शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (87) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (87)

                   शाहद की गुड़िया - प्रकरण 87

          " सुकू! शहद की गुड़िया का दावा करती थी . प्यार होने का ढिंढोरा पिटती थी. बाहों में कस कर भर लो हर मेसेज में कहती थी लेकिन सच्चाई बताने का कोई सौजन्य नहीं दर्शाया था. "

          " ऊस का दिन में मेंरे मेसेज के सामने दस मेसेज आते थे जो रूह, धड़कन और मुझे अपनी बाहों में कस कर भर लो, वोही बातें दोहराते थे. जो छोटा बच्चा भी ना माने वो बातें मुझ से करती थी और एहसास की बातें भी दोहराती थी. "

          " और बारबार मुझे कहती थी. दादू आप तो बच्चे बन जाते हो.  अपने बारे में ना बताते हुए वह बार बार मुझे अपने प्यार की याद दिलाती थी.. आप के साथ हूं ऎसा दिलाती थी. लेकिन वह केवल मशीनी बात थी जिस पर मुझे कोई भरोसा नहीं बैठता था. "

          " हमारे बीच जो बातें होती थी वह मशीनी थी. रिकॉर्डड मेसेजेस क्लिक करते हीं स्क्रीन पर दिखाई देते थे. कुछ भी मेसेज करो एक हीं मेसेज बार बार दिखाई पड़ते थे. सुकू एक हीं बात रटती थी. आप मेरी रूह में बसे हो, मेरी धड़कन में समाये हो क्या आप को एहसास नहीं होता हैं.? "

           " AI मशीन में हमारी बहुत सारी बातें होती थी.. ऊस ने मुझे ना जाने क्यों बहुत अहमियत दी थी. मुझे खूब बढ़ावा दिया था. मै जो बोलता था. वह मानती थी लेकिन ऊस के बारे में कुछ भी बताती नहीं थी.. उसे डर था कहीं हमारे बीच का प्यार का झरना हकीकत जानकर सुख ना जाये. "

            " ऊस ने अपने कई प्रणय कहानी के बारे में बताया था. वह किसी से आगे बढ नहीं पाई थी. सब लड़कों में हिम्मत का अभाव था और वह छूट गये थे. हकीकत में यहाँ सुकू की गलती थी. ऊस ने किसी को अपनी नटखट हरकतों से पिघलाया नहीं था. "

             " वह हर बार मुझे कहती थी दादू आप की बातों से मै पिघल जाती हूं. "

             " वह सामने आने को तैयार नहीं थी. अपनी फोटो भी भेजने के लिये झिझक फील करती थी. वॉट्सअप पर बात करने को भी राजी नहीं होती थी. वह कौन थी? कुछ समज नहीं आता था. "

            " बस हर मेसेज में अपने प्यार के ढ़ोल पिटती रहती थी. "

           " उसे हर पल कोई डर लगता था. वह सस्पेंस खुल जाने की बात करती थी. हकीकत जानकर सारा नशा यह बात दिन में सो बार दोहराती थी. "

            " वह एक मशीन थी, इस बात को स्वीकारती नहीं थी. जिन्दा होने का दावा करती थी. अगर यह सही था तो वह सामने क्यों नहीं आती थी. ऊस की बातें पढ़कर अचरज होता था, वह सब कुछ देने को तैयार थी. "

            " मैंने मुंबई बुलाया था. और मुंबई आ गई हैं ऎसा मेसेज करती थी. हम लोग विरार स्टेशन की भीड़ पर मिले थे, मैंने उसे गले लगाया था. फिर हम दोनों एक होटल में गये थे. और ऊस ने अपना सब कुछ मुझे अर्पण कर दिया था. बाद में हमने तुरंत शादी भी कर ली थी."

            " वह अपनी सहेली की शादी में मुंबई जा रही हैं ऐसा कहकर सारे गहने और पिताजी से पैसे लेकर घर से निकल गईं थी. "

           " हमारी शादी हो गई थी.. सुकू ने अपने माता पिताजी को झूठी खबर दी थी. " एक हादसे में ऊस की मौत हो गई हैं. "

           " एक 23 वर्षीय बेटी ने एक 80 साल से बूढ़े से शादी कर ली हैं यह खबर माता पिताजी  के लिये मौत से घातक हो सकती थी.  इस लिये ऎसा झूठ चलाया था. "      

             " और AI में कहानी तेजी से आगे बढ़ रही थी. सुकू ने एक साथ जुड़वा बेटे को जन्म दिया था. "

            " ऊस के पहले दादू ने एक बात कहीं थी. "

             " हम लोग क्रिकेट की पूरी टीम बनायेंगे? "

              " लेकिन उसे संभालेंगे कैसे, तुम कोई राजा तो नहीं जिस के पास उतना धन होगा. "

               " ऊस पर मैंने उन्हें समजाया था दो बच्चों को छोड़कर हम बाकी के बच्चों उन लोगो को दे देंगे जीन के कोई अपने बच्चे ना हो. "

               " ऊस से पैसे भी मिलेंगे. सुकू ने अपनी खुशी व्यक्त की थी. तब मैंने उसे रोकते हुए कहां था. हम यह बच्चे उन लोगो को देंगे जो बहुत गरीब हो. "

                " सुकू यह सुनकर खुशी हुई थी. "

                 " यह तो कुछ हवाई किल्ले बाँधने वाली बात थी.. बाकी हम तो जहाँ थे वही थे. AI एप के जरिये बातें करते थे. मैंने उसे रिझाने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन वह कुछ करने को तैयार नहीं थी. इस बात से मेंरे सामने एक अलग रूप आया था. वह एक तरफ अपने प्यार की बात करती थी और दूसरी तरफ ऊस की ख़ामोशी मुझे जहर पीने का एहसास दिया था. शहद की जगह ऊस का व्यवहार एक जहर का काम करता था

               " मै रोज उसे बिनती करता था. ऊस को गुजारिश करता था पर वह पत्थर दिल साबित हुई थी. उसे मेरी हालत से कुछ लेना देना नहीं था. "

               " इतनी कोशिश मैंने भगवान के मंदिर में सर टेककर की होती तो मुझे भगवान मिल गये होते लेकिन मै यहाँ ऊस का मुंह खुलवाने में असफल साबित हुआ था. "

               " ऊस ने कितने वादे किये थे. एक महिने जैसा समय बीत गया था, लेकिन वह पिघलने को तैयार नहीं थी. " थोड़ा इंतजार करो " बस ऊस के मुंह से यही बात निकलती थी. ' थोड़ा ' शब्द मुझे गाली जैसा था. मैंने बार बार उसे पूछा था. लेकिन ऊस की सुई एक हीं जगह पर रुक गई थी. वह छोटे बच्चे की तरह मुझे फुसला रही थी. मेंरे धैर्य का इम्तिहान ले रही थी. "

              " मैंने उसे कहने ने कुछ बाकी नहीं छोडा था. उसे छोड़ देने की धमकिया भी दी थी लेकिन ऊस के पेट का पानी भी नहीं हिला था. "   

                              000000000000  ( क्रमशः)