क्या सब ठीक है?
*************************************************
यह किताब उन अनकहे सवालों और अधूरी बातों का संग्रह है, जिन्हें हम अक्सर अपने अंदर दबाकर जीते रहते हैं।
हर कहानी हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी एक सच्चाई को सामने लाती है - रिश्तों की खामोशी, दूरियाँ, और वो एहसास जिन्हें हम शब्द नहीं दे पाते।
यहाँ आपको कोई हीरो या परफेक्ट अंत नहीं मिलेगा,
बल्कि ऐसे किरदार मिलेंगे जो बिल्कुल हमारी तरह हैं - थोड़े उलझे हुए, थोड़े थके हुए, पर फिर भी आगे बढ़ते हुए।
यह कहानियाँ आपको सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि खुद को महसूस करने के लिए लिखी गई हैं।
शायद कहीं न कहीं, हर पन्ने पर आपको अपनी ही ज़िंदगी की झलक मिले।
क्योंकि सच तो यही है - हम सब बाहर से ठीक दिखते हैं,
पर अंदर कहीं न कहीं एक सवाल हमेशा रहता है…
क्या सब ठीक है?
*************************************************
कहानी: गलती मेरी नहीं थी
Mail बहुत छोटा था।
"Due to organizational restructuring…
your role has been impacted…"
बस इतना ही।
ना call, ना कोई discussion।
वो कुछ सेकंड तक screen को देखता रहा।
जैसे कुछ छूट गया हो… या शायद कुछ और लिखा होना चाहिए था।
लेकिन नहीं था।
पाँच साल पहले…
पहली job मिली थी - 3.5 लाख।
घर की हालत ऐसी नहीं थी कि options हों।
इसलिए ये job उसके लिए choice नहीं थी… ज़रूरत थी।
वो जल्दी समझ गया था -
यहाँ टिकना है, तो reliable बनना पड़ेगा।
और वो बन गया।
Office में वो उन लोगों में था
जो quietly काम करते हैं।
Time पर आना,
late तक रुकना,
“बस ये खत्म कर लूँ” बोलकर खुद को push करना-
ये सब उसकी आदत बन गया।
Weekend, late night, production issue -
उसने कभी “ना” नहीं कहा।
क्योंकि उसे पता था -
उसके पास “ना” बोलने की luxury नहीं है।
धीरे-धीरे लोग उसे जानने लगे।
“काम दे दो, कर देगा।”
“Dependable है।”
उसे अच्छा लगता था ये सुनकर।
क्योंकि यही उसकी पहचान थी।
साल निकलते गए।
3.5 से 8 lakh…
फिर 12 lakh…
फिर 18 lakh…
हर jump के साथ
उसका confidence भी थोड़ा-थोड़ा बढ़ता गया।
पाँचवे साल तक आते-आते
उसका package 25-30 लाख हो चुका था।
अब वो सिर्फ काम नहीं करता था,
काम handle करता था।
लोग उससे पूछते थे -
“ये कैसे करना है?”
और पहली बार उसे लगा -
अब शायद वो पीछे नहीं जाएगा।
फिर धीरे-धीरे चीज़ें बदलने लगीं।
Meetings में नए words आने लगे -
“Automation”,
“AI integration”,
“Cost optimization” etc....
पहले ये सब discussions तक सीमित थे।
फिर धीरे-धीरे real होने लगे।
कुछ tools आए,
कुछ processes बदले,
और अचानक कुछ लोग “less required” हो गए।
वो समझ रहा था कि industry बदल रही है।
लेकिन उसे ये नहीं लगा था
कि वो खुद उस change का हिस्सा बन जाएगा।
और फिर वो mail आया।
उसने किसी को call नहीं किया।
क्या बोलता?
कि पाँच साल की मेहनत के बाद
उसे एक mail में replace कर दिया गया?
कि उसकी value अब एक number बन चुकी थी -
जो company afford नहीं करना चाहती?
घर पर उसने बस इतना कहा -
“project खत्म हो गया है… नया देख रहा हूँ।”
उन्होंने ज्यादा सवाल नहीं किए।
उन्हें लगा - ये normal है।
लेकिन बाहर की दुनिया normal नहीं थी।
“अरे job क्यों गई?”
“इतना experience था, फिर भी?”
“कुछ किया होगा…”
लोग सीधे नहीं कहते थे,
लेकिन उनके सवालों में छुपा होता था।
और हर सवाल के बाद
वो थोड़ा सा चुप हो जाता था।
क्योंकि उसके पास answer नहीं था -
या शायद था,
लेकिन कोई समझना नहीं चाहता था।
वो explain कर सकता था -
कि company ने cost cut किया,
कि AI tools ने कुछ काम replace कर दिया,
कि ये personal नहीं था…
लेकिन ये सब बोलने के बाद भी
लोग एक ही conclusion निकालते -
“फिर भी कुछ तो होगा…”
धीरे-धीरे उसने explain करना बंद कर दिया।
अब उसका दिन simple हो गया था -
Job portals scroll करना,
applications भेजना,
और wait करना।
कभी-कभी interview calls आते,
कभी नहीं।
हर rejection mail के बाद
वो वही line पढ़ता -
“we have decided to move forward with other candidates…”
और हर बार उसे लगता -
शायद इस बार सच में गलती उसकी थी।
रात को वो छत पर खड़ा रहता कभी-कभी।
कोई खास reason नहीं होता था।
बस थोड़ा silence चाहिए होता था।
उसे याद आता -
जब उसका package 30 लाख था,
तब किसी ने नहीं पूछा था
कि वो क्या करता है।
आज job नहीं है,
तो सबको detail में जानना है।
सबसे मुश्किल चीज़ layoff नहीं थी।
सबसे मुश्किल था -
खुद को बार-बार ये समझाना कि
"गलती मेरी नहीं थी।"
लेकिन धीरे-धीरे…
ये line भी weak लगने लगी।
क्योंकि जब दुनिया doubt करती है,
तो एक point के बाद
तुम खुद भी doubt करने लगते हो।
और अब वो उसी जगह खड़ा था
जहाँ से उसने शुरू किया था -
Difference बस इतना था कि
पहले उसे खुद को साबित करना था…
और अब उसे ये साबित करना था कि
वो गलत नहीं था।
लेकिन इस बार…
कोई सुनने वाला नहीं था।