भाग 1: वह जो मरना भूल गया
आधी रात का समय था, पर शहर कभी सोता नहीं था। एम्स के तेरहवीं मंजिल के ऑपरेशन थियेटर की चमचमाती लाइटें अब धुंधली पड़ने लगी थीं। डॉ. आर्यन वर्मा ने अपने हाथों के लेटेक्स दस्ताने उतारकर कूड़ेदान में फेंके। आठ घंटे की लगातार सर्जरी थी - एक चालीस वर्षीय महिला का दिल बदलना, जिसकी बायीं निलय अब काम करने से इनकार कर चुकी थी। शरीर थका हुआ था, पर मन उससे भी ज्यादा।
"सब ठीक है, डॉक्टर साहब?" सिस्टर अनिता ने पूछा, जो अभी तक सारे औजार साफ कर रही थी।
आर्यन ने सिर हिलाया। "वेंटिलेटर पर है। अगले चौबीस घंटे निर्णायक हैं।"
उसकी आवाज़ में वही यंत्रवत शांति थी जो पिछले सात वर्षों से उसकी पहचान बन चुकी थी। पर आज कुछ अलग था। छाती के बीचों-बीच एक खोखलापन, जैसे कोई उसके अंदर का कुछ हिस्सा धीरे-धीरे खींच रहा हो। शायद सिर्फ थकान थी। या शायद वह बीमारी जिसका नाम अभी तक कोई नहीं जान पाया था।
छत की ओर जाती सीढ़ियों पर उसके कदमों की आवाज़ गूंज रही थी। हर शिफ्ट के बाद यहाँ आना उसकी आदत बन चुकी थी, ऊँचाई से शहर की लाइटों को देखना, हवा में साँस लेना, और यह याद दिलाना कि वह अभी जीवित है। पर आज रात हवा में एक असामान्य ठंडक थी। जून की गर्मी में यह अजीब था।
दरवाजा खोला तो चाँदनी ने सफेद फर्श पर एक चांदी-सा रास्ता बना रखा था। आर्यन ने अपना लैब कोट कसकर पहना और छत के किनारे की ओर बढ़ा। नीचे, शहर की गर्दन में धँसी गाड़ियों की लाल-पीली आँखें टिमटिमा रही थीं।
तभी अचानक वह एहसास हुआ।
कोई पीछे खड़ा है।
उसकी रगों में बहता खून जैसे जम गया। यह कोई मरीज का अटेंडेंट नहीं हो सकता था, रात के दो बजे छत पर? सुरक्षा गार्ड भी इतनी ऊँचाई पर नहीं आते।
"कौन है?" आर्यन की आवाज़ हवा में लटक गई।
पलटकर देखा तो वहाँ कोई नहीं था। सिवाय चाँदनी के, जो अब एक अजीब तरीके से झिलमिला रही थी, जैसे गर्मी के दिनों में तपती सड़क पर हवा का टेढ़ापन दिखता है। एक जगमगाहट, एक विकृति।
पर वह खाली जगह नहीं थी।
आर्यन ने अपनी कलाई घड़ी की ओर मोड़ी। ओमेगा सीमास्टर, उसके पिता की विरासत। घड़ी की सुइयाँ रुकी हुई थीं। ठीक 3:07 बजे।
"यह..." उसने धीरे से कहा, और फिर उसकी साँसें रुक गईं।
चाँदनी के ठीक बीच, हवा काँप रही थी। धीरे-धीरे, आकार ले रही थी। पहले तो सिर्फ एक धुंधली छाया, फिर मानवीय आकृति का अंदाज़ा, और अंततः...
एक युवती।
वह सफेद कुर्ते जैसा कुछ पहने हुए थी, पर कपड़ा नहीं, बल्कि धुंधली चांदनी जैसा लग रहा था। उसके बाल हवा में तैर रहे थे, पर हवा नहीं चल रही थी। और उसकी आँखें... आर्यन ने कभी इतनी गहरी, इतनी उदास आँखें नहीं देखी थीं। वे सीधे उसकी ओर देख रही थीं, पर देख नहीं रही थीं, वे तो उसके भीतर झाँक रही थीं, उसकी आत्मा के अंधेरे कोनों तक पहुँच रही थीं।
"तुम..." आर्यन ने फुसफुसाया।
युवती ने हाथ उठाया। उसकी उँगलियाँ लंबी और पतली थीं, और उनके सिरे से एक हल्की सी रोशनी निकल रही थी, नीले और चांदी के मिश्रण जैसी। वह रोशनी आर्यन की ओर बढ़ी, उसके सीने की ओर।
और तभी कुछ हुआ।
रोशनी जैसे ही उसके कोट से टकराई, वह बिखर गई। जैसे किसी अदृश्य कांच के शीशे से टकरा कर। चिंगारियाँ बिखरीं और फिर खत्म हो गईं।
युवती की आँखों में हैरानी थी। उसने फिर कोशिश की। इस बार दोनों हाथों से। नीली रोशनी की एक मोटी किरण निकली, जो सीधे आर्यन के हृदय की ओर बढ़ी।
आर्यन ने अपनी छाती पर हाथ रखा। एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी, पर दर्द नहीं। बल्कि... एक शांति। जैसे कोई बहुत पुराना दर्द दूर हो रहा हो।
रोशनी फिर से बिखर गई।
युवती पीछे हट गई। उसके चेहरे पर अब सिर्फ हैरानी नहीं, बल्कि डर भी था। उसने अपने हाथ देखे, फिर आर्यन को देखा, और धीरे-धीरे पीछे की ओर खिसकने लगी।
"रुको!" आर्यन ने कहा, और एक कदम आगे बढ़ाया।
पर वह बहुत देर था। युवती का आकार धुंधला पड़ने लगा। चांदनी में घुलने लगा। आखिरी पल में, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आई, जिज्ञासा और दुख का मिला-जुला भाव।
और फिर वह गायब हो गई।
आर्यन अकेला खड़ा था, हाँफता हुआ। उसकी घड़ी फिर से चलने लगी थी, टिक, टिक, टिक। उसने अपनी छाती पर हाथ रखा। दिल तेजी से धड़क रहा था, पर अजीब बात थी, वह जो थकान और खोखलापन महसूस कर रहा था, वह कम हो गया था। जैसे कोई उसके अंदर से जहर निकाल रहा हो।
वह जीवित था।
सचमुच जीवित, पहली बार बहुत दिनों बाद।
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दूर, अस्पताल के उसी परिसर के एक पुराने बरगद के पेड़ की छाया में, वह युवती फिर से प्रकट हुई। अब उसका रूप और भी धुंधला था, जैसे बुझती हुई मोमबत्ती की लौ।
उसने अपने हाथ देखे। वह रोशनी जो हजारों आत्माओं को शांति से उनके अगले जन्म तक पहुँचा चुकी थी, आज पहली बार नाकाम हो गई थी।
"कैसे?" उसने खुद से पूछा, आवाज़ इतनी धीरी कि हवा के झोंके में खो सी गई। "उसके अंदर... जीने की इच्छा इतनी प्रबल क्यों है?"
उसने अपनी याददाश्त को टटोला। वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ खालीपन। सफेद, अनंत, दर्दरहित खालीपन। वह कौन थी? कब से यह काम कर रही थी? क्यों कर रही थी? कोई जवाब नहीं।
पर आज पहली बार, उस खालीपन में एक दरार आई थी।
जैसे ही वह रोशनी आर्यन से टकराकर लौटी थी, उसके मन में एक छवि कौंधी थी, लाल गुलाब। बारिश में भीगा हुआ एक लाल गुलाब।
वह गुलाब कहाँ से आया? किसका था? क्यों यह याद अचानक आई?
युवती ने आर्यन की ओर देखा, जो अब छत से उतरकर अंदर जा रहा था। उसकी चाल में एक नई दृढ़ता थी।
"तुम्हारा नाम क्या है?" युवती ने फुसफुसाया, हालाँकि वह जानती थी कि वह उसे सुन नहीं सकता।
पर तभी, हवा में एक आवाज़ गूंजी। कोई नहीं, सिर्फ उसके अपने मन की आवाज़, पर वह आवाज़ उसकी नहीं लगती थी।
"मृया..."
युवती चौंक गई। मृया? क्या यह उसका नाम था? या फिर... क्या यह उस इंसान के मन में उसके लिए आया हुआ नाम था?
उसने अपने हाथों को सामने किया। उन पर लिखा हुआ नहीं, छपा हुआ था, जैसे त्वचा के नीचे से रोशनी आ रही हो - "आर्यन वर्मा। समय: अनिश्चित।"
अनिश्चित? यह कभी नहीं हुआ। हर इंसान की एक तिथि होती है। एक समय। एक क्षण। पर इस आदमी के सामने "अनिश्चित" लिखा था।
मृया (क्या वह सचमुच मृया थी?) ने एक लंबी साँस ली, हालाँकि उसे साँस लेने की ज़रूरत नहीं थी। उसने तय किया। वह इस आर्यन वर्मा को देखेगी। समझेगी। क्योंकि पहली बार, इस अनंत खालीपन में, कुछ तो हुआ था।
और पहली बार, उस खालीपन में एक सवाल उठा था।
कौन हूँ मैं?
और वह कौन है जो मरना भूल गया?