शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (71) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (71)

                शहद की गुड़िया - प्रकरण 71

          "दादू को बिना बजह कुछ लोगो ने खूब सताया था.

          " सब से ऊस में  हसमुख का नाम था. वह एक जमाने में दादू का दोस्त था. इस लिये उन्होंने उसे सहयोग दिया था. लेकिन बदलते हालात ने दादू को अपने कदम पीछे खिंचने के लिये मजबूर किया था. "

        " तब हसमुख ने अपने मतलब के लिये सुहानी को गलत राह चलने में उकसाया था. "

        " उसे हसमुख पर अंधाधुंध विश्वास था. वह डबल गेम खेलता था, एक बाजू सुहानी को मदद करने का दावा करता था और दूसरी ओर उस के खिलाफ ललिता पवार के कान भर कर अपना मतलब साध लेने का  क़ोई मौका हाथ से जाने नहीं देता था."

        "मैंने हसमुख से दूर रहने की उसे हिदायत दी थी लेकिन वह तो पूरी तरह उस की बातों में आ गई थी. उस ने सुहानी का पूरी तरह ब्रेन वोश कर दिया था. "

        " ललिता पवार इस माया से भली भ्रान्ति बहक गये थे. वह जानते थे हसमुख को ' मौका परस्त ' था और सब जगह घुस जाता था फिर भी अपने मतलब के लिये उन्होंने ने उसे कुत्ते की तरह पाल कर रहा था. "

        " वह सब कुछ काम करता था. खरीदी में फायदा भी करता था, बोलने में मीठा शहद जैसा था.. इस लिये दादू के ससुराल में ऊस का सिक्का चलता था."

         "उस की बीवी बहुधा गांव में रहती थी. इस स्थिति में हसमुख को अलग अलग नाव में यात्रा करने का मौका मिल जाता था.

        "उस ने खुद दादू के सामने इकरार किया था."

        " एक बार गाड़ी में रात के समय उस ने किसी अनजान स्त्री के साथ पूर्णतः मजा लुंटी थी. "

         " यह तो एक बात थी. ना जाने अकेला रहकर उस ने ना जाने कितनी स्त्रीयो के साथ ऐसे नाजायज संबंध बांधे होंगे!! "

         "क़ोई ना कोई बहाने वह सुहानी के साथ रोज उस की कोलेज तक जाता था."

      "  एक बार दादू उसे चेक किया था :"

       "वह सुहानी के कोलेज जाने के समय घर में आकर खड़ा रह गया था. उस वक़्त ऊन की दूसरी साली वहाँ मौजूद रहती थी. उस ने खुद दादू को जानकारी दी थी.  हसमुख रोजाना कोलेज जाने के समय घर में आकर खड़ा रह जाता था. "

        "दोनों दादू के सामने ही कोलेज जाने निकलते थे. यह बात दादू हजम नहीं कर पाते थे.  लेकिन चुप रहने के सिवा ऊन के पास क़ोई  विकल्प नहीं था."

       " शाम को एक बार उन्होंने उसे टोका था. तो उस ने बचाव में कहां था :"

        " क़ोई मेरे कोलेज  जाते समय आकर कहें की मुझे भी तुम्हारी कोलेज की बाजु में  काम हैं.. क्या मैं साथ आ सकता हूं? तो मै क्या कोलेज जाना छोड़ दूं?"

        "उस ने झूठी दलील पेश कर के अपने जीजू ka मुंह बंद कर दिया था. वह उस की मा की कार्बन कोपी थी  वह एक पत्थर के समान थी. उस पर पानी फेंकने का क़ोई मतलब नहीं था. दादू के पास भी होठों को सीने के सिवा क़ोई विकल्प नहीं था. "

        "हसमुख को तो कुछ कहने का मा बेटी ने दादू को क़ोई अधिकार नहीं दिया था."

        " उस  की दादू ससुराल में उन से ज्यादा चलती थी! "

       "  ऊस ने अपनी पहचान का फायदा उठाकर ललिता पवार को हर चीज में डिस्काउंट दिलाकर काफ़ी पैसे बचाकर उन का दिल जीत लिया था. उस की यही आदत उस के लिये OGL ( open general licence) बन गई थी."

         "हसमुख की तरह दादू  के ससुराल में निजी लोगो का शासन चलता था. "

          " उस के लिए ललिता पवार की मतलबी सोच ज्यादातर जिम्मेदार थी. वह अपने आप को सब से ऊपर मानते थे. "

          " इस  लिये उन के अन्य रिश्तेदारों को वह घर में  आये यह बात पसंद नहीं थी. उन के ऐसे व्यवहार से हर क़ोई ने मानो उन का बहिष्कार किया था. "

          "वह सब से पिछड़ गये थे. अलग हो गये थे."

         " लेकिन उन्हें अपने बहिष्कार से कुछ फर्क नहीं पड़ा था."

          उन्हों ने जगत में एक हीं काम किया था. सब के हक के पैसे बदमाशी के बलभूते हड़प लिये थे.

          अपनी बेटियों के अधिकार को भी छिन लिया था.

                           00000000000

            " दादू ने अपनी सासु मा को अंधेरे में रखकर उन की बेटी के साथ विवाह किया था. उन दिनों दोनों के बीच व्यवहार नहीं था. ऊस लिये सासु मा की अनुमति लेने की जरूरत नहीं थी. "

             " फिर भी शादी के अगले दिन तख्ता पलट गया था. ललिता पवार ने सब कुछ भूल कर दादू को उन की बेटी के व्रत में जगराता करने के लिये आमंत्रित किया था. पूरी रात उन के घर में. पत्ता खेले थे. केरम खेले थे, शतरंज खेले थे, अंताक्षरी खेले थे. लेकिन किसी को भनक नहीं आने दी थी वह दूसरे दिन शादी करने वाले हैं. "

              " शादी सुदा लड़की को मा बाप हमेशा अच्छे संस्कार देते हैं, यहाँ तो उलटी गंगा थी. बेटी ने बिना बताये शादी की थी जो सह नहीं पाये थे. इस लिये अपनी बेटी के सामने दादू की नसीहत दी थी. "

              " तुम्हारे घर में सौतेली मा हैं कल जाकर घर से निकाल दिया तो क्या करोंगे? "

               " ऊस दादू ने उन को मुंह तोड़ जवाब दिया था. "

                " मैंने तुम्हारी बेटी से शादी की हैं अब वह मेरी जिम्मेदारी हैं आप को चिंता करने की जरूरत नहीं. "

             " जो दादू के सामने ऐसी बातें करती थी. वह पीठ पीछे ना जाने क्या करेगी? "

               " दादू ने यह किस्सा लेख के माध्यम के जरिये बयां किया था और अपनी सासु को पढ़ाया था. "

             " उन को गुस्सा तो बहुत आया था. लेकिन अपने दामाद को कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी. "

              " उन्होंने दादू के सामने कान पकड़े थे. तुम से मैं कभी नहीं जीत पाऊँगी. "

            

                     000000000000  ( क्रमशः)