजेंद्र ने आगे बढ़कर कहा: "मुझे पता था, बेटा। मुझे पता था कि तुम और मैत्रेयी पिछले जन्मों से जुड़े हो। और हर बार जब तुम मिलते हो... तुम दोनों मर जाते हो। एक भयानक मृत्यु।"

"क्या?" विजय ने पूछा।

सुवर्ण ने अपना हाथ उठाया, और हवा में दृश्य दिखाई दिए।

पहला जन्म: वीर और मैया। दोनों को युद्ध में मार दिया गया।

दूसरा जन्म: विजय और मैत्रेयी। दोनों जहर से मरे।

"हर बार," सुवर्ण ने कहा। "हर बार तुम दोनों मिलते हो, और हर बार तुम मर जाते हो। एक शाप।"

राजेंद्र ने आँखें मूँद लीं। "जब मुझे पता चला... मैंने सोचा अगर मैं मैत्रेयी को मार दूँ, तो शायद तुम बच जाओगे। पर तुम... तुमने आत्महत्या कर ली।"

"मैंने आत्महत्या नहीं की!" विजय चिल्लाया। "तुमने मुझे मारा!"

"नहीं," राजेंद्र ने कहा। "मैंने तुम्हें जहर दिया, हाँ। पर वह जहर नहीं था। वह एक दवा थी जो तुम्हें बेहोश कर देती। मैं चाहता था कि तुम भाग जाओ। पर तुम... तुमने खुद ही जहर पी लिया। मैत्रेयी की मृत्यु से दुखी होकर।"

विजय का दिमाग सुन्न हो गया। क्या यह सच था? क्या उसने खुद आत्महत्या की थी?

"तुमने मैत्रेयी की चिता पर जहर पी लिया," राजेंद्र रोते हुए बोला। "मैं तुम्हें रोक नहीं पाया। और इसलिए... मैं दोषी हूँ। पर मेरा इरादा तुम्हें बचाना था। उस शाप से बचाना।"

विजय गिर गया, उसके घुटने जमीन पर टिक गए। सारे सालों का गुस्सा... क्या वह गलत था?

"पर शाप..." विजय ने फुसफुसाया।

"हाँ," सुवर्ण ने कहा। "एक शाप जो तुम तीनों को जोड़ता है। आर्यन, मृया, और तुम। तीनों हर जन्म में मिलते हो। और हर बार... हादसा होता है।"

"तो फिर इस बार?" विजय ने पूछा।

"इस बार अलग है," सुवर्ण ने कहा। "क्योंकि इस बार मृया मैत्रेयी नहीं है। वह एक दूत है। और आर्यन... वह मर नहीं सकता। शायद... शायद इस बार तुम इस चक्र को तोड़ सकते हो।"

"पर कैसे?"

"तुम्हें चुनाव करना होगा," सुवर्ण ने कहा। "क्या तुम इस सच्चाई को स्वीकार करोगे? और अगर करोगे... तो क्या तुम फिर भी उनके साथ रहना चाहोगे? जानते हुए कि तुम्हारा प्यार एक शाप हो सकता है?"

विजय ने जवाब नहीं दिया। उसे जवाब नहीं पता था।

°°°°°

तीनों फिर से हवेली के बरामदे में थे। शाम हो चुकी थी, और हवा में एक भारीपन था।

वे घंटों से चुपचाप बैठे थे। हर एक अपनी सच्चाई को पचा रहा था।

आखिरकार, मृया बोली: "मैं... मैं मैत्रेयी नहीं हूँ।"

विजय ने देखा। "मैं जानता हूँ। मैंने भी सुना।"

आर्यन ने सिर उठाया। "और मैं... हम तीनों पिछले जन्मों से जुड़े हैं। एक शाप की तरह।"

एक लंबी खामोशी छा गई।

फिर विजय बोला: "क्या हमें अलग हो जाना चाहिए? क्या यही सही है?"

"मैं नहीं जानती," मृया ने कहा, आँसू उसकी आँखों में थे। "अगर मैं वह नहीं हूँ जिसे तुम प्यार करते हो... तो फिर तुम मुझे क्यों प्यार करोगे?"

आर्यन ने उसका हाथ थामा। "क्योंकि तुम मृया हो। चाहे तुम किसी की याद ही क्यों न हो। तुम वही हो जिससे मैंने प्यार किया। जिसने मुझे बचाया।"

"पर शाप..." विजय ने कहा।

"शाप तोड़ा जा सकता है," आर्यन ने कहा। "हम इस बार अलग हैं। मैं मर नहीं सकता। मृया एक दूत है। और तुम... तुम एक आत्मा हो। शायद यही वह बदलाव है जिसकी ज़रूरत थी।"

"पर क्या हम रिस्क ले सकते हैं?" मृया ने पूछा। "क्या हम फिर से हादसे का कारण बन सकते हैं?"

तीनों चुप रहे।

तभी, काली और सुवर्ण प्रकट हुए।

"तुमने चौथी परीक्षा पार कर ली," काली ने कहा। "तुमने सच्चाई का सामना किया।"

"पर हमें निर्णय नहीं लेना था?" विजय ने पूछा।

"तुमने लिया," सुवर्ण ने कहा। "तुमने एक-दूसरे का हाथ थामा रखा है। यही तुम्हारा निर्णय है।"

उन्होंने देखा, तीनों का हाथ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था। अवचेतन में, उन्होंने अपना चुनाव कर लिया था।

"कल," काली ने कहा। "पाँचवी परीक्षा। क्षमा। और यह भी कठिन होगी, क्योंकि इसमें तुम्हें उस व्यक्ति को क्षमा करना होगा जिसने तुम्हें सबसे ज्यादा चोट पहुँचाई है।"

वे गायब हो गए।

तीनों हाथ जोड़े बैठे रहे। रात गहरा रही थी, और सच्चाई का बोझ उन पर भारी पड़ रहा था।

पर एक चीज़ स्पष्ट थी, वे अलग नहीं होना चाहते थे।

शाप हो या भाग्य, वे एक साथ रहना चाहते थे।

भले ही इसकी कीमत कुछ भी हो।


रात को, जब सब सो रहे थे, हवेली की छत पर एक छाया प्रकट हुई।

यह राजेंद्र वर्मा की आत्मा थी।

उसने नीचे बरामदे में सोए हुए तीनों को देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।

"माफ़ करना," उसने फुसफुसाया। "मैंने तुम्हें बचाना चाहा था। पर मैंने तुम्हें मार डाला।"

और फिर वह गायब हो गया, एक आशीर्वाद छोड़कर जो तीनों को ढक गया।

एक आशीर्वाद जो शायद, सिर्फ शायद, उनके शाप को तोड़ सकता था।