शहद की गुड़िया- प्रकरण 72
"पिताजी का मुंबई से दूर अहमदाबाद में निधन हुआ था, उस पर लोगो को अचरज हुआ था. वह 90 के करीब पहुंच गये थे. फिर भी ज़ब चाहा तब बिना कुछ कहे, बताये निकल पड़ते थे. रास्ते में कहीं कुछ हो गया तो? उस के बारे में सोचना जरूरी नहीं समझा था. उन्हें इतनी बड़ी दुनिया में कहाँ तलाशना.? यह मेरी समस्या थी. "
"वह पुरे दिन कुछ ना कुछ टोपिक पकड कर आरती के साथ उलझते रहते थे. कुछ ना कुछ टिप्पणी करते रहते थे. बच्चों का दिमाग़ भी खाते बैठते थे. वह लोग उन्हें बर्दास्त नहीं कर पाते थे. कुछ ना कुछ संभाषण की वजह से घर मे अशांति का माहौल बना रहता था.."
" मुझे भी बात बात में टोकते रहते थे. "
" मैं क्या करता हूं? कितना कमाता हूं? उस के बारे में सवाल करते रहते थे. वह पैसे मांगेगे यह सोचकर आरती उन्हें सच्चा आंकड़ा नहीं बताती थी."
" उन की काम करने की उम्र नहीं थी. इस लिये मैंने उन्हें मना किया था."
" उन्हो ने जिंदगी में क़ोई बचत नहीं की थी. जो कुछ था वह सब खर्च कर दिया था. नौकरी छोड़ने के बाद जो भी पैसे उन्हे मिले वह हमारे लिये खर्च कर दिये थे. उन का हम पर यह एक कर्ज था, जो हम जीते जी चूका नहीं पाये थे. "
" उन्होंने आरती की बीमारी में उन्हों ने अपनी सारी मुड़ी लुंटा दी थी."
" एक बेटे की हैसियत से दादू ने अपने पिताजी को मदद करना कर्तव्य समझा था. लेकिन उन के पास जरूरत की मुड़ी के अलावा कुछ शेष नहीं बचा था. जिस ने उन्हें विवश, लाचार कर दिया था."
" आज के दौर में कोई भी रिश्ता मायना नहीं रखता था . "
" सब अपनी अपनी समस्या में उलझें रहते हैं. चाहते हुए भी क़ोई अपने मा बाप, भाई बहन के बारे में कुछ नहीं करता. कर सकता हैं तो भी करता नहीं. "
" कुछ भी हो. दादू के भीतर से एक आवाज सुनाई देती थी."
" मुझे अपने पिताजी के लिये कुछ करना चाहिये. "
"उन्हों ने पूरी जिंदगी दादू को संभाला था, जो मांगा था वह दिया था.. शायद यह बदलते समय की मेहरबानी थी. पहले सब कुछ सस्ता था."
" उन के पिताजी खुद उस के जमाने की बातें कहते थे:
" हमारे जमाने में एक पाई में पेट भर मुमरा मिल जाता था, जो समय के साथ दो रूपये, पांच रूपये में भी नहीं मिलता. पानी मुफ्त में मिलता था. लोग उस के लिये परब बांधते थे. और बदलते समय में पानी के भी पैसे देने की स्थिति निर्माण हुई हैं. "
" उन का कहना बिल्कुल सही था."
" हमारे घर में दो वक़्त का खाना मुश्किल से उपलब्ध था. उस में अतिरिक्त कुछ खाने की गुंजाईश नहीं थी. भूख लगने पर बच्चों को सुखी रोटी और चाय से गुजारा करना पड़ता था. "
"कभी स्कूल में ले जाने को कुछ नहीं होता था."
" बच्चे भी ऐसे हालात में कुछ नहीं बोलते थे."
"उन्होंने अपनी तरह से कड़ी मेहनत की थी.. वह किसी के हाथों तले काम नहीं कर सकते थे. किसी की ऊँची आवाज सुन नहीं पाते थे. ऐसी स्थिति में उन्हें कभी भी अपने जोब से हाथ धोना पड़ सकता था. "
" यह उन की नियति थी. यही उन के भाग्य में लिखा था. और वह चाहते हुए भी कुछ बदल नहीं पाये थे. "
" उन्हें बार बार बेकार स्थिति का सामना करना पड़ा था. "
' शेठ ब्रदर्स ' ज्वॉइन करने के बाद उन की हलत में सुधार आया था. उन्होंने एक मामूली टाइपिस्ट, क्लार्क से बाहर निकल कर ओफिसर का दर्जा हांसिल किया था."
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"एक बात दादू कभी भूला नहीं पाये थे. "
" उन के मौसे ने अपने मतलब के लिये दादू को काफ़ी प्रताड़ित, तंग किया था. वह कुछ काम के नहीं हैं ऐसा उन के दिमाग में भरने की हर कोई हरकत की थी. दादू आत्म विश्वास तोड़ने के लिये गंदे राज कारण का सहारा लिया था. उन्हें नीचा दिखाने में क़ोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी. "
" उन्हें हमेशा यही एहसास दिलाने का प्रयास किया था. वह बेवकूफ हैं अनाड़ी हैं. "
" उन के ऐसे रवइये ने दादू आत्म विश्वास को कुचल कर रख दिया था, जिसने उन्हें अपने आप को ' गुड़ फोर नथिंग ' मानने को विवश किया था.
" मौसी ने भी उन्हें परेशान करने में क़ोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी."
" उन दोनों ने शुरू से गीता बहन को काफ़ी तंग किया था. "
" मौसी ने अपनी सौतेली मा को अपने बस में कर लिया था. उन का ब्रेन वोश किया था. वह लोग जो कुछ कहते थे, उसे सह नहीं पाते थे, रोक नहीं सकते थे."
" मौसे ने गीता बहन का यौन शोषण किया था और उन का गर्भाशय निकलवा दिया था ताकि वह कभी मा ना बन सके. "
" गीता बहन की मा अकेली रह नहीं पाती थी. उन्हों ने अपने मतलब के लिये बड़ी उम्र तक बेटी को शादी से महफूज रखा था. "
" मौसे रमन लाल बडे गिनती बाज थे. उन का सब कुछ लुंट कर साली की शादी करवा कर बड़ा नाम कमाया था. और बदले में अपनी सासु मा की मिल्क़्त पर हाथ मारा था. और उन्हें खाली ख़म कर दिया था. "
दादू और उन के पिताजी को गीता बहन की मा मिल्कत की क़ोई लालसा या लालच नहीं थी. "
" दादू के पिताजी के दिमाग़ में भी कभी उन की मिल्कत पाने का ख्याल आया नहीं था."
" दादू अपने मौसे की हर हरकत से वाकिफ थे..
" क़ोई भी ऐसा गलत काम नहीं होगा जो उन्हों ने नहीं किया होगा."
" उन का एक छोटा भाई था. जो मानसिक रूप से अपाहिज था. शादी कर नहीं सकता था. फिर भी उन्होंने ने भाई की शादी करवा दी थी और उस की बीवी को रखैल बनाकर अपनी बीवी की तरह अपने साथ घर में रखा था."
' भाई की बीवी नीचले घराने की थी और पैसे की लालच में अपने जेठ की कठपुतली बनकर रह गई थी. "
" और रमन लाल के दोनों हाथों में लड्डू आ गये थे."
मौसी भी अपने पति को कुछ कह नहीं पाती थी.
" मौसे को सबक सिखाने की आवश्यकता थी. इस लिये उन के सारे कारनामो को कवर करते हुए उन्होंने ' दूसरा चेहरा' कहानी लिखकरl पूरी तरह नंगा कर दिया था. "
दुनिया के बाजार में आखिर चाहत भी बेकार हुई तेरे मेरे बीच ये चांदी की दीवार बनी (2)..बस्ती बस्ती परबत परबत गाता जाये बंजारा
"अपने भाई की बीवी, अपनी साली के अलावा उन के घर की कामवाली से भी उन का आड़ व्यवहार स्थापित था. यह बात का ढिंढोरा पीटा था. जिसे पढ़कर उन का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था.. "
" ज़ब क़ानून के हाथ उन की गर्दन तक पहुंचे तो उन के सारे कांड लोगो के सामने आये थे. छोटे भाई की हत्या कर के खुद को मृत साबित कर के अपने भाई का मुखवटा पहनकर सारी दुनिया से छल कपट करते रहे थे. इतना ही नहीं भाई की बीवी का यौन शोषण करना नहीं छोड़ा था. "
"लेकिन उन की नौकरानी ने सारे भेद खोल दिये थे. और उन की असलियत बाहर आ गई थी. उस स्थिति में उन को भारी दिल का झटका लगा था. और वह अपना कुछ छोड़कर मौत की नींद सो गये थे.
0000000000 ( क्रमशः)