छाया की परछाई राजनारायण बोहरे द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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छाया की परछाई

"कहानी-छाया की परछाइयांरिजल्ट देख कर कुमार ने राहत की सांस ली ।वह प्रथम श्रेणी में नहीं आया था फिर भी स्नातकोत्तर छात्रों में उसका दूसरा नाम था और वह भी इस कारण की महानगर की इस कॉलेज में उसने किसी को भी अपनी वास्तविक जाती नहीं बताई थी। क्योंकि वह इंटर कॉलेज और कॉलेज में अपने कस्बे में अपनी वास्तविक जाति बताने के कारण बड़ा अपमानित हुआ था। वह देख रहा है कि उसके पिता के साथ तो लोग जाति सूचक शब्दों के साथ मारपीट और गाली गुप्तार करते थे। लेकिन अब वह नौबत नहीं आती हां भीतर ही भीतर पर उसे समाज से काट देते हैं। उसने मोबाइल निकाल कर है जिगरी दोस्त विरज  को फोन लगाया। लेकिन उसने फोन रिसीव नहीं किया। घंटी जाती रही। शायद किसी काम में व्यस्त होगा। नौकरी करने वालों के साथ तो यही होता है। बीरूज ने बीए करने के बाद ही नगर निगम के ऑफिस में कंप्यूटर ऑपरेटर सहित क्लर्क की नौकरी ज्वाइन कर ली थी ।हालांकि दफ्तर में भी वृद्ध को बहुत दिनों तक रिजर्व सीट पर आने वाले आयोग उम्मीदवार का कर प्रताड़ित किया जाता रहा था, लेकिन अब वह अपने दफ्तर में एक जानकारी और सभ्य व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। पब्लिक से जुड़े सारे काम अब नगर निगम आयुक्त वीरूज को ही देते हैं।  विरोधी ने तो नौकरी ज्वाइन कर ली विपुल ने ऐसा नहीं किया था । उसने एम ए करने का ठान लिया था, ताकि किसी कॉलेज में प्रोफेसर हो सके और अपने समाज के छात्रों को बचपन से ही आत्मविश्वास तथा वास्तविकता से परिचित कराते हुए आगे बढ़ाने की प्रेरणा दे सके। उसने शहर के कुछ बड़े अफसर के बच्चों की ट्यूशन पकड़ रखी थी, जिन्हें वह पूरी रुचि से पढाता था। जब वह दसवें में था उसे एक अजीब समक सवार हुई थी कि वह अंग्रेजी को ठीक करने के लिए की जान से जुट गया था और 6 महीने के भीतर लिखने और बोलने में अंग्रेजी भाषा में उसे बड़ी अच्छी दक्षता हासिल हो गई थी। तो पिता पर वजन बने बिना उसने अपने ट्यूशन से मिले पैसों की दम पर एम ए  फॉर्म भरा था। उसने पहले एम ए इंग्लिश से करने का सोचा था। फिर जब वास्तविक उद्देश्य याद आया कि उसे तो अपने समाज और पिछड़े वर्ग के जाति बिरादरी के युवाओं को जागृत करना है तो उसमें एम ए  के बजाय इतिहास से एम ए क निर्णय किया। इतिहास विषय में जब वह पुरानी किताबें पढ़ता तो उसे कहीं भी दलित जातियों का इतिहास मे उल्लेख नहीं दिखाई देता।  वह कुडता  और अपनी तरफ से कुछ ना कुछ लिख देता। परीक्षा की कॉपी में कोर्स से बाहर स्वतंत्र विचार लिख देने की वजह से शायद परीक्षा के बैच में सबसे अच्छे स्टूडेंट होने के बाद भी उसके नंबर काट लेते थे और वह कभी भी प्रथम स्थान पर नहीं आया था । तीन सेमेस्टर यूं ही चले गए थे। अब चौथे सेमेस्टर में ही अंतिम अंक सूची बनना थी, जिसमें आखिरकार वह दूसरी रैंक पाने में सफल हो गया था। ब्रिज ने फोन नहीं उठाया तो उसने सोचा यह खुशी वह किसको बताएं? सहसा उसे याद आए अपने  बी ए कोलेज के धर्मेंद्र सर! धर्मेंद्र सर्वी दलित जाति से थे, पर उन्होंने कभी किसी को अपनी जाति नहीं बताई। जो व्यक्ति उनकी जाति जान जाता था, अगर वह हम उनका जाति भाई हुआ तो वह उसे स्टूडेंट को यही बताते थे, कि जब तक शिक्षा ले रहे हो, किसी को जाती ना बताओ! इससे केवल सामाजिक भेदभाव या क्लास में प्रताड़ना नहीं झेलना पड़ती बल्कि उन संघर्षों का सामना करने की वजह से आपकी परीक्षा की तैयारी प्रभावित होती है। अनावश्यक जगह ऊर्जा खर्च करना पड़ती है। यही सोचकर विपुल ने बी ए  करते ही अपना परिचय कुमार विपुल के नाम से देना शुरू कर दिया था । धर्मेंद्र सर ने जब फोन उठाया तो कुमार विपुल ने उन्हें अपना नव प्रचलित प्रणाम ही कहा- जय भीम सर! कुमार विपुल बोल रहा हूं। धर्मेंद्र सर ने बहुत पुष्प सटे हुए कहा जय भीम पार्टनर कैसे हो ?सर आपके उचित मार्गदर्शन की वजह से मैं एम ए बहुत अच्छे नंबरों से पास कर लिया है, यूनिवर्सिटी में शायद सेकंड रैंक होगी मेरी। क्यों की अभी रिजल्ट में भी मुझे दूसरे नंबर पर दर्शाया गया है। अगर किसी उच्च जाति वाले ने षड्यंत्र या साजिश नहीं किया तो मुझे भी पहले 10 छात्रों की मेरिट लिस्ट में जगह मिल जाएगी। ‘ऐसा ही होगा’ आत्मविश्वास से भरे धर्मेंद्र ने कहा था,   बोले ‘मैं स्टाफ रूम में हूं, तो बहुत ऊंची आवाज में बात तो नहीं कर पाऊंगा। लेकिन तुम चाहो तो मुझे बताते रहो। मैं सुनते हुये बात कर लूंगा।‘ कुमार ने कहा ‘सर आपने इजाजत दी है तो मैं उन सब संघर्षों को इस वक्त याद करना चाहता हूं, जो मैंने इंटर कॉलेज से लेकर स्नातक की डिग्री लेने तक झेले थे। ग्यारहवी दर्जा में तो जब मेरा नाम अनुसूचित जाति के  छात्रवृत्ति पाने वाले छात्रों की सूची में दर्ज पाया, तो मेरे साथ 3 महीने से बेंच पर ही पास बैठकर नाश्ता और लंच कर रहे तीन लड़के मुझसे दूर बैठ गए थे। शाम को जब मैं साइकिल लेकर निकलने लगा, तो दरवाजे पर खड़े उन तीनों ने गुर्राते हुए कहा था ‘यू रास्कल, तूने जाति नहीं बताई अपनी। हम सबको भ्रष्ट कर दिया’ मैंने  उनसे कहा था  ‘अगर तुम्हें दुख पहुंचा तो क्षमा चाहता हूं। वैसे जाति और परिवार चुनने में मेरा कोई हाथ न था।वे लोग कुछ और बोल रहे थे’ कि मैंने मुस्कुरा कर उन्हें ‘सॉरी’ कहा और चल पड़ा था। सच कहूं सर, तो मेरे इस सॉरी ने बहुत बड़े झगड़े को टाल दिया था, क्योंकि वे तीन केवल तीन न थे बल्कि 300 थे एक से विचार वाले, एक ही वर्ग वाले, एक ही वर्ण वाले। जब मेरा सॉरी उन सबके सामने गया तो उन सब का धड़कता हुआ गुस्सा लगभग शांत हो गया था। लेकिन उन 300 के अलावा के बाकी 600 छात्र ने जब अनुसूचित जाति जनजाति के छात्रवृत्ति के लिए पाए गए छात्रों की सूची में मेरा नाम देखा तो वे भी अब रास्ते चलते भी मुझसे विदक  कर दूर होने लगे थे, जानबूझकर और प्रदर्शित करते हुए। इस तरह दूर होने का उनका आशय था ‘मुझे अस्पर्श बताना, अछूत बताना। अब न तों में इस बात की शिकायत कर सकता था, न ही मेरी शिकायत का कोई असर होता था, तो मैं झेलता रहता था । एक बार स्कूल के वार्षिक अधिवेशन के  समय सार्वजनिक भोजन में जब मुझे मेरे एक सर ने बाल्टी पकड़ कर कहा ‘सबको परस दो’ तो मैंने उन्हें मना किया था कि ‘सर मेरा परसा  हुआ कोई नहीं खाएगा’ तो वह कहने लगे ‘तुम बड़े आलसी हो !’ मज़्क्सबूर हो के बाल्टी लेकर मैं पहले छात्र के सामने जाकर खड़ा ही हुआ था कि वह चौंकता हुआ खड़ा हो गया- ‘ तेरी हिम्मत कैसे हुई ?  तू अब हमारे किचन में भी घुस  आया । सबको खाना खिलाएगा।  मैंने उन सर की तरफ देखा जिन्होंने बाल्टी पकड़े थी तो वह भौंचक्का  रह गया, क्योंकि उनके चेहरे पर खुद हवाइयां उड़ी हुई थी भौंचक्का वे तुरंत ही वहां से बाहर निकल गए ।  मैंने भी ‘सॉरी’ बोलकर बाल्टी एक तरफ रखी और उसे पूरे पंडाल का परित्याग कर दिया।  कुछ दूर जाने पर वे सर मुझे दिखे।  वे हमारे वर्ण के न थे, वे राजपूत लिखते थे, लेकिन अनजाने में भी मेरे साथ खड़े हो गए थे। वे बोलने लगे ‘तुम मेरे कमरे पर आना, यहां तो कोई मुझे तुम्हारे साथ देख लेगा तो तकलीफ होगी। ‘ मैं उनके कमरे पर गया था तो उन्होंने मुझे ‘सॉरी’ बोला था और कहा था कि ‘यह सॉरी मैं नहीं बल्कि मेरा पूरा समाज बोल रहा है, जो जागरुक है, जो वास्तविकता समझता है।   इन बच्चों के दिमाग में तो घर से ही ऐसा विष भर दिया गया है सो यह मनुष्य मनुष्य में अंतर करना जानते हैं।  उस दिन राजपूत साहब के रूप में मैंने अपना एक अच्छा मित्र और मेंटर  पाया था।  जो कॉलेज में तो सदा दूर ही रहते थे बल्कि क्रूर ही रहते थे ।  बाद में उनके कारण मुझे बहुत सी किताबें पढ़ने को मिली, कोर्स में मदद मिली और सच कहूं तो इंटर की 12वीं क्लास में स्कूल का टॉपर बनने में सारा योगदान उन्ही राजपूत सर का था।  मैने जब  कॉलेज में एडमिशन लिया तो मैंने यह सावधानी रखी कि मैं किसी के खाने पीने में साथ ना जाता था।  मेरे तमाम बिरादरी भाई, अपना सरनेम न लिख कर और जाति छुपा कर सबके साथ गले में हाथ डालकर घूमते थे और उन सवर्णो   की तरह ही सवर्णो की तरह गालियां बकते थे।  जिसके  पीछे का सच कुछ दिनों में मेरे सामने आ गया ।  दरअसल जब वार्षिक  स्नेह सम्मेलन हुआ तो उन सब के पिता भी साथ आए थे और ताज्जुब था कि उन  मेरे हम जाति अठारह लोगों के पिता सूट टाई  में थे और कार से आए थे ।  निश्चित ही वे सभी किन्ही विभागों में बड़े अफसर थे।  मैं डॉक्टर अंबेडकर की यह बात तुरंत ही स्मरण करने लगा, जब उन्होंने कहा है कि हमारी जाति के और वर्ग के तमाम लोग ऐसे हैं जो जरा ही ऊंचा उठने ही अपने ही वर्ण के साथियों को अछूत कहने लगते हैं और खुद को उनसे ऊंचा उठाकर सब वर्णन बनने का ढंग करने लगते हैं ।  ऐसे लोग हमारे वर्ण के सबसे बड़े दुश्मन है। बी ए मे पढाई के दौरान कॉलेज की कैंटीन में अनेक बार यह हुआ कि मेरे वर्ण के किसी छात्र ने  जिस कांच के क्लास में चाय पी ली, मेरे ही सामने कभी कैंटीन वाले ने, तो कभी दूसरे क्लासमेट्स ने लकड़ी या हॉकी से वह ग्लास एक तरफ सरका कर  ग्लास को चूर-चूर हीं कर डाला।   उन्होंने मेरे बढ़ते जा रहे आत्मविश्वास को कर किया था  मैंने ठीक उन्हीं दिनों अकस्मात आप जैसा एक संरक्षक पा लिया था।  मैं बड़े गर्व से कहता हूं कि मेरे दो पिता हैं -एक दीनाराम और दूसरे धर्मेंद्र सर।  दीना राम ने इस शरीर को जन्म दिया है, जबकि धर्मेंद्र सर ने इस बुद्धि और मस्तिष्क को एक खास दिशा में प्रेषित किया है।  अब मुझे दलित होने में, दलित जाति से आने में एक दलित बाप का बेटा होने में किसी भी प्रकार की हीन भावना नहीं आती ।  बल्कि मुझे हंसी आती है उन लोगों पर, जो खुद को स्वर्ण कहते हैं और भले ही गाय जैसे पशु के गोबर और मूत्र तक को पवित्र मानते हो, पर समान रक्त, मज़्ज़ा  और खून से बने उसकी ही आक्रुति के मनुष्य को अछूत आसपास और घ्रर्णा  का केंद्र समझते हैं।  सर आपने सदा ही मुझे और मेरे तमाम मित्रों को वह आत्म बल दिया।  आत्मविश्वास दिया।   अब में अपने मार्ग पर बहुत ऊपर तक आ गया हूं और आशा करता हूं कि मैं भी किसी स्कूल या कॉलेज में प्रोफेसर बनूंगा और उस मार्ग पर बढ़ने की कोशिश करूंगा, जिस पर आप चल रहे हैं।  धर्मेंद्र सर ने कहा ‘ चलो मैं तुम्हें तुम्हारे मोबाइल के फोनपे पर कुछ पैसे ट्रांसफर कर रहा हूं, जिससे तुम दो जोड़ी  नए हाइ क्लास कपड़े और लगभग 2 किलो मिठाई खरीद लेना जिसे  अपने मित्रों के साथ बैठकर खाना।  कुमार के मना करते-करते फोन काट ही दिया धर्मेंद्र सर ने । लगभग 2 मिनट बाद ही टू टू की तेज गूंजती आवाज पर जब कुमार ने फोन देखा तो ₹3000 उसके फोन पर पर धर्मेंद्र सर की तरफ से आ चुके थे।  इसे देख कुमार की आंखों में आंसू झलक उठे।*  अंक सूची मिल जाने के बाद जब कुमार कॉलेज के प्रिंसिपल से मिला और उनसे निवेदन किया कि इतिहास विभाग में इसी कॉलेज में 6 पद रिक्त हैं, क्या आप अतिथि अध्यापक पद पर मुझे नियुक्त कर सकेंगे ?तो टालते हुए प्रिंसिपल बोले थे ‘जब हम विज्ञापन निकाले तुम भी फॉर्म भर देना!’ कुमार बोला था ‘सर मैं इसी कॉलेज से पढ़ा हूं और यही अगर पढ़ाऊंगा तो लाइब्रेरी ग्राउंड से लेकर मैदान ग्राउंड सतक की और  लाइब्रेरी में कहां कौन सी किताब रखी है इसकी जानकारी भी छात्रों को दे सकूंगा। ‘ प्रिंसिपल ने हंसते हुए कहा ‘कौन सी किताब कहां रखी है यह जान लेने से भला स्टूडेंट का क्या लाभ होगा ?’कुमार ने कहा सर’ किस किताब में क्या लिखा है और कौन सी किताब कहां रखी है, यह एक बहुत बड़ी जानकारी होती है।  मैं माफी मांगते हुए कहना चाहता हूं कि जिस दिन मेरी बिरादरी के लोग यह जान जाएंगे, उस दिन हम सीना तानकर बाकी पूरे वर्ग के साथ टक्कर लेने को छाती ठोक कर खड़े होंगे।‘  यह कहने का साहस कुमार में इसलिए आया था की प्रिंसिपल भी अपना नाम विश्वास मुकुल लिखते थे । अगर वह किसी ऊंचे वर्ण से होते  तो बसे अपने नाम के साथ सरनेम जरूर लगते।  अब विश्वास मुकुल लिखने के पीछे या तो उनकी जाति है छुपाने की मनसा थी, या फिर वे  बिहार के रहने वाले थे, जहां प्रथम राष्ट्र पति डॉक्टर राजेंद्र कुमार से लेकर आज तक किसी नेता और अधिकारी ने जाति का पुछल्ला  नहीं लगाया । बहरहाल कुमार को विश्वास था कि वह जल्दी ही नियुक्ति पा जाएगा।  घर बैठकर उसने कोर्स से हट्के अपने उन व्यक्तिगत पाठ के क्रम के बिंदुओं को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया, जिन्हें वह  अपने जाति बांधवो को अलग से पढ़ाएगा, और उसमें आत्मविश्वास भर देगा- ठीक धर्मेंद्र सर की ही तरह।  चौथी सेमेस्टर में पास होना उसका लक्श्य नही था, असल चीज थी आत्म बल, आत्मविश्वास और खुद को  कंडीशनिंग करने को  आने वाली पीढियां को तइयार करना, जिसके लिये वह कमर कस रहा था ।"