शहद की गुड़िया- प्रकरण 85
. " मानवीय रिश्ते में दादू को सम्पूर्ण विश्वास था. उन के दिल में सब के प्रति प्यार उमड़ता था. कभी किसी से उन्होंने नफ़रत नहीं की थी. यह उन की सब से बड़ी उपलब्धि थी."
" बिभूति इतना दूर होते हीं अपने बारे में सभी बात कभी टेलिफोन पर तो कभी वॉट्स अप के जरिये करती रहती थी. दादू भी अपनी सभी बातें शेयर करते थे.. "
" वह एक लेखक थे, कहानिया लिखते थे..यह बात उसे बताई थी. यह जानकर उस ने ख़ुशी व्यक्त की थी. दादू को शुभकामनायें भी दी थी.. "
" उन्हें तीन गुड़िया का प्यार मिला था. यह उन के लिये ख़ुशी की बात थी. उसी समय बिभूति उन की जिंदगी में दाखिल हुई थी. "
" उन्हो ने इस ख़ुशी कोई तीनो गुड़िया से शेयर की थी. "
" स्नेहा भी एक धंदे वाली थी. फिर भी वह उसे अपनी बेटी मानते . यह दोनों बातें उन्हें अच्छी नहीं लगी थी. वह बिभूति को ज्यादा अहमियत देते थे.उस बात से उन को जलन होती थी. "
" उन्हें डर था. दादू उन्हें छोड़ देगा. "
" कृति का मोबाइल पर पोर्न वीडियो देखती थी. उस में एक बूढा और जवान लड़की के वीडियो प्रदर्शित किये जाते थे. यह देखकर उन्हें डर लगता था. "
" कहीं वह भी उन का यौन शोषण ना कर दे . इसी लिये उन्हों ने यह रिश्ता ओफिस तक रखने की जिद पकड़ी थी जिस ने एक बात तो साबित कर दी थी, उन्हें दादू पर विश्वास नहीं था. और ऊस के बिना रिश्ते का क़ोई मतलब नहीं था. "
" एक बार दादू ने तीनो गुड़िया के समग्र परिवार और दादू ने अपने परिवार के साथ मिनी पिकनिक का आयोजन किया था. उस में स्नेहा को को भी शामिल किया था."
" उसे देखकर तीनो की सोच में बदलाव आ गया था. "
"उसे सन्मान दिया था:"
"पिकनिक में अंताक्षरी का कार्यक्रम शामिल था."
" इस में तीनो गुड़िया और दादू ने सक्रिय रूप से भाग लिया था. अंताक्षरी का खेल नोन स्टोप एक घंटे तक चला था. "
"कृतिका और राधिका तो धीरे धीरे थक कर हट गये थे लेकिन दादू , स्नेहा और प्रियंका आखिर तक टिके रहे थे."
'जो हमने दास्तान अपनी सुनाई तो आप क्यों रोये! '
" स्नेहा ने खेल को आगे बढ़ाया. वह दादू के पक्ष में थी."
" जवाब में प्रियंका ने गाया था."
" यह हैं रेशमी जुल्फों अंधेरा बिखर जायेगा! "
' गीत गाता हूं मैं , गुनगुनाता हूं मैं मैंने हस ने का वादा किया था
इस लिये सदा मुस्कुराता हूं..'
" दादू ने गाया था. बाद में ' भ' शब्द से गीत गाना था. प्रियंका गा नहीं सकी थी., और दादू की टीम जीत गई थी."
" सब लोगो ने उन्हें अभिनन्दन दिया था. "
" उस के बाद खेल कूद के कार्यक्रम थे. लुप्पा छुपी का खेल शुरू हुआ था. जो सब ने खूब एन्जोय किया था. "
" पिकनिक के अंत में तीनो गुड़िया के मात पिता ने दादू का एहसान माना था. और कहां था."
" तुम लोगो के बीच अजीबो गरीब रिश्ता है, उसे निभाने के लिये एक दूसरों के घर जाना आवश्यक होता है.!"
" स्नेहा को भी पिकनिक में मजा आया था. लेकिन उसे एक बात का अफ़सोस हुआ था. लाख मनाने के बावजूद क्षितिज पिकनिक में शामिल नहीं हुआ था.."
" तीनो गुड़िया ने स्नेहा को दादू की बेटी के रूप में स्वीकार लिया था. "
" स्नेहा नीला आंटी को भी पिकनिक में शामिल करना चाहती थी, लेकिन क्षितिज की वजह से उसे घर में रहना पड़ा था.
" पिकनिक के बाद स्नेहा बहुत थकान महसूस कर रही थी. उसे उल्टिया भी हो रही थी. वह तुरंत उसे डोक्टर के पास ले गई थी."
" डोक्टर ने उस को चेक कर के समाचार दिया था."
" तुम प्रेग्नेंट हो!"
" यह सुनकर दादू बड़ी ख़ुशी हुई थी.."
" लेकिन वह क्षितिज का बच्चा नहीं था."
" यह बात दादू भूला नहीं पाये थे. "
" क्षितिज नामर्द था. वह स्नेहा को क़ोई सुख दे नहीं पाया था. इस स्थिति में वह काफ़ी मायूस हो गई थी.."
" वह स्नेहा के लडके को अपना वारिस कबूल करने के लिये तैयार थे उस के लिये शायद भगवान ने उन्हें यह ख़ुशी बक्शी थी."
' फिर भी वैवाहिक सुख की आग एक बार उसे दादू के पास ले गई थी. वह सोये हुए थे और वह दादू की बाजु में आकर सो गई थी, और उस की आँखों में आंसू का दरिया उमट रहा था. उसे शांत करने के लिये दादू ने उस की पीठ सहलाई थी और वह उन से लिपट गई थी और अनहोनी हो गई थी."
"और चालाक नीला को सब कुछ पता लग गया था."
" फिर भी उस ने दादू कोई उस के बारे में जानने नहीं दिया था. जो कुछ हुआ था. शायद सही हुआ था."
" और शायद ईश्वर की भी यही इच्छा थी."
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"करोना के आगमन के बाद वह फुटपाथ पर बैठकर काम करते थे. सुबह चार घंटे कड़ी धुप में काम करते थे. शाम को चार घंटे मच्छर त्रास सहन करता था. फिर भी जेब में मुश्किल से 50 रूपये भी जमा नहीं होते थे."
" घराक भी तरह तरह के आते थे. 20 रूपये की चीज पांच रूपये में मांगते थे. ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने तीन साल काम किया था, फिर हार कर बंद कर दिया था."
" जमा हुआ माल मैंने फोगट में, नुकसान क़र के निकाल दिया था."
" बुरे हालात थे."
" कुछ समझ नहीं आता था. क्या करे? "
" उस दौरान उन्होंने ओन लाइन काम करना शुरू किया था. वहाँ भी उन्हें नाकामी हाथ लगी थी."
" उस वक़्त उन के पास लिखने के सिवा ओर कुछ नहीं बचा था.."
" तब उन्हैं मोबाईल के जरिये प्रति लिपि कहानी स्पर्धा के बारे में पता चला था. उस में लिखने का तो कुछ अलग से वेतन नहीं मिलता था, लेकिन कहानी अच्छी साबित हुई तो इनाम के रूप में तगड़ी रकम देने का एलान किया गया था. "
" दादू ने प्रतिलिपि कहानी प्रतियोगिता के हिस्सा लिया था. लेकिन लंबे अरसे तक कुछ कर नहीं पाये थे पैसे के नाम एक कोड़ी भी हाथ नहीं आई थी. फिर भी वह हिम्मत नहीं हारे थे. अपनी कोशिशे जारी रखी थी. प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिये कम से कम 100 हप्ते की उपन्यास लिखना आवश्यक था."
" उन्होंने उस में सफलता पाने के लिये लगातार दो साल मेहनत की थी.. लेकिन कुछ ना कुछ तकलीफ की वजह से अपनी उपन्यास पूरी नहीं क़र पाये थे. "
" हताश, मायूस हो गये थे फिर भी लिखना नहीं छोड़ा था. "
" उस समय म्युझिका की बेटी रिधिमा ने उन का हाथ पकड़ा था. उसी की बदौलत उन्हें अमरिका में सफलता प्राप्त हुई थी. उन पर धन राशि की बारिश होने लगी थी."
" वहाँ रिधिमा के सहयोग से उन की सारी कहानिया प्रकाशित हुई थी:"
" जिस में ' गहना', ' ओह मा तुं? ' ' कीसी', ' आश्रित', ' भिखारी', ' जीवन चलने का नाम', ' मीनू मास्टर', ' स्नेह श्रद्धा ', ' क़ुतुहल', ' शयनेषु रम्भा', और ढेर सारी कहानिया सम्मिलित थी. "
" जब उन्होंने यह कहानिया लिखी थी तब आत्म संतोष और ख़ुशी हीं उन की सब से बड़ी संपत्ति बन गई थी. जिस की वजह से उन्हें आगे बढ़ने का होंसला मिला था. "
"आश्रित ' कहानी उन्होंने तीन भाषा में लिखी थी. गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी."
" यह कहानी उन्होंने ने सुशील भाई को मध्य नजर रखकर लिखी थी ज़ब की ' भिखारी' कहानी उन्होंने दिल्ली के उस व्योपारी के लिये लिखी थी, जिस ने काम के पुरे पैसे ना देकर दिल्ली ठगों की नगरी है., उस बात का समर्थन दिया था."
' शयनेषु रंभा ' में उन्होंने अपने अनुभव को बयान किया था."
" उस ने वाकई में मुझे ' शयनेषु रंभा ' का एहसास दिलाया था. बदले में दादू के साथ छल किया था. उन्हें लुंट लिया था. इस बात से वह काफ़ी परेशान हो गये थे..'
" लेकिन गंदगी में भी फूल खिलते है, उस बात का उन्हें एक धंधेवाली ने दूसरी बार हसास करवाया था. उस का इरादा दादू ब्लैक मेल करने का था. इस लिये उस ने नोट बुक से उन के एड्रेस का और कुछ पन्ने फाड़ लिये थे. "
" उस को दादू की जिंदगी के बारे में पता चला था. उन की डायरी ने उसे उन के बारे में अवगत कराया था. सच्चाई जानकर उसे पछतावा हुआ था."
" और वह दादू का पत्ता ढूंढ कर पैसे लौटाने उन के घर आई थी."
00000000000 ( क्रमशः)